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जब पाकिस्तान गए वाजपेयी ने प्रोटोकॉल तोड़ा और फैज़ से मिलने पहुंच गए

किस्सा 1977-78 का है. देश पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार देख रहा था. अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्रालय संभाल रहे थे. वह पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर गये. विदेश मंत्री का प्रोटोकॉल होता है. आना-जाना, मिलना-जुलना सब पहले से तय होता है. अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी प्रोटोकॉल था. उन्हें वह मेंटेन करना था. लेकिन वह नहीं माने.

उन्हें फैज़ से मिलना था. वो प्रोटोकॉल तोड़ कर फैज़ से मिलने उनके घर गए.

फैज़ अहमद फैज़ तब एशियाई-अफ़्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष थे. बेरुत (लेबनान) में कार्यरत थे. उन दिनों पाकिस्तान आए हुए थे.

सब चकित रह गए. दोनों (फैज़ और अटल) दो तरह से सोचने वाले. फिर भी मिले. अटल बिहारी वाजपेयी ने मिलते ही कहा, मैं सिर्फ एक शेर के लिए आपसे मिलना चाहता था.

फैज़ ने शेर पढ़ने को कहा. अटल बिहारी वाजपेयी ने फैज़ की एक मशहूर ग़ज़ल का शेर पढ़ा,

मकाम ‘फैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं,
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले.

कू-ए-यार – यार (प्रियतम/प्रियतमा) की गली
सू-ए-दार – मौत की तरफ़ (दार = सूली)

यह सुनकर फैज़ भावुक हो गए. उन्होंने ग़ज़ल सुनाई. दोनों काफी देर साथ रहे. और फिर अटल बिहारी वाजपेयी, उन्हें भारत आने का न्योता देकर लौट आये.

फैज़ उसके बाद 1981 में भारत आये और दिल्ली में अटल से मिले भी.

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1981 में जब फैज और अटल मिले.

अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस ग़ज़ल के एक शेर के लिए प्रोटोकॉल तोड़ दिया था, वो ग़ज़ल है,

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारों, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले

जो हमपे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले

मक़ाम ‘फैज़’ कोई राह में जँचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में ले के गिरेबाँ का तार तार चले

यह ग़ज़ल फैज़ ने 1954 में लिखी थी. जनवरी के महीने में. फैज़ तब पाकिस्तान के मांटुगुमरी जेल में थे. फैज़ 1951 से 1955 तक पाकिस्तान की जेल में कैद में रहे. जब वह जेल में थे तो आरोपों के आधार पर यह माना जा रहा था कि उन्हें फांसी की सजा होगी, पर जुर्म साबित न हो सका.

खैर, फैज़ भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों के आवाम के पसंदीदा शायर थे. सो यहां भी कई शहरों और विश्वविद्यालयों में उनका काव्य पाठ आयोजित था. एक कार्यक्रम जे एन यू में भी था. प्रोग्राम के दौरान वहां उनकी प्रसिद्ध नज़्म ‘रकीब’ पढ़ने को कहा गया, वो आधी नज़्म पढ़ कर बैठ गए. छात्रों ने पूछा कि आधी नज़्म ही क्यूं सुनाई तो फैज़ ने जवाब दिया,

‘जहां तक सुनाया वहीं तक असली नज़्म है, बाकि का हिस्सा अति प्रगतिशीलता के आग्रह पर लिखा गया है. ‘

फैज़ बेहद बेबाक थे और अटल के बेहद करीबी भीउनकी नज़्म रकीब:

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था
जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था 
आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उस की मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में
उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे बरसा है उसी बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है
तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने
तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ’नी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ’नी सीखे
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के
अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है


यह किस्सा The Lallantop से प्रो. सदानंद शाही ने साझा किया है और हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे शाश्वत ने लिखा है


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