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अमेरिका में फेसबुक, गूगल, ऐमज़ॉन और ऐपल क्यों लपेटे में है?

शुरुआत करते हैं 22 साल पुराने एक लैंडमार्क केस से. ये केस दर्ज़ किया था अमेरिकी सरकार ने. किसपर? दुनिया की नंबर वन सॉफ़्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ़्ट पर. माइक्रोसॉफ़्ट पर इल्ज़ाम था कि वो बाज़ार में अपनी मनॉपली बना रहा है. मनॉपली माने किसी ख़ास तरह के बाज़ार में एकाधिकार बनाना.

आप पूछेंगे मनॉपली में क्या ख़राबी है?

ये ख़राबी बिल्कुल आसान भाषा में समझाते हैं आपको. आप सब्ज़ी-तरकारी खरीदते हैं न. मान लीजिए कि आपके शहर में सब्ज़ी की एक ही दुकान है. पूरा शहर इसी दुकान से सब्ज़ी खरीदता है. लोगों को शिकायत है कि इस दुकान पर बासी और सड़ी-गली सब्ज़ियां मिलती हैं. ऊपर से सब्ज़ी वाला मनमानी कीमतें लगाता है. आप क्वॉलिटी और कीमत की शिकायत करते हैं. दुकानदार कहता है लेनी है तो लो, वरना रास्ता नापो. ऐसे में आप क्या करेंगे? सब्ज़ी खाना तो छोड़ नहीं देंगे. मन मारकर भी आपको उसी दुकान से सब्ज़ी खरीदनी पड़ेगी.

अब एक और तस्वीर की कल्पना कीजिए. आप एक सब्ज़ी बाज़ार में हैं. जहां ढेर सारी भाजी-तरकारी की दुकानें हैं. अब सोचिए, आपको कितनी सहूलियत होगी. एक जगह पालक की सूखी गड्डियां हैं. आप ताज़ी पालक के लिए दूसरी दुकान चले गए. एक ने भिंडी का कुछ ज़्यादा ही रेट बताया. आपने दूसरी दुकानें झांक लीं.

यही अंतर है फ्री मार्केट और मनॉपली में. एक फ्री मार्केट में कॉम्पीटिशन होना ज़रूरी है. अलग-अलग कंपनियों में कॉम्पिटिशन होगा, तो वो ग्राहकों को रिझाने के लिए बेहतर सर्विस देंगे. अलग-अलग आय वर्ग के ग्राहकों की जेब का ख़याल रखा जाएगा. नए-नए इनोवेशन होंगे. कंपनियां कम कीमत में बेहतर प्रॉडक्ट देने की कोशिश करेंगी.

Microsoft
माइक्रोसॉफ़्ट पर मनॉपली का इल्ज़ाम था (फोटो: एपी)

माइक्रोसॉफ़्ट पर क्या आरोप था?

माइक्रोसॉफ़्ट पर इसी फ्री मार्केट के माहौल को नुकसान पहुंचाने का आरोप था. इल्ज़ाम था कि वो अपने विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम में कई और प्रोग्राम जोड़कर मनॉपली बना रहा है. इसकी एक मिसाल था इंटरनेट एक्सप्लोरर. ये माइक्रोसॉफ़्ट का ब्राउज़र है. ब्राउज़र माने वो खिड़की, जहां आप इंटरनेट पर चीजें खोजते हैं. माइक्रोसॉफ़्ट ने क्या किया कि ये ब्राउज़र सॉफ़्टवेयर मुफ़्त में देना शुरू कर दिया. मतलब आप उसका विंडोज़ सिस्टम खरीदते हैं, तो ये ब्राउज़र बोनस मिलेगा.

बाज़ार में और भी ब्राउज़र कंपनियां थीं. लेकिन जब ग्राहक को विंडोज़ सिस्टम के साथ इंटरनेट एक्सप्लोरर मुफ़्त मिल रहा है, तो वो कोई और ब्राउज़र क्यों खरीदेगा? एक और बड़ी दिक्कत थी. इल्ज़ाम था कि माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़ से चलने वाले कंप्यूटर्स पर किसी और कंपनी के ब्राउज़र को इन्स्टॉल करने में बड़ी मुश्किल होती है. अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने कहा कि ये हरकतें मनॉपली बनाने की कोशिश है. इन्हीं आरोपों के तहत 18 मई, 1998 को माइक्रोसॉफ़्ट पर केस दर्ज़ किया गया. कंपनी के मुखिया बिल गेट्स सफाई देने के लिए पेश हुए. मगर उनकी दलीलें खारिज़ कर दी गईं. माइक्रोसॉफ़्ट को एक पुराने और काफी अहम अमेरिकी कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया.

Bill Gates
माइक्रोसॉफ़्ट के मुखिया बिल गेट्स (फोटो: एपी)

कौन सा क़ानून था ये?

इस क़ानून का नाम था- एंटीट्रस्ट लॉ. ये एंटीट्रस्ट लॉ एक बार फिर चर्चा में है. इस बार इसके लपेटे में हैं दुनिया की चार बड़ी कंपनियां- गूगल, फेसबुक, ऐमेज़ॉन, और ऐपल. 29 जुलाई को इन चारों कंपनियों के CEO की पेशी हुई. कहां? अमेरिकी कांग्रेस की 15 सदस्यों वाली एक ऐंटीट्रस्ट सबकमिटी के आगे. इसमें फेसबुक के मार्क ज़करबर्ग, गूगल के सुंदर पिचाई, ऐपल के टिम कुक और ऐमेज़ॉन के CEO जेफ बेज़ॉस शामिल हुए. छह घंटे तक विडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के ज़रिये चली इस पूछताछ में क्या हुआ? इन कंपनियों पर क्या इल्ज़ाम हैं? ये सब बताएंगे आपको. मगर इससे पहले बताते हैं कि ये एंटीट्रस्ट क़ानून क्या होता है.

एंटीट्रस्ट लॉ समझिए कि अमेरिकी सरकार का एक मॉनिटर है. एंटीट्रस्ट में जो ट्रस्ट शब्द है, उसका मतलब है बड़े बिज़नस ग्रुप. इस क़ानून का मकसद है बाज़ार में स्वस्थ कॉम्पिटीशन बनाए रखना. ये देखना कि बड़ी कंपनियां कहीं फ्री मार्केट के नियम तो नहीं तोड़ रहीं. ग़लत तरीकों से अपना कॉम्पीटिशन तो नहीं ख़त्म कर रही हैं.

Antitrust Law
1890 में अमेरिकी कांग्रेस ने शरमन एंटीट्रस्ट ऐक्ट पास किया था. (फोटो: फेडरल ट्रेड कमीशन)

इस क़ानून का बैकग्राउंड जुड़ा है 1880 के दशक से

उस दौर में अमेरिकी ऑइल मार्केट से मनॉपली का ट्रेंड शुरू हुआ. जल्द ही सीमेंट और रेलवे में भी बड़ी कंपनियां अपना एकाधिकार बनाने लगीं. पूरी अमेरिकी इकॉनमी कुछ मुट्ठीभर लोगों के कंट्रोल में आ गई. इन कंपनियों के एकाधिकार के कारण कॉम्पीटिटर कंपनियां दिवालिया होने लगीं. मनॉपली का असर कामगारों और ग्राहकों पर भी पड़ने लगा.

सरकार को लगा, ये स्थिति अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है. इतनी मनॉपली में तो फ्री मार्केट सर्वाइव नहीं कर सकेगा. उत्पादों की कीमतें भी अनियंत्रित हो जाएंगी. इनोवेशन जैसी चीजें भी बैकगियर में चली जाएंगी. यही चीजें सोचकर 1890 में अमेरिकी कांग्रेस ने पास किया शरमन एंटीट्रस्ट ऐक्ट. इस क़ानून को अपना नाम मिला है ओहायो के तत्कालीन अमेरिकी सेनेटर जॉन शरमन से. इस क़ानून की बुनियाद समझाते हुए उन्होंने जो बात कही थी, वो आज भी कोट की जाती है. शरमन बोले थे-

हम किसी राजा की सत्ता नहीं मानते. हमें उत्पादन, परिवहन और जीवन से जुड़ी किसी भी ज़रूरी सामान की बिक्री में भी किसी राजा को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. अगर हम किसी राजा के आगे सिर नहीं झुकाएंगे, तो हमें किसी कारोबारी शहंशाह के आगे भी नहीं झुकना चाहिए.

John Sherman
अमेरिकी सेनेटर जॉन शरमन (फोटो: लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस)

1890 के बाद 1914 में इस कैटेगरी के अंदर दो और एंटीट्रस्ट क़ानून बनाए. अब कुल तीन एंटीट्रस्ट कानून हो गए अमेरिका में-

#1 शरमन एंटीट्रस्ट ऐक्ट
#2 फेडरल ट्रेड कमिशन ऐक्ट
#3 क्लेटोन ऐक्ट

यही तीन कानून आज भी अमेरिकी फेडरल एंटीट्रस्ट लॉ का आधार हैं.

इतिहास समझने के बाद अब आते हैं 29 जुलाई को हुई पेशी पर. आपको ऐमज़ॉन, गूगल, फेसबुक और ऐपल पर लगे मुख्य आरोप पॉइंट्स में बता देते हैं-

#1 अपनी मार्केट पावर के सहारे कॉम्पीटिशन को कुचलना
#2 अपने पास जमा डेटा के सहारे कॉम्पीटिटर्स को बिज़नस से बाहर करना
#3 अपने राइवल्स के प्रॉडक्ट्स की नकल करना
#4 इतना पावरफुल हो जाना कि प्रतिद्वंद्वियों और ग्राहकों के लिए भी ख़तरा बन जाना

इस पूछताछ के लिए अमेरिकी हाउस जूडिशरी सबकमिटी पिछले 13 महीनों से जांच कर रही थी. इस जांच के दौरान उन्होंने इन चारों कंपनियों से जुड़े करीब 13 लाख डॉक्यूमेंट्स जमा किए. इनमें से ज़्यादातर कागज़ात फेसबुक से जुड़े थे. कमिटी ने सबसे ज़्यादा सवाल भी ज़करबर्ग से ही पूछे. 2012 में फेसबुक ने जिस तरह अपने कॉम्पीटिटर इंस्टाग्राम को खरीदा, उसपर भी सवाल हुए. इल्ज़ाम लगा कि ज़करबर्ग ने इंस्टाग्राम को खरीदने के लिए उसपर दबाव बनाया. उसे उसके प्रॉडक्ट की क़ॉपी बनाकर बिज़नस से बाहर करने की धमकी दी. कमिटी में शामिल अमेरिकी सांसद जिम सेनसेनब्रेनर ने इस ख़रीद पर टिप्पणी करते हुए कहा-

हमारे पास उपलब्ध कागज़ातों से साफ है कि फेसबुक को इंस्टाग्राम अपना मज़बूत कॉम्पीटिटर लगता था. फेसबुक को लगता था, इंस्टाग्राम उससे बिज़नस छीन सकता है. ऐसे में उससे मुकाबला करने की जगह, फेसबुक ने इंस्टाग्राम को ही ख़रीद लिया.

CEO ने सवालों पर क्या कहा?

ऐमज़ॉन

CEO जेफ बेजॉस से थर्ड-पार्टी विक्रेताओं पर सवाल पूछे गए. सवाल जैसे कि कंपनी इन विक्रेताओं को कैसे चुनती है? इन्हें कैसे वैरिफाई किया जाता है? क्या इन विक्रेताओं के प्रॉडक्ट्स से आइडिया चुराकर कंपनी ख़ुद अपने कॉम्पिटिटिंग प्रॉडक्ट्स लाती है? कमिटी ने जेफ बेजॉस को विक्रेताओं से मिले अपने फीडबैक के बारे में भी बताया. सांसद लूसी मैकबाथ ने इस फीडबैक पर टिप्पणी करते हुए कहा-

थर्ड पार्टी सेलर्स ने हमें बताया कि ऐमजॉन उन्हें डराता-धमकाता है.

Jeff Bezos
कमिटी के सामने जवाब देते ऐमज़ॉन के CEO जेफ बेजॉस (फोटो: एपी)

गूगल

CEO सुंदर पिचाई से पूछा गया कि क्या गूगल अपने सर्च रिज़ल्ट को प्रभावित करता है? क्या वो अपने प्लेटफॉर्म पर अपने उत्पादों और सेवाओं को तवज़्जो देता है? क्या ऑनलाइन सर्च और विज्ञापनों में गूगल अपनी मनॉपली चलाता है?

ऐपल

CEO टिम कुक से ज़्यादातर ऐप स्टोर से जुड़े सवाल पूछे गए. ऐपल पर अपने ऐप स्टोर में ग़लत तरीके से प्रभुत्व बनाने का आरोप है. इल्ज़ाम है कि वो कई कॉम्पीटिटर ऐप्स को ग़लत तरीके से हटा देता है. प्रतिद्वंद्वी ऐप लाकर उन्हें बिज़नस से बाहर कर देता है.

Tim Cook
कमिटी के सामने जवाब देते ऐपल के CEO टिम कुक (फोटो: एपी)

29 जुलाई को इन चारों कंपनियों से हुई पूछताछ में रिपब्लिकन और डेमोक्रैटिक पार्टी, दोनों के ही सदस्यों में काफी एका दिखा. दोनों तरफ के सदस्य पूरी तैयारी के साथ आए थे. उन्होंने सवाल पूछने में काफी सख़्ती बरती. कई बार जवाब देते हुए जब CEO ट्रैक से हटने लगते, तो कमिटी के सदस्य उन्हें टोकते. CEO’s ने कई ज़रूरी सवालों को टाला भी. मसलन, ज़करबर्ग से पूछा गया कि उनकी कंपनी ने अब तक कितनी कॉम्पिटिटर कंपनियों के उत्पादों की नकल की है. इस सवाल का ज़करबर्ग ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया. ज़करबर्ग के कई जवाबों से कमिटी के सदस्य संतुष्ट नहीं हुए. मसलन, कमिटी की मेंबर प्रमिला जयापाल ने कहा-

फेसबुक मनॉपली पावर की एक केस स्टडी है. आपकी कंपनी हमारा डेटा जमा करती है. उससे पैसा कमाती है. उस डेटा का इस्तेमाल करके आप अपने कॉम्पिटिटर्स की जासूसी करते हैं. उनके प्रॉडक्ट्स की नकल करके अपना उत्पाद लाते हैं. इस तरह आप अपने प्रतिद्वंद्वियों को ख़त्म कर देते हैं.

Pramila Jayapal
अमेरिकी हाउस जूडिशरी सबकमिटी की मेंबर प्रमिला जयापाल. (फोटो: एपी)

29 जुलाई को हुई पूछताछ टेक कंपनियों पर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया का पहला चरण है. एंटीट्रस्ट क़ानूनों का मौजूदा ढांचा टेक कंपनियों पर कारगर नहीं है. जानकार कहते हैं कि सही कानून की कमी के चलते बड़ी टेक कंपनियां स्वस्थ कॉम्पीटिशन जैसे ज़रूरी नियमों का उल्लंघन कर रही हैं. इन्हीं आशंकाओं के मद्देनज़र सांसदों की इस सबकमिटी ने चारों कंपनियों के लीडर्स से पूछताछ की. इस पेशी के आधार पर कमिटी अब अपनी रिपोर्ट देगी. इस रिपोर्ट में बताया जाएगा कि इन टेक कंपनियों ने किस तरह मौजूदा एंटीट्रस्ट क़ानूनों से बचते हुए फ़ायदा उठाया. एक ऐंगल ये भी है पेशी के दौरान कंपनियों द्वारा दिए गए जवाब के आधार पर क़ानूनी एजेंसियां आगे की जांच शुरू करें. वैसे ही, जैसे माइक्रोसॉफ़्ट के केस में हुआ था. ये भी संभावना है कि इसी कार्रवाई के आधार पर टेक इंडस्ट्री को ध्यान में रखते हुए एंटीट्रस्ट क़ानूनों का दायरा बढ़ाया जाए.


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