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ग्लासगो में भारत ने ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने को लेकर क्या प्लान पेश किया?

संगच्छध्वम्

संवदध्वम्

सम् वो मानसि जानताम्.

अर्थात,

हम सब साथ मिलकर चलें.

हम मिलकर संवाद करें.

यानी, हम सब का मन-मष्तिष्क भी एक रहे.

एक नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ग्लासगो में थे. कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ (COP26) में उनका संबोधन था. अपने भाषण की शुरुआत उन्होंने ऋग्वेद के इसी मंत्र से की.

बहुत लंबे समय से हम ये सुनते आ रहे थे कि ग्लोबल वॉर्मिंग एक वैश्विक समस्या है. अब ये हमारी आंखों के सामने दिखने लगा है. दुनियाभर में एक्सट्रीम वेदर कंडीशंस देखने को मिल रही है. जहां कभी सालों भर बर्फ जमी रहती थी, वहां झुलसाने वाली गर्मी हो रही है. वर्षावनों में भयानक आग लग रही है. बुशफ़ायर में कई प्रजातियां लुप्त हो चुकीं है. इसके अलावा, तूफ़ान, फ़्लैश फ़्लड्स, भूस्खलन जैसी आपदाएं तो आम हो गईं है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर धरती का तापमान और बढ़ा तो तबाही निश्चित है. एक अनुमान और लगाया गया कि जिस रफ़्तार से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, उस हिसाब से अगले कुछ दशकों में धरती का तापमान औसतन तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. अगर ऐसा हुआ तो तबाही निश्चित है.

इसलिए, हर साल दुनियाभर के देश एक साथ बैठकर चिंतन-मनन करते हैं, ताकि ऐसी स्थिति पैदा ना हो. इस बैठक को कॉप कहा जाता है. कॉप के बैनर तले पहला कॉन्फ़्रेंस 1995 में बर्लिन में हुआ था. तब से कॉप की ज़रूरत काफ़ी बढ़ गई है. जलवायु परिवर्तन की समस्या का ग्राफ़ काफ़ी ऊपर जा चुका है. या यूं कहें कि इसका नियंत्रण हाथ से छूटने ही वाला है.

2015 में पैरिस के कॉप सम्मेलन में एक साझा लक्ष्य रखा गया था. तय हुआ कि धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना है. तभी हम बर्बादी से बच सकते हैं.

ग्लासगो में कॉप का 26वां संस्करण 31 अक्टूबर को शुरू हुआ. ये कॉन्फ़्रेंस 12 नवंबर तक चलेगा. इस बार की बैठक धरती को बचाने का अंतिम मौका है. अगस्त 2021 में इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज़ (IPCC) की रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा गया था कि या तो अभी सुधर जाइए, वरना प्रकृति आपको ख़ुद-ब-ख़ुद सुधार देगी.

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है. अमेरिका और चीन के बाद. भारत आबादी के मामले में दूसरे नंबर पर है. वो बहुत जल्द चीन को पीछे छोड़ सकता है. भारत में नए-नए शहर भी विकसित हो रहे हैं. ऊर्जा की ज़रूरत बढ़ रही है.

इस लिहाज से क्लाइमेट चेंज़ के खेल में भारत एक डिसाइडिंग फ़ैक्टर है. इसी वजह से दुनिया की निगाहें भारत के प्रस्ताव पर थी. एक नवंबर को नरेंद्र मोदी ने कॉप-26 में भारत का प्लान पेश किया. उन्होंने ‘पंचामृत’ का कॉन्सेप्ट दिया. ये क्या है? ये पांच उपाय हैं, जिनके ज़रिए भारत क्लाइमेट चेंज़ की समस्या से निपटने में अपना योगदान देगा.

पहला- भारत, 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा. इसमें सोलर, हाइड्रो-इलेक्ट्रिक, जियो-थर्मल, विंड और बायोमास आदि शामिल हैं.

दूसरा- भारत, 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा ज़रूरतों की पूर्ति नवीकरणीय ऊर्जा से करेगा.

तीसरा- भारत अभी से 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन उत्सर्जन में एक सौ करोड़ टन की कमी करेगा.

चौथा- 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेंसिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा.

और पांचवा- 2070 तक भारत नेट ज़ीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा. नेट ज़ीरो का अर्थ ये नहीं है कि कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह ख़त्म कर दिया जाएगा. बल्कि इसका अर्थ ये है कि जितना ग्रीनहाउस गैस निकलेगा, उतने को तकनीक के ज़रिए वायुमंडल में पहुंचने से पहले ही ख़त्म कर दिया जाएगा.

पिछले साल ही चीन ने 2060 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करने का ऐलान किया था. इसको लेकर भारत पर भी दबाव बन रहा था.

आपने भारत के प्रस्ताव के बारे में सुना. अब जानते हैं कि विदेशी मीडिया में इस प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया आ रही है?

ब्रिटिश अख़बार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने पीएम मोदी के संबोधन को विस्तार से छापा है.

इसमें पैरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट के बाद भारत के प्रयासों की सराहना की गई है. हालांकि, इसमें ये भी कहा गया है कि ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में विकास करने के बावजूद कोयले पर निर्भरता जारी है. अख़बार ने इसको लेकर चिंता जताई है. जहां एक तरफ़ भारत नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पाद पर ज़ोर दे रहा है. वहीं दूसरी तरफ़, उसने कोयले का इस्तेमाल बंद करने या नए कोल प्लान्ट्स पर रोक लगाने को लेकर कोई वादा नहीं किया है.

अमेरिकी अख़बार न्यू यॉर्क टाइम्स ने भी भारत के प्रस्ताव को जगह दी है.

हालांकि, अख़बार ने लिखा कि मोदी ने ये नहीं बताया कि भारत का कार्बन उत्सर्जन कब अपने पीक पर पहुंचेगा.

टाइम्स ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि भारत में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है. इसकी तुलना में भारत सिर्फ़ छह प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है.

न्यूज़ एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने अपनी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी के भाषण की अहमियत बताई है.

मोदी ब्रिक्स देशों से कॉप-26 में शामिल होने वाले इकलौते बड़े नेता हैं. ब्रिक्स में भारत, ब्राज़ील, चीन, रूस और साउथ अफ़्रीका हैं. ब्रिक्स देश कुल 40 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं. बाकी देशों ने सिर्फ़ अपना डेलीगेशन ग्लासगो भेजा है. जबकि भारत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद शामिल हुए. ये क्लाइमेट चेंज़ को लेकर भारत की प्रतिबद्धता दिखाता है.

भारत ने क्लाइमेट चेंज़ पर ऐक्शन के लिए विकसित देशों से हर साल एक ट्रिलियन डॉलर की मदद की मांग भी की है. अख़बारों ने इसको भी प्रमुखता से छापा है. 2009 में कॉपेनहेगन में हुए कॉप सम्मेलन में विकसित देशों ने हर साल लगभग सात लाख करोड़ रुपये की मदद देने की बात कही थी. आज तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है. नई डेडलाइन 2023 की रखी गई है. जब तक विकसित देश, विकासशील और अल्प-विकसित देशों की मदद नहीं करते, क्लाइमेट चेंज़ की समस्या से निपटना नामुमकिन है. क्योंकि क्लाइमेट चेंज़ के तार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. एक भी देश छूटा, सुरक्षा चक्र छूटा.

कॉप-26 में अभी तक क्या-क्या हुआ है?

– पहले दिन यूएन के सेक्रेटरी-जनरल अंतोनियो गुतेरेस का संबोधन हुआ. उन्होंने पिछले तीस सालों में पर्यावरण में आए बदलावों की चर्चा की. उन्होंने चेतावनी के लहजे में कहा कि हम अपनी क़ब्र ख़ुद से ही खोद रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमारी धरती हमसे कुछ कह रही है. हमें उसे सुनने और उस पर अमल करने की ज़रूरत है.

– अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने भाषण की शुरुआत में माफ़ी मांगी. उनसे पहले वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पैरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट से अमेरिका को बाहर निकाल लिया था. बाइडन ने कहा कि पिछली सरकार की ग़लती के चलते हम काफ़ी पीछे छूट गए हैं.

– एक बात तो तय है कि क्लाइमेट चेंज़ से कोई भी देश नहीं बचेगा. लेकिन सबसे पहली और तेज़ मार छोटे-छोटे द्वीपीय देशों पर पड़ेगी. वैसे देश जो समुद्रतल से कम ऊंचाई पर हैं, उनके डूबने का ख़तरा सबसे अधिक है. इन देशों ने विकसित देशों को लताड़ लगाई. फिजी के प्रधानमंत्री ने कहा कि पूरा मामला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और कॉर्पोरेट ग्रीड के बीच अटका हुआ है. उन्होंने कहा कि तापमान को नियंत्रित करने का लक्ष्य आसानी से पूरा किया जा सकता है. लेकिन हमें इसके लिए हिम्मत दिखानी होगी.

– कॉप-26 के पहले दिन सौ से अधिक देश इस बात पर राज़ी हो गए हैं कि 2030 तक जंगलों की कटाई को पूरी तरह रोक दिया जाएगा.

आप लंबे समय से सुन रहे होंगे कि क्लाइमेट चेंज़ की वजह से ये तबाही हो सकती है, वो तबाही हो सकती है. हो सकता है आपको लगे कि ये सब कहने की बातें है. काश कि ये सब सिर्फ़ कहने की बातें होती. दुनिया के कई देश और शहर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. कुछ बड़े नामों के बारे में जान लीजिए.

लिस्ट में पहला नाम हिंद महासागर में बसे देश मालदीव का है.

मालदीव एक हज़ार से अधिक द्वीपों का समूह है. इनमें से अधिकतर द्वीप समुद्रतल से 1 मीटर की ऊंचाई पर हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सदी के अंत तक समंदर का जलस्तर 1.1 मीटर तक बढ़ जाएगा. यानी मालदीव की सतह पानी के नीचे होगी. मालदीव सरकार नए द्वीप तैयार कर रही है. उसने कई दूसरे देशों में ज़मीन खरीदने की तैयारी भी की है. अगर क्लाइमेट चेंज़ नियंत्रण में नहीं आया तो मालदीव का डूबना तय है.

दूसरा नाम यूनाइटेड अरब एमिरेट्स (यूएई) का है. यूएई में आमतौर पर गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाता है. MIT की रिपोर्ट के अनुसार, 2070 तक यूएई में ये आम हो जाएगा. अगर इंसान को दस मिनट तक 60 डिग्री सेल्सियस में रखा जाए तो उसका ज़िंदा रहना मुश्किल हो जाएगा. आने वाले दिनों में हालात और भी ख़राब होंगे. पिछले एक दशक में यूएई में जो कुछ इंफ़्रांस्ट्रक्चर तैयार हुआ है, वो बेकाबू गर्मी को झेलने के लिए नाकाफ़ी होगा. यूएई के पास पैसा और संसाधन है. वो बदलते हालात में अडेप्ट करने के उपाय कर सकता है. लेकिन ग़रीब देशों के लिए क़यामत को टाल पाना बेहद मुश्किल है.

अगला नाम इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता का है. जकार्ता हर साल समुद्रतल से लगभग सात इंच नीचे जा रहा है. ये लिमिट से अधिक भूजल निकालने की वजह से हो रहा है. 2050 तक राजधानी का अधिकांश हिस्सा पानी के नीचे होगा. जकार्ता अभी से ही बाढ़ की समस्या से परेशान है. इसके चलते इंडोनेशिया सरकार को अपनी राजधानी शिफ़्ट करना पड़ रहा है. सरकार 2024 तक बोर्नियो आईलैंड पर नई राजधानी बसाएगी.

अब बात अफ़्रीकी देश नाइजीरिया की. नाइजीरिया का शहर लागोस अफ़्रीकी महाद्वीप के सबसे बड़े शहरों में से एक है. रिसर्च के अनुसार, इस इलाके में अगर तीन फ़ीट से अधिक जलस्तर बढ़ा तो लागोस डूब जाएगा.

ये समझना एक बड़ी भूल होगी कि क्लाइमेट चेंज़ अकेला ही तबाही मचाने के लिए काफ़ी है. दरअसल, इसकी वजह से बाकी चीज़ों पर भी असर पड़ता है. मसलन, सूखे या बाढ़ की वजह से फ़सल का उत्पादन प्रभावित होता है. इससे भुखमरी बढ़ सकती है. इसी तरह, बुशफ़ायर के चलते आय के साधन खत्म हो सकते हैं. इससे ग़रीबी की आशंका बढ़ेगी. कहने का मतलब ये कि क्लाइमेट चेंज़ के तार दूसरी समस्याओं के साथ गुत्थमगुत्था हैं.

इस तथ्य के दो उदाहरण

पहला है यमन. ये देश 2015 से सिविल वॉर से जूझ रहा है. इसकी वजह से हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है. लाखों लोग पलायन के शिकार हैं. अकाल, ग़रीबी, भुखमरी से यमन परेशान है. यमन में स्थायी सरकार भी नहीं है. क्लाइमेट चेंज़ के कारण यमन सूखे का सामना कर रहा है. यानी ना तो उसके पास पीने के लिए साफ़ पानी है और ना ही फसल उपजाने के लिए. यमन पूरी तरह से बाहरी मदद पर निर्भर है. यमन के संकट को इस दौर का सबसे बड़ा मानवीय संकट कहा जाता है.

दूसरा उदाहरण हेती का है. हेती हरिकेन्स से प्रभावित रहता है. पिछले कुछ समय में यहां आने वाले हरिकेन्स की तीव्रता बढ़ गई है. हेती एक ग़रीब देश है. 2010 के भूकंप के बाद से हेती की हालत और खराब हुई है. वो तूफ़ानों से बचाव के लिए ज़रूरी खर्च करने की हालत में नहीं है.

हेती की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है. अगर समंदर का जलस्तर बढ़ा तो ग्राउंडवॉटर खेती के काबिल नहीं रहेगा. ये लोगों की जीवनचर्या को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा.

आसान भाषा में कहें तो क्लाइमेट चेंज़ या जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर हमारी ज़िंदगी से जुड़ा है. हर एक व्यक्ति का रवैया दूसरे की ज़िंदगी पर असर डालता है. अगर इस समस्या से निपटना है तो हमें सच में एक होना होगा. सिर्फ़ स्लोगन्स में नहीं, बल्कि हक़ीक़त में. तभी हम इस धरती को बचा पाएंगे. तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुंदर भविष्य दे पाएंगे.


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