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'आशिकी' वाली अनु अग्रवाल आज कल कहां हैं?

‘आशिकी’. 90 के दशक की कल्ट फिल्म. लीड में थे राहुल रॉय और अनु अग्रवाल. फिल्म इतनी कामयाब हुई कि दोनों रातों-रात स्टार बन गए. दोनों कुछ फिल्मों के बाद फिल्म इंडस्ट्री से गायब हो गए. राहुल रॉय बीच में ‘बिग बॉस में दिखाई दिए. साथ ही कुछ समय पहले एक फिल्म की शूटिंग भी कर रहे थे. लेकिन बहुत ही कम लोग जानते हैं कि ‘आशिकी’ की लीडिंग लेडी अनु  के साथ क्या हुआ. इतनी बड़ी सक्सेस के बाद उनके फिल्मी करियर ने उड़ान क्यों नहीं भरी, यही बताएंगे आपको.

Kaha Gaye Ye Log


# टीवी से हुई शुरुआत

11 जनवरी, 1969 को दिल्ली में अनु अग्रवाल का जन्म हुआ. दिल्ली में ही पली-बढ़ीं. बचपन में कभी नहीं सोचा था कि आगे जाकर एक्टर बनना हैं. हां, लेकिन एक्टिंग करना पसंद था. इसलिए थिएटर नाटकों में हिस्सा लेती थीं. लेकिन वो सिर्फ शौकिया तौर पर. उन्हें प्यार था सिर्फ बास्केटबॉल से. अपने टीन-एज इयर्स से ही बास्केटबॉल खेल रही थीं. प्लान था कि आगे जाकर स्टेट बास्केटबॉल टीम का हिस्सा बनें. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

खैर, स्कूल खत्म हुआ. जिसके बाद अनु ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. और सोशियोलॉजी पढ़ने लगीं. कॉलेज के दिनों में थिएटर में भी एक्टिव रहीं. यूनिवर्सिटी का रिज़ल्ट आया. जिसने सबको चौंका दिया. बास्केटबॉल और थिएटर ड्रामा पर ध्यान देने वाली ये लड़की गोल्ड मेडलिस्ट बनकर निकली. कॉलेज के बाद अनु ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया. लेकिन एक्टिंग अभी भी उनकी प्राथमिकता नहीं थी. इसी दौरान उन्हें दूरदर्शन का एक शो ऑफर हुआ. 1988 में आया ‘इसी बहाने’. उन्होंने शो को हां कर दिया. शो में अनु के अलावा सईद जाफरी, किरण खेर, लिलिपुट और मोहनीश बहल जैसे एक्टर्स भी शामिल थे. बनाया था आनंद महेंद्रु ने. जिन्होंने आगे जाकर ‘देख भाई देख’ भी लिखा.

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फिल्मों में आने से पहले अनु का फोकस मॉडलिंग पर था. फोटो – इंस्टाग्राम

अनु अब तक मुंबई आ चुकी थीं. शो में भले ही काम किया हो, फिर भी स्क्रीन के लिए एक्टिंग करने का उनका मन नहीं था. मॉडलिंग असाइनमेंट्स पर ध्यान दे रही थीं. अनु हमेशा से ही आउटस्पोकन रही हैं. इसलिए कोई भी असाइनमेंट लेने से पहले वो अपनी बात पहले ही रख देती थीं. कि चेहरे को गोरा करने वाला मेकअप नहीं लगवाएंगी. ना ही कोई ग्लैमर डॉल टाइप काम करेंगी.


# ‘आप आशिकी वाली अनु हैं ना?’

आज से करीब 30 साल पहले चलते हैं. तारीख 23 जुलाई, 1990. एक नई फिल्म रिलीज़ होनी थी उस दिन. दोनों लीड एक्टर्स नए चेहरे थे. प्रड्यूसर को विश्वास था कि इन एक्टर्स को देखने कोई नहीं आएगा. अगर इनको पोस्टर पर रखा तो फिल्म घाटे का सौदा साबित होगी. डायरेक्टर महेश भट्ट ने प्रड्यूसर को भी खुश कर दिया. पोस्टर में लीड कपल का चेहरा कोट से ढक दिया. फिल्म थी ‘आशिकी’. अपनी रिलीज़ के साथ बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफान लाई जो थमने का नाम नहीं ले. थिएटर्स के बाहर आलम ऐसा था कि 200-300 लोग खड़े दिखते. अगले शो की बुकिंग के लिए. फिल्म के गाने तो जैसे लोगों के खून में घुल गए. सभी की जुबां पर चढ़ गए. फिल्म की लीड में थे राहुल रॉय और अनु अग्रवाल. दोनों एक झटके में स्टार बन गए. उस वक्त फिल्म के दीवानेपन में लोगों ने जो किया, वो आज शायद सुनने में अजीब लगे. फिल्म देखते वक्त परदे पर सिक्के उछाले, नोट फेंके.

Aashiqui Songs
‘आशिकी’, वो फिल्म जिसके लिए जनता दीवानी हो गई थी.

फिल्म की रिलीज़ के वक्त अनु जुहू के एक पीजी में रहती थीं. रोज सुबह उठकर स्विमिंग करने जाना उनके रूटीन का पार्ट था. 24 जुलाई, 1990 की सुबह भी वो उठीं. अपनी बिल्डिंग से बाहर निकलीं. एकाएक लोग उन्हें पुकारने लगे. उनकी अपनी बिल्डिंग से, बाजू वाली बिल्डिंग से. एक भीड़ ने उन्हें घेर लिया. भीड़ से बच-बचाकर बाहर निकलीं. मेन रोड पर पहुंचीं. तो देखा कि रोड की दोनों लेन पर लड़कों का हुजूम जमा था. जिन्होंने ‘आई लव यू अनु’ लिख-लिखकर दीवारें भर दी. फिल्म के गाने ‘धीरे–धीरे से’ में ठीक ऐसा ही राहुल के किरदार ने उनके लिए किया था. अनु को समझ नहीं आया कि ये सब हो क्या रहा है. आनन-फानन में एक रिक्शा रोका. इत्तेफाकन रिक्शा में आशिकी के ही गाने बज रहे थे. रिक्शा चालक भी सामने रोड पर कम और पीछे बैठी अपनी सवारी को मुड़-मुड़कर देख रहा था. अनु ने उसे टोका. कहा कि भईया सामने रोड पर ध्यान दीजिए. रिक्शा ड्राइवर भी ज्यादा देर तक अपनी व्याकुलता दबा नहीं पाया. और पूछ बैठा, ‘आप आशिकी वाली अनु हैं ना?’ वो दौर सोशल मीडिया और इंटरनेट का नहीं था. फिर भी ‘आशिकी’ का क्रेज ऐसा चढ़ा कि देश के कोने-कोने में जनता राहुल और अनु को पहचानने लगी थी.

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‘धीरे धीरे’ गाने का वो पार्ट जहां राहुल दीवार पर अनु का नाम लिखता है. फोटो – यूट्यूब

अनु अग्रवाल स्टार बन चुकी थीं. महेश भट्ट ‘आशिकी’ में उनके सिवा किसी और को नहीं लेना चाहते थे. इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने महेश भट्ट को बहुत समझाया. कि इस लड़की को देखने कोई नहीं आएगा. लेकिन वो अपने फैसले पर टिके रहे. बाद में जब फिल्म इतनी बड़ी सक्सेस साबित हुई तो वही लोग अनु अग्रवाल को खोज बताने लगे. अनु एक्टिंग से परहेज कर रही थीं. फिर भी ये रोल उनके हिस्से आया. यहां भी एक किस्मत कनेक्शन था. दरअसल, ‘आशिकी’ की रिलीज़ से करीब छह महीने पहले अनु किसी पार्टी में लंच के लिए गई थीं. महेश भट्ट भी वहां मौजूद थे. अचानक से उनकी नजर अनु पर पड़ी. हाई, हैलो कुछ नहीं कहा. तपाक से बोले कि तुम एक स्टार हो. अनु को हंसी आ गई. पूछा कि क्या इस ब्रह्मांड में? महेश भट्ट ने आगे कहा कि फिल्मों में एक्टिंग क्यों नहीं करती. अनु ने कहा कि उन्हें फिल्मों में काम करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं. मुलाकात खत्म हो गई.

Mahesh Bhatt
महेश भट्ट सिर्फ अनु को लेकर ही ‘आशिकी’ बनाना चाहते थे.

इसके बाद अनु अपने मॉडलिंग असाइनमेंट्स को लेकर बिज़ी हो गईं. जिसकी बदौलत अक्सर उन्हें विदेशों में ट्रैवल करना होता था. वापस इंडिया लौटी. मुंबई छोड़ने का फैसला लिया. सामान पैक करने लगीं. तभी उनके पास महेश भट्ट का कॉल आया. कहा कि उन्होंने एक फिल्म की कहानी लिखी है. लेकिन अगर अनु उस फिल्म में काम नहीं करेंगी तो वो फिल्म नहीं बनाएंगे. अनु को लेकर महेश भट्ट का भरोसा चौंकाने वाला था. उनके भरोसे पर भरोसा कर अनु ने फिल्म को हां कर दिया. लेकिन अपनी कुछ शर्तों के साथ. महेश भट्ट को लंबी-चौड़ी लिस्ट भेजी. उन बातों की जो वो फिल्म में नहीं करेंगी. जैसे एक आइटम गर्ल बनकर नहीं सिमटेंगी, खुद को गोरा करने वाला मेकअप नहीं लगवाएंगी जैसी बातें. महेश भट्ट को कोई आपत्ति नहीं थी. झट से मान गए. उसके बाद जो हुआ, वो सबके सामने है.


# क्यों वन हिट वंडर बनकर रह गईं?

‘आशिकी’ के बाद अनु के घर के बाहर प्रोड्यूसरों की लाइन लग गई. सब उन्हें अपनी फिल्म में साइन करना चाहते थे. लेकिन अपनी ओर आए अधिकतर ऑफर्स को अनु ने मना कर दिया. इसकी वजह थी कि 90 के दशक में हीरोइन्स को प्रॉप की तरह यूज़ किया जाता था. इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में हीरो सेंट्रिक होती थी. जो रोल अनु को ऑफर हुए उन में या तो हिरोइन सबको खाना खिला रही होती, पति के घर आने के बाद उससे पूछती कि अरे आप आ गए. या फिर हीरो के इर्द-गिर्द नाच रही होती. ये सब अनु को कतई पसंद नहीं था. फिल्मों को लेकर उनकी समझ हमेशा से मैच्योर थी. इसलिए ऐसे सभी रोल्स को मना कर दिया.

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90 के दशक की ज्यादातर हिंदी फिल्मों में एक्ट्रेसेस को प्रॉप की तरह यूज़ किया जाता है. फोटो – फिल्म ‘दिल’ का गाना

अपनी डेब्यू फिल्म के बाद उनकी अगली फिल्म थी 1992 में आई ‘गजब तमाशा’. लीड में ‘आशिकी’ वाली जोड़ी ही थी. उम्मीद थी कि रिस्पॉन्स भी वैसा ही मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिल्म बुरी तरह से बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही. अगली फिल्म थी ‘थिरुड़ा थिरुड़ा’. मणि रत्नम के डायरेक्शन में बनी फिल्म. जिसका म्यूज़िक आज भी याद किया जाता है. साल 1993 में मणि रत्नम की ये फिल्म आई थी. उसी साल अनु की अगली फिल्म आई. ‘किंग अंकल’. अनु समेत शाहरुख खान, नगमा, जैकी श्रॉफ और परेश रावल भी फिल्म का हिस्सा थे. फिल्म में अनु ने जैकी की सेक्रेटरी का रोल निभाया था. लेकिन पिछली दो फिल्मों की तरह यहां भी अनु का काम नोटिस में नहीं आया. फिर आई ‘खल-नायिका’. जो हॉलीवुड फिल्म ‘द हैंड दैट रॉक्स द क्रैडल’ से प्रेरित थी. फिल्म में अनु ने एक साइको किलर का रोल निभाया था. उनके काम की प्रशंसा हुई. सिर्फ दर्शक ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्री से जुड़े लोग भी उनके काम की तारीफ कर रहे थे. ऐसा रिस्पॉन्स देखकर अनु को उम्मीद थी कि उन्हें अवॉर्ड्स में नॉमिनेशन मिलेगा. ऐसा हुआ भी. लेकिन उन्हें सिर्फ सपोर्टिंग एक्ट्रेस की कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया. फिल्म में उनका रोल अहम था और उन्हें सपोर्टिंग एक्टर की श्रेणी में रखा गया. ये देखकर अनु का मन खट्टा हो गया.

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खुद को लेकर की जा रही मीडिया रिपोर्टिंग से अनु परेशान थीं. फोटो – इंस्टाग्राम

मेन स्ट्रीम फिल्म इंडस्ट्री और मीडिया सर्कल्स में उन्हें पसंद नहीं किया जा रहा था. इसकी वजह थी उनके खिलाफ होने वाली मीडिया रिपोर्टिंग. ‘आशिकी’ के बाद वो ओवरनाइट स्टार बन गईं. मुंबई में अकेली रहने वाली ये लड़की इस बात से बेखबर थी कि स्टारडम की कीमत चुकानी पड़ेगी. क्योंकि उसके बाद से ही उनके घर के आसपास मीडिया वालों का जमघट रहने लगा. उनके घर पर कोई भी आता या कोई भी निकलता, प्रेस उसे अगले दिन मिर्च मसाले के साथ पेश करती. उनका नाम अपने को-स्टार्स के साथ जोड़ा जाने लगा. अपने बारे में ऐसी बातें अनु को मन-ही-मन खाने लगीं. सोशल मीडिया होता तो अपनी सफाई पेश कर देतीं. लेकिन प्रेस में जो छप गया, सभी ने उसे ही सच मानन लिया. इससे उनकी पर्सनल लाइफ भी जूझने लगी. मीडिया रिपोर्ट्स के चलते उनका अपने बॉयफ्रेंड से भी ब्रेकअप हो गया. उन्हें न पसंद किए जाने की एक और वजह थी. अनु अपने समय के हिसाब से बहुत बोल्ड थीं. जिस दौर में हीरोइन्स से बस हीरो की हां में हां मिलाने की उम्मीद की जाती थी. उस दौर में वो कंडोम की एडवरटाईज़मेंट कर रही थीं.

अनु को भले ही अपने देश में एप्रीशिऐशन नहीं मिल रहा था. लेकिन वो बाहर अपना नाम चमका रही थीं. सिर्फ एक इंटरनेशनल सुपरमॉडल के तौर पर ही नहीं. बल्कि अपनी फिल्मों के जरिए भी. जैसे 1994 में उनकी एक शॉर्ट फिल्म आई थी. ‘द क्लाउड डोर’. डायरेक्ट किया था मणि कौल ने. वही मणि कौल, जिन्होंने मेन स्ट्रीम सिनेमा से इतर पैरेलल सिनेमा की शुरुआत की. जिनकी 1969 में आई फिल्म ‘उसकी रोटी’ को पैरेलल सिनेमा के लिए की गई शुरुआती कोशिशों में गिना जाता है. खैर, ‘द क्लाउड डोर’ कान फेस्टिवल गई. जहां फिल्म के हिस्से सराहना आई. न्यू यॉर्क टाइम्स और वैराइटी ने अपने रिव्यूज़ में फिल्म की जमकर तारीफ़ें की.

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‘द क्लाउड डोर’ के एक सीन में अनु.

इंडिया आकर उन्होंने कुछ और फिल्मों में काम किया. ‘जन्म कुंडली’ और ‘राम शस्त्र’ उन्हीं में से थीं. लेकिन इस पॉइंट तक अनु का फिल्मों से मन ऊब चुका था. वो खुद से सवाल करने लगीं. कि क्या ज़िंदगी सिर्फ इतनी ही है, या इसके कोई और भी मायने हैं. और अगर हैं तो वो अब उन्हें खोजना चाहती थीं. मटेरियलिस्टिक सोच में खोट नजर आने लगा. अनु खुद मानती हैं कि जब वो अपने करियर में सबसे अमीर थीं, उसी समय वो सबसे बड़ी निर्धन थीं. मन में उठ रहे सवालों का हल ढूंढने के लिए उन्होंने स्पिरिचुएलिटी और योग का रुख कर लिया. अपनी एनर्जी मेडिटेशन जैसे काम में लगानी शुरू की. बिना कोई शोरगुल मचाए फिल्म इंडस्ट्री से चुपचाप एक्ज़िट ले लिया. उनकी आखिरी फिल्म थी 1996 में आई ‘रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ’.


# एक एक्सीडेंट जिसके बाद डॉक्टरों ने कहा कि तीन साल से ज्यादा नहीं जिएंगी

साल 1999. सुबह का वक्त था. मुंबई के चौपाटी एरिया के पास एक गाड़ी ने अपना बैलेंस खो दिया. पूरी तरह रुकने से पहले तीन बार पलटी. गाड़ी की दुर्दशा हो चुकी थी. पास ही मौजूद पुलिस मदद को पहुंची. देखा कि ड्राइविंग सीट पर बैठी महिला बुरी तरह चोटिल हो चुकी है. वो महिला अनु अग्रवाल थी. इस एक्सीडेंट की वजह से उनके स्कल में फ्रैक्चर हो गया. ब्लैडर रप्चर हो गया. चेहरे का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि उनकी याददाश्त भी चली गई. उन्हें एक्सीडेंट के बारे में कुछ भी याद नहीं था. दिन और रात के फर्क की समझ तक चली गई. भाषाओं की समझ ओझल हो गई. वो किसी को नहीं पहचान पा रही थीं. अपना नाम तक याद नहीं रहा. अपने एक्सीडेंट के बाद करीब 29 दिनों तक वो कोमा में रही. इलाज कर रहे डॉक्टरों ने साफ तौर पर कह दिया कि अनु ज्यादा नहीं जिएंगी. ज्यादा से ज्यादा वो तीन साल और जी पाएंगी.

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एक्सीडेंट के बाद अनु ने योग और स्पिरिचुएलिटी के जरिए खुद को हील किया. फोटो – इंस्टाग्राम

अनु ने अपनी बुक ‘अनयूज़ुअल: मेमॉयर ऑफ अ गर्ल हू केम बैक फ्रॉम द डेड’ में इस घटना का जिक्र किया है. अनु बताती हैं कि एक्सीडेंट के बाद उन्हें कई महीने रिहैब सेंटर में बिताने पड़े. ताकि शरीर के बेसिक फंक्शन सीख सकें. खुद को योग के जरिए हील करना शुरू किया. तीन साल लगे लेकिन उनकी हालत बेहतर हो गई. ठीक होने के बाद आया उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट. जिसने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया. वो मानने लगी कि एक तरह से उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. क्योंकि ऐसी दुर्घटना के बाद किसी का भी पूरी तरह ठीक हो पाना लगभग असंभव है. इसलिए उन्होंने अपनी इस नई ज़िंदगी को दूसरों के नाम समर्पित करने का सोचा. जिस योग ने उनकी ज़िंदगी बचाई, अब वो उसे बच्चों तक ले जाना चाहती थीं. शुरुआत की मुंबई के झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों से. अपनी संस्था खोली जिसके तहत वो ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच सकें.


# आज कल कहां हैं Anu Aggarwal?

अनु अब एक्टिव तौर पर बच्चों के लिए काम कर रही हैं. वो फुल टाइम काउंसलर भी हैं. जिसकी बदौलत वो विदेशों में मेंटल हेल्थ और योग पर स्पीच देने के लिए जाती रहती हैं. उनका अनु अग्रवाल फाउंडेशन विदेशी संस्थाओं के साथ मिलकर बच्चों के लिए काम कर रहा है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो अनु आजकल बिहार के मुंगेर जिले में रहती हैं. और फिलहाल वहां के बच्चों के लिए काम कर रही हैं. अनु मानती हैं कि वो दुनिया नहीं बदल रही. वो बस वही कर रही हैं, जो वो कर सकती हैं.

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अनु अपनी बुक को स्क्रीन पर अडैप्ट करने की कोशिश कर रही हैं. फोटो – इंस्टाग्राम

बाकी क्या वो फिर से फिल्मी दुनिया में दिखाई देंगी? उन्होंने इसका भी जवाब किया. 2020 में पिंकविला को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वो नेटफ्लिक्स से बातचीत कर रही हैं. प्लान है कि उनकी बुक ‘अनयूजुअल’ को अडैप्ट किया जा सके. हालांकि, इस प्रोजेक्ट से जुड़ी कोई भी डिटेल अभी बाहर नहीं आई है.


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