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जब नरेंद्र मोदी को राजी करने के लिए ओबामा ने अफ्रीकन-अमेरिकन कार्ड खेला था

जिस अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को 10 साल तक अपनी ज़मीन पर पैर रखने की इजाज़त नहीं दी, उसने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन पर से वीज़ा प्रतिबंध हटा लिए. ये वो वक्त था, जब अमेरिका की कमान बराक ओबामा के हाथ में थी और नरेंद्र मोदी स्पष्ट बहुमत के साथ भारत की सत्ता पर काबिज़ हुए थे.

इसके बाद महज़ दो साल के भीतर दोनों नेताओं के बीच 6 से ज़्यादा मुलाकातें हुईं. इनकी दोस्ती को मीडिया में ‘ब्रोमांस’ की संज्ञा दी गई. दोस्ती के इस दौर में दोनों देशों के बीच सैन्य-संसाधनों के उपयोग और जलवायु समेत कई समझौते भी हुए, जबकि दोनों औपचारिक रूप से मित्र-राष्ट्र नहीं हैं. यहां तक कि 2015 में भारत के गणतंत्र दिवस पर ओबामा ने भारत का चीफ गेस्ट बनना भी कबूल किया.

2015 में भारतीय गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में मोदी के साथ ओबामा
2015 में भारतीय गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में मोदी के साथ ओबामा

अब बराक ओबामा के 8 साल के राष्ट्रपति कार्यकाल को काफी गहरे से खंगालती एक किताब आई है. नाम है- ‘The World at It Is: A Memoir of the Obama White House’. इसे बेंजामिन जे. रोड्स ने लिखा है, जो एक पॉलिटिकल अडवाइज़र हैं और वाइट हाउस स्टाफ के सदस्य रह चुके हैं. ओबामा कार्यकाल में बेंजामिन स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन के डिप्टी नेशनल सिक्यॉरिटी अडवाइज़र थे.

बेंजामिन ने अपनी किताब में ओबामा के लिए कई कड़े निर्णयों का ज़िक्र किया है. इसमें एक घटना का भी ज़िक्र है, जिसके केंद्र में ओबामा और नरेंद्र मोदी हैं. ये किस्सा यूनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस का है, जो 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015 के बीच पेरिस में आयोजित हुई थी.

बेंजामिन जे. रोड्स की किताब
बेंजामिन जे. रोड्स की किताब

पेरिस कॉन्फ्रेंस का एक मकसद बड़े देशों को ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए सहमत करना था. बेन लिखते हैं कि समिट के आखिरी दौर में सबसे ज़्यादा ज़ोर भारत को सहमत करने पर था, जिसके अधिकारियों के साथ किसी समझौते पर पहुंचना सबसे मुश्किल था. यहीं पर ओबामा ने एंट्री ली और उन्होंने मोदी को राजी करने के लिए अपना अफ्रीकन-अमेरिकन कार्ड खेल दिया.

बेन लिखते हैं, ‘आखिरी वक्त में भारत को राजी करने के लिए ओबामा खुद आगे आए. उन्होंने भारत के दो अधिकारियों के साथ निजी तौर पर बात करके उन्हें समझाया कि भारत का इस डील का हिस्सा होना कितना ज़रूरी है. हालांकि, वो भारतीय अधिकारियों को दस्तखत करने के लिए राजी नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ करीब एक घंटा बिताया. बातचीत का कोई फायदा न होते देख उन्होंने अफ्रीकन-अमेरिकन कार्ड फेंका.’

पैरिस समिट में मोदी और ओबामा
पैरिस समिट में मोदी और ओबामा

किताब के मुताबिक, ‘करीब एक घंटे तक मोदी लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे कि उनके मुल्क में करोड़ों लोग बिना बिजली के रह रहे हैं और भारतीय इकॉनमी को आगे बढ़ाने के लिए कोयला ही सबसे सस्ता तरीका है. मोदी ने जताया कि वो पर्यावरण की चिंता करते हैं, लेकिन उन्हें लाखों लोगों की गरीबी भी देखनी है. ओबामा ने उन्हें सौर ऊर्जा की उस पहल के बारे में जानकारी है, जिस पर अमेरिका काम कर रहा था. हालांकि, मोदी ने उस अन्याय का ज़िक्र कहीं नहीं किया कि अमेरिका जैसे देश कोयले के दम पर ही विकसित हुए हैं और अब वो भारत से ऐसा न करने की मांग कर रहे हैं.’

आखिरकार ओबामा ने कहा, ‘देखो मैं ये समझता हूं कि ये सही नहीं है. मैं एक अफ्रीकी-अमेरिकी हूं.’ बेन लिखते हैं कि इतना सुनते ही मोदी जानबूझकर मुस्कुराए और अपने हाथों की तरफ देखने लगे. उनके चेहरे पर दु:ख था. फिर बराक ने कहा,

‘मुझे पता है कि इस अन्यायपूर्ण सिस्टम में रहना कैसा लगता है. मैं जानता हूं कि बहुत पीछे से शुरुआत करना कैसा होता है और फिर जब आपसे ज़्यादा करने की उम्मीद की जाए. अन्याय के बाद आपसे ऐसा बर्ताव करने के लिए किया जाए, जैसे कुछ हुआ ही न हो. लेकिन मैं इन चीज़ों को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने दे सकता और तुम्हें भी हावी नहीं होने देना चाहिए.’

modi-obama-freind

बेन के मुताबिक उन्होंने ओबामा को पहले कभी किसी नेता के साथ यूं बात करते नहीं देखा था. मोदी को भी ये पसंद आया और उन्होंने सहमति में अपना सिर हिलाया. इस किस्से से बेन बताते हैं कि कैसे ओबामा ने अफ्रीकन-अमेरिकन कार्ड खेलते हुए मोदी को अपने पाले में झुका लिया.


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