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अफगानिस्तान में तालिबान को लेकर मोदी सरकार का क्या स्टैंड है?

तालिबानी सज़ा… तालिबानी फरमान…. तालिबानी आदेश. तालिबान के कामों ने उसे संज्ञा से विशेषण बना दिया – ऐसा लेबल, जिसके साथ कोई जुड़ना नहीं चाहता. तालिबान शब्द के साथ एक छवि नत्थी हो गई है. ऐसा कुछ जो अमानवीय हो, निरंकुश हो. आधुनिकता और न्याय का दुश्मन. किसी को सज़ा के तौर पर पत्थर मारना. कोई मलाला स्कूल की ओर बढ़े तो उसे गोली मार देना. या किसी दूसरे पंथ के लोगों को बम से उड़ा देना. तालिबान के नाम पर हम ऐसा ही सुनते देखते आए हैं. लेकिन आज हम तालिबान की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भारत सरकार के तालिबान से बात करने की खबरें आई हैं. प्रेस रिपोर्ट्स का दावा है कि भारत के अधिकारी चुपचाप अफगानिस्तान के तालिबान से बातचीत कर रहे हैं.

तालिबान से भारत बातचीत क्यों कर रहा है? अफगानिस्तान में अब क्या पक रहा है, तालिबान के सत्ता में आने की आशंका से भारत की क्या चिंताएं हैं, डिप्लोमैसी की ये सब बातें आज आसान भाषा में एक्सपर्ट्स से समझेंगे.

सबसे पहले प्लेन हाइजैक की कहानी

भारत सरकार और तालिबान एक वाक्य में आते हैं तो प्लेन हाइजैक की एक पुरानी कहानी याद आती है. 24 दिसंबर, 1999 की बात है. नेपाल के काठमांडू से इंडियन एयरलाइंस के विमान IC 814 ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी. लेकिन कुछ देर बाद ही जानकारी मिली कि आतंकियों ने प्लेन हाईजैक कर लिया. जिसके बाद प्लेन पहले अमृतसर में लैंड हुआ. वहां रिफ्यूलिंग हुई. फिर लाहौर ले जाया गया, उसके बाद दुबई और आखिर में कंधार लाया गया. प्लेन हाईजैक करने वाले कश्मीरी आतंकी थे. उन्होंने कंधार में प्लेन और यात्रियों को कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा. आपको वो पुरानी तस्वीरें याद होंगी जिनमें प्लेन के पास गाड़ियों पर रॉकेट लॉन्चर नज़र आते हैं. ये गाड़ियां तालिबान की थीं.

इस प्लेन हाइजैक पर भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने कहा था कि विमान तालिबान के कंट्रोल में आ गया है जिनके साथ ना तो हमारा कोई आधिकारिक संवाद है और ना ही हमने उन्हें मान्यता दी है. प्लेन कंधार में था. कंधार अफगानिस्तान में है. और अफगानिस्तान में उस वक्त ऐसी सरकार थी जिसे भारत की सरकार मानती ही नहीं थी. ना सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के ज्यादातर देश उस सरकार को नहीं मानते थे. दर्शक जानते ही हैं कि तालिबान ने 1996 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद नाजिबुल्ला की हत्या कर चौराहे पर शव लटका दिया था और उसके बाद अफगानिस्तान में इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी कानून के हिसाब से हुकूमत शुरू कर दी थी.

1999 में प्लेन हाईजैक के वक्त भारत की सरकार को ये कमी ज़रूर महसूस हुई होगी कि अगर अफगानिस्तान में कोई मित्र सरकार होती तो प्लेन हाईजैक से डील करने में इतनी मुश्किल नहीं होती. कंधार में प्लेन हाइजैक करने वाले आतंकियों को तालिबान से संरक्षण मिल रहा था. तालिबान मीडिएटर कम, आतंकियों का हिमायती ज्यादा था.

तालिबान की हुकूमत का मतलब पाकिस्तान की प्रॉक्सी सरकार?

और बात सिर्फ एक प्लेन हाईजैक की ही नहीं है. अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत का मतलब था पाकिस्तान की प्रॉक्सी सरकार. भारत पूरी तरह से अफगानिस्तान से उखड़ गया था. अस्सी और 90 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के दखल के खिलाफ पाकिस्तान की आईएसआई ने अमेरिकी फंड और हथियारों की मदद से मुजाहिद तैयार किए थे. जब सोवियत संघ अफ़गानिस्तान से पीछे हट गया तो पाकिस्तान ने मुजाहिदों को कश्मीर की तरफ झोंकना शुरू कर दिया. सोवियत संघ से लड़ने के लिए मुजाहिदों को दी ट्रेनिंग का इस्तेमाल पाकिस्तान कश्मीर में करने लगा था. भारत के लिए कश्मीर में बढ़ते उग्रवाद से लड़ना मुश्किल हो रहा हो था. और उधर अफगानिस्तान में मुजाहिद ही तालिबान के रूप में हथियारों के दम पर सत्ता में काबिज हो रहे थे.

1996 में राजधानी काबुल पर कब्ज़ा करने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान आधिकारिक तौर पर 5 साल तक हुकूमत में रहा. लेकिन भारत ने तालिबान को कभी मान्यता नहीं दी. सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब, यूएई जैसे देशों ने ही तालिबान सरकार को माना. भारत ने हमेशा ये माना कि तालिबान की चाबी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के पास है. इसलिए किसी तरह का फॉर्मल इंगेजमेंट उस वक्त नहीं हुआ. तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने सितंबर 1996 में अफगानिस्तान में अपना दूतावास बंद कर दिया था. 9/11 के हमले के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को सत्ता से हटाया तो भारत ने फिर अफगानिस्तान का रुख किया. अमेरिकी दखल के 6 हफ्ते बाद भारत ने नवंबर 2001 में अपने राजनयिकों को फिर से अफगानिस्तान भेजा.

यानी अफगानिस्तान में भारत के लिए जो कांटे पाकिस्तान ने बोए थे वो 2001 में अमेरिका ने हटा दिए. 2001 से लेकर 2021 तक तालिबान भले ही अपनी इलाकों में मजबूत रहा हो, लेकिन सत्ता से दूर रहा. और इस दौरान अफगानिस्तान में चाहे हामिद करज़ई राष्ट्रपति रहे हों, या अशरफ ग़नी, हर सरकार के भारत के साथ ताल्लुकात अच्छे रहे. अफगानिस्तान में डेवलेपमेंट के लिए भारत ने अरबों रुपये खर्च किए. अफगानिस्तान में नया संसद भवन बनवाया. स्कूल, हॉस्पिटल, सड़क, बांध हर तरह की मदद भारत की तरफ से अफगानिस्तान को दी गई है. अफगानिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत सुविधाओं का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में भारत का सबसे बड़ा रोल रहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, अफ़गानिस्तान में मौजूद भारतीय वहां बैंकिंग, अस्पताल, सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों में काम करते हैं. 2002 के बाद से अब भारत ने अफगानिस्तान को 3 अरब डॉलर की मदद दी है, इतना भारत ने दुनिया के किसी और मुल्क के लिए नहीं किया. रुपए में ये रकम होती है 22 हज़ार 248 करोड़ से भी ज़्यादा.

Hamid Karzai
अफ़गानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई. (तस्वीर: एएफपी)

और अब इस पूरे निवेश पर संकट दिख रहा है?

इसका जवाब है, हां. क्योंकि तालिबान के सत्ता में लौटने की आहट महसूस हो रही है. तालिबान ने अमेरिका के साथ करीब 2 दशक लंबा युद्ध लड़ा. ये अमेरिका के आधुनिक इतिहास का सबसे लंबा युद्ध है. इस युद्ध से अमेरिका तालिबान को काबुल से दूर रख पाने में तो कामयाब रहा लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं कर पाया. पिछले एक दशक में तालिबान के कब्जे वाले इलाकों का दायरा बढ़ा है. अभी अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा हिस्से पर तालिबान का कब्जा है. अमेरिका की अफगानिस्तान पॉलिसी पर सवाल उठने लगे थे. और उसे एक सम्मानजनक एग्जिट चाहिए था. इसलिए 29 फरवरी 2020 को अमेरिका ने तालिबान के साथ एक करार साइन किया. करार इस बात का था कि तालिबान अफगानिस्तान को आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा. उसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना निकालना शुरू कर दिया. अमेरिका की लगभग आधी सेना अभी घर लौट चुकी है. इस साल के आखिर तक पूरी अमेरिकी की अफगानिस्तान से निकासी हो जाएगी.

तालिबान को रोकना नामुमकिन है?

अब ये बात पूरी दुनिया को समझ आ रही है कि अमेरिका के निकलने के बाद तालिबान को सत्ता हथियाने से रोकना नामुमकिन है. अफगानिस्तान की सरकार ज़्यादा देर तक ऐसा कर नहीं पाएगी. इसलिए अफगानिस्तान की सरकार और तालिबान में बातचीत के दौर शुरू हुए. इसे इंट्रा अफगान टॉक्स कहते हैं. इस तरह की बातचीत क़तर की राजधानी दोहा में चल रही है. अफगानिस्तान में तालिबान की हिस्सेदारी वाला पीस प्रोसेस शुरू करने के लिए पिछले तीन साल से बैठकें चल रही हैं. अमेरिका के अलावा रूस, चीन, ईरान, पाकिस्तान इन बैठकों में शामिल हो रहे हैं. नवंबर 2018 में रूस में हुई ऐसी पहली बैठक में भारत ने आधिकारिक तौर पर हिस्सा नहीं लिया था. दो रिटायर्ड डिप्लोमैट्स भारत की तरह से मीटिंग में शामिल हुए थे. उसके बाद क़तर में इंट्रा अफगान टॉक्स के उद्घाटन में वर्चुअली भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल हुए.

इस मामले में भारत की आधिकारिक पोजिशन क्या है?

भारत का स्टैंड मंगलवार को यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की वर्चुअल मीटिंग में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फिर दोहराया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत को तेज़ करने के हर प्रयास का भारत समर्थन करता है. इस प्रक्रिया के कामयाब होने के लिए ज़रूरी ये है कि जो भी पक्ष इसमें शामिल हैं वो अच्छी नियत के साथ बातचीत आगे बढ़ाएं और एक राजनैतिक हल की प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ें. एस जयशंकर ने कहा- इंट्रा-अफगान डायलॉग से अफगानिस्तान में हिंसा कम नहीं हुई है. अफगानिस्तान में कोई भी राजनीतिक समाधान ऐसा होना चाहिए जो संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को बनाए रखे.”

यानी भारत अफगानिस्तान में शांति के लिए सभी पक्षों के बीच बातचीत से समाधान की बात तो करता है लेकिन तालिबान से कोई सीधी बात आधिकारिक तौर पर नहीं की, जैसा अमेरिका ने किया. विद्वानों ने अखबारों में कई लेख लिखकर कहा कि भारत को तालिबान से अब रिश्ते सुधारने चाहिए. और इस पूरे विमर्श के बीच खबर आई कि भारत तालिबान से बैकडोर वाली बातचीत कर रहा है. कतर के विशेष प्रतिनिधि मुतलक़ बिन माजेद अल क़हतानी ने भारत और तालिबान की बातचीत होने की ज़िक्र किया. अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी की एक वर्चुअल चर्चा के दौरान कतर के अल क़हतानी ने भारत के संदर्भ में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं कि भारत के अधिकारियों ने तालिबान से मिलने के लिए चुपचाप दौरा किया है. हालांकि भारत ने तालिबान से मिलने की बात नहीं कबूली है. हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर कुवैत और केन्या के दौरे के बीच रास्ते दोहा में रुके थे. 9 जून को एस जयशंकर दोहा में क़तर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मिले. इनका मतलब ये ही निकाला गया कि अफगानिस्तान को लेकर भारत अपनी ज़मीन मजबूत करने में लगा है.

तो तालिबान को लेकर भारत की चिंताएं क्या हैं?

दो तरह की बड़ी चिंता हैं.

पहली तो ये कि इसकी क्या गारंटी है कि तालिबान के सत्ता में आने पर अफगानिस्तान की ज़मीन भारत के खिलाफ आतंकवाद में इस्तेमाल नहीं होगी? जैसे तालिबान की पहली सरकार में हुई.

दूसरा- अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत लौटने का मतलब है कि ISI का दखल बढ़ेगा. ISI हक्कानी नेटवर्क जैसी तंज़ीमों से पहले भी भारत के एसेट्स को निशाना बनाती रही है, आगे इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है. यानी अफगानिस्तान में जिस तरह से भारत अभी तक काम कर रहा था वैसे नहीं कर पाएगा.

पूरी दुनिया की उम्मीद इस बात पर टिकी है कि तालिबान अब पहले जैसे तालिबान नहीं रहेगा. ज्यादा लोकतांत्रिक और कम हिंसक होगा. दुनिया की बाकी शासन व्यवस्थाओं से तालिबान भी सीखेगा. अब देखना है कि तालिबान 2.0 अफगानिस्तान के लोगों और दुनिया के लिए कैसा साबित होता है.


विडियो- अमेरिकी फोर्सेज़ के जाने के बाद तालिबान और पाकिस्तान से अफगानिस्तान में कैसे निपटेगा इंडिया?

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