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9/11 हमलों में क्या थी सऊदी अरब की भूमिका, FBI की जांच रिपोर्ट में क्या निकला?

अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले की 20वीं बरसी मनाई जा चुकी है. तकरीबन तीन हज़ार आम लोगों की जान लेने वाले इस हमले ने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया था. अमेरिका की एक बड़ी आबादी उस सदमे से अभी तक उबर नहीं पाई है. बीस साल बीत जाने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है, जो पर्दे के पीछे छिपा हुआ है. अमेरिकी जनता आज भी उन अनसुलझी पहेलियों का सच जानने की कोशिश कर रही है.

इस कड़ी में सबसे बड़ी पहेली है, 9/11 के हमलों में सऊदी अरब की भूमिका. क्या सऊदी अरब को हमलों की जानकारी पहले से थी? क्या सऊदी अधिकारियों ने अल-क़ायदा को पैसे मुहैया कराए? क्या अमेरिकी सरकार सऊदी अरब को बचा रही है? 9/11 हमले के पीड़ित और उनके सगे-संबंधी लंबे समय से इन सवालों का जवाब मांग रहे थे. इस मांग की वजह क्या थी? हमले में शामिल 19 में से 15 हाईजैकर्स सऊदी अरब के नागरिक थे.

इस हमले का सबसे बड़ा मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन सऊदी अरब के एक ताक़तवर शेख़ परिवार से ताल्लुक रखता था. अल-क़ायदा को सऊदी अरब से अच्छी-खासी मदद मिलती थी. इसके बावजूद अमेरिका ने सऊदी अरब की भूमिका को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया था. इसी के चलते सरकार की मंशा पर लगातार सवाल उठ रहे थे.

इस मामले में नया क्या है? नया ये है कि तमाम क़िस्म की आशंकाओं से पर्दा खींचने की पहल हो चुकी है. पिछले हफ़्ते अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने हमले की जांच से जुड़े सीक्रेट दस्तावेज़ों को पब्लिक डोमेन में लाने का आदेश दिया था. 11 सितंबर 2021 को एफ़बीआई ने 16 पन्नों का सीक्रेट दस्तावेज़ रिलीज़ कर दिया है. इस दस्तावेज़ से क्या-क्या पता चला है? क्या सच में सऊदी अरब इन हमलों का ज़िम्मेदार था? उस ‘घोस्ट एम्पलॉयी’ की कहानी क्या है, जो अमेरिका में दो हाईजैकर्स का रहनुमा बना था? और, आगे क्या होने वाला है? चलिए जानते हैं.

सबसे बड़ा आतंकी हमला

11 सितंबर 2001 की तारीख़ उस वक़्त इतिहास में दर्ज़ हो गई. जब अल-क़ायदा के आतंकियों ने चार यात्री विमानों को हाईजैक कर अमेरिका पर हमला कर दिया था. दो प्लेन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो टॉवर्स से टकराए गए. एक प्लेन पेंटागन पर गिराया गया. जबकि चौथा प्लेन पेन्सिलवेनिया के बाहर एक खेत में क्रैश हो गया.

9/11, अमेरिका की धरती पर हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला था. इस हमले के सभी तार सऊदी अरब से जुड़ रहे थे. इसलिए, ये ज़रूरी था कि इन लिंक्स की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल की जाए. लेकिन असलियत में क्या हुआ?

जनवरी 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स और प्रो पब्लिका ने एफ़बीआई के इन्वेस्टिगेशन पर एक रिपोर्ट पब्लिश हुई थी. रिपोर्ट के अनुसार, एफ़बीआई की एक टीम ने कई सालों तक सऊदी कनेक्शन की सीक्रेट जांच की. फिर एक दिन उनसे जांच बंद करने के लिए कह दिया गया.

9/11 हमले के बाद बर्मिंघम में एक संदिग्ध अल-बयूमी के घर से एक डायरी मिली थी. उस डायरी में एक प्लेन का डायग्राम बना था. रिपोर्ट के मुताबिक, इसका डिजाइन उस प्लेन से मेल खाता था, जिसे पेंटागन पर गिराया गया था. लेकिन जांच के दौरान उस डायरी और उसमें मौजूद कॉन्टेंट पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. टाइम्स की रिपोर्ट में एफ़बीआई और सीआईए के बीच भरोसे और तालमेल की कमी का भी ज़िक़्र किया गया है.

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जॉर्ज़ डब्ल्यु बुश ने इन दस्तावेज़ों को पब्लिक डोमेन में लाने से मना किया था. फोटो- AP

ये घटना साल 2010 की है. एफ़बीआई सऊदी अरब की मिनिस्ट्री ऑफ़ इस्लामिक अफ़ेयर्स के दो धार्मिक अधिकारियों को फ़ुल-टाइम सर्विलांस पर रखना चाहती थी. इन दोनों ने अमेरिका में अंग्रेज़ी की पढ़ाई के लिए वीजा लिया था. एफ़बीआई को ये मालूम चला था कि दोनों के ट्रैवल डिटेल्स हाईजैकर्स और उनको मदद मुहैया कराने वाले संदिग्धों से मेल खाते थे.

लेकिन जब तक ये प्लान अमल में आता, सीआईए ने इस पर ऑब्जेक्शन जता दिया. सीआईए उन दोनों के सर्विलांस के लिए राज़ी नहीं हुई. एफ़बीआई के एक पूर्व अधिकारी ने टाइम्स को बताया कि वे सऊदी सरकार को नाराज़ नहीं करना चाहते थे.

दोनों धार्मिक अधिकारियों ने अमेरिका आने का प्लान ऐन समय पर कैंसिल कर दिया. एफ़बीआई को ये शक था कि किसी ने पहले ही सऊदी अधिकारियों को सीक्रेट प्लान की जानकारी दे दी थी. ऐसा किसने और क्यों किया, ये कभी पता नहीं चल पाया.

अमेरिकी सरकार पर हमेशा ये आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सऊदी अरब के गुनाहों को छिपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. ये आरोप हर नई सरकार को विरासत में मिला. बुश के बाद ओबामा, ओबामा के बाद ट्रंप और अब जो बाइडन. हालांकि, बाइडन इस विरासत से पीछा छुड़ाने की कवायद में जुट गए हैं. उनके आदेशानुसार, एफ़बीआई ने 16 पन्नों की एक जांच रिपोर्ट को डिक्लासिफ़ाई कर दिया है. एफ़बीआई के इस दस्तावेज़ से क्या पता चला है?

ये जांच रिपोर्ट एफ़बीआई के ‘ऑपरेशन एनकोर’ पर बेस्ड है. इस ऑपरेशन का फ़ोकस हमले में शामिल दो हाईजैकर्स पर था. साथ ही, ये पता लगाना भी था कि सैन डिएगो में उन दोनों को मदद किसने पहुंचाई थी. ऑपरेशन एनकोर के तहत, नवंबर 2015 में एफ़बीआई ने एक व्यक्ति का इंटरव्यू लिया था. ये व्यक्ति एक समय लॉस एंजिलिस में सऊदी अरब के दूतावास में काम कर चुका था. हालांकि, डिक्लासिफ़ाईड डॉक्यूमेंट में उसके नाम को छिपा लिया गया है. हम उसका नाम मान लेते हैं, एक्स.

एक्स ने क्या जानकारी दी?

उसने बताया कि उमर अल-बयूमी ने दो हाईजैकर्स नवाफ़ अल-हाज़मी और ख़ालिद अल-मिधार की हर तरह से मदद की थी. बयूमी ने दोनों के रहने की व्यवस्था की थी. खाने-पीने, घूमने, इंटरप्रेशन के अलावा पैसे से भी उनकी मदद की गई थी. अल-बयूमी ने अपने नाम पर सैन डिएगो में एक फ़्लैट लीज़ पर लिया था. उसने पहले महीने का किराया भी अपनी जेब से दिया था. अल-बयूमी ने उन दोनों को बैंक अकाउंट खोलने में भी मदद की थी.

अल-बयूमी ने 2003 में पूछताछ में बताया था कि नवाफ़ और ख़ालिद से उसकी मुलाक़ात एक रेस्टोरेंट में हुई थी. वो पहले से उन दोनों को नहीं जानता था. लेकिन एक्स के इंटरव्यू से कुछ और ही कहानी पता चलती है. क्या? ये कि अल-बयूमी दोनों को पहले से जानता था. और, उसने दोनों के आने के जश्न में एक पार्टी भी दी थी.

एक्स ने ये भी बताया कि अल-बयूमी लॉस एंजिलिस में स्टूडेंट के तौर पर रजिस्टर्ड था. उसे सऊदी सरकार की तरफ़ से स्कॉलरशिप मिली हुई थी. वो था तो स्टूडेंट, लेकिन वो बराबर सऊदी दूतावास में जाता रहता था. वहां उसे सब लोग जानते थे और ख़ूब इज्जत भी देते थे. सऊदी दूतावास के कई बड़े अधिकारियों से अधिक उसका सम्मान होता था. इससे साफ़ जाहिर है कि सऊदी अधिकारी अल-बयूमी को अच्छी तरह से जानते थे. उसका सऊदी दूतावास में अच्छा-खासा कनेक्शन था. एक्स की पत्नी ने एफ़बीआई को बताया था कि अल-बयूमी हमेशा जिहाद की बात किया करता था.

इसके अलावा, एफ़बीआई के दस्तावेज़ में एक सऊदी डिप्लोमैट फहाद अल-थुमैरी का भी नाम आया है. वो लॉस एंजिलिस के किंग फहाद मस्जिद का इमाम था. फ़हाद को कट्टर चरमपंथी विचारों के लिए जाना जाता था. दस्तावेज़ में एक फ़ोन कॉल का भी ज़िक़्र है. ये कॉल अल-थुमैरी ने साल 1999 में किया था. सऊदी अरब के दो भाईयों को. 9/11 के बाद ये दोनों भाई गिरफ़्तार किए गए थे. इन्हें ग्वांतनामो बे की जेल में रखा गया था.

अमेरिकी जांच एजेंसियों ने बाद में दोनों से अलग-अलग जगहों पर पूछताछ भी की. अल-बयूमी और अल-थुमैरी, दोनों ने हमले में किसी भी तरह का हाथ होने से इनकार कर दिया. जांच एजेंसियों ने उनके कहे पर मुहर लगा दी. 2004 में आई 9/11 कमीशन की रिपोर्ट में लिखा गया कि सभी तथ्यों को खंगालने के बाद हमें इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि अल-थुमैरी ने दोनों हाईजैकर्स को किसी भी तरह की सहायता दी थी.

एफ़बीआई के इन्वेस्टिगेशन में पता चला है कि अल-थुमैरी ने दोनों हाईजैकर्स की मदद के लिए एक व्यक्ति नियुक्त किया था. उस व्यक्ति का नाम भी छिपा लिया गया है. दस्तावेज़ से ये भी पता चला है कि ‘कट्टर इस्लामिक साहित्य’ बांटने के ज़ुर्म में सऊदी सरकार दूतावास के एक कर्मचारी को निकालना चाहती थी. लेकिन, अल-थुमैरी के कहने पर उसकी नौकरी बच गई थी. एक बात और, 9/11 के हमले से दो महीने पहले उमर अल-बयूमी और फ़हाद अल-थुमैरी अमेरिका से निकल गए थे. इस वजह से ये शक पुख्ता होता है कि दोनों को हमले के बारे में पूरी जानकारी थी.

जो बाइडन से पहले के तीन राष्ट्रपतियों जॉर्ज़ डब्ल्यु बुश, बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर इन दस्तावेज़ों को पब्लिक डोमेन में लाने से मना कर दिया था. लेकिन बाइडन अलग लीक पर चलने का मन बना चुके हैं. उन्होंने जस्टिस डिपार्टमेंट को आदेश दिया है कि जिन दस्तावेज़ों को रिलीज़ किया जा सकता है, उन्हें बाहर लाने का काम शुरू कर दिया जाए. 11 सितंबर 2021 को पहला दस्तावेज़ बाहर आया है.

हालांकि, इससे हमले में सऊदी सरकार के सीधे तौर पर शामिल होने के पुख्ता सबूत तो नहीं मिलते. लेकिन इतना तो तय है कि सऊदी सरकार के लिए काम कर रहे कई बड़े लोग इस साज़िश के बारे में जानते थे. एफ़बीआई की तरफ़ से जारी होने वाले दस्तावेज़ों की ये पहली कड़ी है. अगले छह महीनों में और भी खुलासे होने की संभावना है.

फिलहाल तो इस खुलासे पर सऊदी अरब की तरफ से कोई बयान नहीं आया है. कुछ समय पहले सऊदी अरब ने ये कहा था कि वो डिक्लासिफ़िकेशन का स्वागत करता है. उसने ये भी मांग रखी थी कि हमले से जुड़े हर दस्तावेज़ को पब्लिक डोमेन में लाया जाए ताकि सऊदी अरब के ख़िलाफ़ लग रहे बेबुनियाद आरोपों का सिलसिला खत्म हो सके.

पीड़ित परिवारों ने इस खुलासे पर क्या कहा है?

उन्होंने इस रिलीज़ का स्वागत किया है. पीड़ित परिवारों के एक वकील ने कहा कि सारे सबूत इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि अल-क़ायदा को अमेरिका में सपोर्ट मिल रहा था. और, ये सब सऊदी सरकार की जानकारी में था. जुलाई 2021 में कुछ पीड़ित परिवारों ने सऊदी सरकार को कोर्ट में लाने की प्रक्रिया शुरू की थी. वे लंबे समय से मांग कर रहे थे कि सरकार सऊदी अरब की संलिप्तता से जुड़ी रिपोर्ट साझा करे. ताकि उन्हें अदालती कार्रवाई में मदद मिल सके. पहली रिलीज़ ने उनके अंदर उम्मीदें जगा दी हैं.

किसके दावे में कितना दम है और 9/11 हमले की जड़ें कितनी गहरी हैं, ये तो आने वाला समय ही बताएगा. जब एक-एक कर सारे ज़रूरी दस्तावेज़ पब्लिक डोमेन में आएंगे. तभी हमले के पीड़ितों की बेचैनी कम हो पाएगी. तभी वे ‘न्याय’ के और क़रीब पहुंच पाएंगे.

दुनिया की अन्य बड़ी खबरें-

1. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा तेज़ हो गई थी. पिछले शासन के दौरान तालिबान ने महिलाओं को घरों में रहने का आदेश दिया था. तालिबान ने लड़कियों की पढ़ाई पर भी रोक लगा दी थी. नई सरकार में क्या हुआ? इस बार तालिबान की पॉलिसी में हल्का-सा बदलाव आया है. इस बार उसने कहा है कि लड़कियां पढ़ाई कर सकती हैं. लेकिन उन्हें लड़कों से अलग बैठना होगा. साथ ही, उन्हें अपना सिर भी ढकना होगा. लड़कियों को महिला टीचर्स ही पढ़ाएंगी. भले ही तालिबान बदलने का दावा करे, लेकिन आज़ादी छीनने की उसकी आदत अभी बरकरार है.

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काबुल एयरपोर्ट के बाहर खड़े तालिबान लड़ाके. फोटो- PTI

अफ़ग़ानिस्तान में और क्या चल रहा है? तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से कोई भी कॉमर्शियल फ़्लाइट अफ़ग़ानिस्तान में लैंड नहीं हो रही थी. मिलिटरी और चार्टर्ड प्लेन्स के सहारे लोगों को बाहर निकाला जा रहा था. 13 सितंबर को पाकिस्तान इंटरनैशनल एयरलाइंस का एक कॉमर्शियल प्लेन 10 यात्रियों को लेकर काबुल एयरपोर्ट पर लैंड हुआ. काबुल की गद्दी पर तालिबान की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में लैंड होने वाली ये पहली इंटरनैशनल फ़्लाइट है. 30 अगस्त को अमेरिका की वापसी के बाद से तालिबान काबुल एयरपोर्ट को दोबारा चालू करने की कोशिश कर रहा है. क़तर और पाकिस्तान समेत कई देश इस काम में उसकी मदद कर रहे हैं.

2. दक्षिणी नाइजीरिया में बंदूकधारियों ने एक जेल पर हमला कर 240 से अधिक क़ैदियों को छुड़ा लिया. कोगी स्टेट में बनी इस जेल पर 12 सितंबर की रात को हमला हुआ. सुरक्षाकर्मी इस हमले का जवाब नहीं दे पाए. जिस जेल पर हमला हुआ है, वो 2008 में बनी थी. इसमें दो सौ क़ैदियों के रहने का इंतज़ाम है. लेकिन हमले के वक़्त इसमें 294 क़ैदी बंद थे. इनमें से 70 सज़ायाफ़्ता थे. बाकी कोर्ट की सुनवाई शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नाइजीरिया में मुकदमा शुरू होने से पहले आरोपियों को लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. इसी वजह से अक्सर नाइजीरिया के जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदियों को रखा जाता है. पुलिस ने भागे हुए क़ैदियों की तलाश तेज़ कर दी है. अभी तक हमले में हताहत हुए लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.


वीडियो- तालिबान ने महिलाओं के विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को बेरहमी से पीटा

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