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FCAT का पूरा तिया-पांचा, जिसे बंद करने पर इंडिया की तुलना तानाशाह मुल्कों से हो रही है

तारीख 06 अप्रैल, 2021. फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज ने इसे सिनेमा जगत के लिए एक दुखद दिन बताया.

हंसल मेहता ने ट्वीट कर लिखा,

ऐसे समय पर इस तरह का फैसला क्यों लिया गया? आखिर इस फैसले की जरूरत क्या थी?

 

‘कांटे’, ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ और ‘काबिल’ जैसी फिल्में बनाने वाले संजय गुप्ता ने लिखा,

पर क्यों क्यों क्यों? किस तरह की अकड़ है ये? आप हमें बिना बताए फिल्म इंडस्ट्री का मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार छीन लेते हैं, और हम से पूछना तक जरूरी नहीं समझते.

कुछ ऐसी ही बातें ऋचा चड्ढा, डायरेक्टर मुकेश भट्ट और प्रड्यूसर गुनीत मोंगा ने भी कही.

शुरुआत में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों का ज़िक्र किया. कि कैसे वो अपना गुस्सा ज़ाहिर कर रहे थे. दरअसल, ये सारा रोष एक ट्राइब्यूनल से जुड़ा है. नाम है FCAT. यानी Film Certification Appellate Tribunal. जिसे सरकार ने चुपचाप बंद कर दिया है. वो भी बिना किसी की राय लिए. FCAT इंडियन फिल्म सेंसरशिप का एक अभिन्न अंग था. जिसकी बदौलत कई फिल्में डिब्बे में बंद होने से बची. इसी FCAT पर बात करेंगे. जानेंगे कि ये क्यों जरूरी था, इसका रोल समझेंगे. ऐसा क्या था इसमें कि इसे बंद किये जाने के फैसले को लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हुए किसी हमले की तरह देख रहे हैं. साथ ही बताएंगे उन फिल्मों के बारे में, जिन्हें आप सिर्फ FCAT की बदौलत ही देख पाए.

Spotlight


# जब चुपचाप बंद किया FCAT

06 अप्रैल को हर जगह खबर छपी कि सरकार ने FCAT को बंद कर दिया है. लेकिन सरकार अपना खेला पहले ही खेल चुकी थी. ठीक दो दिन पहले. 04 अप्रैल को कानून मंत्रालय ने एक ऑर्डिनेंस जारी किया. Tribunals Reforms Ordinance, 2021. जिसके अंतर्गत नौ ट्राइब्यूनल्स को भंग कर दिया गया. इन्हीं नौ में से एक था Film Certification Appellate Tribunal यानी FCAT. ये खबर लोगों को अचानक से ज़रूर मिली, लेकिन सरकार इसकी प्लानिंग काफी पहले से कर रही थी. दरअसल, इसी फ़रवरी में लोकसभा के बजट सत्र के दौरान Tribunals Reforms Bill इन्ट्रोडयूस किया गया था. उस समय इसे पारित नहीं किया गया. हालांकि, बाद में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ऑर्डिनेंस जारी किया. जिसके तहत FCAT को भंग कर दिया गया. FCAT का गठन द सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के अंतर्गत हुआ था. अब सरकार ने इस एक्ट में एक संशोधन कर FCAT को खत्म कर दिया है. एक्ट में जहां ‘ट्राइब्यूनल’ शब्द था, उसे हटाकर अब ‘हाई कोर्ट’ कर दिया गया है. आप पूछेंगे कि इतने से संशोधन से कौन सी बला आ रही है, तो ज़रा सी देर में उस पर भी बात करेंगे. एक-एक कर चीज़ें समझेंगे, क्यूंकि क्रोनोलॉजी समझना बहुत जरूरी है.

Ram Nath Kovind
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ऑर्डिनेंस जारी कर FCAT भंग कर दिया.

# फिल्म सेंसरशिप का सीन क्या है?

मान लीजिए कि आप एक फिल्ममेकर हैं. आप ने एक फिल्म बनाई. अब उसे थिएटर्स और टीवी पर दिखाना चाहते हैं. लेकिन सीधे-सीधे आप ऐसा नहीं कर सकते. अपनी फिल्म पब्लिक को दिखाने के लिए आपको उसके लिए एक सर्टिफिकेट लेना होगा. जो ये घोषित करे कि आपकी फिल्म सोसाइटी के किस एज ग्रुप के लिए सूटेबल है. फिर आप अपनी फिल्म भेजते हैं सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन यानी CBFC के पास. जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में सेंसर बोर्ड भी बोलते हैं. हालांकि, इनका काम सिर्फ फिल्मों को उनकी एज ग्रुप के हिसाब से सर्टिफिकेट देना है. उसे काटना-छांटना नहीं. यही बात CBFC को बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी याद दिलाई थी. 2019 में. जब CBFC ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्मित फिल्म ‘चिड़ियाखाना’ को यूनिवर्सल सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था. कोर्ट ने इसपर कहा था, ‘आप सर्टीफिकेशन बोर्ड हैं, सेंसर बोर्ड नहीं’.

Chidiakhana
‘चिड़ियाखाना’ पर कोर्ट ने CBFC को डांट लगाई थी.

खैर, फिर से टॉपिक पर लौटते हैं. तो आप अपनी फिल्म CBFC को सबमिट कर चुके हैं. अब आपकी फिल्म देखेगी एग्ज़ामिनेशन कमिटी. CBFC की ये कमेटी फिल्म देखेगी और चार श्रेणियों के आधार पर फिल्म को सर्टिफिकेट देगी. ब्रीफ़ में इन चार श्रेणियों के बारे में भी बताते हैं.

#1. यूनिवर्सल (U): पहली कैटेगरी है ‘यूनिवर्सल’. ये सर्टिफिकेट मिलने का मतलब है कि फिल्म कोई भी देख सकता है. बच्चे, बूढ़े सब.

#2. यूनिवर्सल/ एडल्ट (U/A): जिन फिल्मों को U/A सर्टिफिकेट मिलता है, उन्हें भी कोई भी देख सकता है लेकिन 12 साल या उससे छोटी उम्र के बच्चों को इस सर्टिफिकेट वाली फिल्में अपने पेरेंट्स की निगरानी में देखनी होंगी.

#3. एडल्ट (A): एडल्ट यानी वयस्क. ‘A’ सर्टिफिकेट मिलने वाली फिल्मों को केवल 18 साल या उससे बड़ी उम्र के लोग ही देख सकते हैं.

#4. स्पेशल (S): वो फिल्में जिन्हें समाज के किसी खास तबके के लिए बनाया गया हो. जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट्स आदि. ऐसी फिल्मों को ‘S’ सर्टिफिकेट दिया जाता है.

आम तौर पर CBFC आपके साथ एक लिस्ट शेयर करेगी. कि हमें इस-इस सीन और डायलॉग पर आपत्ति है. इन्हें अपनी फिल्म से हटा लीजिए. इसके बिना हम आपकी फिल्म को सर्टिफिकेट नहीं दे सकते. मान लीजिए कि आप उनके सुझावों से सहमत नहीं हैं. आपको लगता है कि जिन सीन्स पर आपत्ति उठाई गई है, वो कहानी के नज़रिए से जरूरी हैं. अब आप क्या करेंगे? आप अपनी शिकायत लेकर जाएंगे रिवाइज़िंग कमेटी के पास. ये भी CBFC की ही दूसरी कमेटी है. ध्यान रहे, इस कमेटी में से किसी ने भी आपकी फिल्म को पहले नहीं देखा है. पिछली कमेटी वालों का यहां कोई काम नहीं.

Cbfc Certificate
CBFC का सर्टिफिकेट.

अब रिवाइज़िंग कमेटी आपकी फिल्म देखेगी. और अपनी रिपोर्ट CBFC के चेयरपर्सन को सौंपेगी. इसके बाद CBFC फिल्म को लेकर अपना फाइनल वर्डिक्ट देगी. या तो आपकी मांग मानकर फिल्म को सर्टिफिकेट दे देगी. वर्ना जिन हिस्सों पर उसे आपत्ति लगे, उन्हें हटाने के लिए कह सकती है. कह सकती है कि ये चेंजेस कर लो, उसके बाद ही सर्टिफिकेट इश्यू करेंगे. तीसरी सिचुएशन ये भी हो सकती है कि आपकी फिल्म को कोई भी सर्टिफिकेट देने से ही मना कर दे. रिवाइज़िंग कमेटी के फैसले से भी आप संतुष्ट नहीं होते तो आपके पास एक ही रास्ता है. कोई अच्छा सा वकील हायर कीजिए और पहुंच जाइए हाई कोर्ट. लगाइए अर्ज़ी. काटिए कोर्ट के चक्कर. हो सकता है कि असंख्य सुनवाइयों के बाद कोर्ट आपकी मांग मान ले. लेकिन तब तक आपके वकील की फीस आपकी फिल्म के बजट को पार कर चुकी होगी. अपनी फिल्म को कोर्ट ले जाने में आपका एक और नुकसान है. मुमकिन है कि केस की सुनवाई कर रहे जज का फिल्मों से कोई वास्ता न हो. उनकी सारी कार्रवाई कागज़ों के आधार पर होगी. कागज़ों पर अगर आपका केस कमज़ोर है, तो गया केस पानी में. हर तरह से ये CBFC के लिए विन-विन सिचुएशन है. और CBFC सीधे-सीधे सरकार के कंट्रोल में है. तो सरकार को जो डायलॉग पसंद नहीं आएगा. अब उसपर चलेगी कैंची. जो फिल्म ही पसंद नहीं आएगी, वो जाएगी डिब्बे में. लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था. कम से कम 1983 से लेकर 2021 की शुरुआत तक तो नहीं.


# सारे केस कोर्ट नहीं संभाल सकती

CBFC से सहमत ना होने के बावजूद फिल्ममेकर्स कोर्ट जाने से कतराते थे. पैसे और वक्त की बर्बादी में कौन फंसे. इससे अच्छा CBFC जो चेंज करने को कहती, उसे मान लेते. और जैसे-तैसे फिल्म रिलीज़ कर देते. लेकिन कुछ मेकर्स CBFC की मनमानी को चैलेंज कर कोर्ट पहुंच जाते. ऐसा करने में कोर्ट का भी नुकसान होता. एक तो उनके पेंडिंग केसेस की लिस्ट, ऊपर से फिल्मों से जुड़े केस भी आकर उन में जुड़ जाते. तो और दिक्कत. इसलिए सरकार ने इस समस्या को फिक्स करने का फैसला लिया. 1983 में एक ट्राइब्यूनल बनाई. FCAT के नाम से. इस ट्राइब्यूनल का काम था फिल्ममेकर्स और CBFC के बीच के विवाद को खत्म करना. वो भी मसले को बिना कोर्ट ले जाए.

Indian Filmmakers
CBFC से अपने विवाद सुलझाने के लिए फिल्ममेकर्स को कोर्ट जाना होगा.

एक चेयरपर्सन समेत चार अन्य सदस्य इस ट्राइब्यूनल का हिस्सा होते थे. रिटायर्ड चीफ जस्टिस को ही FCAT का चेयरपर्सन बनाया जाता था. बाकी चार सदस्यों में से कम-से-कम एक सदस्य फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा शख्स होता था. CBFC के सर्टिफिकेशन से सहमत नहीं होने पर मेकर्स सीधा FCAT के दरवाज़े पहुंच जाते. FCAT उन से मामूली सी फीस चार्ज करती. उसके सदस्य फिल्म देखते. और नॉर्मली, छह हफ्तों में अपना फैसला सुना देते. अगर उन्हें फिल्ममेकर की बात सही लगती तो CBFC को अपना फैसला बदलने को कहते. फिल्म को नया सर्टिफिकेट जारी करने को कहते. हालांकि, कई मौकों पर ऐसा भी हुआ है जब उन्होंने CBFC के फैसले को सही ठहराया हो. ऐसे केस में फिल्ममेकर को या तो उनकी बात माननी पड़ती वर्ना आखिरी ऑप्शन के रूप में कोर्ट जाना पड़ता. 2018 और 2019 में करीब 53 फिल्ममेकर्स अपनी शिकायत लेकर FCAT पहुंचे थे. अब FCAT ना होने से ऐसे फिल्ममेकर्स को कोर्ट का रुख करना पड़ेगा.

Aandhi
‘आंधी’ जिसे कांग्रेस सरकार ने बैन कर दिया था.

सरकारों पर हमेशा एक आरोप लगता रहा है. कि ये कला के क्षेत्र में मनमानी दखलअंदाज़ी करती हैं. कलाकार को सामाजिक मुद्दों पर बोलने की आज़ादी नहीं देती. अपने यहां फिल्मों को बैन या बॉयकॉट करने का चलन भी कोई नया नहीं. कांग्रेस सरकार ने भी इमरजेंसी के समय ‘आंधी’ और ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसी फिल्मों पर बैन लगाया था. अब भी ये हो ही रहा है. किसी स्ट्रॉन्ग पॉलिटिकल सब्जेक्ट पर फिल्म बनाओ. बस लग गया बैन. राई के दाने पर आहत होने वाली जनता तो ऐसे मुद्दों पर कब की सुन्न पड़ चुकी है. अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी गैर-जरूरी चीज़ों से भला उन्हें क्या मोह? सरकारें पहले भी फिल्मों पर अपनी भड़ास निकालती थीं. अब FCAT जैसे मीडियम के ना होने से उन्हें और हिम्मत मिलेगी.

अब भोलेपन में आप पूछेंगे कि इतना हल्ला क्यूं काट रहे हो? CBFC तो है ही ना. अपना काम करने के लिए. तो इसका जवाब है कि CBFC सीधा सरकार के अंडर आती है. यानी कि CBFC का चेयरपर्सन भी सरकार ही चुनकर भेजती है. अब टू प्लस टू आप खुद कर लीजिए. कि सरकार जैसा चाहेगी, वैसा CBFC आखिर क्यूं नहीं करेगी.


# जब CBFC की मनमानी दरकिनार कर फिल्में रिलीज़ हुईं

FCAT भंग हो गई. न्यूज़ आई और फिल्म इंडस्ट्री में हल्ला मच गया. फिल्म मेकर्स इसे सिनेमा के लिए दुखद बताने लगे. अफसोस जताने लगे कि अब बस एक ही किस्म की फिल्में बनेंगी. कोई भी पॉलिटिकल सब्जेक्ट चुनने से हिचकिचाएगा. ऑफ बीट फिल्मों पर मानो अघोषित बैन लग गया हो. फिल्म मेकर्स का ये त्राहिमाम जायज़ भी है. क्यूंकि भारतीय सिनेमा में ऐसे कई उदाहरण हैं. जहां CBFC ने अपनी टेबल पर फिल्म की निर्मम हत्या कर डाली हो. इतने कट दिए हों कि फिल्म अपने पैरों पर ना खड़ी हो पाए. ऐसे ही मौकों पर FCAT और कोर्ट की बदौलत इन फिल्मों को हरी झंडी मिली. जो अगर CBFC के भरोसे रहती तो शायद चंद सीन्स में सिमटकर रह जातीं. कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में जानते हैं जो CBFC का फैसला उलटकर रिलीज़ हुई.

#1. उड़ता पंजाब (2016)

94 कट. CBFC ने फिल्म देखने के बाद ‘उड़ता पंजाब’ में 94 कट सुझाए. साथ ही मेकर्स के हाथ में 13 पॉइंट्स की लिस्ट थमा दी. कि फिल्म में कांट-छांट के बाद और क्या-कुछ बदलाव करने होंगे. मेकर्स पहुंचे बॉम्बे हाई कोर्ट. कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. एक सीन काटने को कहा. जहां शाहिद कपूर का किरदार टॉमी भीड़ पर पेशाब कर रहा होता है. साथ ही मेकर्स को फिल्म में डिसक्लेमर जोड़ने को कहा. इसके बाद CBFC को आदेश दिया कि दो दिन के अंदर फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट दिया जाए. उस समय CBFC के चेयरपर्सन थे पहलाज निहलानी. जो आए दिन किसी-ना-किसी फिल्म पर बिगड़ते रहते. ‘उड़ता पंजाब’ के दौरान भी उनकी और प्रड्यूसर अनुराग कश्यप की खूब ठनी थी.

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एक सीन काटकर फिल्म पास कर दी गई थी.

खुद फिल्मों पर कैंची चलवाने वाले पहलाज के साथ आगे जाकर ‘कर्मा स्ट्राइक्स बैक’ वाला केस हुआ. हुआ यूं कि कड़े विरोध के चलते 2017 में पहलाज को CBFC चेयरपर्सन के पद से हटा दिया गया. इसके दो साल बाद पहलाज ने फिल्म प्रड्यूस की. फिल्म थी ‘रंगीला राजा’. सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 20 कट सुझाए. पहलाज बिगड़ गए. शिकायत लेकर FCAT पहुंचे. हालांकि, FCAT ने 20 कट्स को तीन पर लाकर छोड़ दिया.

#2. बैंडिट क्वीन (1996)

भारत सरकार आपको रोम तो भेजेगी नहीं. एक काम कीजिए, आप खजुराहो हो आइए. ताकि निर्वस्त्रता, नग्नता और अश्लीलता के बीच का फ़र्क समझ सकें.

सेंसर बोर्ड पर ये कटाक्ष कसा था FCAT के उस समय के चेयरपर्सन और रिटायर्ड बॉम्बे हाई कोर्ट जज लेंटिल जे ने. पूरा मामला बताते हैं. हुआ यूं कि शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ दुनियाभर के फिल्म फेस्टिवल्स की सैर पर थी. वहां वाहवाही लूट रही थी. इंडिया आकर शेखर ने CBFC को अपनी फिल्म भेजी. एग्ज़ामिनिंग कमेटी ने फिल्म देखी. फिल्म के कई हिस्सों पर अपनी आपत्ति जताई. जिसके बाद मामला गया रिवाइज़िंग कमेटी के पास. उन्हें भी फिल्म की भाषा और नग्नता पर आपत्ति थी. इतनी कि मेकर्स को 100 से ज़्यादा कट्स करने को कहा. शेखर को CBFC का रवैया पसंद नहीं आया. पहुंच गए FCAT के पास. FCAT के सदस्यों ने फिल्म देखी और उन्हें किसी भी सीन पर आपत्ति नहीं हुई. उल्टा लगा कि सेंसर बोर्ड की बात मानकर सीन काटने से कहानी खराब हो जाएगी. इसलिए CBFC को आदेश दिया कि बिना कोई कांट-छांट किए एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ फिल्म को रिलीज़ किया जाए. आगे जाकर ‘बैंडिट क्वीन’ ने बेस्ट फीचर फिल्म का नैशनल अवॉर्ड जीता. बल्कि, इंडिया की तरफ से ऑस्कर्स के लिए भी भेजी गई.

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फिल्म को इंडिया की तरफ से ऑस्कर्स के लिए भेजा गया था.

#3. लिपस्टिक अंडर माई बुर्का (2017)

वो फिल्म जिसे CBFC ने सर्टिफिकेट देने तक से मना कर दिया. हवाला दिया कि ये स्त्री-प्रधान कहानी है. लोगों ने अपना सर पकड़ लिया. लेकिन पहलाज निहलानी की अध्यक्षता वाले CBFC से किसी को और उम्मीद भी नहीं थी. CBFC के अड़ियल रवैये के बाद फिल्म की डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव FCAT पहुंची. फिल्म देखने के बाद FCAT ने भी कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई. अपनी तरफ से मेकर्स को 16 कट बताए. साथ ही CBFC को आदेश दिया कि ये कट्स होने के बाद फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ रिलीज़ करने की अनुमति दे दी जाए.

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CBFC ने ‘स्त्री प्रधान’ कहकर फिल्म अटका दी.

इन कट्स का कहानी पर कुछ ज़्यादा असर नहीं पड़ने वाला था. इसलिए FCAT के सुझाए कट्स पर अलंकृता भी मान गईं. फिल्म 21 जुलाई, 2017 को पूरे इंडिया में रिलीज़ हुई.

#4. एन इनसिग्निफिकेंट मैन (2017)

इस डॉक्युमेंट्री के डायरेक्टर्स खुशबू रांका और विनय शुक्ला 2012 से अरविंद केजरीवाल के इलेक्शन कैम्पेन को फॉलो कर रहे थे. दिल्ली चुनाव तक जो कुछ हुआ, उस सब को कवर किया. और सामने आई अरविंद केजरीवाल पर बनी ये डॉक्युमेंट्री. जिसे टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्टैंडिंग ओवेशन मिला. बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में लोग इसे देखने के लिए उमड़ पड़े. लेकिन इंडिया में फिल्म की रिलीज़ पर सवालिया निशान लग गए. CBFC ने सर्टिफिकेट देने से साफ इनकार कर दिया. कहा कि अरविंद केजरीवाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेकर आओ. यानी तीनों से लिखवाकर लाओ कि उन्हें इस फिल्म से कोई आपत्ति नहीं. साथ ही जोड़ा कि फिल्म में जहां भी कांग्रेस और बीजेपी का ज़िक्र है, उस हिस्से को म्यूट किया जाए.

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2012 से शुरू कर केजरीवाल का इलेक्शन कैम्पेन फॉलो किया मेकर्स ने.

मेकर्स ने CBFC के आदेश के खिलाफ FCAT में अपील की. FCAT ने बिना किसी कट के फिल्म को हरी झंडी दिखा दी.

#5. हरामखोर (2017)

एक और फिल्म जिसकी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में जमकर तारीफ हुई. लेकिन इंडिया में इसे बैन झेलना पड़ा. स्क्रीनिंग के बाद CBFC ने पाया कि फिल्म का सब्जेक्ट बेहद उत्तेजक किस्म का है. इसलिए फिल्म को बैन कर डाला. अपने अगले ऑप्शन के रूप में मेकर्स FCAT पहुंचे. FCAT के सदस्य फिल्म की मैसेजिंग समझ गए. CBFC का ऑर्डर उलट कर उन्होंने फिल्म को U/A सर्टिफिकेट देकर रिलीज़ करने का आदेश दिया. साथ ही कहा कि ये फिल्म अपने साथ एक सोशल मैसेज लेकर चल रही है और लड़कियों को अपने अधिकारों के प्रति आगाह होने का संदेश दे रही है.

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फिल्म पर FCAT का फैसला पढ़ा जाना चाहिए.

#6. द बैटल ऑफ बनारस (2018)

2014 लोकसभा चुनाव. बीजेपी के नरेंद्र मोदी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के अजय राय एक ही सीट से चुनाव लड़ रहे थे. वाराणसी की सीट से. ‘ओम दरबदर’ के डायरेक्टर कमल स्वरूप ने इलेक्शन कैम्पेन के लगभग 44 दिनों को अपनी इस डॉक्युमेंट्री में बांधा. 2015 में फिल्म को CBFC के पास भेजा गया. CBFC ने सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया. हालांकि, ऐसा करने के पीछे कोई वजह नहीं बताई. बस इतना कहा कि ये डॉक्युमेंट्री उन्हें आपत्तिजनक लगी. फिल्म के कौन से हिस्से पर ऐतराज़ था, ये तक साफ नहीं किया. फिर बारी आई FCAT की. उन्होंने भी CBFC का स्टैंड लेते हुए फिल्म को रोक दिया.

Battle For Banaras Poster
पॉलिटिकल थीम होने की वजह से डाक्युमेंट्री को अटका दिया गया.

मेकर्स पहुंचे दिल्ली हाई कोर्ट. पिटिशन दायर की कि CBFC और FCAT कुछ भी साफ नहीं कर रहे. ऊपर से फिल्म भी अटकाकर बैठे हैं. हाई कोर्ट ने दोनों को फटकार लगाई. फिर से फिल्म को FCAT के पास भेजा. साथ में कहा कि चार हफ्तों के भीतर नया फैसला लीजिए जिसका कारण साफ हो. FCAT ने फिर फिल्म देखी. और इस बार इसे U/A सर्टिफिकेट के साथ रिलीज़ करने का आदेश दिया.


# वो फिल्म जिसे रोकने के लिए फिल्मी ड्रामा हुआ

‘इन दिनों मुज़फ्फरनगर’. 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों पर बनी एक डॉक्युमेंट्री. जहां 60 से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गवां दी. फिल्म के डायरेक्टर्स शुब्रादीप चक्रवर्ती और मीरा चौधरी ने दंगों के पीछे पनपने वाली सालों की मानसिकता को एक्सपलोर किया. फिल्म को CBFC के पास भेजा गया. जिसने फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. कहा कि इससे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का खतरा है. FCAT ने भी CBFC के फैसले को सही ठहराया. इसी सब मसले के बीच शुब्रादीप की डेथ हो गई. आगे उनकी पत्नी और को-डायरेक्टर मीरा ने लीगल बैटल जारी रखी. आगे जो हुआ वो किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं.

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फिल्म को रोकने के लिए पूरा फिल्मी ड्रामा चला.

मीरा अपनी शिकायत लेकर दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गई. कोर्ट ने CBFC को नई रिवाइज़िंग कमेटी बनाने का ऑर्डर दिया. कि ये कमेटी फिल्म देखेगी और अपनी रिपोर्ट सबमिट करेगी. कमेटी ने फिल्म देखकर अपनी रिपोर्ट भेजी. कहा कि फिल्म को U/A सर्टिफिकेट के साथ पास किया जा सकता है. बशर्ते, कुछ हिस्से काटने होंगे. मीरा मान गईं. सोचा कि ढाई घंटे की फिल्म से 30 सेकेंड का हिस्सा उड़ भी जाएगा तो फिल्म के नैरेटिव पर क्या ही असर पड़ेगा. इसके साथ ही डिस्क्लेमर ऐड करने का भी आदेश मिला. मीरा इसके लिए भी तैयार थीं. ये सारे चेंज कर लिए गए. तैयार डीवीडी के साथ मीरा पहुंची CBFC के दफ्तर में. लेकिन वहां उनकी डीवीडी लेने को कोई तैयार नहीं. ऐसा एक नहीं, अनेकों बार हुआ. किसी ना किसी कारण से उन्हें लौटा दिया जाता. उन्होंने फिर कोर्ट में शिकायत की. कहा कि CBFC के ऑफिस में कोई डीवीडी एक्सेप्ट नहीं कर रहा. कोर्ट ने CBFC अधिकारियों से इसकी वजह पूछी. तो उन्होंने सारी बात मीरा की ओर घुमा दी. कहा कि उन्हें कोई डीवीडी मिली ही नहीं. मीरा ने अपनी स्टोरी कोर्ट में बताई. कोर्ट ने कहा कि क्या अभी डीवीडी ला सकती हो? मीरा कुछ घंटों की मोहलत लेकर घर की ओर दौड़ पड़ी. कोर्ट में डीवीडी पेश कर दी. इसके जवाब में CBFC ने गृह मंत्रालय का एक लेटर पेश किया. जिसमें कहा गया था कि इस फिल्म को बैन किया जाए. क्यूंकि ये दो धर्मों के लोगों के बीच हिंसा भड़का सकती है.

वो दिन है और आज का दिन, अब तक ये फिल्म अटकी ही हुई है. और लग नहीं रहा कि जल्दी रिलीज़ भी हो पाएगी.


# इंडिया से ठीक उलटा काम किया इटली ने

04 अप्रैल को इंडिया ने सेंसरशिप को लेकर अपना रुख कड़ा कर लिया. ठीक इसके एक दिन बाद सेंसरशिप को लेकर दुनिया के दूसरे कोने से खबर आई. लेकिन वो यहां की तरह निराशाजनक नहीं थी. 05 अप्रैल को न्यूज़ आई कि इटली ने अपना 108 साल पुराना कानून खत्म कर दिया है. वो कानून जो इटली की सरकार को ताकत देता था फिल्मों को सेंसर करने की. उन्हें बैन करने की. 1913 में बने कानून के अंतर्गत करीब 100 से ज़्यादा फिल्में सेंसरशिप की भेंट चढ़ चुकी हैं. अब जाकर सरकारी अथॉरिटी ने फिल्मों को आज़ाद कर दिया है.

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इटली ने 108 साल पुराने कानून को दफन कर दिया.

मोटा-माटी कहें तो अब फिल्ममेकर्स सेल्फ-सेंसरशिप की प्रैक्टिस करेंगे. जिसके तहत वो खुद सारी बातों का ध्यान रखते हुए फिल्में बनाएंगे. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि फिल्मों को एडल्ट या यूनिवर्सल टाइप ब्रैकेट में नहीं बांटा जाएगा. बस अब ये काम सरकार की जगह फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर करेंगे. डिस्ट्रीब्यूटर खुद अपनी फिल्मों को एज के हिसाब से क्लासिफाई करेंगे. कि कौन सी फिल्म 14 साल से ऊपर के लोग देख सकते हैं. और कौन सी फिल्म 18 साल से ऊपर के लोगों के लिए सूटेबल है. काम सिर्फ यहीं पूरा नहीं होता. इसके बाद एक कमिशन बनेगी. जिसमें फिल्म इंडस्ट्री के लोग, एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट और एजुकेशन से जुड़े एक्सपर्ट शामिल होंगे. डिस्ट्रीब्यूटर के एज के हिसाब से क्लासिफिकेशन करने के बाद इस कमिशन को फिल्म दिखाई जाएगी. ताकि ये जांच लें कि फिल्म को सही एज ग्रुप के हिसाब से बांटा गया है या नहीं.

ये वही इटली है जो अबतक 10,000 से ज़्यादा फिल्मों पर कैंची चला चुका है. वही इटली जहां मार्लोन ब्रांडों की फिल्म ‘लास्ट टैंगो इन पेरिस’ रिलीज़ से पहले बैन कर दी गई थी. फिल्म के प्रिंटस तक जला डाले थे. हालांकि, 1987 में फिल्म पर से बैन हटा दिया गया था. कुछ ऐसा ही मिलता-जुलता हंगामा मचा था 1975 में आई ‘सलो’ पर. फिल्म का निशाना थीं, फासीवाद और पूंजीवाद जैसी विचारधारा. जिन्हें प्रतीकात्मक रूप से दिखाया गया. जनता ने मैसेजिंग से ज़्यादा मीडियम पर ध्यान दिया. फिल्म को अश्लील और घिनौना घोषित कर जमकर ऊधम मचाया. कोई और रास्ता न निकलता देख सरकार को फिल्म बैन करनी पड़ी.

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‘सलो’ को घिनौना और अश्लील बताकर बैन कर दिया गया.

बात का तात्पर्य है कि इटली का फासीवाद से पुराना नाता रहा है. वहां भी गैर-जरूरी कानूनों का सख्ती से पालन किया गया है. लेकिन उसने अपने अतीत से दूरी बना भविष्य की ओर देखने का फैसला लिया. 100 साल पुराने कानून को दफन करना हर मायने में साहसिक, क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कहा जाना चाहिए. इटली जैसे देश आगे की संभावनाओं से परिचित होना चाहते हैं.

सेंसरशिप की इस पूरी गाथा को पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया आरएम लोधा के वर्डिक्ट से बांधना चाहेंगे. जो उन्होंने 2014 में आमिर खान की फिल्म ‘पीके’ पर सुनवाई करते हुए कहा था. वहां भी कुछ धार्मिक भावनाएं आहत होने का मामला था. पूर्व सीजेआई ने कहा था,

अगर आपको नहीं पसंद, तो वो फिल्म मत देखिए. लेकिन अगर आप उसपर बंदिश लगाते हैं, तो आप दूसरों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं. इंटरनेट पर सब कुछ है. आप क्या-क्या छुपाओगे?


वीडियो: अप्रैल-मई में रिलीज़ हो रहीं इन 16 फ़िल्मों और वेब सीरीज़ के बारे में जान लीजिए!

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आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?

अनुपम खेर को ट्विटर और वॉट्सऐप वीडियो के अलावा भी ध्यान से देखा है तो ये क्विज खेलो

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चेक करो अनुपम खेर पर अपना ज्ञान.

कहानी राहुल वैद्य की, जो हमेशा जीत से एक बिलांग पीछे रह जाते हैं

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'इंडियन आइडल' से लेकर 'बिग बॉस' तक सोलह साल हो गए लेकिन किस्मत नहीं बदली.

गायों के बारे में कितना जानते हैं आप? ज़रा देखें तो...

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कितने नंबर आए बताते जाइएगा.

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

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ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.