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टूर ऑफ ड्यूटी: सेना क्यों युवाओं को तीन साल की इंटर्नशिप पर रखना चाहती है?

भारतीय सेना ने एक प्रस्ताव रखा है, जिसे अगर अमल में लाया गया, तो आम लोग भी सेना में जा सकेंगे. ये तीन साल की इंटर्नशिप होगी, लेकिन इसमें होगी वर्दी और रैंक. जवान भी भर्ती किए जाएंगे और अफसर भी. अभी ये प्रस्ताव है, लेकिन काफी कुछ है, जिस पर आपको गौर करना चाहिए. मिसाल के लिए, एक ही साथ सेना राष्ट्रवाद, देशभक्ति और बेरोज़गारी का ज़िक्र कर रही है.

इस पर बात करेंगे, लेकिन पहले समझिए कि प्रस्ताव है क्या?

ये खबर बाहर आई सेना के एक इंटरनल नोट के ज़रिए. सेना में अलग-अलग तरह की नीतियों के लिए विभागीय पत्राचार चलता है. वैसा ही एक नोट ये भी है. जितनी जानकारी मीडिया में सामने आई है, उसके मुताबिक सेना के नोट में इस तीन साल की इंटर्नशिप को कहा जाएगा ‘टूर ऑफ ड्यूटी’. ये उन युवाओं के लिए होगी, जो सेना को अपना स्थायी पेशा नहीं बनाना चाहते, लेकिन पेशेवर फौज वाला ”थ्रिल” और ”एडवेंचर” महसूस करना चाहते हैं. देश में बेरोज़गारी की समस्या है ”राष्ट्रवाद” और ”देशभक्ति” की भावना एक बार फिर बढ़ रही है. ये नोट की भाषा है.

लेकिन ये प्रस्ताव कॉर्पोरेट नौकरी की बोरियत दूर करने से कहीं आगे की बात करता है. ये नोट भारत में सैन्य सेवा के तरीके को बदलने के बारे में है. फिलहाल सेना में पूरा ज़ोर कमिटमेंट पर है. अगर आप सेना की सुविधाएं और पेंशन चाहते हैं, तो आपको एक तय समय तक सेवा देनी ही होती है. मिसाल के लिए जवानों को पेंशन तभी मिलती है, जब वो कम से कम 17 साल सेवा दें. ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ वाला नोट इस अनिवार्य सेवा के सिद्धांत से इंटर्नशिप या अस्थायी सेवा के सिद्धांत की तरफ जाने की बात करता है. इस दौरान वेतन मिलेगा, लेकिन पेंशन या ग्रैच्युटी नहीं. और यही इस प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा है.

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नई दिल्ली में 26 जनवरी के मौके पर परेड करती इंडियन आर्मी. तस्वीर इसी साल की है. फोटो क्रेडिट- PTI.

पेंशन तो अच्छी चीज़ है, फिर दिक्कत क्या है?

सेना एक खतरनाक पेशा है. जान जाने का जोखिम है. फिर फौज को युवा बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में सैनिक और अफसर जल्दी रिटायर कर दिए जाते हैं. आपने कर्नल थ्रेशहोल्ड सुना होगा. सेना में स्थायी कमीशन लेने वाले अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक आसानी से पहुंच जाते हैं. लेकिन इसके बाद ज़्यादातर अफसरों को रिटायर कर दिया जाता है और चुनिंदा अफसरों को उच्च पदों के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. ऐसा ही जवानों के साथ भी है. इसीलिए पेंशन दी जाती है. ताकि कम उम्र में रिटायर होने वाले लोगों के पास आय का कुछ ज़रिया हो. लेकिन पेंशन सेना के बजट पर काफी बोझ डालती है. खासकर ‘वन रैंक वन पेंशन’ के नियम के आने के बाद से.

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी स्टैंडिंग आर्मी है. मतलब जितने जवान और अफसर इंडियन आर्मी के पास हैं, उतने किसी के पास नहीं है. इसका एक अनचाहा असर ये होता है कि सेना के बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा तनख्वाह और पेंशन पर खर्च होता है. ये खर्च कितना है, इसे ऐसे समझिए. 10 साल में तीनों सेनाओं का पेंशन बजट 10 गुना से ज़्यादा हो चुका है. 2005-06 में जहां पेंशन पर 12 हज़ार 715 करोड़ खर्च होते थे, वहीं साल 2020-21 में इसके लिए एक लाख 33 हज़ार करोड़ का बजट रखा गया है. सेनाओं में आधुनिक साज़ो-सामान की खरीद के लिए पैसा रक्षा मंत्रालय के कैपिटल एक्सपेंडीचर में से आता है.

इस साल का पेंशन बजट इस कैपिटल एक्सपेंडीचर की कुल रकम से भी 15 हज़ार 291 करोड़ ज़्यादा है. तनख्वाह पर खर्च अलग है. मतलब जितना पैसा हम आधुनिकीकरण पर खर्च नहीं कर रहे, उससे ज़्यादा तनख्वाह और पेंशन पर खर्च होता है. रक्षा आधुनिकीकरण ज़रूरी है, लेकिन सरकार इसपर भी फूंक-फूंक कर ही खर्च करना चाहती है. इसीलिए तीनों सेनाएं पेंशन और तनख्वाह पर हो रहा खर्च घटाने में लगी हैं.

थलसेना में ही क्यों?

थलसेना में चूंकि सबसे ज़्यादा लोग हैं, बजट कम करने का दबाव वहां सबसे ज़्यादा है. इसीलिए इसपर आश्चर्य नहीं हुआ कि ऐसा प्रस्ताव थसलेना में पहले आया. इसमें बताया गया है कि 17 साल सेवा करने वाले एक जवान की जगह अगर ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ वाले सैनिक को लगाया जाए, तो 11.5 करोड़ की बचत होगी. ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ इंटर्नशिप की तरह है, तो उसमें पेंशन नहीं होगी. सेना के नोट में ये भी लिखा है कि इससे युवाओं की ऊर्जा का सही इस्तेमाल होगा. सैनिक ट्रेनिंग और तौर तरीकों से आबादी का स्वास्थ्य बेहतर होगा. इंटर्नशिप के बाद पेंशन नहीं होगी, लेकिन सरकारी नौकरी के लिए योग्यताओं में छूट दी जा सकती है. फिर कॉर्पोरेट सेक्टर भी टीमवर्क और लीडरशिप स्किल्स सीख चुके युवाओं को अपने यहां नौकरियों में प्राथमिकता देगा. लेकिन जितना गणित इस प्रस्ताव में समझाया गया है, उससे यही लगता है कि ये प्रस्ताव बेरोज़गार युवाओं को थ्रिल और सेना के एडवेंचर से रूबरू कराने से ज़्यादा पैसे बचाने के बारे में है.

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पुलवामा में 6 मई को हुई मुठभेड़ के दौरान की एक तस्वीर. प्रतीक के तौर पर इसे इस्तेमाल किया गया है. क्रेडिट- PTI.

क्या ये सेना की क्षमता पर असर डालेगा, ये कहना फिलहाल मुश्किल है. सेना से रिटायर्ड अधिकारियों की राय बंटी हुई है. एक मत है कि देश के युवाओं की ऊर्जा के सही इस्तेमाल का तरीका है, तो इसे अपनाया जाए. फिर दुनिया के दूसरे देशों ने भी सिविलियन्स को फौज में लिया है, और कोई बड़ी समस्या नहीं हुई. लेकिन दूसरा मत रखने वाले अधिकारी हतप्रभ हैं. उनका कहना है कि जो मौजूदा व्यवस्था है, उसे बनाए रखना ज़रूरी है, तभी सेना अपना काम ठीक से कर पाएगी.

सिविलयन्स को सेना में लेना विचार के स्तर पर नया नहीं है. भारत में प्रादेशिक सेना या टेरेटोरियल आर्मी है, जिसमें आम लोग हर साल कुछ वक्त वर्दी में सेवाएं देते हैं. ताकि आपात स्थिति में वो सेकंड लाइन ऑफ डिफेंस बन सकें. महेंद्र सिंह धोनी, कपिल देव और सचिन जैसे लोगों ने इसी रास्ते से सेना की वर्दी पहनी. फिर एक उदाहरण इज़रायल का है, जहां 18 साल की उम्र के बाद 2 साल 8 महीने की अनिवार्य सेवा फौज में देनी होती है. अमेरिका में भी अनिवार्य सेवा का नियम समय-समय पर इस्तेमाल में लाया गया है – मिसाल के लिए पहला और दूसरा विश्व युद्ध और वियतनाम की लड़ाई.

क्या ये सभी के लिए अनिवार्य है?

सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा है कि प्रस्तावित ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ सभी के लिए अनिवार्य नहीं होगा. लोग अपनी मर्ज़ी से इसमें भाग ले सकेंगे. भर्ती की शर्तों और ट्रेनिंग में कोई रियायत भी नहीं होगी.

अब आते हैं बेरोज़गारी, राष्ट्रवाद और देशभक्ति के ज़िक्र पर. ये तर्क कुछ अजीब लगा. पूरी दुनिया में देश युवाओं को सेना की तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि लोग फौज में जाना नहीं चाहते. वहां इस तरह की बातें होती हैं. लेकिन भारत में सेना आज भी एक भरोसेमंद पेशा है. फिर यहां मिलने वाली तनख्वाह और सुविधाएं दूसरे पेशों में तेज़ी से कम हो रही हैं. सरकारी नौकरियां घट रही हैं. निजी नौकरियां हैं, लेकिन वहां काम करते-करते आदमी ही घिस जाता है. तो लोग सेना की तरफ खिंचे चले आ रहे हैं. ऐसे में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज़िक्र गैरज़रूरी है, क्योंकि यहां आकर बात अक्सर फिसल जाती है. इसीलिए फौज का पूरा ज़ोर ट्रेनिंग और अनुशासन पर ही होता है.

कुल जमा निचोड़ ये है कि ये प्रस्ताव युवाओं को सेना की तरफ खींचने से ज़्यादा उन्हें ये बताने की कोशिश कर रहा है कि आपकी ज़रूरत है, लेकिन हमारे पास उतने पैसे नहीं हैं. इसीलिए इंटर्नशिप कीजिए. आप भी खुश. हम भी खुश. फिलहाल ये एक प्रस्ताव है. पहले ट्रायल होगा, इंटर्न्स की एक छोटी संख्या के नतीजे देखे जाएंगे. उसके बाद कोई स्थायी फैसला होगा.


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