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इंडिया का वो खिलाड़ी, जिसकी कनपटी पर गेंद लगी और 48 घंटे ICU में रहा

‘दी ग्रेट वॉल’ का नाम लेते ही अगर कोई चीज़ ज़हन में आती है, तो वो है चाइना की दीवार. यही सवाल अगर भारत के किसी क्रिकेटप्रेमी से पूछा जाए तो वो निसंकोच बोल देगा राहुल द्रविड़. बहुत कम लोगों को पता है कि राहुल से बरसों पहले किसी और का इस खिताब पर दावा था. वो खिलाड़ी, जिसने दुनिया के टॉप तेज़ गेंदबाजों में से एक की तेज़रफ़्तार गेंद सीधे कनपटी पर झेली थी. वो जिसे तुरंत हॉस्पिटल न ले जाया जाता, तो उसकी जान भी जा सकती थी.

23 सितंबर, 1958 को पैदा हुए अंशुमन दत्ताजीराव गायकवाड़ के साथ हुए उस हादसे को याद करेंगे अपन.

अंशुमन गायकवाड, उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक जो चश्मा पहन कर क्रिकेट खेलते थे. (Image: Cricket Country.com)
अंशुमन गायकवाड़, उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक जो चश्मा पहन कर क्रिकेट खेलते थे. 

गेंदबाज़ी की वो काली ट्रिक, जिसकी सारी दुनिया ने आलोचना की

1975-76 का क्रिकेटिंग सीज़न था. भारत की टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर थी. चार टेस्ट मैच की सीरीज का पहला मैच वेस्टइंडीज ने जीता और दूसरा ड्रॉ हो गया. यहां तक तो ठीक था. तीसरा टेस्ट इंडिया ने जीत लिया और यहीं से चीज़ें खराब हो गई. वेस्टइंडीज की टीम को ताकतवर माना जाता था. भारत जैसी कमज़ोर टीम से हारना उनके समर्थकों को रास न आया. क्लाइव लॉयड की कप्तानी पर सवाल उठने लगे. झल्लाई वेस्टइंडीज ने स्पोर्ट्समैन स्पिरिट की बनियान उतार कर खूंटी पर टांग दी.

चौथे टेस्ट की पहली ही इनिंग्स से उन्होंने बॉडीलाइन बोलिंग शुरू की. बॉडीलाइन गेंदबाज़ी माने ऐसी बोलिंग जिसमें बल्लेबाज़ों के शरीर को निशाना बनाकर बॉल डाली जाए. वेस्टइंडीज की टीम का पेस अटैक उस वक़्त दुनिया में सबसे ख़तरनाक था. चार गेंदबाज़ ऐसे थे जो 150 किलोमीटर की रफ़्तार से गेंद फेंक सकते थे. वेन डेनियल, वनबर्न होल्डर, ब्रेंडन जुलिएन और ख़ास तौर से माइकल होल्डिंग.

माइकल होल्डिंग, कहरबरपा गेंदबाज़ी में एक लीजेंडरी नाम. (Image: Cricket Country.com)
माइकल होल्डिंग, कहरबरपा गेंदबाज़ी में एक लीजेंडरी नाम.

गावस्कर को भी लगता था ये जानलेवा बोलिंग है

पहले विकेट के लिए सुनील गावस्कर और अंशुमन गायकवाड़ ने 136 रन जोड़े. दोनों ही संभलकर खेलते रहे. वेस्टइंडीज ने भयानक बॉडीलाइन बोलिंग की. गावस्कर ने इसकी अम्पायरों से शिकायत भी की. ब्रेक के दौरान एक मैच अधिकारी ने गावस्कर की शिकायत पर ताना मारा कि तुम ऐसी बोलिंग खेल ही नहीं सकते. गुस्से में सुनील गावस्कर ने अपना बल्ला ज़मीन पर फेंक दिया. कैप उछाल दी. अंशुमन गायकवाड़ ने जब उनसे पूछा कि उन्होंने इतना ओवररिएक्ट क्यों किया तो उन्होंने जवाब दिया,

“मैं यहां मरना नहीं चाहता. मुझे अपने नवजात बेटे का मुंह देखना है.”

उनकी बात में अतिशयोक्ति ज़रा भी नहीं थी. ये वो दौर था जब बल्लेबाज़ बिना हेलमेट के खेला करते थे. और भी कई सारे सेफ्टीगियर, जो आज के खिलाड़ियों को सहज ही हासिल हैं, वो तब उपलब्ध नहीं थे. गावस्कर की बात में कितना दम था ये कुछ समय बाद साबित भी हो गया.

अंशुमन, गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ.
अंशुमन, गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ.

मैदान से सीधा ICU में

136 के स्कोर पर गावसकर आउट हो गए. अंशुमन खेलते रहे. आग उगलती गेंदों का सामना करते रहे. पसलियों में गेंदें लगी. फिर भी वो डटे रहे. 81 के स्कोर तक पहुंच गए. एक गेंद अंशुमन की उंगलियों पर लगी. अंशुमन दर्द से बिलबिला उठे. फ्रस्ट्रेशन में उन्होंने होल्डिंग की तरफ देख के कुछ इशारा किया. इसने होल्डिंग को और भड़का दिया. और फिर आई वो घातक गेंद.

अगली गेंद एक भयानक बाउंसर थी. सीधे अंशुमन के कान पर आ लगी. वो चारो खाने चित्त हो गए. उनका चश्मा उड़कर न जाने कहां गया. ग्राउंड पर ख़ून ही ख़ून बिखर गया. अंशुमन को तुरंत मैदान से बाहर ले जाया गया. 48 घंटे तक वो ICU में रहे. दो बार कान की सर्जरी हुई. आज तक उनको सुनने में दिक्कत महसूस होती है.

भारत के कोच के रूप में दो बार सेवाएं दी. (Image: pinterest.com)
भारत के कोच के रूप में दो बार सेवाएं दी.

वॉल का खिताब यूं ही नहीं मिला था

1983 की बात है. पाकिस्तान के साथ जालंधर में टेस्ट था. खराब शुरुआत को संभालने की ज़िम्मेदारी अंशुमन पर आ पड़ी थी. और वो ऐसी पारी खेल गए, जो उस ज़माने में सबसे सुस्त लेकिन मज़बूत मानी गई. 671 मिनट तक खेलते रहे वो. 436 गेंदें खेलकर 201 रन बनाए. ये उनके करियर की सबसे बड़ी पारी थी. यूं चट्टान की तरह जमे रहे कि आखिरकार मैच ड्रॉ रहा.

अंशुमन की ज़िंदगी के कुछ दिलचस्प फैक्ट

# अंशुमन के परिवार में और भी क्रिकेटर्स थे. उनके पिता दत्ताजी गायकवाड़ और उनके बेटे शत्रुंजय ने बड़ोदा के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेली.

# कलकत्ता से उनका ख़ास नाता रहा. उनका पहला और आख़िरी टेस्ट मैच इसी मैदान पर खेला गया. बहुत कम क्रिकेटर्स के साथ ऐसा खूबसूरत इत्तेफ़ाक होता है.

# उन्होंने अपना फर्स्ट क्लास करियर एक उंचाई पर ख़त्म किया. अपने आख़िरी मैच में शतक लगाया.

# वो 1992 से लेकर 1996 तक नेशनल सिलेक्टर रहे.

# वो दो बार टीम इंडिया के कोच रहे. पहले 1997 से लेकर 1999 तक. बाद में तब, जब कपिल देव ने इस्तीफा दे दिया था.

एक दिलचस्प बात ये भी कि बाउंसर की वजह से मरते-मरते बचे अंशुमन गायकवाड़ क्रिकेट में बाउंसर बैन करने के खिलाफ़ हैं. कहते हैं कि ये गेंदबाजों के साथ अन्याय होगा. बिना बाउंसर के मुकाबला एकतरफा होकर रह जाएगा.


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