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कोऑपरेटिव बैंकों के RBI की निगरानी में आने से क्या बदल जाएगा?

24 जून, 2020. कैबिनेट मीटिंग में 5 बड़े फ़ैसले लिए गए. इन सभी फ़ैसलों के बारे में आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं. अभी के लिए इन 5 में सिर्फ़ एक फ़ैसले पर फ़ोकस करते हैं. और वो फ़ैसला ये है कि कोऑपरेटिव बैंकों भी अब RBI (रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया) की निगरानी में आ जाएंगे.

अब सवाल ये, कि क्या पहले नहीं आते थे?

आते थे. लेकिन याद कीजिए अपने बचपन के वो दिन, जब क्लास में कॉपी चेक करवाने में आपका लास्ट नम्बर होता था तो आप कितने निश्चिंत रहते थे, कि मेरा नम्बर आने तक तो पीरियड की घंटी बज जानी है. यही हाल कोऑपरेटिव बैंक्स का भी था. RBI उनकी कॉपी चेक तो करता था लेकिन ऐसा RBI की प्राथमिकता में नहीं था. तो कोऑपरेटिव थोड़े निश्चिंत थे. अब नहीं रहेंगे.

ये थी मोटा मोटी बात. पूरी बात समझने के लिए शुरू से शुरू करते हैं.

कोऑपरेटिव बैंक्स

हालांकि बैंकिंग को कई तरीक़ों से कैटेगराइज़ किया जा सकता है. जैसे-सरकारी बैंक, प्राइवेट बैंक. या- नेशनल बैंक, इंटरनेशनल बैंक. लेकिन कोऑपरेटिव बैंक्स को समझने के लिए हम यूं कैटेगरी बनाएंगे-

# कमर्शल बैंक्स
# कोऑपरेटिव बैंक्स

कमर्शल बैंक्स वो ठहरे जो ‘बैंकिंग रेग्यूलेशन एक्ट 1949’ के अंतर्गत आते हैं. या RBI के अंतर्गत आते हैं. जबकि कोऑपरेटिव बैंक्स आते हैं, ‘कोऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट 1965’ के अंतर्गत या कह सकते हैं, राज्य सरकार के अंतर्गत.

ये तो हुआ कैटेगराइज़ेशन. लेकिन कोऑपरेटिव बैंक्स की कोई स्टैंड-अलोन या अपने आप में भी कोई परिभाषा होगी न?

तो कोऑपरेटिव बैंक्स भी कमर्शल बैंक्स की तरह ही पैसे जमा करते हैं और उधार देते हैं. लेकिन कमर्शल बैंक्स की तरह इनका मुख्य उद्देश प्रॉफ़िट कमाना नहीं होता बल्कि ज़रूरतमंदो की सहायता करता होता है. हां इस दौरान में थोड़ा बहुत प्रॉफ़िट हो जाए तो हर्ज ही क्या है?

‘सहकारी बैंक’ में ‘सहकारी’ शब्द पर गौर कीजिए. मतलब आपसी सहयोग. को-ओपरेशन. इसे सामाजिक विज्ञान के नज़रिए से समझिए. जब एक से अधिक लोग आपस में किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपना ज्ञान, सामान, शारीरिक श्रम वग़ैरह बिना किसी भेदभाव के साझा करते हैं तो यह कॉन्सेप्ट ‘सहकारी’ ठहरा.

बूलियन एलज़ेब्रा

अब दूसरा पॉईंट बूलियन एलज़ेब्रा से समझाते हैं. देखिए किसी समुच्चय में शामिल होने वाले व्यक्तियों की संख्या जितनी अधिक होती जाएगी, उनके बीच के कॉमन फ़ैक्टर्स उतने कम होते जाएंगे. जैसे कि समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ के बीच पाया जाने वाला सहयोग, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक एवं आर्थिक, हर प्रकार का होता है. लेकिन कल्पना कीजिए एक ऐसे समुच्चय की जिसमें एक शहर की हर परिवार की मुखिया आपस में कोई सहयोग बांधना चाहती है. तो अब पहले सुनिश्चित करना होगा कि शहर के सभी परिवारों के बीच कौन सा उद्देश्य कॉमन है जिसके आधार पर वो आपस में एक-दूसरे की मदद कर सकती हैं. यानी लोग बढ़े तो उनके बीच के ‘कॉमन फ़ैक्टर्स’ घटे. और लोग घटे तो ‘कॉमन फ़ैक्टर्स’ बढ़े. इसलिए ही तो तुलनात्मक रूप से एक शेड्यूल बैंक से ज़्यादा लोग जुड़े होते हैं और एक सहकारी बैंक से कम. क्यूं?

वो इसलिए क्यूंकि ‘बैंक’ की बात करें तो इसमें कॉमन फ़ैक्टर हो गया ‘आर्थिक सहयोग’. और अगर ‘सहकारी बैंक’ की बात करें तो इसमें ’आर्थिक सहयोग’ के अलावा कम से कम एक और फ़ैक्टर कॉमन होगा. जैसे हो सकता है, इनके सारे मेंबर्स गाय पालते हों, या किसी एक सोसाइटी में रहते हों, या सभी वकील हों. मेरे शहर में एक कोऑपरेटिव बैंक है. नाम है अल्मोड़ा अर्बन कोऑपरेटिव बैंक. इसमें बैंकिंग के अलावा मेंबर्स के बीच एक और चीज़ कॉमन है, वो ये कि सभी लोग अल्मोड़ा शहर के निवासी हैं.

तो इस तरह सामाजिक विज्ञान और बूलियन एलज़ेब्रा के माध्यम से ‘सहकारी बैंक’ को समझा जा सकता है और उसे ‘शेड्यूल बैंक’ से अलग किया जा सकता है.

सहकारी बैंक्स कई प्रकार के होते हैं. कुछ मुख्य तरीक़े के ये रहे-

1. राज्य सहकारी बैंक

2. केंद्रीय सहकारी बैंक

3. शहरी सहकारी बैंक

4. मल्टी-स्टेट (बहु-राज्यीय) सहकारी बैंक जैसे PMC (पंजाब महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक)

5. ग्रामीण सहकारी बैंक

आपको इनके अलावा ‘भूमि विकास बैंक’ या ‘प्राथमिक सहकारी क्रेडिट सोसायिटी’ जैसे नाम भी गाहे-बगाहे सुनने को मिल जाएंगे. सभी के नाम भी ऐसे कि समझने के लिए इनकी परिभाषाओं की ज़रूरत नहीं.

ड्यूलेटी (द्वैत)

हमने आपसे शुरू में बात की थी न कि RBI कोऑपरेटिव बैंक्स की भी कॉपी चेक करता है. बिना मेटाफ़र के कहें तो, RBI, का कोऑपरेटिव बैंक्स के ऊपर भी काफ़ी हद तक कंट्रोल है. तभी तो पिछले साल पंजाब महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (PMC) बैंक वाल मामला RBI की नज़र में आया था, और RBI ने ही तो उसपर प्रतिबंध भी लगाए थे.

लेकिन जब हम कोऑपरेटिव बैंक्स को समझ रहे थे तब तो हमने कहा था कि ये राज्यों के अंतर्गत आते हैं. ऐसा कैसे? ये द्वैत कैसे?

तो ये ड्यूलेटी आई 1 मार्च, 1966 से. जब कोऑपरेटिव बैंक्स काफ़ी हद तक ‘बैंकिंग रेग्यूलेशन एक्ट 1949’ के अंतर्गत आ ‘भी’ गए. पूरी तरह नहीं, काफ़ी हद तक.

1 मार्च, 1966 से, कोऑपरेटिव बैंक्स के बैंकिंग से जुड़े फ़ंक्शन (जैसे लाईसेंसिंग, इंट्रेस्ट रेट्स, ऐरिया ऑफ़ ऑपरेशन) RBI के द्वारा और रजिस्ट्रेशन, मैनजमेंट और लिक्विडेशन से जुड़े फ़ंक्शन्स राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रित किए जाने लगे.

और इसी वजह से दिक़्क़तें आती हैं. क्यूंकि मैनजमेंट राज्य सरकार देखती है तो कई बार पाया गया कि इन कोऑपरेटिव बैंक्स के मैनजमेंट में कोई राजनेता या उनका रिश्तेदार, या कोई ऐसा जिसका अपना कोई निजी हित हो, बैठा था. साथ ही चूंकि ऑडिटिंग भी RBI के हाथ में नहीं थी इसलिए बुक कीपिंग में भी कोताही बरती गई. और बंटने लगे उल्टे सीधे लोन. होने लगे राइट ऑफ़. मतलब सब कुछ इस हद तक ख़राब, कि चलिए PMC वाली दिक्कत तो पकड़ में आ गई लेकिन ये कोई पहली बार होने वाली अनियमितता नहीं थी. मनीकंट्रोल की एक वीडियो के अनुसार 2004 में भारत में 1,926 अर्बन कोऑपरेटिव बैंक्स थे जो 2018 में घटकर 1,551 रह गए.

कैबिनेट फ़ैसले के बाद क्या क्या बदल जाएगा?

पहले आपको बता दें कि भारत में 1,540 अर्बन कोऑपरेटिव और 96 हज़ार से ज़्यादा रूरल (ग्रामीण) कोऑपरेटिव बैंक्स हैं. ग्रामीण सहकारी बैंक्स की संख्या इतनी ज़्यादा है कि RBI के बस में नहीं है कि इन सबपर नज़र रखे. इसलिए अभी RBI के दायरे में सिर्फ़ अर्बन और मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव बैंक्स ही आएंगे. ग्रामीण सहकारी बैंक्स नहीं. तो जो भी बदलाव होंगे इन 1,540 (1482 अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक और 58 मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव) बैंक्स पर ही लागू होंगे. और वो बदलाव क्या होंगे? कुछ बड़े बदलाव ये रहे-

#1 अब इन ऑपरेटिव बैंक्स में मैनेजमेंट की भर्ती ऐसे ही नहीं हो जाएगी. पूर्व एमएलए या पार्षद का भतीजा टाइप. एक न्यूनतम अहर्ता आवश्यक होगी.

#2 CEO के अपॉईंटमेंट के लिए तो बाक़यदा RBI से आज्ञा लेनी होगी.

#3 यूं इन बैंक्स का ‘लेड बैक एटिट्यूड’ घटेगा और एक प्रफेशनलिज्म आएगा. अगर आपने कभी कोऑपरेटिव बैंक्स देखे हैं तो आप समझ रहे होंगे इस ‘लेड बैक एटिट्यूड’ का अर्थ.

#4 वो कॉपी चेक करने वाला शुरुआती उदाहरण, अब कॉपी RBI चेक करेगा. मतलब ऑडिट. पहले स्टेट करता था. RBI साल में सिर्फ़ एक बार इन बैंक्स की बुक-कीपिंग देख लेता था.

#5 पहले लिक्विडेशन का ज़िम्मा स्टेट के पास था अब ये RBI कर सकेगी. हां लेकिन अब भी स्टेट से इस मामले में राय मशविरा ज़रूर होगा.


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