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सिविल सर्वेंट्स को 'लो रैंक वाले' और 'बूढ़े' कहने पर रेलवे में क्या बवाल मचा हुआ है

स्टोरी शुरू करने से पहले UPSC के सेट-अप को समझ लिया जाए. मेरे कुलिग अभिषेक इस सेट-अप को मुझ मूढ़ बुद्धि को समझाते हुए कहते हैं-

UPSC एक रिक्रूटमेंट बॉडी है, पहले तो ये ध्यान रखना है. इसका सबसे मेज़र इग्ज़ाम होता सिविल सर्विसेज़ एग्ज़ाम, जिसके तहत IAS, इंडियन फॉरेन सर्विस, IPS, रेवेन्यू सर्विस, रेलवे ट्रैफ़िक सर्विस, रेलवे पर्सनल सर्विस और जो जनरल सर्विसेज़ हैं, उनके सलेक्शन होते हैं.

इसके अलावा UPSC अलग से एक इंडियन फॉरेस्ट सर्विस का एग्ज़ाम लेती है, इंडियन इंजीनियरिंग सर्विस का एग्ज़ाम लेती है, इंडियन मेडिकल सर्विस CMS का एग्ज़ाम लेती है. और ऐसे बहुत सारे एग्ज़ाम लेती है.

तो सिविल सर्विस का जो एग्ज़ाम होता है, उसमें किसी स्ट्रीम की बाइंडिंग नहीं है कि आप इसी स्ट्रीम से पढ़कर आए हैं, तभी आप एपियर होंगे. आप किसी भी स्ट्रीम के हों- आर्ट्स, साइंस, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट – जो भी हो. आपने अगर किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से, किसी भी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से, ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है, किसी भी स्ट्रीम में चाहे, वो IIT हो, बुंदेलखंड हो, आप फ़ॉर्म भरने के लिए एलिजिबल हैं.

बाक़ी जो सर्विसेज़ हैं, उसमें स्ट्रीम की बाध्यता है. जैसे मेडिकल सर्विसेज़ में आपको MBBS होना होगा. इंजीनियरिंग सर्विसेज़ में आपको बी. टेक होना चाहिए. इस तरह ही फॉरेस्ट सर्विस के लिए आपको साइंस ग्रेजुएट होना चाहिए.

यूपीएससी की बिल्डिंग.
यूपीएससी की बिल्डिंग.

इंजीनियरिंग सर्विस वाले जो रिक्रूट होते हैं, वो UPSC की ‘इंडियन इंजीनियरिंग सर्विस’ का एग्ज़ाम देते हैं. उसमें से जो सेलेक्ट हुए, वो अलग-अलग डिपार्टमेंट में चले जाते हैं. जैसे कोई सीपीडब्ल्यूडी में चले गए, कुछ रेलवे चले गए. उनकी रैंक के हिसाब से और प्रेफरेंस के हिसाब से.

# मुद्दा क्या है-

सरकार ने टारगेट रखा है कि वो नवंबर तक रेलवे की विभिन्न सर्विसेज़ का विलय करके एक एकीकृत, भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (IRMS) बनाएगी. दिसंबर 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेलवे के पुनर्गठन की मंजूरी दी थी, जिसमें रेलवे की आठ सेवाओं को एकीकृत करने का भी प्रस्ताव था.

जिन आठ सेवाओं को मर्ज़ किया जाएगा, उनमें सिविल सर्विसेज से इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS), इंडियन रेलवे अकाउंट्स सर्विस (IRAS) और इंडियन रेलवे पर्सनेल सर्विस (IRPS) शामिल हैं. इनके अलावा बाकी पांच तकनीकी या इंजीनियरिंग सेवाएं हैं. ये हैं- IRSE (इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ़ इंजीनियर्स) , IRSME (इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ़ मैकेनिकल इंजीनियर्स), IRSEE (इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ़ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स), IRSSE (इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ़ सिग्नल इंजीनियर) और IRSS (इंडियन रेलवे स्टोर सर्विस).

मतलब, तीन ऐसे डिपार्टमेंट, जिनके आला अधिकारी सिविल सर्विस परीक्षा से आए हैं और पांच ऐसे डिपार्टमेंट, जिनके आला अधिकारी इंजीनियरिंग सर्विस एग्ज़ामिनेशन (ESE) से आए हैं. दोनों ही इग्ज़ाम्स UPSC ऑर्गनाइज़ करता है.

# अब क्या हुआ है-

सिविल सेवा अधिकारी संघ, मतलब जो सिविल सर्विसेज के माध्यम से रेलवे में आए, उसने इस विलय के विरोध में सरकार को एक संयुक्त ज्ञापन सौंपा था.

इन अधिकारियों ने तर्क दिया है कि रेलवे सेवाओं का विलय या पुनर्गठन, रेलवे के सुचारु संचालन के लिए हानिकारक होगा.

इस ज्ञापन के जवाब में इंजीनियरों के पांच संघों के महासचिवों ने भी मंत्रालय को एक पत्र लिखा, जिसमें मांग की गई कि केवल तकनीकी पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों को ही ऑपरेशंस वाले काम करने की इजाज़त दी जाए. इस लेटर में रेलवे के पांच इंजीनियरिंग एसोसिएशन के ‘जनरल सेक्रेटरी’ लेवल के पांच अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं.

अब इस दूसरे वाले पत्र को लेकर ट्विटर से लेकर बाकी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म में भी बवाल मच गया है. कारण?

रेलवे के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि लॉक-डाउन के समय स्टाफ़ की हालत पस्त थी. (तस्वीर: PTI)
रेलवे के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि लॉक-डाउन के समय स्टाफ़ की हालत पस्त थी. (तस्वीर: PTI)

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक ख़बर के अनुसार, 12 अगस्त को लिखे गए इस पत्र में इंजीनियरिंग विंग के प्रतिनिधियों ने गैर-तकनीकी अधिकारियों को ‘लो रेंक वाले सिविल सर्वेंट’, ‘बुढ़ापे में और कई प्रयासों के बाद परीक्षा पास करने वाले बताया’.

हमने इस सारे विषय में एक रेलवे अधिकारी से बात की. उन्होंने पूरा मुद्दा विस्तार से बताया-

रेलवे में सिविल सर्विस परीक्षा से चार सर्विस आती हैं. ‘इंडियन रेलवे ट्रैफ़िक सर्विस’, ‘इंडियन रेलवे अकाउंट सर्विस’, ‘इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विस’ और RPF.

ट्रैफ़िक सर्विस का काम है रेवेन्यू और ऑपरेशंस देखना. ये जो TTE या IRCTC या कॉनकोर, ये सभी चीजें हैं. रेलवे अकाउंट सर्विस देखती है पूरा अकाउंट्स. फाइनेंस प्रपोज़ल आना और अप्रूव करना. बजट वग़ैरह. पर्सनल सर्विस देखती है पूरा ‘मैनपावर मैनेजमेंट’. जैसे RRB के इग्ज़ाम कंडक्ट कराने से लेकर रिक्रूटमेंट से लेकर इनका बोनस वग़ैरह सब कुछ. RPF का काम सिक्योरिटी संभालना. अब RPF को तो मर्ज़ नहीं किया जा सकता. बाक़ी तीन नॉन-टेक्निकल सर्विसेज़ को पांच टेक्निकल सर्विसेज़ के साथ मर्ज़ करने की बात चल रही है.

नॉन-टेक्निकल सर्विसेज़ या सिविल सर्विसेज़ दरअसल ख़र्चा कुछ नहीं करती हैं. अब जैसा किसी को चाहिए कि पैसेंजर के लिए फ़ैसिलिटी बढ़ानी है, तो इंजीनियरिंग सर्विस उसे करेगा. वो बनाकर देगा और ऑपरेशंस यूज़ कर सकते हैं. तो हुआ क्या कि रेलवे में जैसे ये प्रपोज़ल चला इन आठों को मर्ज़ करने का, तो सिविल सर्विस ने विरोध किया.

देखिए, माना मैं कोई ऑपरेशन देख रहा हूं, तो उसका काम इन सभी से (टेक्निकल सर्विसेज़ वालों से) काम लेना है. और अगर ये कोई गड़बड़ करते हैं, जैसे-

ट्रेन की व्हील गर्म हो जाती है, उसे सही नहीं किया गया, बदला नहीं गया, तो वो ट्रेन गिर जाएगी. जैसे कोई ऑपरेटिंग का बंदा है, उसे मालूम है कि ये व्हिल ख़राब है. तो उसका काम है रिपोर्ट करना कि ये व्हील ख़राब हुआ है. तो उससे क्या होता है कि क्लास लगती है मैकेनिकल सर्विसेज़ की.

यूं सब कुछ अलग-अलग है. अब अगर सब मर्ज़ कर दोगे, तो मुझे पता है कि आज मैं यहां हूं, तो कल मैं मैकेनिकल में जा सकता हूं. इस भय से मैं बताऊंगा नहीं. तो वो जो एक थर्ड पार्टी, एक न्यूट्रल वाला रोल था, वो ख़राब हो जाएगा.

डिपार्टमेंटलिज़्म, रेलवे में इश्यू बताते हैं. डिपार्टमेंटलिज़्म का मतलब ये होता है कि कितने एसेट मैं अपने अंदर रखूं? तो टर्फ़-वॉर (रस्साकशी) होती है एसेट के लिए. जैसे ‘ट्रेन 18’ इंडिया में बनी, जो वंदे भारत चली, वो फेल इसलिए हुई क्योंकि मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल आपस में झगड़ पड़े कि कौन कंट्रोल करेगा. मतलब ट्रेन 18 की मैन्युफेक्चरिंग और मेंटेनेंस अगर मेरे अंडर होगी, तो स्टाफ़ भी मेरे अंडर हो गया. आपके अंडर जितना ज़्यादा स्टाफ़ है, उतना आप पावरफुल फ़ील करेंगे. ऐसा ही सिग्नलिंग, इलेक्ट्रिकल और इन सब की लड़ाई है, तो ये जो डिपार्टमेंटलिज़्म है, जिसका आप बोल रहे हो कि हम IRMS से ठीक करेंगे, तो वो डिपार्टमेंटलिज़्म तो विद-इन इंजीनियरिंग सर्विसेज़ था. क्योंकि बाक़ी तीन सर्विसेज़ तो कुछ Owe (अधिकार रखने के संदर्भ में) करती भी नहीं है.

अब मुझे जैसे अगर ट्रेन देखनी है. मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल कोई भी चलाए, मुझे उससे कोई दिक्कत नहीं है. फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे. न फ़ायदा है, न नुक़सान है. चूंकि मैं ऑपरेशंस देखता हूं, इसलिए बस मुझे ये चाहिए कि वो ट्रेन टाइम पर आ जाए, बीच में ख़राब न हो.

जबकि मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल में लड़ाई है कि उसने ले लिया, तो उसके पास पावर आ जाएगी. यही इंजीनियरिंग के साथ है. ज़मीन मेरी है, हम रेस्ट हाउस बनाएंगे, मैनेज करेंगे. कोई और करेगा तो, पावर किसी और को मिल जाएगी.

कुल मिलाकर पांचों (टेक-सर्विस) के बीच में लड़ाई है, उसमें आपने थर्ड पार्टी, न्यूट्रल (नॉन-टेक), जिसका काम है चेक-बैलेन्स करने का, उसको भी ज़बरदस्ती मेल दिया है.

तो यही सब तर्क सुनकर प्राइम मिनिस्टर ऑफ़िस ने ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर बनाया कि इसमें डिबेट और डिस्कशन चले. फिर आ गया कोविड. स्टाफ़ सब श्रमिक चलाने में बिज़ी हो गया. आपको मालूम होगा कि ‘श्रमिक’ पूरी ट्रैफ़िक सर्विस ने चलायी. किसी को भी तीन घंटे से ज़्यादा सोने को नहीं मिला. 15-15 दिन तक.

तो ये सब चल रहा था और अभी भी सब जन बिज़ी हैं. इस दौरान इंजीनियरिंग सर्विस ने क्या किया कि मिनिस्ट्री को लेटर भेजा. कि सिविल सर्विस को आप रेलवे से हटा दीजिए. उससे भी दिक़्क़त नहीं थी. उन्होंने क्या लिख दिया लेटर में कि ये बूढ़े लोग हैं, अटेम्प दे-दे के आते हैं, नीचे वाले रैंकर हैं और इनको रेलवे में मत रखिए.

इससे सब सिविल सर्वेंट भड़क गए. तो सिविल सर्विस इसलिए भड़क गई कि एक तो अपने लेटर में इन्होंने ये लिखा कि ये लोग मैनेज नहीं कर पाते हैं और इंजीनियरिंग सर्विस को पूरा दे दो. तो वो जो लैंग्वेज थी, उसको सभी सिविल सर्वेंट ने डेरोगेट्री मान लिया. जैसे फ़र्स्ट रैंक होल्डर्स, IAS, IPS, फ़ॉरेन सर्विस, सबने इसके अगेन्स्ट ट्वीट करना शुरू कर दिया है, प्राइम मिनिस्टर के लिए कि इनके ऊपर डिसिप्लिनरी एक्शन लीजिए.

लेटर भेजा है पांचों रेलवे की इंजीनियरिंग सर्विस के हेड ने, जो 30-30 साल सीनियर सर्विस में हैं. तो अगर उनकी मैंटलटी और विचारधारा ये है, तो कल अगर आप बोल रहे हो IRMS सब मर्ज़ कर दो, तो हम इनके अंडर में काम करेंगे? तो, क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि ये फेयर रहेंगे हम से? जो इतना ग़ुस्सा अभी से निकाला हुआ है कि ये बूढ़े हैं, इनसे कुछ नहीं होता है, नीचे रैंक लाए हुए हैं, और ये सब चीज़ें.

ये लेटर चला गया था, दो-तीन हफ़्ते पहले. पहले जनता ने इग्नोर मारा. फिर ये ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में छप गया, तो फिर लोगों का ग़ुस्सा आया. फिर ये सब शुरू हो गया. आप ट्विटर देखेंगे, तो आइडिया लग जाएगा कि पुलिस कमिशनर से लेकर सबने इसके अगेंस्ट ट्वीट किया है कि एक्शन लिया जाए. कि इतने सर्विस में सीनियर होते हुए  विचारधारा अलग हो, उससे दिक्कत नहीं है, पर ऐसे वर्ड्स यूज़ करना, डेरोगैट्री लैंग्वेज यूज़ करना सही नहीं है.

अभी महामारी चल रही है, सब काम में बिज़ी हैं. और इस टाइम पर ये ज़बरदस्ती का लेटर भेज देना, तो इससे भड़क गए लोग. प्रोटेस्ट मोमेंट शुरू हो गया है.

जहां तक रेलवे मंत्रालय की बात है, उसने अभी तक अपना कोई पक्ष नहीं दिया है, वो बच रहा है.

मेरे एक पुराने मित्र, जो रेलवे और बाक़ी विभागों की बेहतरीन जानकरी रखते हैं, दोनों ही पक्ष के बारे में बताते हैं-

इस लड़ाई को हम असामान्य लड़ाई नहीं मानेंगे. ये बेहद ही सामान्य लड़ाई है. इसलिए, क्योंकि ऐसी कथा आप इतिहास में ढूंढेंगे, तो हर डिपार्टमेंट की अलग-अलग निकलेगी. और तब से निकलेगी, जब से किसी मंत्रालय के अंदर ‘सब-डिपार्टमेंट’ बने. जैसे रेलवे के अंदर.

रेलवे, चूंकि आप जानते हैं कि इसमें, फाइनेंस इनवॉल्व है, रेवेन्यू इनवॉल्व है, इसमें मैनेजमेंट इनवॉल्व है, इसमें इंजीनियरिंग इनवॉल्व है…

अब होता ये है कि सरकारी सिस्टम में हर एक शाखा को चलाने के लिए एक डिफरेंट काडर बना देते हैं. अब एडमिनिस्ट्रेशन को चलाने के लिए, जिसको IAS भी कहते हैं, सिविल सर्विसेज़ इग्ज़ाम है. उससे लोग आते हैं, उनको लगता है कि रेल को हम संभालेंगे. लेकिन इंजीनियरिंग वालों को लगता है कि यार ये रेल संभालेंगे कैसे, जबकि पटरी बनाना मेरा काम है, इंजन चलाना मेरा काम है, इंजन को रिपेयर करना मेरा काम है. तो मैं रेल चला रहा हूं, ये कैसे रेल चला रहे हैं. तो ये डिपार्टमेंट्स के अंदर हर दिन की लड़ाई रहती है.

अब लड़ाई कैसे रहती है, मैं ये समझाता हूं. एक स्टेशन के अंदर, स्टेशन मास्टर भी बैठा है, इंजीनियरिंग का हेड भी बैठा है. हो सकता है कि रेवेन्यू वाले का भी हेड बैठा हुआ हो. अब तीनों के बीच में अंदरखाने लड़ाई होगी कि भैया असली अधिकार किसका है? कौन सबसे ऊपर है?

अब दो तर्क आ रहे हैं इसमें. एक इंजीनियरिंग वाला जो तर्क दे रहा है कि सिविल सर्विस इग्ज़ामिनेशन में जिनके कम नाम नंबर आते हैं, या जो बूढ़े हो जाते हैं, वही रेलवे सर्विसेज़ में आते हैं. ये बात बिलकुल सही नहीं भी कही जाएगी, तो मोटा-मोटी आप कह सकते हैं. अब मुझे नहीं पता शायद सर्वे होना चाहिए, तब हमको आंकड़ा पता चले.

आप इस साल के सिविल सर्विसेज़ में पास हुए कुछ बच्चों का उदाहरण ले लीजिए, जो पहले से ही रेलवे सर्विसेज़ में काम कर रहे थे, वो दोबारा से सिविल सर्विसेज़ में बैठे और दोबारा से पेपर देकर IAS बने.

सांकेतिक तस्वीर (PTI)
सांकेतिक तस्वीर (PTI)

मतलब रेलवे सर्विसेस में या एक इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस भी होती है, 40-42 ऐसी नीचे की सर्विसेज़ होती हैं.

आदमी या तो IAS बनना चाहता है, पहले नंबर पर. उसमें टॉप रैंकर्स ही बन पाते हैं. क्योंकि उसमें पोस्टिंग ज़्यादा होती है और पावर भी ज़्यादा होती है, वैरायटी भी ज़्यादा होती है. या फिर बनना चाहता IPS, क्योंकि उसमें वर्दी है, धौंस है. कुछ फिर उसके बाद बनना चाहते हैं, IRS. इसके बाद की जो भी सर्विसेस आती हैं, वो सर्विसेज़ कोई भी बाई चॉइस नहीं लेता है. वो उनको उनकी रैंक की वजह से मिल जाती है. इसीलिए, जो इंजीनियर ये बात कह रहे हैं कि रेलवे सर्विस में आने वाले सेंट्रल सिविल सर्विस की परीक्षा देकर आने वाले छात्र, वो रिलकटेंट एडमिनिस्ट्रेटर हैं, ये बात सही है.

दूसरा, उम्र वाली बात भी सही है, क्योंकि सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ में, सबकी उम्र सीमा तय है कि कौन किस कैटेगरी में आएगा. अगर उस सीमा तक वो IAS नहीं बन पाता है, जिसने IAS बनने का सपना देखा, और अगर उसको रेलवे सर्विसेज़ में नौकरी मिल गई, तो फिर वो रेलवे सिविल सर्विसेस ही ज्वाइन कर लेगा और मरे मन से उसे रेलवे सर्विस में नौकरी करनी होगी. अब इसमें ऐसा हो सकता है कि किसी का हृदय परिवर्तन हो जाए और रेलवे किसी को बहुत अच्छी सर्विस लगने लग जाए, तो वो अच्छा काम करने लग जाए. लेकिन बुनियादी तर्क इंजीनियरिंग सर्विस वालों का बिलकुल सही है.

लेकिन अब इसके काउंटर पॉइंट पर बात करें. एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस वालों का भी कहना बहुत सही है कि आप हमको एडमिनिस्ट्रेशन चलाने के लिए बैठा रहे हैं, तो फिर आप इंजीनियरिंग वालों को क्यों आगे कर रहे हैं? इंजीनियरिंग वालों को क्यों तरजीह मिलनी चाहिए? जब काम हम कर रहे हैं, तो इंजीनियर वाला भी मेरे अंडर रह कर काम करे. मैं बताऊंगा इनको कि काम कैसे करना है. मतलब इंजन सही करना है, ये इनका काम है, लेकिन इनको बताऊंगा तो मैं न कि तुमको 10 इंजन यहां पर सही करने हैं, 25 वहां पर सही करने हैं, 10-12 इंजीनियर वहां भेजो 5-6 इंजीनियर वहां भेजो. या मैं ये कहूं कि मेरे स्टेशन में इतने लोग की ज़रूरत है, इंजीनियरिंग वाले. आप इतने लोगों को भेजो. काम वो करवाएगा, लेकिन मेरे कहने पर करवाएगा.

# डेटा क्या कहता है-

सर्वे वाली बात हमने गौर की और कुछ डेटा निकाला. बाक़ी ट्वीट तो पूरी स्टोरी के दौरान आप देख-पढ़ ही रहे हैं.

# IRTS में IRSME और IRSEE से ज़्यादा IITians हैं. आपको ग्राफ़िक देखकर पता चल जाएगा.

# जिन रेलवे अधिकारी से हमने शुरू में बात की, वो बताते हैं-

सिविल सर्वेंट- अगर आप देखेंगे कि रैंक वन और जिसका रैंक लास्ट आता है – उसमें कोई मार्क्स का फ़र्क़ नहीं होता है. जैसे मेरे जो मार्क्स थे, 50 से ज़्यादा लोगों को वही थे. मेरे 2-3 मार्क्स और होते, तो मुझे IPS मिलती. 12-13 लाख लोगों में से 700-800 लोग ले रहे हैं, तो इनटेक अच्छा ही आएगा, सिविल सर्विसेज़ का.

# नीचे ऐसी लिस्ट भी है, जिनमें दिखता है कि कई ने IAS, IPS के ऊपर IRTS को तरजीह दी है.

# ये रही तीसरी लिस्ट, जो दिखाती है कि अधिकारियों ने अपनी सीनियरिटी को ताक में रखकर, रेलवे इंजीनियरिंग सर्विसेज़ को छोड़कर, IRTS जॉइन किया.

# ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ एक अनाम सिविल सर्वेंट के हवाले से बताता है-

रेलवे एक टेक्नॉलजी-ड्रिवन (प्रौद्योगिकी-चालित) संगठन है. वर्तमान में समूह-ए में 72% कर्मचारी कोर इंजीनियर (आईआरएसई, आईआरएसईई, आईआरएसईई और आईआरएसएस) हैं, जो इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा (ईएसई) के माध्यम से भर्ती किए गए हैं. जबकि 28% गैर-तकनीकी (IRTS, IRAS और IRPS) सेवाओं के अधिकारी हैं, जिनकी भर्ती सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से की जाती है. सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से भर्ती किए गए गैर-तकनीकी अधिकारियों में भी 60% इंजीनियर होते हैं.

# मेरे कुलिग अभिषेक तर्क रखते हैं-

जो इंजीनियरिंग सर्विस वाले लोग ये कह रहे हैं कि ये (सिविल सर्विस वाले) लोअर रैंक वाले होते हैं, तो उनको तो सरकार ने रोक नहीं रखा है कि आप सिविल सर्विस का एग्ज़ाम न दो. बहुत सारे दे भी रहे हैं. टॉप भी कर रहे हैं, तो फिर आप किस बेस पर आरोप दूसरे पर लगा रहे हैं?

जैसे आपके लिए एक्सक्लूसिवनेस तय की गई है, UPSC की तरफ़ से कि हां, इंजीनियर ही बैठेंगे. सिविल सर्विस में तो ऐसी कोई चीज़ तय नहीं की गई है. आप जाके बैठ सकते हो. आप के लिए भी समान अवसर है. और आप कह रहे हो कि आपसे लोवर लेवल है, तो आपके लिए तो क्लियर करना आसान भी होगा.

# अंततः 

सवाल ये नहीं है कि कौन ग़लत, कौन सही. बस ये ज़रूर है कि भाषा की और व्यवहार की मर्यादा बनी रहनी चाहिए. मुद्दे तो एक बार मेज़ पर बैठकर हाल हो जाएंगे. अब IAS, IPS और इतनी टॉप पोस्ट छोड़िए, आप मेरे उदाहरण को ही ले लीजिए. होटल मैनजमेंट करने के बाद कुछ दिनों तक मैंने एक होटल में जॉब की थी. मैं देखता था कि FnB प्रॉडक्शन और FnB सर्विसेज़ के बीच आए दिन पंगे हुआ करते थे. मतलब शेफ़ और वेटर वाले डिपार्टमेंट के बीच. ऐसा लगता कि आज दोनों डिपार्टमेंट में से किसी एक का तो क़त्ल होकर रहेगा. और हम ग़लत नहीं होते थे. नीचे पार्किंग एरिया में एक-दो नहीं, ढेर सारी लाशें पड़ी मिलती थीं. सिगरेटों की. और क़त्ल दोनों डिपार्टमेंट के हेड ने मिलकर किया होता था.

इसका मतलब समझे? यही कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.


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