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चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव पर लग रहे आरोपों की सच्चाई क्या है?

‘मुझे एक डोरमेट्री के भीतर बंद करके रखा गया था. दरवाज़े के बाहर हमेशा सिक्योरिटी रहती थी. कोरोना महामारी के दौरान मेरा बुखार 102 डिग्री तक पहुंच गया था. इसके बावजूद मुझे बाहर नहीं निकलने दिया गया. खाने का पूरा सामान खत्म हो चुका था. भागने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था. एक दिन मैंने कमरे की खिड़की तोड़ दी और फिर दोस्त के साथ भाग निकला. ऐसा लग रहा है कि मैं नर्क़ से ज़िंदा बचकर निकला हूं.’

ये बयान अप्रैल 2021 की वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट का हिस्सा है. कैरेक्टर का नाम है, डिंग. सुरक्षा कारणों से उसने अपना पूरा नाम नहीं बताया था. डिंग को चीन के हेनान से इंडोनेशिया लाया गया था. कोनावे में चल रहे एक प्रोजेक्ट में मज़दूरी के लिए. डिंग की कहानी दिल दहलाने वाली है, लेकिन ये इकलौती नहीं है. कई मजदूरों ने बताया कि कोरोना संक्रमण होने के बाद भी उनसे लगातार काम करवाया गया. उनके पासपोर्ट ज़ब्त कर लिए गए थे. कई महीनों तक वेतन नहीं दिया जाता था. सवाल करने पर बेरहमी से पीटा भी जाता था. घायल होने पर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता था.

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

इन बेरहम कहानियों में कौन-सी चीज़ कॉमन है? वो है, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव. इन मज़दूरों को इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाकर लाया गया था. 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, दस लाख से अधिक चीनी मज़दूर बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत दुनियाभर में काम कर रहे हैं.

इन प्रोजेक्ट्स में इंसानी अधिकारों के उल्लंघन की ख़बरें लंबे समय से चल रहीं थी. हाल में आई दो रिपोर्ट्स ने इन आरोपों को पुख़्ता कर दिया है. पहली रिपोर्ट है, ह्यूमन राइट्स वॉर (HRW) की. जबकि दूसरी रिपोर्ट बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स रिसोर्स सेंटर (BHRRC) नामक एनजीओ ने पेश की है. इन रिपोर्ट्स में क्या जानकारियां सामने आईं है? चीनी कंपनियों पर किस तरह के आरोप लगाए गए हैं? और, चीन का बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव क्या है? चलिए बताते हैं-

चीन में माओ के बाद सबसे ताक़तवर नेता कौन हुआ? इसका जवाब बहुमत से ‘डेन जियाओपिंग’ के पक्ष में होगा. जियाओपिंग को 1989 में तियानमेन स्क़्वायर में प्रदर्शनकारियों पर टैंक चलवाने के लिए याद किया जाता है. लेकिन उनके हिस्से में कई और उपलब्धियां भी हैं. जैसे, चीन के मार्केट को दुनिया के लिए खोलना. जैसे, एक मशहूर बयान, ‘अपनी शक्तियों को छिपाकर रखो और सही मौके का इंतज़ार करो.’

90 के दशक के अंतिम सालों तक चीन इसी नीति पर चलता रहा. लेकिन 1999 में उसने अपनी रणनीति बदल दी. वो ‘गो आउट पॉलिसी’ लेकर आया. चीन ने अपने यहां की कंपनियों को बाहर के देशों में निवेश करने के लिए कहा. इसका कई मकसद थे, अपने चीनी FDI को बढ़ावा. प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता में सुधार. अमेरिका और यूरोप के बाज़ारों में अपने आप को स्थापित करना. चीन इसमें काफी हद तक कामयाब भी हुआ.

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बेल्ट एंड रोड चीन की महत्वकांक्षी परियोजना है. फोटो- AP

इस कामयाबी के बावजूद चीन का मन नहीं भरा था. वहां उससे कहीं बड़ा प्लान तैयार हो रहा था. उसे दो चीज़ों की ज़रूरत महसूस हो रही थी. कच्चा माल और तैयार प्रोडक्ट्स के लिए बाज़ार. पैसे, तकनीक और मानव संसाधन के मामले में उसका हाथ मज़बूत था.

शी जिनपिंग ने धरातल पर उतारी योजना

मार्च 2013 में शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति बने. उनके दिमाग में लंबे समय से ये परियोजना पनप रही थी. पूरी दुनिया को सीधे चीन के बाज़ार से जोड़ने का प्लान. राष्ट्रपति बनने के छह महीने बाद ही उन्होंने इसे धरातल पर उतार दिया. इसका नाम रखा गया, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव. इसी का एक नाम है वन बेल्ट, वन रोड (OBOR), ओबोर.

बेल्ट का क्या मतलब था? जिन देशों में आधारभूत संरचना नहीं है. चीन ने वहां मदद का वादा किया. जैसे, सड़क बनवाने में, रेल लाइन बिछाने, सोलर प्लांट्स तैयार करने में आदि. ये चीन को सेंट्रल एशिया और यूरोप से जोड़ता है. जिनपिंग का कहना था कि वो अतीत के सिल्क रूट को रिवाइव करना चाहते हैं.

ये तो हुई बेल्ट की बात. अब रोड का मतलब समझ लेते हैं. इसके जरिए चीन एशिया से अफ़्रीका के रास्ते यूरोप तक एक समुद्री रास्ता तैयार करना चाहता है. इसलिए वो बांग्लादेश, श्रीलंका, जिबूती, ग्रीस, स्पेन और पेरू जैसे देशों में बंदरगाह तैयार करने पर खर्च कर रहा है.

ओबोर को इतिहास की सबसे महंगी परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है. इसमें चीन के अलावा लगभग 65 देश शामिल हैं. इसमें दुनिया की कम-से-कम 60 फीसदी आबादी शामिल है.

ओबोर को इतना सपोर्ट क्यों मिल रहा है?

अमेरिका या दूसरे विकसित देशों के सपोर्ट वाली संस्थाएं ज़रूरतमंद देशों की मदद शर्तों के साथ करतीं है. वे उन देशों के पूरे आकलन के बाद ही मदद जारी करती हैं. उन्हें शर्तों के हिसाब से ही पैसे खर्च करने होते हैं.

इस मामले में चीन का हिसाब सीधा है. वो किसी तरह के पचड़े में नहीं पड़ता. वो कहता है, अपनी ज़रूरत बताओ, बाकी प्रबंध हम देख लेंगे. बदले में तुम्हें हमारे हितों का ध्यान रखना होगा. चीन ये नहीं देखता कि किसी देश में तानाशाही सरकार है या वहां बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है. उसका इकलौता मकसद प्रॉफ़िट है.

अब आप कहेंगे कि चीन इतनी उदारता से पैसे देकर विकास कर रहा है, तो इसमें दिक़्क़त कहां है?

चीन दूसरे देशों में जो पैसा खर्च कर रहा है, वो निवेश या कर्ज़ के तौर पर दिए गए हैं. उन देशों को बाद में पैसे लौटाने भी होंगे. अब आप सोचिए, जो देश मदद के लिए चीन के आगे हाथ फैला रहे हैं, वो कुछ ही बरस बाद अरबों का कर्ज़ कहां से चुकाएंगे.

फिर ऐसी स्थिति में क्या होगा?

वही होगा जो श्रीलंका और जिबूती में हुआ. श्रीलंका सरकार ने एक बंदरगाह बनाने के लिए चीन के आगे झोली फैलाई थी. चीन ने झोली तो भर दी, लेकिन कुछ समय बाद उसने अपने पैसे वापस मांगे. श्रीलंका के पास पैसे थे नहीं. आख़िरकार, उसे हमबनटोटा पोर्ट को 99 साल के लिए चीन को लीज पर देना पड़ा. जो लोग पहले से हमबनटोटा में बसे थे, उन्हें बाहर निकलने के लिए कह दिया गया. उन्होंने प्रोटेस्ट किया, लेकिन चीन के आगे झुकी सरकार क्या ही कर सकती थी?

जिबूती में क्या हुआ? वहां भी चीन ने ख़ूब निवेश किया. इथियोपिया तक रेल लाइन बनवा दी. और भी कई सेक्टर में विकास करवाया. चीन ने इतना पैसा खर्च किया कि जिबूती का कुल क़र्ज़ जीडीपी के 70 फीसदी तक पहुंच गया. 2017 में चीन ने जिबूती में विदेशी धरती पर पहला मिलिटरी बेस खोल लिया. अगर कभी जिबूती को लगा कि उसकी ज़मीन का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है, वो किस मुंह से चीन की आलोचना कर पाएगा.

जानकारों का कहना है कि चीन का निवेश एक तरह से महाजन का बिछाया जाल है. जिसमें फंसने वाला पीढ़ियों तक उसका क़र्ज़ चुकाता रहता है.

HRW की रिपोर्ट में क्या है?

ये तो हुई वैश्विक राजनीति के स्तर की बात. एक उदाहरण से समझते हैं कि कैसे ओबोर ने इंसानी जीवन को प्रभावित किया है. ये वाकया सामने आया है, मानवाधिकार संगठन HRW की रिपोर्ट में. इसमें क्या है? पूर्वोत्तर कंबोडिया में लोअर सेसान बांध का निर्माण 2013 में शुरू हुआ था. इसपर पनबिजली संयंत्र बननी थी. ये भी बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का हिस्सा था. चीन ने इसपर लगभग 700 करोड़ रुपये का खर्च किया. बांध की वजह से निचले इलाकों में रहनेवाले पांच हज़ार लोग प्रभावित हुए. जब उन्होंने परियोजना का विरोध किया तो उनकी आवाज़ दबा दी गई. कईयों को तो जेल में डाल दिया गया.

विरोध के बावजूद संयंत्र का काम चलता रहा. 2017 में जब घरों में पानी भरने लगा तो उन लोगों को ज़बरदस्ती बाहर निकाल दिया गया. उन्हें जिस नई जगह पर रहने के लिए दिया गया था, वहां आजीविका का कोई साधन नहीं था. नई ज़मीन बंजर थी, वहां फसल भी पैदा नहीं हो रहा है. HRW की रिपोर्ट के अनुसार, उन लोगों को न तो कोई ट्रेनिंग दी गई और न ही उन्हें रोजगार दिया गया. ये लोग पूरी तरह से खेती और मछलीपालन पर निर्भर थे. उनकी रोजी-रोटी हमेशा के लिए छिन गई. समझिए कि उनके जीवन पर संकट आ खड़ा हुआ है.

2018 में जब प्रोजेक्ट पूरा हुआ, तब तक उनके घर पूरी तरह डूब चुके थे. इन लोगों ने अपनी सरकार से मदद की गुहार लगाई. लेकिन मदद की बजाय उन्हें धमकाया गया. इस बांध की वजह से मेकोंग नदी में मछलियां कम हो रहीं है. कहा जा रहा है कि इससे आनेवाले समय में दस लाख से अधिक लोग प्रभावित होंगे. मांग की जा रही है कि चीन अपनी ओबोर इनीशिएटिव में सुधार करे. ताकि मूलनिवासियों का ध्यान रखा जा सके. साथ ही, पर्यावरण के साथ भी छेड़छाड़ रोकी जाए.

BHRRC की रिपोर्ट क्या कहती है?

ये तो हुई ओबोर से होने वाले नुकसान की बात. एक रिपोर्ट और आई है, जिसमें ओबोर प्रोजेक्ट्स के भीतर होने वाले अत्याचार की कहानी बयां की गई है. BHRRC, एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ है. ये दुनिया की दस हज़ार से अधिक कंपनियों में मानवाधिकार से संबंधित घटनाओं पर नज़र रखती है. उन्होंने पिछले सात साल तक OBOR के अंदर हुए मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को कम्पाइल किया है.

उनकी रिपोर्ट में क्या है? ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव से जुड़े प्रोजेक्ट्स में मानवाधिकार उल्लंघन के कम-से-कम 679 मामले सामने आए हैं. ये सभी केस 2013 से 2020 के दर्ज़ किए गए हैं.

इनमें से सबसे अधिक मामले उन देशों के हैं, जो ग़रीब हैं या जहां चीन का बहुत अधिक निवेश है. जैसे कि म्यांमार, पेरू, इक्वाडोर, कम्बोडिया, इंडोनेशिया आदि. म्यांमार 97 मामलों के साथ पहले, जबकि पेरू दूसरे नंबर पर है. फरवरी 2021 में म्यांमार में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्तापलट कर दिया था. जब से सैन्य सरकार सत्ता में आई है, चीन के 15 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिल चुकी है. तख़्तापलट के बाद से सेना सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की हत्या कर चुकी है. विरोध करने पर लोगों को गायब किया जा रहा है. जाहिर-सी बात है, सेना की मंजूरी से चालू होने वाले प्रोजेक्ट्स में आम लोगों के हितों की अनदेखी होगी.

अगर सेक्टर के आधार पर देखें तो मेटल एंड माइनिंग सेक्टर इस लिस्ट में सबसे ऊपर है. यहां कुल 236 मामले दर्ज़ हुए. कंस्ट्रक्शन में 152 और एनर्जी सेक्टर में कुल 118 मामले सामने आए हैं. चीन, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव में पारदर्शिता का दावा करता है. लेकिन 102 कंपनियों में से सिर्फ़ 24 ने आरोपों पर कार्रवाई की. बाकी मामले हमेशा के लिए दबा दिए गए.

रिपोर्ट में कंपनियों को पारदर्शिता बरतने और शिकायत का प्रॉपर चैनल तैयार करने की सलाह दी गई है. ये भी कहा गया है कि इंसानी अधिकारों पर कंपनियां उदारता से सोचें. चीन में पारदर्शिता की सलाह पर एक पुरानी कहानी याद आती है. सच्ची वाली. आधुनिक चीन के संस्थापक माओ त्से-तुंग के समय की.

साल 1956. माओ को सत्ता हासिल किए सात बरस बीत चुके थे. उसी वक़्त पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ के शासन के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट हो रहे थे. माओ को डर हुआ कि वैसा ही विरोध चीन में न शुरू हो जाए. प्रीमिया चाऊ एन लाई के कहने पर उसने एक कैंपेन शुरू किया. लेखकों और बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की गई कि वे सरकार के बारे में खुलकर अपनी राय रखें. हर तरह की आलोचना का स्वागत होगा. माओ ने अपने भाषण में कहा, ‘लेट ए हंड्रेड फ़्लावर्स ब्लूम’.

मतलब ये कि जिस तरह एक बगीचे में सैकड़ों किस्म के फूल होते हैं, उसी तरह चीन में हर तरह के विचारों को जगह मिलेगी. इस कैंपेन को नाम दिया गया, हंड्रेड फ़्लावर्स मूवमेंट. माओ के ऐलान के बाद तो जैसे भगदड़ मच गई. लोग उससे खार खाए बैठे थे. कुछ तो समझदार थे. उन्होंने आलोचना की भाषा संयत रखी. लेकिन बाकी लोग बहुत आगे निकल गए. खुली छूट पाकर उन्होंने माओ को बुरा-भला कहना शुरू कर दिया.

चाऊ एन लाई के दफ़्तर में चिट्ठियों का अंबार लग गया. अधिकतर में माओ को घमंडी और विनाशक बताया गया था. बीजिंग यूनिवर्सिटी में ‘डेमोक्रेसी की दीवार’ खड़ी कर दी गई. छात्रों ने कम्युनिस्ट शासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू कर दिया. वे लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सरकार बदलने की मांग करने लगे. माओ के विरोध में पोस्टर छपने लगे.

माओ को लगा कि मामला हाथ से निकल रहा है. उसने कहा कि सुगंधित फूलों को ज़हरीली घास से अलग करने का टाइम आ गया है. आगे क्या हुआ? माओ ने अपने आलोचकों की लिस्ट निकलवाई. ऐसे लोगों की संख्या लाखों में थी. उनमें से कुछ को मौत की सज़ा दी गई. बाकियों को लेबर कैंप्स में भेज दिया गया. ताकि उन्हें कम्युनिस्ट शासन का ककहरा सिखाया जा सके.

कई बरस बार किसी ने माओ से पूछा, ‘हंड्रेड फ़्लावर्स कैंपेन से क्या फायदा हुआ?’

माओ ने चहकते हुए कहा, ‘जो आस्तीन के सांप थे, वे बिल से बाहर निकल आए.’

भले ही चीन में माओ का राज खत्म हो गया हो. लेकिन आज भी उनके डीएनए में माओ की कुटिल सीखें ज़िंदा हैं. उनसे खुलेपन की उम्मीद रखने का मतलब है, अपने पैरों को कुल्हाड़ी पर पटक देना.

दुनिया भर की बड़ी खबरें-

रूसी लड़ाकों पर वॉर क्राइम्स के आरोप

लीबिया के सिविल वॉर में शामिल हुए किराए के रूसी लड़ाकों पर वॉर क्राइम्स के आरोप लगे हैं. इनका नाम है वेग्नर ग्रुप. वेग्नर ग्रुप का नाम पहली बार 2014 के यूक्रेन वॉर के दौरान चर्चा में आया था. जहां उन्होंने प्रो-रशियन अलगाववादियों को सपोर्ट किया था. वेग्नर ग्रुप का फ़ाउंडर दिमित्री उत्किन रूस की स्पेशल फ़ोर्सेज़ काम कर चुका है. ग्रुप में उसका कोडनेम चलता है, नाइन.

लीबिया में वेग्नर्स ने क्या किया? वेग्नर ग्रुप पहली बार अप्रैल 2019 में लीबिया आया था. वे विद्रोही सेना के कमांडर जनरल खलीफ़ा हफ़्तार के साथ मिलकर लड़ रहे थे. आरोप हैं कि उन्होंने बेवजह सैकड़ों क़ैदियों की हत्या की. ताकि क़ैदियों को खाना खिलाने का खर्चा न उठाना पड़े. इसके अलावा, उन्होंने कई युद्ध नियमों का भी उल्लंघन किया. अक्टूबर 2020 में लीबिया में युद्धविराम हो गया था. इसके बावजूद वेग्नर्स लीबिया में ही रूके हुए हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेग्नर्स के तार सीधे तौर पर रूस की आधिकारिक सेना से जुड़े हैं. ग्रुप के एक लड़ाके का टैब बीबीसी के हाथ लगा है. इसमें ग्रुप के काम करने के तरीके की जानकारियां मिली है. बताया जा रहा है कि ये लोग रूसी मिलिटरी से साजो-सामान खरीद रहे थे. रूस वेग्नर ग्रुप के साथ किसी भी तरह के संबंध से इनकार करता है. 2011 में मुअम्मार गद्दाफ़ी की हत्या के बाद से लीबिया में सिविल वॉर चल रहा है. इस साल दिसंबर में नई सरकार के लिए चुनाव कराए जाएंगे. अगर सब ठीक रहा तो लीबिया को दस साल बाद स्थायी सरकार मिल सकती है.

अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के फ़ैसले पर कायम

राष्ट्रपति जो बाइडन अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों को निकालने के फ़ैसले पर कायम हैं. बाइडन ने कहा कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है. इससे पहले पेंटागन ने बयान दिया था कि अफ़ग़ानिस्तान की लड़ाई वहां के लोगों की है. अमेरिका उसमें दखल नहीं देगा. इस बयान की खूब आलोचना हो रही थी. कहा जा रहा था कि 20 सालों तक अफ़ग़ानिस्तान में बारूद बिछाने के बाद अमेरिका चुपचाप निकल रहा है.

मांग चल रही थी कि अमेरिका को अपने सैनिकों को निकालने के फ़ैसले पर फिर से विचार करना चाहिए. अमेरिकी सैनिकों के निकलने के बाद से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के हमले बढ़ गए हैं. पिछले पांच दिनों में नौ बड़े शहरों पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो चुका है. 11 अगस्त को अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी मज़ार-ए-शरीफ़ पहुंचे. रिपोर्ट्स के अनुसार, ग़नी ने वहां सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया. मज़ार-ए-शरीफ़, अफ़ग़ान सरकार के सबसे मज़बूत किलों में से एक है. अगर इसपर तालिबान का अधिकार हुआ तो काबुल बहुत दूर नहीं रह जाएगा. ताज़ा समाचार ये है कि अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक वित्त मंत्री खालिद पायेंदा ने इस्तीफा दे दिया है. वो देश छोड़कर भाग गए हैं.

इथियोपिया की पीएम ने नागरिकों से युद्ध में मदद को कहा

इथियोपिया के प्रधानमंत्री एबी अहमद अली ने सभी सक्षम नागरिकों से युद्ध में शामिल होने की अपील की है. उन्होंने कहा कि ये देशभक्ति दिखाने का समय है. इथियोपिया की सेना पिछले नौ महीने से टिग्रे पीपल्स लिबरेशन फ़्रंट (TPLF) के ख़िलाफ़ जंग लड़ रही है. जून 2021 में TPLF को खदेड़ने के बाद नेशनल आर्मी ने सीज़फ़ायर का ऐलान कर दिया. लेकिन फिर TPLF ने वापसी की और टिग्रे पर दोबारा क़ब्ज़ा कर लिया. तब से नेशनल आर्मी और TPLF के बीच लड़ाई तेज़ हो गई है. इस लड़ाई में अब तक पचास लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं. पचास हज़ार से अधिक लोग देश छोड़कर भाग चुके हैं. यूएन की रिपोर्ट के अनुसार, तीन लाख से अधिक लोगों पर अकाल का ख़तरा मंडरा रहा है.


वीडियो- दुनियादारी: चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ की ये सच्चाई आपको हैरान कर देगी!

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