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पाकिस्तान में शियाओं को लेकर इतनी नफरत का कारण क्या है?

धर्म का सीमेंट देश की नींव के लिए कितना खतरनाक होता है, इसे सोचे बिना पाकिस्तान के लिए आंदोलन चला. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे ज़हीन लोग, जो दीन और दुनिया दोनों की समझ रखते थे, पाकिस्तान के विचार के खिलाफ थे. क्योंकि वो जानते थे कि पाकिस्तान नाम के प्रयोग का नतीजा मुसलमानों के लिए ही कितना घातक होगा. बावजूद इसके, मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान लेकर रही. पाकिस्तान बना था, मुसलमानों के नाम पर, मुसलमानों के लिए.

लेकिन इन 75 सालों में भी पाकिस्तान सारे मुसलमानों के लिए अपने दिल में जगह नहीं बना पाया. और अब तो पाकिस्तान के इस स्याह सच को उघाड़ने के लिए 1971 के बांग्लादेश युद्ध जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की ज़रूरत भी नहीं रह गई. दुबई में एक खिलाड़ी से कैच क्या छूट गया, ये बात पूरी दुनिया के सामने आ गई कि पाकिस्तान में इस्लाम के भीतर ही अल्पसंख्यकों की हालत क्या है. ऐसे ही नहीं ट्विटर पर हसन अली और शिया शब्द ट्रेंड कर रहे थे.

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि हसन अली का कैच छूटना वाकई पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सेट बैक था. लेकिन क्या हसन अली ने अकेले पाकिस्तान को मैच हरा दिया? इस सवाल पर कुछ वक्त बिताना बनता है.

पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया दुबई के इंटरनैशनल स्टेडियम पर ICC टी 20 वर्ल्ड कप का सेमिफाइनल खेलने आए थे. ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीता और पाकिस्तान को पहले बैटिंग करने बुलाया. पाकिस्तान ने 176 रन बनाए. ये ठीक-ठाक टार्गेट था. फिर ऑस्ट्रेलिया की शुरुआत बहुत खराब रही. 12 ओवर खत्म होने के बाद ऑस्ट्रेलिया की टीम ने महज़ 96 रन बनाए थे, वो भी 5 विकेट गंवा कर. ऑस्ट्रेलिया को अब 48 गेंदों में 81 रन चाहिए थे. जो कि बिल्कुल भी आसान नहीं लग रहा था. मैच पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में जा रहा था.

लेकिन मार्कस स्टोइनिस और मैथ्यू वेड क्रीज़ पर बने रहे. बावजूद इसके आखिरी 24 गेंदों में भी ऑस्ट्रेलिया को 50 रन और चाहिए थे. यहां तक दबाव ऑस्ट्रेलिया पर था. लेकिन इसके बाद जब हारिस रऊफ 17वां और हसन अली 18वां ओवर लेकर आए, तो दबाव पाकिस्तान पर आना शुरू हो गया. 17वें ओवर में हारिस को 13 रन पड़े. इसके बाद 18वें ओवर में हसन अली ने 15 रन दे दिए.

मैच यहीं से ऑस्ट्रेलिया के पाले में जाने लगा था. फिर 19 वें ओवर में बाउंड्री लाइन पर हसन अली ने मैथ्यू वेड का आसान सा कैच ड्रॉप कर दिया. जिस वक्त वेड का कैच ड्रॉप किया गया तो वो 13 गेंदों में 21 रन बनाकर खेल रहे थे. इसके बाद उन्होंने तीन छक्के लगाकर मैच खत्म कर दिया.

खालिस हार-जीत की नज़र से देखें, तो हसन अली से चूक तो वाकई हुई थी. पाकिस्तान को अगर विकेट मिलता, तो पाकिस्तान मैच में वापसी कर सकता था, नया बैटर कुछ वक्त लेता और बोलर का मनोबल ऊपर रहता. इसलिए हसन अली का ड्रॉप निर्विवाद रूप से इस मैच का सबसे बड़ा हाइलाइट था. लेकिन बारीक नज़र से मैच देखने वाले एक और ही कहानी सुनाते हैं.

दी लल्लनटॉप की स्पोर्ट्स डेस्क ने इस मैच को बॉल बाय बॉल फॉलो किया था. हमारे लिए वर्ल्ड कप कवर कर रहे विपिन ध्यान दिलाते हैं कि हसन अली के ड्रॉप के बाद एक दूसरे पाकिस्तानी खिलाड़ी शाहीन शाह अफरीदी ने अगली तीन गेंदों पर क्या किया ये भी याद रखना होगा. वो ओवर की चौथी गेंद यॉर्क करने से मिस कर गए, पांचवी गेंद वेड को स्लॉट में दे दी और आखिरी फिर यॉर्क मिस की और उसका अंजाम भी पिछली दो गेंदों जैसा हुआ. छक्के पर छक्के पड़ता रहा.

दूसरी तरफ अगर हसन अली मैथ्यू वेड का कैच पकड़ भी लेते. तो भी क्या ऑस्ट्रेलिया मैच पूरी तरह से गंवा चुका था? ऐसा कहने से पहले ये जान लीजिए कि अगर वेड आउट होते तो बहुत अधिक संभावना थी कि अगली गेंद का सामना करते मार्कस स्टोइनिस. जिनका T20 क्रिकेट में स्ट्राइक रेट 134.51 का है. छक्के लगाने में वो भी माहिर हैं. वहीं अगले बल्लेबाज़ थे पेट कमिंस. जिनका स्ट्राइक रेट 133.33 का रहा है. और ऑस्ट्रेलिया उन्हें एक ऑल-राउंडर की तरह ही देखता है.

मैच का ये बारीक विश्लेषण बताता है कि हसन अली पर हार का ठीकरा फोड़ने में समस्या क्या है. ये कहने के लिए पर्याप्त जगह है कि हसन अली को बेहतर खेल दिखाना चाहिए था. लेकिन यही बात अफरीदी के बारे में भी कही जा सकती थी. और फिर क्रिकेट तो है ही अनिश्चितताओं का खेल. कोई मैच 20 ओवर एक तरफ झुका रहता है, बस आखिरी गेंद पर पलट जाता है.

लेकिन जैसा हमने पहले बताया, शियाओं के लिए नफरत से भरे पड़े पाकिस्तान के कट्टरपंथी लोगों ने बस इस एक बात को पकड़ लिया कि हसन अली शिया हैं.
कई लोगों ने हसन के नाम से ही अंदाज़ा लगा लिया कि वो शिया हैं. क्योंकि अली नाम शिया पंथ में खूब रखा जाता है. साथ में लिखा – एक शिया पाकिस्तान को ले डूबा.

एक यूज़र ने लिखा – हसन अली अब शिया कार्ड खेलेगा.
एक यूज़र ने लिखा – hasan ali is a shia for sure. मानो शिया होना, पाकिस्तान के खिलाफ काम करने की गैरंटी हो
कुछ यूज़र्स ने यहां तक लिख दिया कि हसन अली ने पाकिस्तान में शियाओं पर होने वाले अत्याचारों का बदला ले लिया है.

कुछ बद्दिमाग लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने हसन अली की गलती को एक भारतीय महिला से उनकी शादी से जोड़ दिया. हसन अली की पत्नी समिया आरज़ू भारत से हैं.

हसन को लेकर जो कुछ कहा गया, उनपर जो इल्ज़ाम लगाए गए, उनमें से ज़्यादातर तो हम आपको यहां बता भी नहीं सकते. हसन अली के शिया होने को लेकर जब बात कुछ ज़्यादा ही आगे जाने लगी, तो भारत और पाकिस्तान से कई लोगों ने उनके समर्थन में भी ट्वीट किए. और इस बात पर ज़ोर दिया कि हसन अली के खेल का उनके शिया होने से कोई ताल्लुक नहीं है.

वैसे पाकिस्तान में शियाओं के साथ दुर्व्यवहार का ये पहला मामला नहीं है. हसन अली तो हसन अली, पाकिस्तान में तो उसने बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्नाह को भी शिया होने की सज़ा मिली. जिन्ना के दादा काठयावाड़ी हिंदू थे. नाम था- पूंजा गोकुलदास मेघजी ठक्कर. उन्होंने इस्लाम अपनाया तो इस्माइली शाखा का हिस्सा बने. दुनिया में कई जगह मुसलमान इस्माइलियों को मुसलमान नहीं मानते. बाद में मोहम्मद अली जिन्ना ने शिया इस्लाम कबूल किया. मगर सुन्नी मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा तो शियाओं से भी नफरत करता है.

जिन्ना का शिया होना पाकिस्तानी हुकूमत और यहां तक कि मुस्लिम लीग के लिए भी शर्मिंदगी की बात थी. जब तक पाकिस्तान बनने का संघर्ष चला, तब तक इस बात ने ज्यादा सिर नहीं उठाया. लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना का शिया होना कइयों को पाकिस्तान की शान में बट्टा लगाने लगा.

जब जिन्ना का देहांत हुआ, तो अंतिम संस्कार दो अलग तरीकों से हुआ. एक, जो उनकी बहन फातिमा जिन्ना ने करवाया. दूसरा, जो पाकिस्तानी हुकूमत ने किया. पहले फातिमा और चंद करीबियों ने मिलकर चुपके-चुपके शिया रवायतों के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार किया. जिन्ना की लाश को गुसल करवाया गया. फिर गवर्नर जनरल के उसी बंगले में, जहां जिन्ना ने आखिरी सांस ली थी,

नमाज-ए-जनाज़ा पढ़ी गयी. उस वक्त उस कमरे के भीतर बस तीन-चार शिया ही मौजूद थे. लियाकत अली खान चूंकि सुन्नी थे, सो कमरे के बाहर खड़े थे. शिया तौर-तरीकों से अंतिम संस्कार की ये रस्में अदा करने के बाद फातिमा ने जिन्ना की लाश पाकिस्तान सरकार के सुपुर्द कर दी. पाकिस्तानी हुकूमत इतिहास से, लोगों के दिमाग से ये याद खुरचकर फेंक देना चाहती थी कि जिन्ना शिया थे.

इसीलिए आधिकारिक कार्यक्रम में राजकीय सम्मान के साथ जिन्ना की अंतिम विदाई हुई. मगर सुन्नी रवायतों के मुताबिक. मरने वाला क्या था, किसमें यकीन रखता था, इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया.

पाकिस्तान में इस्लाम के भीतर अल्पसंख्यकों से कैसा बर्ताव किया जाता है, उसकी एक और बानगी सुनिए –

किसी इस्लामिक मुल्क से ताल्लुख रखने वाले पहले शख्स को विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला 1979 में. नाम – मोहम्मद अब्दुस सलाम. पाकिस्तान के नागरिक. 1960 और 70 के दशक में पाकिस्तान में अब्दुस सलाम का बड़ा रुतबा था. वे राष्ट्रपति के ‘चीफ साइंटिस्ट एडवाइजर’ थे. और देश की इंटरनल एजेंसी और पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन बनाने में सरकार की मदद कर रहे थे.

फिजिक्स के फील्ड में बेहतरीन काम और पाकिस्तान के एटॉमिक प्रोग्राम में योगदान की वजह से उन्हें साठ के दशक में पाकिस्तान का नेशनल हीरो माना जाता था. अब्दुस सलाम और उनके जैसे दूसरे 30 लाख अहमदिया लोगों की जिंदगी 1974 में तब बदल गई जब पाकिस्तान की असेंबली ने संविधान में संशोधन कर अहमदिया समुदाय को मुसलमान मानने से इनकार कर दिया.

1974 में अब्दुस सलाम ने संविधान संशोधन के विरोध में अपने सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया और अपने काम को जारी रखने के लिए देश छोड़कर यूरोप चले गए. वहां इटली में वो न्यूक्लियर फिजिक्स पर काम करते रहे और 1979 में उन्हें नोबेल प्राइज से नवाजा गया.

1996 में अब्दुस सलाम का निधन हुआ. लेकिन अपमान खत्म नहीं हुआ. उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान में दफनाया गया था. उनकी कब्र के पत्थर पर लिखा गया – नोबेल पुरस्कार जीतने वाला पहला मुसलमान. मजहबी कट्टरपंथियों के लगातार विरोध के बाद एक लोकल मजिस्ट्रेट ने उससे मुसलमान शब्द हटाने का आदेश दिया. कहा गया कि जो शख्स मुसलमान है ही नहीं, उसके कब्र पर मुसलमान शब्द लिखना एक गुनाह है. इसके बाद मुसलमान शब्द को कब्र पर से खुरच दिया गया.

आप पाकिस्तान, अहमदिया और ब्लास्ट – ये तीन शब्द गूगल करके देखिए. नज़र आएगा कि अहमदिया लोगों पर कितने हमले हुए हैं. कितनी जानें गई हैं. अहमदिया खुद को मुसलमान कहते हैं. लेकिन पाकिस्तान के मुसलमान उन्हें मुसलमान नहीं मानते. शियाओं के साथ ये तो नहीं होता, लेकिन उन्हें दोयम दर्जे का माना जाता है, ये किसी से छिपा नहीं है.

अपनी मान्याताओं के समर्थन में शिया एक फेसबुक पोस्ट कर दें, उतने में उनकी जान पर बन आती है. ऐसे में हसन अली के साथ जो हुआ, उसपर हम अफसोस कर सकते हैं, आश्चर्य नहीं.


T20 विश्वकप: लोग पाकिस्तान की हार का ये कारण बता रहे हैं

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