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प्रशांत भूषण पर कंटेंप्ट साबित, अब क्या कहते हैं कानून की दुनिया के फन्ने खां

भारत के सुप्रीम कोर्ट की महानता में किसी आलोचना से उतनी कमी नहीं आई है, जितनी इस आलोचना पर दी गई उसकी प्रतिक्रिया से आई. – (सुप्रीम कोर्ट के 450 से ज्यादा वकीलों की लिखी चिट्ठी से)

अपने 2 ट्ववीट को लेकर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का दोषी माना है. कोर्ट ने सजा के लिए तय तारीख 20 अगस्त को सजा सुनाने के बजाय प्रशांत भूषण का बयान सुना और उन्हें सोचने के लिए कुछ और वक्त दे दिया है. इस बीच तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. मामला इतना गंभीर हो गया है कि बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि मामले की सुनवाई 5 या 7 जजों की संविधानिक बेंच को करनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के 450 से ज्यादा वकीलों ने भी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट को चिट्ठी लिख डाली. अब सुप्रीम कोर्ट प्रशांत भूषण को सजा कुछ भी सुनाए, लेकिन इस पूरे मामले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. कोर्ट की इस अवमानना को लेकर कानून के जानकारों के तीखे विचार हैं. हम इन्हें आपके लिए एक जगह समेटकर लाए हैं. आइए जानते हैं कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के बारे में किसने कहां और क्या कहाः

वकीलों से लेकर पूर्व जस्टिस तक ने जताई चिंता
पूर्व जस्टिस कुरियन जोसेफ ने अपनी चिट्ठी में लिखा है.

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पूर्व न्यायधीश कुरियन जोसेफ भी मामले पर अपनी चिंता जता रहे हैं.

 

वर्तमान कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट सिर्फ एक या दो व्यक्तियों से जुड़ा मामला नहीं है. बल्कि इसमें न्याय से जुड़े कई सवाल और न्यायशास्त्र से जुड़ी कई बातें शामिल हैं. इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को शारीरिक सुनवाई में विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए, जहां व्यापक चर्चा और भागीदारी की गुंजाइश है. लोग आएंगे और जाएंगे, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्याय के न्यायालय के रूप में हमेशा के लिए बना रहना चाहिए.

 

कुछ ऐसी ही बात सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने ‘द हिंदू’ अखबार से कही. उन्होंने कहा है.

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पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने भी कोर्ट की जल्दबाजी और रवैये पर सवाल खड़े किए हैं.

आसमान थोड़े ही गिर रहा था, इतनी जल्दी क्या थी? कोरोना महामारी के बीच वर्चुअल कोर्ट सिस्टम के जरिए फौरन सुनवाई करके अपने अधिकारों की रक्षा करना असल में दूसरे पक्ष को उसकी व्यक्तिगत आजादी के अधिकार से वंचित करना है. कोर्ट की गरिमा को नुकसान पहुंचाना और उसका अपमान करना मात्र घिसे-पिटे शब्द नहीं हैं. इनके कई बहुत गहरे अर्थ हैं. इन अर्थों को समझने के लिए गहन समझ की जरूरत है. इन्हें रुटीन शब्द की तरह सिर्फ इसलिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए कि किसी को लगता है कि इससे एक शख्स की गरिमा को धक्का लगा है.

 

सुप्रीम कोर्ट के 450 वकीलों ने मामले पर अपना विरोध जताते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट से मुखातिब होकर स्टेटमेंट जारी कर दिया. बार एंड बेंच डॉट कॉम के अनुसार, वकीलों ने कोर्ट के व्यवहार के बारे में स्टेटमेंट में लिखा है.

यदि देश का सर्वोच्च न्यायालय, जो हमारे संवैधानिक मूल्यों की प्राणवायु है, उस मामले में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं करता है, जहां वह खुद भी एक पक्ष है, और निष्पक्षता या आत्मविश्वास को बनाए रखने में विफल रहता है तो इससे कानून के शासन पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव अपरिवर्तनीय होंगे..

 

‘इंडियन एक्सप्रेस’ में अपने लेख में नाल्सर लॉ यूनिवर्सिटी हैदराबाद के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा लिखते हैं.

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देश की सबसे बड़ी लॉ यूनिवर्सिटी नाल्सर, हैदराबाद के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए हैं.

11 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे सीनियर जज सुप्रीम कोर्ट परिसर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायिक संस्था की विश्वसनीयता खतरे में है. वो इस बात पर जोर देते हैं कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका के बिना एक सफल लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद पर ऐसे सख्त अभियोग को सहन कर लिया था. लेकिन अब उसे एक एक्टिविस्ट वकील के ट्वीट बर्दाश्त नही हैं. यह पूरा घटनाक्रम इस बात पर सवाल उठाता है कि क्या सिर्फ एक ट्वीट से सुप्रीम कोर्ट के काम में खलल पड़ता है और न्यायिक गरिमा क्या इतनी नाजुक है कि एक एक्टिविस्ट वकील के अपनी राय देने मात्र से भारत की परिपक्व जनता की आंखों में कोर्ट की छवि खराब हो जाएगी.

 

‘द वायर’ में छपी एक रिपोर्ट में मुंबई के सीनियर वकील नवरोज एच सीरवी कहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कोर्ट की गरिमा और महानता को कम करने वाला बताते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा हमला है.

 

सीनियर वकील मजीद मेमन ने ट्वीट करके कहा.

कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971 अपनी जगह पर इसलिए बना हुआ है, जिससे सुप्रीम कोर्ट की और जजों की गरिमा को बरकरार रखा जा सके. सुप्रीम कोर्ट इसलिए सर्वोच्च है कि इससे बड़ा कोई कोर्ट नहीं है, न कि यह कोर्ट अचूक है और इससे कोई गलती नहीं हो सकती.

 

‘द हिंदू’ में सीनियर वकील संजय हेगड़े के हवाले से लिखा गया है.

इस फैसले से यह नहीं पता चलता है कि सिर्फ दो ट्वीट के जरिए कोर्ट की गरिमा को कैसे धक्का लगा है. जनता का भरोसा और न्यायालय का अधिकार उससे अधिक मजबूत नींव पर टिके हैं.

 

‘फर्स्टपोस्ट’ में बॉम्बे हाई कोर्ट के अधिवक्ता अजय कुमार कहते हैं.

फैसलों के लिहाज से देखें तो न्यायपालिका आज डीएम से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक सब कुछ बन चुकी है. अदालतों और जजों का काम ये नहीं है. अगर एक मामले में अदालत अपने लिए तय दायरे से आगे चली जाती है और दूसरे में वह ऐसा नहीं करती तो अपने आप उस पर सवाल उठेंगे. पिछले कुछ समय के दौरान तय हदों से आगे जाकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिए खुद ही वैसी उम्मीदें पैदा कर ली हैं, जो लोग राजनेताओं से करते हैं. ऐसे में किसी भाजपा नेता की महंगी मोटरसाइकिल पर सवार मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर अगर किसी को अनैतिक लगती है तो इसमें हैरानी कैसी?

 

फैसले का स्वागत करने वालों ने भी लिखी कोर्ट को चिट्ठी

ऐसा नहीं है कि कानून के बड़े जानकार इस फैसले के खिलाफ हैं. 15 पूर्व जजों समेत 103 लोगों ने जो पत्र जारी किया है उसमें उन लोगों की आलोचना की गई है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हैं. पत्र में कहा गया है कि प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी करार दिए जाने के बाद कई ऐसे लेख लिखे गए, जिसमें शीर्ष कोर्ट पर सवाल उठाए गए हैं. ‘न्यायिक जवाबदेही और सुधार के लिए अभियान’ (CJAR) ने तो फैसले की निंदा तक कर डाली और इस पर पुनर्विचार की मांग की. पत्र में कहा गया है कि ऐसी मांगें उचित नहीं हैं. पत्र लिखने वालों में मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व जीफ जस्टिस केआर व्यास, सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व जीफ जस्टिस पी. कोहली, गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व जीफ जस्टिस एसएम. सोनी और इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्व जीफ जस्टिस विजय लक्ष्मी शामिल हैं. पत्र में कहा गया है कि

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सीजेएआर और कुछ अन्य दबाव समूहों द्वारा निंदा अत्यधिक आपत्तिजनक और अस्वीकार्य है. हम देश के संबद्ध नागरिक, ऐसे लोगों के समूह द्वारा इस तरह की बयानबाजी से चिंतित हैं.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा हर मामला अपने में एक ऐसा मुद्दा समेटे होता है, जिसका देश की कानून व्यवस्था पर गहरा असर पड़ता है. कंटेंप्ट के इस फैसले पर भले ही कानून के जानकारों की राय कुछ भी हो, लेकिन प्रशांत भूषण पर अदालत का आने वाला फैसला यह तय करेगा कि आगे इन मामलों को कोर्ट कैसे डील करेगा.

वीडियो – प्रशांत भूषण और ट्विटर पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर केस कर दिया है

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