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82000 करोड़ की गैस पाइपलाइन ने रूस-यूक्रेन संकट में क्या खेल किया?

हम पहले भी बता चुके हैं कि 2022 में पूरी दुनिया की सबसे ज़्यादा नज़र रूस और यूक्रेन पर होगी. ऐसा हो भी रहा है. रूस ने नवंबर 2021 से ही यूक्रेन बॉर्डर पर भारी-भरकम हथियार और हज़ारों सैनिकों को तैनात किया हुआ है. तब से दोनों तरफ़ से बारगेनिंग चल रही है. रूस अपनी बात ख़ुद रख रहा है. लेकिन यूक्रेन की तरफ़ से नेटो और अमेरिका ने मोर्चा संभाल रखा है. यूक्रेन इस संकट में पार्टी होने के बावजूद दर्शक की भूमिका में दिख रहा है.

27 जनवरी को रूस-यूक्रेन संकट में नया मोड़ आया. अमेरिका ने वॉशिंगटन में रूस के राजदूत को मिलने के लिए बुलाया. फिर उनको एक चिट्ठी सौंपी गई. ये तनाव कम करने के लिए अमेरिका का ऑफ़र था. बाद में चिट्ठी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास पहुंची. चर्चा के बाद रूस का बयान आ गया. रूस ने कहा कि चिट्ठी में मुख्य मुद्दे को दरकिनार किया गया है. बातचीत की पहल तक तो ठीक है, लेकिन इससे कुछ बदलने वाला नहीं है.

रूस के बयान के कुछ देर बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन फ़ोन लगाया. राष्ट्रपति वोल्दोमीर ज़ेलेन्सकी को. बाइडन ने आगाह किया कि रूस फ़रवरी में हमला कर सकता है.

बाइडन सरकार ने ये भी दोहराया कि रूस के हमले की स्थिति में रूस के एक ख़ासमख़ास प्रोजेक्ट को अप्रूवल नहीं मिलेगा. ये प्रोजेक्ट एक गैस पाइपलाइन से जुड़ा है. इस पाइपलाइन को तैयार करने में लगभग 82 हज़ार करोड़ रुपये का खर्च आया है.

रूस-यूक्रेन संकट के बीच गैस की बात कहां से आई? नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन क्या है? और, अगर सचमुच में हमला हुआ और गैस की सप्लाई रुक गई तो उसका क्या असर होगा?

सबसे पहले जान लेते हैं कि नॉर्ड स्ट्रीम 2 की कहानी क्या है?

ये एक अंडरवाटर गैस पाइपलाइन है. ये पश्चिमी रूस से होकर पूर्वोत्तर जर्मनी तक बिछाई गई है. बाल्टिक सागर के नीचे से. इस पाइपलाइन की लंबाई लगभग 1275 किलोमीटर है. इस पाइपलाइन का मालिकाना हक़ रूस की सरकारी कंपनी गैज़प्रोम के पास है.

इस पाइपलाइन का काम सितंबर 2021 में ही पूरा हो चुका है. लेकिन अभी तक यूरोप की एजेंसियों ने इसे मंज़ूरी नहीं दी है. अगर ये पाइपलाइन चालू हो जाए तो हर साल 55 अरब क्यूबिक मीटर गैस यूरोप में भेजी जा सकती है. अभी रूस नॉर्ड स्ट्रीम 1, यूक्रेन और बेलारुस के रास्ते से यूरोप में गैस की सप्लाई करता है. नॉर्ड स्ट्रीम वन साल 2011 से काम कर रही है.

अब सवाल ये आता है कि यूरोप को इस पाइपलाइन की कितनी ज़रूरत है?

न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अभी जो पाइपलाइंस चालू हैं, उनमें से कई पूरी क्षमता पर काम नहीं कर रहीं है. मसलन, यूक्रेन से गुजरने वाली पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाकर हर साल 77 अरब क्यूबिक मीटर गैस भेजी जा सकती है. ये नॉर्ड स्ट्रीम 2 की कुल क्षमता से लगभग दोगुना है.

फिर नॉर्ड स्ट्रीम 2 की ज़रूरत क्यों पड़ी?

इसके पीछे दो मुख्य वजहें हैं.

पहली वजह सोवियत संघ के विघटन से जुड़ी है. रूस आज भी अपना पुराना गौरव लौटाना चाहता है. व्लादिमीर पुतिन अक्सर ये बात दोहराते भी हैं. इसी पॉलिसी के तहत रूस ऐसे नेताओं को गैस सप्लाई में होने वाली कमाई का कमीशन देता है, जो उसकी बात मानें.

अगर कोई लीडर वेस्ट की तरफ़ झुके तो रूस वहां सप्लाई रोक देता है या फिर दाम बढ़ा देता है. उदाहरण के लिए, पश्चिमी यूरोप में रूस जो गैस सप्लाई करता है, उसका बड़ा हिस्सा यूक्रेन से होकर जाता है. यूक्रेन में 2014 से पहले प्रो-रशियन सरकार थी. 2014 में जनता ने प्रोटेस्ट कर वो सरकार गिरा दी. नई सरकार रूस के प्रति उतनी उदार नहीं है. ऐसे में रूस क्या करेगा? वो यूक्रेन वाली पाइपलाइन को धीमा कर देगा. सप्लाई कम कर देगा या फिर गैस के दाम बढ़ा देगा. लेकिन इससे उसके ऊपर भी भार पड़ता है. ऐसा तो है नहीं कि इस पाइपलाइन से सिर्फ़ यूक्रेन को ही गैस मिलता है. वो पाइपलाइन आगे जाकर वेस्टर्न यूरोप के कई देशों तक भी पहुंचती है. इससे रूस को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.

इस नुकसान से बचने और यूक्रेन पर निर्भरता कम करने के लिए बायपास ढूंढा गया. बाल्टिक सागर के नीचे से गैस ले जाने में किसी पर निर्भर भी नहीं होना पड़ा और रूस का काम भी हो गया. तो, नॉर्ड स्ट्रीम 2 रूस के लिए इस तरह से फायदेमंद है.

दूसरी वजह जर्मनी से जुड़ी है. जर्मनी का प्लान है कि वो रूस या चीन से उलझने की बजाय उसके साथ रिश्ता कायम कर ले. जर्मनी का मानना है कि एक बार रूस से व्यापारिक रिश्ते बन गए तो वो टुच्ची हरक़तें नहीं करेगा. नॉर्ड स्ट्रीम 2 से रूस को भारी कमाई होगी और वो इसे खोने के डर से अच्छा बना रहेगा.

पाइपलाइन के समर्थकों का ये भी तर्क है कि नॉर्ड स्ट्रीम 2 जर्मनी की गैस की सारी ज़रूरतों को पूरा करेगा. नेचुरल गैस, तेल की तुलना में पर्यावरण के लिए कम हानिकारक है. मार्च 2011 में जापान के फ़ुकुशिमा न्युक्लियर रिएक्टर में बड़ा हादसा हुआ था. जर्मनी की तत्कालीन चांसलर एंजेला मर्केल ने उस समय कहा था कि देश में मौजूद सभी न्युक्लियर रिएक्टर्स को बंद कर दिया जाएगा.

नॉर्ड स्ट्रीम 2 से एक फायदा और भी है. मान लीजिए कि रूस और यूक्रेन में झगड़ा हो गया और इसके चलते उधर वाली गैस पाइपलाइन को बंद कर दिया गया. ऐसी स्थिति में नॉर्ड स्ट्रीम 2 के ज़रिए सप्लाई जारी रह सकती है.

नॉर्ड स्ट्रीम 2 से फायदा ही फायदा है. फिर इससे नाराज़ कौन और क्यों है?

इस पाइपलाइन से नाराज़ हैं, अमेरिका, यूक्रेन और यूरोप के कई बड़े देश.

अमेरिका की नाराज़गी की वजह पुरानी है. नॉर्ड स्ट्रीम 2 से यूरोप गैस के लिए रूस पर निर्भर हो जाएगा. अमेरिका नहीं चाहता कि रूस यूरोप में बढ़त बनाए. इसलिए, पहले बराक ओबामा और फिर डोनाल्ड ट्रंप और अब जो बाइडन जर्मनी से पाइपलाइन की डील को रद्द करने की मांग करते रहे हैं. यूरोप के कई और देश भी रूस के बढ़ते प्रभाव की वजह से चिंता में हैं.

यूक्रेन की नाराज़गी की एक वजह पैसा है. रूस की जो पाइपलाइन यूक्रेन से होकर गुज़रती है, उसके बदले में उसे किराया मिलता है. रूस की गैस कंपनी यूक्रेन को हर साल ट्रांज़िट फ़ी के तौर पर लगभग 17 हज़ार करोड़ रुपये देती है. नॉर्ड स्ट्रीम 2 के चालू होने से ये कमाई बंद हो जाएगी. यूक्रेन का कहना है कि उसे पश्चिमी देशों के साथ जाने की सज़ा दी जा रही है.

ये तो हुआ नॉर्ड स्ट्रीम 2 का तिया-पांचा. जैसी कि आशंका है, अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया और रूस ने गैस की सप्लाई रोक दी तो क्या होगा?

अगर रूस ने गैस की सप्लाई रोकी तो यूरोप को भारी नुकसान होगा. यूरोप में पिछले कुछ समय से गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. रूस की आय का बड़ा हिस्सा गैस से आता है. जानकारों का कहना है कि सप्लाई रुकने से उसके खज़ाने पर निश्चित ही बड़ा असर होगा, लेकिन सवाल ये है कि क्या यूरोप इस झटके को झेलने के लिए तैयार है?

इसका जवाब संशय वाला है. जर्मनी को रूस के गैस की सख़्त ज़रूरत है. जर्मनी के वित्त मंत्री ने कहा भी है कि अगर रूस पर किसी भी तरह का प्रतिबंध लगाया गया तो जर्मनी को भी उसका नुकसान झेलना होगा.

जर्मनी के पास दूसरे विकल्प भी हैं. वो यूरोप के अन्य देशों से गैस आयात कर सकता है. लेकिन इतनी जल्दी शिफ़्ट करना इतना आसान भी नहीं है. नॉर्वे, यूरोप में गैस निर्यात करने के मामले में दूसरे नंबर पर है. उसका कहना है कि वो मैक्सिमम लिमिट पर जाकर गैस सप्लाई कर रहा है. वो रूस की कमी पूरी नहीं कर पाएगा.

यहां पर अमेरिका की भूमिका अहम हो जाती है. अमेरिका ने दो टूक लहजे में कहा है कि अगर रूस पीछे नहीं हटा तो नॉर्ड स्ट्रीम 2 को किसी भी क़ीमत पर चालू नहीं होने दिया जाएगा. लेकिन पाइपलाइन का मसला तो रूस और जर्मनी के बीच का है. दोनों ही संप्रभु देश हैं. तो सवाल ये है कि अमेरिका कैसे अपनी मनमानी थोप सकता है?

यही सवाल अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से भी पूछा गया. उनका कहना था कि अभी तो हमने प्रोसेस के बारे में नहीं सोचा है. लेकिन हम जर्मनी के साथ मिलकर इसका कोई न कोई हल ज़रूर निकाल लेंगे.

जर्मनी भले ही इस समय अमेरिका और नेटो की हां में हां मिला रहा हो, लेकिन वो युद्ध हरगिज़ नहीं चाहता. इसी वजह से जर्मनी की भूमिका को लेकर बाकी यूरोपीय देशों में संदेह है. जर्मनी ने यूक्रेन को हथियार देने से भी मना कर दिया है. हथियारों की बजाय वो पांच हज़ार हेलमेट्स भेजेगा. इसको लेकर जर्मनी की काफी किरकिरी भी हो रही है.

जानकारों का कहना है कि नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन दोनों ही पक्षों के लिए गले की हड्डी बन चुकी है. ये अंतिम समय पर खेल पलटने की काबिलियत रखती है.

रूस-यूक्रेन संकट में नया क्या हो रहा है?

जो बाइडन की चेतावनी के बाद रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का जवाब आया है. बाइडन ने कहा था कि रूस फ़रवरी में यूक्रेन पर हमला कर सकता है. इस बयान के जवाब में लावरोव ने कहा कि हम कोई युद्ध नहीं चाहते लेकिन हमारे हितों को नज़रअंदाज करना ठीक नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि अगर वे यानी कि अमेरिका और नेटो अपने ज़िद से पीछे नहीं हटे तो हम भी अपनी ज़िद पर कायम रहेंगे. दो हफ़्ते बाद सर्गेई लावरोव अमेरिका के विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन से मुलाक़ात करने वाले हैं.

फ़रवरी महीने में बीजिंग में विंटर ओलंपिक्स का आयोजन है. पुतिन उद्घाटन समारोह में हिस्सा लेने जाएंगे. इसी दौरान उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात भी होनी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों नेताओं की बातचीत में यूक्रेन संकट छाया रहेगा.


नाटो को लेकर रूस-यूक्रेन क्यों आपस में भिड़े हुए हैं?

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