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अफगानिस्तान वॉर खत्म होने के बाद अब अमेरिका और यूरोप के रिश्तों का क्या होगा?

एक अमेरिकी हॉरर लेखक हैं- थॉमस लिगोटी. रिफ़्रेंस के लिए समझिए कि HBO पर प्रसारित मशहूर थ्रिलर शो, ‘ट्रू डिटेक्टिव’ के पहले सीज़न के काफ़ी सारे डायलॉग उनके ही लेखन से लिए गए है.

उनका एक कथन कुछ इस प्रकार है,

‘इस दुनिया का पागलपन, अशांति और बर्बरता. हर दिन अनगिनत लोगों की तबाही. इस सब के बीच हम चीख़-चिल्ला ही रहे होते हैं, और इतिहास उंगली पर थूक लगाकर पन्ना पलट देता है’

अबकी बार इतिहास का एक नया पन्ना अफ़ग़ानिस्तान में पलटा जा रहा है. और उंगली के सिरे पर लगा है खून. जो बीस वर्षों तक चले एक युद्ध की निशानी बयान कर रहा है. सारी दुनिया इस युद्ध का दोषी अमेरिका को ठहरा रही है. ये बात सही भी है लेकिन पूरी नही. क्यों? क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, NATO (North Atlantic Treaty Organization) की फ़ोर्सेस भी लड़ रही थीं. NATO, जिसका जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ था.

अमेरिका और यूरोप, अटलांटिक महासागर के सिरे पर बसे दो महाद्वीप. दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों की साझेदारी ने नए कीर्तिमान रचे. चाहे बॉल्कन वॉर हो या 9/11 के बाद ‘वॉर ऑन टेरर’. मित्र राष्ट्रों का संगठन इन सभी युद्धों में साथ मिलकर लड़ा. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में मिली शिकस्त ने समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है. आशंका जताई जा रही है कि यूरोप अब अपनी अलग राह पर निकल सकता है. ब्रेग्जिट के बाद बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलनों से निपट रहा यूरोप, अमेरिका के साथ रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है.
अफ़ग़ानिस्तान के बाद इन दोनों महाद्वीपों के एलायन्स का क्या होगा? यूरोपीय देशों के सुर क्यों बदले हुए हैं?

शुरुआत 19वीं सदी के फ़र्स्ट हाफ़ से. ये 50 साल दो विश्व युद्धों के साक्षी रहे. जिनमें मानवीय जीवन और सम्पदा का भारी विनाश हुआ. प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ़ नेशन की स्थापना हुई. जर्मनी पर भारी दंड लगाए गए. वर्साय की संधि हुई और लगा कि स्थिति दुबारा सामान्य हो जाएगी. लेकिन 1930 में अमेरिका में आए इकोनॉमिक डिप्रेशन और जर्मन राष्ट्रवाद ने शांति को ज़्यादा दिन ठहरने नहीं दिया. नतीजा- 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया. जिसके फलस्वरूप पूरी दुनिया में ऐसी तबाही हुई कि प्रथम विश्व युद्ध बौना लगने लगा.

1945 में जब तक दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ. यूरोप तबाह हो चुका था. हालात इतने ख़राब थे कि पूरे यूरोप को नए सिरे से निर्माण की ज़रूरत थी. 1945 को ‘ईयर ज़ीरो’ का नाम दिया गया. यानी शून्य से शुरुआत. प्रथम विश्व युद्ध और दूसरे विश्व युद्ध में एक महत्वपूर्ण अंतर था. जान माल का नुक़सान पहले विश्व युद्ध में भी हुआ था. लेकिन इस बार युद्ध के क़हर का निशाना सिर्फ़ सैनिक ही नहीं आम लोग भी बने थे. कहते हैं सर्वनाश के ‘four horsemen’ होते हैं – महामारी, युद्ध, अकाल और मृत्यु.

19 वीं सदी की शुरुआत में लगा कि मानवता ने इन्हें मध्य युग में पीछे छोड़ दिया. लेकिन तबाही के फुट स्टेप्स का पीछा करते हुए ये चार घुड़सवार 1945 तक आ पहुंचे थे. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान लगभग 6 करोड़ लोग मारे गए. दुनिया की डिक्शनरी में एक नया शब्द जुड़ा- जेनॉसायड (Genocide). युद्ध के बाद जब जर्मन कॉन्सेंट्रेशन कैम्पस की असलियत सामने आई. तो ये साफ़ हो गया कि दुनिया पहले जैसे नहीं रहने वाली. दुनिया के स्ट्रक्चर में आमूल चूल परिवर्तन होना तय था. पूरे यूरोप में एक नारा चला, ‘नेवर अगेन’ यानी हम दुबारा कभी ऐसा नहीं होने देंगे.

युद्ध में लाखों लोग मारे गए थे. लेकिन जो ज़िंदा बचे थे उनकी हालात भी मौत से बदतर ही थी. वॉरसॉ, बर्लिन और कीव जैसे खूबसूरत शहर खंडहर में तब्दील हो चुके थे. ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और बेल्जियम के प्रमुख औद्योगिक और सांस्कृतिक केंद्रों सहित कई शहर नष्ट हो चुके थे. समूचे यूरोप में इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका था. विक्टोरियन एरा की ख़ूबसूरती पर बमों और गोलियों ने ऐसे निशान छोड़े थे कि पूरा यूरोप एक श्मशान नज़र आता था.

World War
वर्ल्ड वॉर 2 की एक तस्वीर.

लोग भूखों मर रहे थे और मदद का कोई इंतज़ाम नहीं था. रेड क्रॉस के जर्मनी में घुसने पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था. इसके बावजूद जो भी मदद पहुंचाई जा रही थी. उसमें भी पुलों, बंदरगाहों और रेलवे लाइनों के नष्ट हो जाने के कारण दिक़्क़त आ रही थी. लाखों लोग बेघर हो चुके थे. अकेले जर्मनी में ही 70% घर नष्ट हो चुके थे. रसद नियंत्रण के नाम पर अधिकतर लोगों को सिर्फ़ 800 कैलोरी प्रतिदिन की खुराक मिल रही थी. नीदरलैंड में लोग टूलिप के फूल ख़ाकर अपना पेट चला रहे थे.

महाशक्तियों का उदय

1945 तक जर्मनी और जापान के नेपथ्य में चले जाने के कारण दुनिया में एक पावर वैक्यूम आ चुका था. ब्रिटेन की हालत ऐसी नहीं थी कि वो नई दुनिया को लीडरशिप दे. द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से सिर्फ़ तीन बड़े राष्ट्र बचे रहे थे, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका. इनमें से सिर्फ़ अमेरिका था, जिसने युद्ध में एक बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके अलावा अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर वो लीडर की भूमिका निभा सकता था. लेकिन अमेरिका और यूरोप के बीच पूरा अटलांटिक महासागर था. इसलिए सवाल उठा कि बिना नई संधियों और समझौतों के यूरोप को किस प्रकार मदद दी जाए.

मार्शल प्लान

दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध से पहले अमेरिका ‘एकला चलो’ की नीति पर चलता था. द्वितीय विश्व युद्ध से उसे ये समझ आया कि दुनिया के दूसरे इलाक़े में अगर एक तितली भी पर हिलाए तो अटलांटिक के पार तक तूफ़ान आ सकता है. यानी बटरफ़्लाई इफ़ेक्ट. विश्व युद्ध के कारण ब्रिटेन बैंकरप्ट हो चुका था. फ़्रांस की अधिकतर धन सम्पदा जर्मनों ने लूट ली थी. सोवियत की बढ़ती शक्ति अमेरिका के लिए चिंता का कारण थी. यूरोप के कई देशों में जनतांत्रिक सरकारों के ख़िलाफ़ कॉम्युनिस्ट आंदोलन शुरू हो गए थे. इसके पीछे सोवियत का हाथ था. अमेरिका के लिए ज़रूरी था कि सोवियत के बढ़ते प्रभाव को रोका जाए. इसके लिए दो महत्वपूर्ण कदम उठाए गए. इनमें से पहला था मार्शल प्लान और दूसरा NATO का गठन.

1947 में यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका और यूरोप के बीच एक मीटिंग हुई. सोवियत को भी न्योता दिया गया. लेकिन सोवियत ने ये कहते हुए मीटिंग में भाग लेने से इनकार कर दिया कि अमेरिका और उसके रास्ते अलग अलग हैं. इस मीटिंग में मार्शल प्लान की रूपरेखा तय हुई. जिसके अनुसार यूरोपीय देशों को 15 बिलियन डॉलर देने का प्रस्ताव था. ये राशि तब अमेरिका की GDP के 5% के बराबर थी. 3 अप्रैल, 1948 को अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रुमैन ने मार्शल प्लान पर दस्तख़त किए. इसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, पश्चिम जर्मनी और नॉर्वे सहित 16 यूरोपीय देशों को आर्थिक सहायता पहुंचाई गई.

मार्शल प्लान का एक बड़ा हिस्सा CIA को भी दिया गया. जिसने यूरोप में व्यापार के नाम पर अपने फ़्रंट खोले. जो इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने के लिए बनाए गए थे. 1949 में ट्रांस अटलांटिक पार्टनरशिप की शुरुआत हुई. 4 अप्रैल,1949 को नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर साइन किए गए. और NATO का गठन हो गया. अक्सर कहा जाता है कि NATO का गठन सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए किया गया. लेकिन इसके और भी उद्देश्य थे. जैसे यूरोप में अमेरिका की परमानेंट मौजूदगी ताकि नाज़ी पार्टी जैसे अल्ट्रा नैशनलिस्ट संगठनों का उदय ना हो.

इस ट्रीटी का एक विशेष हिस्सा था, आर्टिकल 5. जिसके अनुसार, NATO के सदस्य देशों में से किसी एक पर भी हमला हुआ तो इसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा. अमेरिका इस ट्रीटी का डी-फ़ैक्टो लीडर था. पूरे शीत युद्ध काल में उसने अपनी विश्वसनीयता बनाए रखी. उसकी कथनी और करनी में कभी बड़ा अंतर नहीं रहा. NATO की पश्चिमी यूरोप और पूर्वी एशिया में रूस की शक्ति के खिलाफ संतुलन बनाये रखने में बड़ी भूमिका थी. यूरोप की सुरक्षा का ज़िम्मा अमेरिका के ऊपर था. कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में कितनी गर्मजोशी थी, इसकी बानगी 1962 के एक क़िस्से से मिलती है.

1962 में सोवियत ने अमेरिका के पड़ोसी क्यूबा में मिसायल तैनात कर दी थी. दुनिया में न्यूक्लियर आर्मागेडन के हालात पैदा हो गए. इस दौरान अमेरिका ने अपने यूरोपीय साझेदारों से मदद की गुज़ारिश की. अमेरिका के राष्ट्रपति थे जॉन ऍफ़ केनेडी. केनेडी ने अपने विदेश मंत्री डीन अचेसन को फ़्रांस भेजा. ताकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फ़्रांस अमेरिका का साथ दे. फ़्रांस के पास UN में वीटो का अधिकार था. डीन अचेसन ने फ़्रांस पहुंचकर राष्ट्रपति चार्ल्स डे गॉल से मुलाक़ात की. अचेसन ने क्यूबा के हालात बताने के लिए राष्ट्रपति चार्ल्स से कहा, ‘सबूत के लिए अमेरिका के पास तस्वीरें हैं जिनमें क्यूबा में मिसायल की स्थिति साफ़ देखी जा सकती है.”

Marshal
मार्शल प्लान. फोटो सोर्स- कॉपीराइट फ्री विकीमीडिया कॉमन्स.

चार्ल्स ने तस्वीरें देखने से इनकार कर दिया. और कहा कि अमेरिका पर उन्हें पूरा भरोसा है. अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्द ही काफ़ी है, उन्हें और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है. 1991 में सोवियत का विघटन हुआ और शीतयुद्द समाप्त हो गया. अमेरिका इकलौती सुपरपावर बन गया. लेकिन इसके बाद भी उसने अपनी विश्वसनीयता बनाए रखी.

आफ़्टर 9/11

यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण चरण आया 2001 में. अमेरिका पर हमला हुआ और पूरे यूरोप ने एक स्वर में कहा, ‘हम सब अमेरिका के साथ हैं.’ अक्टूबर 2001 में जब ‘जॉर्ज डबल्यू बुश’ ने तालिबान पर आक्रमण का निर्णय लिया तो उन्होंने इसका ऐलान करते हुए कहा, ‘हमारी लड़ाई आतंक के विरुद्ध है. इस लड़ाई में जो हमारे साथ नहीं है, हम समझेंगे कि वो हमारे ख़िलाफ़ है.’

ऊपर हमने आपको NATO ट्रीटी के आर्टिकल 5 के बारे में बताया. NATO के 70 साल के इतिहास में ये आर्टिकल सिर्फ़ एक बार इन्वोक किया गया है. 9/11 हमले के बाद. अमेरिका वैसे भी घायल शेर की तरह बर्ताव कर रहा था. यूरोपियन यूनियन में युद्ध के ख़िलाफ़ छिट-पुट आवाज़ उठी. लेकिन आर्टिकल 5 के कारण NATO के सभी सदस्य देशों को इसमें भाग लेना पड़ा. 2003 में इराक़ वॉर के दौरान भी जब अमेरिका में झूठ परोसा गया कि सद्दाम हुसैन के पास ‘Weapons of mass destruction’ है. तब भी यूरोप ने अमेरिका की देखा-देखी की. और इराक़ में अपनी सेनाएं भेजी.

ट्रम्प के दौरान

2016 में अमेरिका की राजनैतिक स्थितियों में एक भूचाल आया. सबकी अपेक्षाओं के विपरीत डॉनल्ड ट्रम्प ने हिलरी क्लिंटन को हरा दिया. और अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए. यहीं से अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में बदलाव आने लगा. 2017 में नाटो सम्मेलन के दौरान एक तस्वीर बहुत चर्चित हुई. जर्मनी की चांसलर अंगेला मर्कल और फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों एक टेबल के ऊपर हाथ धरे हुए हैं. सामने कुर्सी पर बैठे ट्रम्प ने अपने हाथ बांध सीने से लगा रखे हैं. मानो कह रहे हों, ‘तुम क्या चाहते हो, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मैं सिर्फ़ अपने ही मन की करुंगा.’

अमेरिका और यूरोप के बदले हुए संबंध को ज़ाहिर करने के लिए इससे बेहतर तस्वीर नहीं हो सकती. जिस अमेरिका को दुनिया का लीडर समझा जाता था. उसके राष्ट्रपति ने एक नया नारा दिया. अमेरिका फ़र्स्ट. असलियत में इसका मतलब अमेरिका फ़र्स्ट के बजाय ओन्ली एंड ओन्ली अमेरिका था. यानी सिर्फ़ और सिर्फ़ अमेरिका. ट्रम्प ने आते ही यूरोपीयन यूनियन को गरियाना शुरू किया और ट्रांस अटलांटिक ट्रेड पर कई तरीक़े के टैरिफ़ लगा दिए.

साथ ही विदेश नीति को लेकर भी ट्रम्प का रवैया अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के विपरीत था. अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ़ अमेरिकी सेना नहीं थी. वहां NATO की फ़ोर्सेस भी तैनात थी. ट्रम्प ने बिना अपने साझेदार देशों से मशवरा किए, ये एलान किया कि चाहे कुछ हो, अमेरिकी फ़ौजें अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाएंगी. इसके बावजूद यूरोपियन यूनियन को लगा कि ये सब ट्रम्प के चलते हो रहा है. और ट्रम्प के हटते ही चीजें दुबारा पटरी पर आ जाएंगी. लेकिन एक देश था जिसको बदलती हवाओं का अंदाज़ा हो गया था.

2017 में फ़्रांस के राष्ट्रपति चुने जाने के तुरंत बाद ही इमैनुएल मैक्रों ने ‘यूरोपियन संप्रभुता’ का मुद्दा उठाना शुरू किया. उन्होंने रक्षा मामलों में स्वयायत्ता लाने और यूरोप की सैन्य क्षमता बढ़ाने की बात कही. जर्मनी और ब्रिटेन ने मैक्रों की इस अपील को नज़रंदाज़ किया. जर्मनी को लगा कि फ़्रांस अंतरराष्ट्रीय पटल पर असर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. जबकि ब्रिटेन में ब्रेग्जिट का मुद्दा ही यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के लिए उठा था. ऐसे में उसे यूरोप में बढ़ती सैन्य साझेदारी में कोई इंटरेस्ट नहीं था.

ख़ैर 2021 में ट्रम्प की कुर्सी छिन गई और बाइडन राष्ट्रपति बन गए. सबको लगा कि बाइडन के आने से अमेरिका दुबारा वर्ल्ड लीडर का रोल सम्भाल लेगा. 2020 में जर्मनी में एक प्यू पोल कराया गया था. इसमें 79% लोगों ने कहा कि बाइडन के आने से अमेरिका दुबारा वर्ल्ड लीडर का रोल निभाने लगेगा. ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान सिर्फ़ 10% लोगों का ऐसा मानना था. इससे पता चलता है कि बाइडन से यूरोप की जनता को क्या उम्मीदें थी. 2021 में हुए G -7 सम्मेलन में एक और तस्वीर बड़ी चर्चित हुई. तस्वीर में बाइडन और मैक्रों ने एक दूसरे के गले में हाथ डाल रखा था. मानो, अमेरिका और यूरोप के रिश्ते पहले जैसे हो गए हों.

Nato
अफगानिस्तान में नाटो फोर्सेस. फोटो- AP

बाइडन ने कहा भी, ‘अमेरिका इज बैक’. लेकिन बैक जाते-जाते बाइडन सिर्फ़ ट्रम्प से पहले के अमेरिका में नहीं रुके. उनकी ट्रेन रुकी 1939 में. जब अमेरिका isolationist यानी पृथकतावादी नीति पर चलता था. 2021 में अमेरिका दुबारा ‘एकला चलो’ की नीति पर लौट चुका है. अब बाइडन हो या ट्रम्प इससे फ़र्क नहीं पड़ता. अमेरिका की ‘फॉरएवर वार’ से वहां की जनता थक चुकी है. और किसी भी नेता के पास ये समर्थन नहीं है कि वो बाकी देशों के मामलों में हस्तक्षेप करे. ख़ासकर तब जबकि कोविड-19 के कारण अमेरिका की आर्थिक स्थिति को बहुत नुक़सान हुआ है. बाइडन के आने से लगा था कि यूरोप अमेरिका के रिश्ते पहले जैसे हो जाएंगे. लेकिन बाइडन ने ट्रम्प द्वारा लगाए टैरिफ़ को बनाए रखा है.

कोविड वैक्सीन के लिए पेटेंट में राहत देते वक्त यूरोप से कोई मशवरा नहीं किया गया. साथ ही अमेरिका ने यूरोप पर कोविड के चलते यात्रा प्रतिबंध लगाए हुए हैं. जबकि यूरोप की तरफ़ से अमेरिकी नागरिकों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष हैं, मार्गारिटिस कीनस. इस हफ़्ते वो अमेरिका का दौरा करने वाली थी. लेकिन उन्होंने ये कहते हुए दौरा रद्द कर दिया कि अगर अमेरीका यूरोपियन यूनियन पर यात्रा प्रतिबंध लगाए रखता है, तो ऐसे में उनके अमेरिका दौरे का कोई मतलब नहीं है. इसके अलावा यूरोपीय संघ ने अमेरिका को ट्रैवल सम्बन्धी ‘सेफ़ लिस्ट’ से भी हटा दिया है. इस मामले में फ़्रांस की पूर्व मंत्री नताली लूएज़ो कहती हैं,

“बहुत से यूरोपीय देशों को लगा कि ट्रम्प के जाने का इंतज़ार करना चाहिए. इसके बाद रिश्ते पुराने जैसे हो जाएंगे. लेकिन अब वो रिश्ते जीवित ही नहीं बचे हैं. मुझे लगता है कि अब यूरोप को जाग जाना चाहिए. और ये समझना चाहिए कि वो अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता”

अमेरिका और यूरोप के सम्बन्धों में आई खटास की सबसे बड़ी वजह है, अफ़ग़ानिस्तान से NATO फ़ोर्सेस की वापसी. NATO फ़ोर्सेस में 36 देशों की सेनाएं हैं. इसमें तीन चौथाई ग़ैर-अमेरिकी सैनिक हैं. लेकिन अमेरिका ने वापसी पर NATO सदस्यों से कोई सलाह मशवरा नहीं किया. उसने इसकी जानकारी तो दी लेकिन वापसी के निर्णय पर एकाधिकार बनाए रखा. इसे लेकर एक-एक कर सारे यूरोपीय देश अमेरिका पर हमलावर रुख़ किए हुए हैं. ब्रिटिश संसद में बोलते हुए पिछले महीने पूर्व प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने कहा,

‘क्या हमारी इंटेलिजेन्स इतनी कमजोर है? क्या हमें अफ़ग़ानिस्तान के हालत की कुछ भी जानकारी नहीं? या हम ये मानकर चल रहे थे कि अगर हम अमेरिका के पीछे-पीछे आंख मूंद कर चलते रहेंगे तो सब सही हो जाएगा.’

जर्मनी में भी अमेरिका को लेकर ग़ुस्सा भड़का हुआ है. जर्मनी दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार विदेशी ज़मीन पर किसी सैन्य मिशन में शामिल हुआ था. वहां अगले महीने इलेक्शन हैं. चांसलर के लिए कंज़रवेटिव उम्मीदवार आर्मिन लाशेत ने विदेश नीति के सवाल पर जवाब दिया है कि ‘NATO की स्थापना के बाद ये उसकी सबसे बड़ी हार है.’ चेक रिपब्लिक के राष्ट्रपति मिलोस ज़ेमान ने कहा है कि ‘अमेरिका वर्ल्ड लीडर के रूप में अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है.’

यूरोप में ‘सामरिक स्वायत्तता’ पर नए सिरे से बहस छिड़ चुकी है. यूरोपीय संघ को दो चिंताएं मुख्य रूप से सता रही हैं. पहली ये कि अफ़ग़ानिस्तान में अशांति से 2015 जैसे हालात पैदा हो सकते हैं. जब सीरिया से लाखों शरणार्थी यूरोप जा पहुंचे थे. यूरोप को चिंता है आने वाले वक्त में एक और रिफ़्यूजी संकट खड़ा हो सकता है. यूरोप की दूसरी चिंता है रूस और चीन को लेकर है. अमेरिका के लौटने से चीन के तेवर और आक्रामक हो गए हैं. पिछले दिनों चायनीज़ मीडिया में ताइवान को लेकर नए नए बयान जारी हुए हैं. जिनमें कहा जा रहा है कि अब ताइवान मदद के लिए पश्चिम की ओर नहीं देख सकता.

दूसरी तरफ़ रूस को लग रहा है कि अब वो यूक्रेन पर अपनी पकड़ मज़बूत कर सकता है. QUAD को लेकर भी नई आशंकाएं जन्मी हैं. चीन का कहना है कि अमेरिका अगर अपने पुराने साथियों के प्रति वफ़ादार नहीं रहा तो वो जापान और भारत को कितनी मदद दे पाएगा. लेकिन इन सब बातों से अमेरिका चिंतित नहीं है. अमेरिका की तरफ़ से अभी तक अपने साझेदारों को कोई आश्वासन भी नहीं दिया गया है. बाइडन कई बार दोहरा चुके हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से निकलने का उनका फ़ैसला सही है.

ये समझ लेना भी गलती होगी कि अमेरिका कमजोर पड़ चुका है. इराक़ और अब अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद अब बाइडन के पास अपने घरेलू मसले सुलझाने का बेहतर मौक़ा है. साथ ही अमेरिका अब चीन की बढ़ती ताक़त पर भी बेहतर तरीक़े से ध्यान दे सकता है. एक तरह से ये कहा जा सकता है कि अमेरिका अपनी नॉर्मल स्थिति पर लौट चुका है. आगे आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि NATO का भविष्य क्या होगा? क्या फ़्रांस और जर्मनी मिलकर कोई नया गठजोड़ बनाएंगे या अमेरिका से साथ रिश्तों में एक नया अध्याय लिखा जाएगा.


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