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नागालैंड गोलीबारी के बाद सिर धड़ से अलग कर देने वाले कोन्याक समूह के बीच जाने का अनुभव

नोट- ये रिपोर्ट इंडिया टुडे की रिपोर्टर श्रेया चटर्जी की है. हमने इसका अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है.


नागालैंड का मोन जिला. देश के सुदूर इलाकों में से एक भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित ये जगह कोन्याक जनजातीय समूह का घर है. वही कोन्याक जनजाति जिसे ‘हेड हंटिंग’ यानी सिर को धड़ से अलग कर देने वाले समूह के तौर पर जाना जाता है. इस समूह के लोगों के लिए ये एक प्रथा रही है. शुरुआती दिनों में वे जब अपने दुश्मनों पर हमला करते थे, तो इसी प्रथा के तहत दुश्मनों के सिर धड़ से अलग कर देते थे.

इसीलिए बीती 4 दिसंबर को जब मोन जिले के ओटिंग गांव में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में निर्दोष ग्रामीणों की जान गई तो स्थानीय लोगों ने सुरक्षाबलों पर हमला कर दिया और उनकी गाड़ियां जला दीं. इस हमले से खुद को बचाने के लिए सुरक्षा बलों ने फिर गोलीबारी की जिसमें 7 और लोगों की जान चली गई.

पूर्वोत्तर की अगर बात करें, खासतौर पर नागालैंड की, तो ये इलाका देश के मुख्य भूभाग में रहने वालों की नजरों से छिपा हुआ है. कारण कई हैं. खराब ट्रांसपोर्ट सेवा, भाषाई अवरोध और जीवनशैली. जब मैं कई आशंकाओं के बीच नागालैंड पहुंची तो मुझे एहसास हुआ कि भारत के मुख्य भूभाग में रहने वालों के लिए नागालैंड अभी भी एक ऐसा इलाका है, जहां जाना सही नहीं है.

सोमवार, यानी 6 दिसंबर को सुबह करीब 9 बजे मैं डिब्रूगढ़ पहुंची. यहीं मुझे पता चला कि नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियो रियो मृतक नागरिकों के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेंगे, जो हेलीपैड ग्राउंड पर होगा. इस समय तक मृतक नागरिकों की संख्या बढ़कर 14 हो गई थी. 13 नागरिकों की मौत शनिवार को हुई थी, फिर एक नागरिक की मौत रविवार की शाम को हुई. मेरा पत्रकारीय मन मुझे उस हेलीपैड ग्राउंड पर ले ही जाना चाहता था. गूगल मैप्स पर चेक करने पर पता चला कि ये करीब दो घंटे की यात्रा होनी थी. मैं सीधे उस जगह के लिए निकल गई.

‘आगे अपने रिस्क पर जाओ…’

हमने असम के सोनारी को पार किया और मोन जिले के प्रवेश बिंदु पर पहुंच गए. यहीं से दृश्य बदलने लगा. कर्फ्यू लगे होने के बाद भी लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. इन प्रदर्शनकारियों ने हमें रोका. मैंने गाड़ी से उतरकर उनसे बात की. मुझे एहसास हुआ कि वो बस इतना चाहते हैं कि हम उनकी बात को भी देश-दुनिया के सामने पेश करें. सौभाग्य से यही मेरा काम है. इस दौरान मेरा ड्राइवर काफी डर गया था. वो पहले ही मोन जिला आने से मना कर रहा था. बातचीत के बाद मुझे मोन में जाने की मंजूरी मिल गई. इससे पहले मैं आगे की कहानी बताऊं, ये बताना भी जरूरी है कि इंडिया टुडे एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय चैनल है जिसने इस पूरे घटनाक्रम की जमीनी रिपोर्टिंग अपने रिपोर्टर्स की पहचान छिपाए बिना की.

कोन्याक जनजाति समूह के लोग मृतकों के शवों पर फूल चढ़ा रहे थे. बाइबल की पंक्तियां बोल रहे थे. (फोटो: श्रेया चटर्जी/इंडिया टुडे)
कोन्याक जनजाति समूह के लोग मृतकों के शवों पर फूल चढ़ा रहे थे. बाइबल की पंक्तियां बोल रहे थे. (फोटो: श्रेया चटर्जी/इंडिया टुडे)

इस घटनाक्रम के तुरंत बाद से ही असम के स्थानीय रिपोर्टर वहां मौजूद रहे. जब हम अपने रास्ते पर आगे बढ़े तो हमें एक बार और रोका गया. एक बाइक सवार ने हमें आगे ना जाने की चेतावनी दी. ये भी कहा कि अगर हम आगे जाते हैं, तो अपने रिस्क पर ही जाएंगे. हमने अपना सफर जारी रखा. मैंने एंट्री पॉइंट पर अपना एक संपर्क बना लिया था. हमें ये सुनिश्चित किया गया था कि हम तब तक सुरक्षित हैं, जब तक हम प्रदर्शनकारियों का पक्ष सुन रहे हैं.

रास्ते में हमने ये भी महसूस किया कि गूगल मैप्स ने नागालैंड के इलाकों को ढंग से नहीं मापा है और हेलीपैड ग्राउंड पहुंचना असंभव है. इसी दौरान हमें अंतिम संस्कार के लिए जाता हुआ काफिला मिला. उस काफिले में हमने एक समूह की एकता और शक्ति के प्रदर्शन को देखा. वो काफिला अलग-अलग जगहों पर रुक रहा था और प्रदर्शनकारी मृतकों पर फूल चढ़ा रहे थे. साथ ही साथ बाइबल की कुछ पंक्तियां भी बोल रहे थे.

कोन्याक समूह की एकता और बंद की घोषणा

जब हम ओटिंग गांव पहुंचे, तब तक शाम हो चुकी थी. पूरा गांव अंतिम संस्कार के लिए इकट्ठा हो चुका था. ये कोन्याक जनजातीय समूह की एकता का प्रदर्शन था. हर किसी की जुबान पर बस एक ही मांग थी. आफस्पा (Armed Forces Special Powers Act) का खात्मा. बीजेपी के मोन जिला अध्यक्ष न्यावांग कोन्याक ने भी यही मांग दोहराई. इंडिया टुडे से बात करते हुए उन्होंने बताया कि वो अपनी पार्टी से अनुरोध करेंगे कि नागालैंड से आफस्पा को हटा दिया जाए.

अंतिम संस्कार पूरा होते-होते काफी देर हो चुकी थी. गांव के लोगों ने हमसे अनुरोध किया कि हम उनके ही पास रुक जाएं ना कि वापस जाने के लिए रात के समय 20 किलोमीटर लंबे खतरनाक रास्ते पर सफर करें. आशंकाओं के बाद भी हमने उस गांव में रुकने का फैसला किया, जो अपने 12 बेटों की मौत का दुख मना रहा था.

कोन्याक सहूम के लोगों ने Nagaland के Mon जिले में सात दिनों के बंद की घोषणा की है. (फोटो: श्रेया चटर्जी/ इंडिया टुडे)
कोन्याक सहूम के लोगों ने Nagaland के Mon जिले में सात दिनों के बंद की घोषणा की है. (फोटो: श्रेया चटर्जी/ इंडिया टुडे)

उनके लिए काफी उत्साहजनक था कि देश के मुख्य भूभाग में रहने वाला कोई व्यक्ति इतनी कठिन दूरी तय करके उनका पक्ष सुनने आया है. ऐसे में उन्होंने सुनिश्चित किया कि हमें सुरक्षित महसूस हो. इस बीच कोन्याक समूह के लोगों ने मोन जिले में सात दिनों के बंद की घोषणा कर दी. हालांकि, इस बंद के दौरान आपातकालीन सेवाएं चालू रखने की बात हुई.


वीडियो- नागालैंड में सैनिकों ने आम नागरिकों पर क्यों चलाईं गोलियां?

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