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महात्मा गांधी और चार्ली चैप्लिन जब मिले तो ये हुआ

महात्म गांधी और चार्ली चैप्लिन दोनों ने वो ज़िंदगी जी कि वो आज किंवदंतियां बन गए हैं. तो अगले कुछ हफ्ते 'अलख निरंजन' का जाप करते हुए आप जानेंगे कि क्या हुआ जब राजनीति और सिनेमा की दुनिया के इन दो दिग्गजों की मुलाकात हुई. पहली किस्त पेश ए नज़र है.

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nitin thakur

ये बाजू में दिख रही फोटो नितिन ठाकुर की है. इनका मानना है कि आज-कल के ज़माने में आप मनचाहा खा सकते हैं, मनचाहा गा सकते हैं, मनचाहा बजा सकते हैं और तो और अब तो मनचाहा ब्याह भी सकते हैं. लेकिन सबसे मुश्किल जो हो चला है, वो है – ना मनचाहा लिख सकते हैं और ना मनचाहा बोल सकते हैं. तो नितिन को हमने लल्लनटॉप का एक कोना अलॉट कर दिया है, ‘अलख निरंजन’ नाम से. इसमें नितिन हर हफ्ते मनचाहा लिखेंगे – कोई कहानी, कोई किस्सा या कभी-कभी बस ‘मन की बात.’


साल 1936 में जर्मनी ओलंपिक खेलों का मेजबान था. एडॉल्फ हिटलर के लिए ये मौका था जब वो दिखा सकता था कि अठारह साल पूर्व पहली आलमी लड़ाई में हार चुका जर्मनी फिर से उठ खड़ा हुआ है. इन खेलों के सहारे वो जर्मनों की शर्मिंदगी को आत्मविश्वास में तब्दील कर डालना चाहता था. उसने टीवी नाम की मशीन का इस्तेमाल किया और पहली बार दुनिया में किसी खेल आयोजन का प्रसारण हुआ. वाकई वो जर्मनी की भव्यता का अद्भुत प्रदर्शन था.

इसे समझने के लिए आप चाहें तो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म रेस देख सकते हैं. फिल्म एक ऐसे अश्वेत एथलीट पर है जिसका जीतना हिटलर को भाता नहीं लेकिन वो नाज़ी जर्मनी के बड़े खिलाड़ियों को हराकर हिटलर का मान मर्दन करता है. ये वही ओलंपिक था जिसमें ध्यानचंद ने हॉकी स्टिक घुुमाकर हिटलर को सम्मोहित कर डाला था. ऑस्ट्रिया के वियना शहर में साल 1939 को ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए मूर्ति इसके बाद ही लगी.

 

बर्लिन ओलंपिक के सेमिफाइनल में फ्रांस के खिलाफ मैच खेलते ध्यानचंद. (फोटोःविकिमीडीया कॉमन्स)
बर्लिन ओलंपिक के सेमिफाइनल में फ्रांस के खिलाफ मैच खेलते ध्यानचंद. (फोटोःविकिमीडीया कॉमन्स)

 

ठीक इसी दौरान दुनिया में विज्ञान कुलांचे भर रहा था. मशीनें और भी तेज़ हो रही थीं, ज़्यादा स्मार्ट बन रही थीं. हर देश उत्पादन बढ़ाने के लिए मॉडर्न मशीनें चाहता था. पैसा कमाने की दौड़ में कोई किसी से पीछे नहीं छूटना चाह रहा था. तेज़ दौड़ती कारें.. दोगुनी-तिगुनी रफ्तार से सामान पैदा करते कारखाने.. सब कुछ तेज़ और ज़्यादा के बीच झूल रहा था.

पश्चिम से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे गांधी इस दृश्य को देखकर सहमे हुए थे. जो डर वो सालों पहले हिंद स्वराज में व्यक्त कर चुके थे, अब वो हकीकत बनकर सामने खड़ा था. हिंद स्वराज में गांधी ने लिखा था,

”मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है. यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूं.”

जो वो देख समझ रहे थे उसे ठीक इसी दौरान फिल्मों का सबसे चमकता सितारा चार्ली चैप्लिन भी महसूस करने लगा था. हालांकि वो खुद नई मशीनों के सहारे अपने धंधे का विस्तार कर रहे थे मगर वो भूले नहीं थे कि उनका कल गरीबी की गोद में खेलकर ही दमकने वाला आज बना था. मशीनों के फेर में बढ़ती बेरोज़गारी और साथ ही खिंचते जा रहे काम के घंटे उन्हें परेशान करने लगे थे. टॉल्स्टॉय, इमरसन, रस्किन जैसे चिंतक मशीनों के चंगुल से आज़ाद करके मानवता को प्रकृति की तरफ ले जाना चाहते थे. वो अजब से धर्मसंकट में थे.

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अब मैं ले चलता हूं आपको साल 1931 में. जगह लंदन थी और मौका था दूसरे गोलमेज सम्मेलन का. महात्मा गांधी पहले गोलमेज़ सम्मेलन के नाकामयाब होने के बाद कांग्रेस की तरफ से प्रतिनिधि बनकर आए थे. दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान लौटने के बाद वो पहली बार विदेशी दौरे पर थे. वक्त बदल चुका था. दुनिया या तो उनसे प्यार कर रही थी या नफरत. लेकिन नज़रअंदाज़ अब कोई नहीं कर सकता था. असहयोग आंदोलन के प्रयोग ने अंग्रेज़ों के साथ ही पूरी दुनिया को समझा दिया था कि गांधी नाम का प्रयोगवादी बिना हिंसा किए भी जो हासिल करना चाहता है वो धीरे-धीरे कर रहा है.

उस वक्त के वाइसरॉय विलिंग्डन तो गांधी के सामने बेहद बेबस थे. उन्होंने अपनी बहन को एक खत लिखा था. उसमें गांधी के बारे में उनकी जो राय थी वो पढ़िए –

”अगर गांधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती. वह जो भी कदम उठाता है उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है लेकिन असल में उसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल होती है. देखता हूं कि अमेरिकी प्रेस उसको गज़ब का आदमी बताती है लेकिन सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक , रहस्यवादी और अंधविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गांधी को भगवान मान बैठी है.”

भारत की जनता के तत्कालीन भगवान से मिलने के लिए चार्ली चैप्लिन भी उत्साहित थे. वो खुद अपनी फिल्म ‘सिटी लाइट्स’ का प्रचार करने बचपन के शहर लंदन लौटे थे. उन्हें सुझाव मिला कि गांधी से मिलिए. मौका अच्छा था.

पश्चिम से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे गांधी इस दृश्य को देखकर सहमे हुए थे. जो डर वो सालों पहले हिंद स्वराज में व्यक्त कर चुके थे, अब वो हकीकत बनकर सामने खड़ा था. हिंद स्वराज में गांधी ने लिखा था, 'मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है. यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूं.' जो वो देख समझ रहे थे उसे ठीक इसी दौरान फिल्मों का सबसे चमकता सितारा चार्ली चैप्लिन भी महसूस करने लगा था. हालांकि वो खुद नई मशीनों के सहारे अपने धंधे का विस्तार कर रहे थे मगर वो भूले नहीं थे कि उनका कल गरीबी की गोद में खेलकर ही दमकने वाला आज बना था. मशीनों के फेर में बढ़ती बेरोज़गारी और साथ ही खिंचते जा रहे काम के घंटे उन्हें परेशान करने लगे थे. टॉल्स्टॉय, इमरसन, रस्किन जैसे चिंतक मशीनों के चंगुल से आज़ाद करके मानवता को प्रकृति की तरफ ले जाना चाहते थे. वो अजब से धर्मसंकट में थे.
चार्ली चैपलिन ने अपनी फिल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ में अंधाधुंध औद्योगिरण के नुकसान बताए थे.

विंस्टन चर्चिल के साथ चार्ली चैप्लिन अक्सर गुफ्तगू करते थे. गांधी से मिलने के ठीक कुछ रात पहले चैप्लिन उन विंस्टन चर्चिल और उनके सहयोगियों से डिनर पर मिले थे, जिन्हें गांधी फूटी आंख पसंद नहीं थे. ‘अधनंगा फकीर’ कहकर चर्चिल ने ही गांधी का अपमान करने की कोशिश की थी. चैप्लिन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं,

”मैंने उन्हें बताया कि मैं गांधी जी से मिलने जा रहा हूं जो इन दिनों लंदन में हैं. तब विंस्टन के साथ आए ब्रैकेन बोल, “हमने इस व्यक्ति को बहुत झेल लिया है. भूख हड़ताल हो या न हो, उन्हें चाहिए कि वे इन्हें जेल में ही रखें. नहीं तो ये बात पक्की है कि हम भारत को खो बैठेंगे. गांधी को जेल में डालना सबसे आसान हल होगा, अगर ये हल काम करे तो ” मैंने टोका, “लेकिन अगर आप एक गांधी को जेल में डालते हैं तो दूसरा गांधी उठ खड़ा होगा और जब तक उन्हें वह मिल नहीं जाता जो वे चाहते हैं वे एक गांधी के बाद दूसरा गांधी पैदा करते रहेंगे.”

चर्चिल मेरी तरफ मुड़े और मुस्कुराए, “आप तो अच्छे खासे लेबर सदस्य बन सकते हैं.” ये चर्चिल का तंज था.

चर्चिल का ज़िक्र चला है तो लिखता चलूं कि वो भारत पर राज करना इतना ज़रूरी समझते थे कि अप्रैल 1931 में कहा था – The loss of India will be the death blow of the British Empire. गलत नहीं थे चर्चिल.

बहरहाल, इस मुलाकात के बाद चार्ली चैप्लिन को गांधी से मिलना था.

(क्रमश:)

अलख निरंजन!


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