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ये कौन-सी संसदीय कमेटी है, जो 'फेसबुक हाजिर हो' की रट लगा रही है

फेसबुक पर फिर हल्ला मचा है. और इस बार यह हल्ला फेसबुक की वजह से ही मचा है. मजेदार बात यह है कि इसकी स्क्रिप्ट अमेरिका में लिखी गई है. असल में वॉल स्ट्रीट जर्नल नाम के एक बड़े अखबार ने बीजेपी के कुछ नेताओं और फेसबुक पर फैली हेट स्पीच में कनेक्शन निकाल दिया है. खबर सामने आने की देर थी, अमेरिका से लेकर भारत तक जितने मुंह, उतनी बातें. बार-बार चर्चा हो रही है कि पार्लियामेंट्री हाउस कमेटी में फेसबुक इंडिया के अधिकारियों को तलब करके जवाब मांगा जाए. अब ये कौन-सी कमेटी है, जो फेसबुक को अपने सामने बुलाने पर मजबूर कर सकती है. आइए जानते हैं, भारत में हाउस कमेटियों के बारे में, आसान भाषा मेंः

क्या है यह हाउस कमेटी का चक्कर?
मामला फेसबुक पर फैली हेट स्पीच का है. इस पर इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी मामलों की संसदीय समिति के मुखिया शशि थरूर भन्नाए हुए हैं. कह रहे हैं, फेसबुक को बुलाएंगे और उससे किए-धरे का हिसाब मांगेंगे. अब आपको लग रहा होगा कि सरकार तो बीजेपी की है, तो फिर ये कांग्रेसी थरूर क्यों भुजाएं फड़का रहे हैं. यही खेल तो समझने वाला है. आपको लगता है कि देश भर के लिए कानून बनाने और व्यवस्था कायम करने का काम सिर्फ सरकार करती है, बाकी सारे एमपी मौज करते हैं? जी नहीं, ऐसा नहीं है. सरकार चलाने का काम बहुमत से चुनी सरकार करती है लेकिन इस काम में मदद पूरी संसद करती है. लोकतंत्र में संसद के दो प्रमुख काम होते हैं- एक तो कानून बनाना और दूसरा सरकार के कामकाज पर नजर रखना. ऐसे ही कामों को संसद अपनी समितियों के जरिए करती है. इन्हें आम भाषा में हाउस कमेटी कहते हैं. ये कमेटी सरकार के बनाए कानून पर रायशुमारी भी करती हैं, उस पर एक्सपर्ट्स से बात करती हैं और सरकार को बताती हैं. जरूरत पड़ने पर ये समितियां किसी मामले की जांच भी कर सकती हैं. इन समितियों में सिर्फ सत्ताधारी दल के एमपी ही नहीं बल्कि विपक्ष के एमपी भी होते हैं. कई समितियों के अध्यक्ष विपक्षी पार्टी के मेंबर होते हैं. ऐसी ही एक कमेटी है आईटी कमेटी, जो इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी से जुड़े कानूनों और मामलों पर सरकार को राय देती है. इसके अध्यक्ष शशि थरूर हैं.

विशेषाधिकार समिति में अदालत की तरह सुनवाई होती है. (प्रतीकात्मक फोटो)
विशेषाधिकार समिति में अदालत की तरह सुनवाई होती है. (प्रतीकात्मक फोटो)

इस तरह की कितनी कमेटियां हैं भारत में?

भारत की संसदीय व्यवस्था में 2 तरह की कमेटियां काम करती हैं.
1 – स्थायी समितियां या स्टैंडिंग कमेटी
2- अस्थायी समितियां या एड हॉक कमेटी

जैसा कि नामों से ही लग रहा है कि स्टैंडिंग कमेटी वह होती है, जो परमानेंट बनी रहती है. सरकार कोई भी आए-जाए, ये कमेटियां अपना काम करती रहती हैं. यह बात और है कि इनके मेंबर बदलते रहते हैं. भारत की संसद में इस तरह की 24 स्टैंडिंग कमेटियां हैं. कुल 24 समितियों में से 16 लोकसभा के अंतर्गत और 8 समितियां राज्यसभा के अंतर्गत काम करती हैं. हर कमेटी अलग-अलग विभागों के काम से डील करती है. इनमें शामिल हैं- कॉमर्स, होम अफेयर्स, ह्यूमन रिसोर्स या अब शिक्षा, डिफेंस और हेल्थ आदि. हर कमेटी में 31 मेंबर होते हैं. इनमें से 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से आते हैं. इन सदस्यों को लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा के चेयरमैन चुनते हैं. सदस्यों का कार्यकाल एक साल का होता है. हर साल बदल-बदल कर सदस्य आते रहते हैं. अब संसद चूंकि साल में कुछ दिन ही बैठती है, ऐसे में सरकार द्वारा पेश किए गए बिलों को गहराई से पढ़ने, समझने और एक्सपर्ट्स से रायशुमारी के लिए 1993 तक इन कमेटियों को बनाया गया था.

अब बात एड हॉक कमेटी की. इसमें जांच और सलाहकार समितियां शामिल होती हैं. यह मौके के हिसाब से बनाई जाती हैं. जैसे किसी सांसद के अधिकारों का हनन हो गया तो उसकी जांच के लिए एक संसदीय कमेटी बना दी गई. ये अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करती हैं और मामले पर फैसला लिया जाता है. इसी तरह अगर किसी खास मामले में संसद कोई सलाह चाहती है तो उसके लिए एक सलाहकार कमेटी बना दी जाती है. इस वक्त कौन-कौन सी समितियां संसद में क्या काम कर रही हैं, इसकी पूरी जानकारी यहां पर देखी जा सकती है.

कहां से आया संसदीय समितियों का आइडिया?

हमारे पुरखे जब भारत का संविधान बना रहे थे तो उन्होंने एक बहुत स्मार्ट काम किया. दुनिया भर के संविधान पढ़े और सबसे बढ़िया-बढ़िया चीजें अपने संविधान में रख लीं. इसलिए भारत का पूरा संविधान दुनिया भर की बेहतरीन प्रैक्टिस समेटे हुए है. संसदीय समितियां भी ऐसे ही सिस्टम का हिस्सा बनीं. हमने ज्यादातर सिस्टम ब्रिटिश संसद से ही लिए. इसका कारण यह था कि हम जब आजाद नहीं थे तो उसी सिस्टम में काम कर रहे थे. उसी को आगे बढ़ाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. संसदीय समितियों के गठन का विचार भी ब्रिटेन से आया है। दुनिया की पहली संसदीय समिति का गठन सन 1571 में ब्रिटेन में किया गया था। भारत की बात करें तो यहां पहली संसदीय समिति लोक लेखा समिति थी. इसे अप्रैल 1950 में बनाया गया था.

तो क्या किसी को भी हाजिर होने के लिए बुला लेती है कमेटी?

संसदीय समितियों को अपना काम करने के लिए कई तरह के अधिकार मिले हुए हैं. हर संसदीय समिति को मामले से जुड़े डॉक्युमेंट्स, रेकॉर्ड्स या शख्स को समन भेजकर बुलाने का अधिकार होता है. ये अधिकार समितियों को Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha के नियम 269 और 270 के अधीन मिले हुए हैं. कमेटियां किसी विटनेस या गवाह की गवाही ले सकती हैं और सबूत भी देख सकती हैं. कमेटी को हालांकि किसी एमपी या मंत्री को बुलाने का अधिकार नहीं है लेकिन स्वेच्छा से कोई पेश होना चाहे तो हो सकता है. तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह 2जी घोटाले पर बनाई जॉइंट पार्लियामेंटरी कमेटी के बुलाने पर भी पेश नहीं हुए थे.
खैर, कमेटी को दी गई गवाही या सबूत तब तक सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, जब तक कमेटी अपनी रिपोर्ट हाउस या संसद के सामने पेश न कर दे. कमेटी के हुक्म की नाफरमानी संसद के विशेषाधिकार के हनन का मामला बन जाएगा. इस पर अलग से कार्यवाही करके संसद सजा सुना सकती है. कुल मिलाकर संसदीय कमेटियों को इस मामले में प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियां मिली हुई होती हैं.

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संसदीय समितियों को संसद की तरफ से कई अधिकार दिए गए हैं,

अमेरिका की तरह यहां भी सीईओ को संसद में बुलाकर टाइट कर सकते हैं क्या?

अमेरिका का मामला थोड़ा अलग है. अमेरिका में कमेटियों को बहुत ज्यादा पावर मिली हुई हैं. वह किसी को हाउस में बुलाकर सवाल पूछ सकती हैं और इसके लाइव प्रसारण की व्यवस्था भी कर सकती हैं. इसे लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत उदाहरण माना जा सकता है क्योंकि जो सुनवाई कमेटी कर रही है, वह सब कुछ जनता को सामने आ रहा है. भारत में ऐसा नहीं होता है. यहां सभी सुनवाईयां बंद कमरों में करने का प्रावधान है. यहां तक कि कमेटी में हुई सुनवाई की जानकारी भी बाहर नहीं दी जा सकती. यही वजह है कि शशि थरूर के मीडिया में दिए बयान पर इसी समिति के सदस्य निशिकांत दूबे ने आपत्ति जताई है और लोकसभा स्पीकर से शिकायत करने की बात कही है. थरूर को कमेटी से हटाने की बातें भी कही जा रही हैं.

वीडियो –  फेसबुक और रिलायंस जियो की डील से किसको क्या फायदा होगा?

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