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नोबेल प्राइज़ के सबसे बड़े विवादों का इतिहास क्या है?

आज 10 दिसंबर है. आज के दिन दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार बांटा जाता है. नोबेल. स्टॉकहॉम और ओस्लो में कार्यक्रम होते हैं. इनमें साल के नोबेल विजेताओं को सम्मानित किया जाता है. ओस्लो में सिर्फ़ शांति का नोबेल दिया जाता है. बाकी केटेगरी के अवॉर्ड स्टॉकहॉम में दिए जाते है. इस अवॉर्ड की शुरुआत करने वाले अल्फ़्रेड नोबेल की यही इच्छा थी.

नोबेल पुरस्कारों की अपनी पहचान है. इसे प्रतिष्ठा, ईमान, मानवीयता का मापदंड माना जाता है. कसौटी पर एकदम कसा हुआ. लेकिन कई बार ये मापदंड ध्वस्त हुए हैं. जब-जब ऐसा हुआ, तब-तब नोबेल प्राइज़ की साख़ पर बट्टा लगा है.

आज जानेंगे, नोबेल प्राइज़ के सबसे बड़े विवादों का इतिहास क्या है? और, नोबेल अवॉर्ड में घपले वाली बात में कितनी सच्चाई है? साथ में बताएंगे, आज के दिन इंटरनैशनल मीडिया में क्या ख़ास छपा है?

जोसेफ स्टालिन, बेनिटो मुसोलिनी और एडोल्फ़ हिटलर में क्या समानताएं हैं?

बहुत सारी. मसलन, तीनों सनकी तानाशाह थे. तीनों ने लाखों लोगों को मरवाया. तीनों ही वर्ल्ड वॉर 2 का हिस्सा थे. और, सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि तीनों को नोबेल पीस प्राइज़ के लिए नॉमिनेट किया गया था.

अल्फ़्रेड नोबेल स्वीडन में पैदा हुए थे. अक्टूबर 1833 में.

अपने जीवन-काल में उन्होंने कई आविष्कार किए. लेकिन जिस के लिए उन्हें सबसे अधिक चर्चित हुए, वो था डायनामाइट. अल्फ़्रेड डायनामाइट को शांति का माध्यम बताते थे. उन्होंने ‘बैलेंस ऑफ़ टेरर’ यानी आतंक के संतुलन की थ्योरी दी थी. उनका मानना था कि जिस दिन देशों को ये अहसास हो जाएगा कि एक झटके में पूरी आर्मी खत्म हो सकती है, उस दिन वे तुरंत शांति के लिए तैयार हो जाएंगे.

अल्फ़्रेड ने ऑस्ट्रियन लेखिका बार्था वोन सटनर को लिखी चिट्ठियों में इसका ज़िक्र किया था. एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा,

हो सकता है कि मेरी फ़ैक्ट्रियां आपके शांति-सम्मेलनों से बहुत पहले युद्ध पर लगाम लगा दे.

ये दावा बाद में ग़लत साबित हुआ. पहले विश्व युद्ध में उनके आविष्कारों का जो घृणित इस्तेमाल हुआ, उसे देखने के लिए वो ज़िंदा नहीं रहे. 10 दिसंबर, 1896 को उनकी मौत हो गई. लेकिन मरने से पहले उन्होंने अपनी वसीयत लिख दी थी. इसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शांति को शह देने के लिए डोनेशन की बात लिखी थी. वसीयत लिखने के बाद उन्होंने इसकी जानकारी बार्था को दी. बार्था का जवाब आया,

‘मैं रहूं या ना रहूं, ये मैटर नहीं करता. लेकिन हमने जो कुछ दिया है, वो हमेशा कायम रहने वाला है.’

1901 में नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हो गई. शुरुआत में पांच क्षेत्रों में अवॉर्ड दिए जाते थे. 1968 से अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी नोबेल प्राइज़ दिए जाने लगे.

अल्फ़्रेड नोबेल के लिए शांति वाला पुरस्कार सबसे अहम था. उनकी वसीयत में लिखा था कि पीस प्राइज़ का विजेता पांच लोगों की एक कमिटी द्वारा चुना जाए. और, उस कमिटी का चुनाव नॉर्वे की संसद करे. इसी वजह से शांति का नोबेल नॉर्वे में दिया जाता है. जबकि बाकी स्वीडन में.

हम लौटते हैं दुनियादारी की ओर. जिसमें नोबेल से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विवादों की चर्चा कर रहे हैं.

अल्फ़्रेंड की दोस्त बार्था को 1905 में नोबेल पीस प्राइज़ मिला. 1914 में उनकी मौत हो गई. अल्फ़्रेड दो दशक पहले ही गुज़र चुके थे. दोनों नहीं रहे. लेकिन उनका नाम और काम बना रहा. नोबेल पुरस्कार बने रहे. उनकी प्रतिष्ठा बनी रही. ठीक-ठीक कहा जाए तो ख़्याति में विस्तार ही हुआ है.

ख़्याति अपने साथ लांछन भी लेकर आती है. नोबेल पुरस्कारों की उम्र 120 साल की हो चुकी है. इस अवधि में दुनिया ने अनगनित उतार-चढ़ाव देखे हैं. दो-दो विश्वयुद्ध, पांच दशकों तक चला शीत युद्ध, इंटरनेट की खोज, देशों का विभाजन, नए देशों का निर्माण, महामारियां आदि-आदि. हम लल्लनटॉप पर उन घटनाओं के बारे में बताते रहे हैं. आगे भी बताते रहेंगे.

विज्ञान, अर्थशास्त्र और साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्कारों पर विवाद कम ही होता है. लेकिन पीस प्राइज़ के साथ ऐसा नहीं है.

अल्फ़्रेड नोबेल ने वसीयत में लिखा था,

पीस प्राइज़ किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए, जिसने देशों के बीच भाईचारा बढ़ाने, सैनिकों की संख्या घटाने और शांति को बढ़ावा देने को लेकर बेहतरीन काम कर रहा हो.

लेकिन उनकी इच्छा का कई बार पालन नहीं हुआ. अवॉर्ड देने वाली कमिटी ने फ़ाउंडर की मूल बात पर ही मट्ठा डाल दिया.

1935 में जर्मन पत्रकार कार्ल वोन ओसिएज़्की को नोबेल पीस प्राइज़ मिला. कार्ल ने हिटलर की युद्ध की तैयारियों को उजागर किया था. वो हिटलर के धुर-विरोधी थे. कार्ल को अवॉर्ड मिला तो हिटलर नाराज़ हो गया. उसने जर्मन लोगों को नोबेल प्राइज़ लेने पर रोक लगा दी. उसने नोबेल प्राइज़ को टक्कर देने के लिए नेशनल अवॉर्ड शुरू देना शुरू किया.

1938 और 1939 में तीन जर्मन वैज्ञानिकों ने नोबेल देने का ऐलान हुआ, लेकिन हिटलर के दबाव में उन्हें प्राइज़ लेने से इनकार करना पड़ा. हालांकि, हिटलर की मौत के बाद उन्होंने इसे ग्रहण कर लिया.

1939 में स्वीडन के एक सांसद ने हिटलर का नाम नोबेल पीस प्राइज़ के लिए भेज दिया था. मज़ाक में. इसको लेकर ख़ूब बवाल हुआ. तब जाकर नॉमिनेशन वापस लिया गया.

ये तो हुई हिटलर की बात. 1945 में हिटलर मर गया. उसी साल दूसरा विश्व युद्ध भी ख़त्म हुआ. फिर अक्टूबर महीने में यूनाइटेड नेशंस (UN) की स्थापना हुई. UN को स्थापित करने में कॉर्डेल हल नाम के एक राजनीतिज्ञ का बड़ा योगदान था. हल 1933 से 1944 तक अमेरिका के विदेश मंत्री भी रहे. 1945 में उन्हें नोबेल पीस प्राइज़ मिला.

पीस प्राइज़ मिलने से छह साल पहले की बात है. मई 1939 में एस. एस. सेंट लुईस नामक एक जहाज हवाना पहुंचा. इस जहाज में नौ सौ से अधिक यहूदी सवार थे. वे यूरोप में नाज़ियों के कहर से बचकर आए थे. उनका इरादा अमेरिका में शरण लेने का था.

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट इसके लिए तैयार थे. लेकिन हल ने इसका विरोध किया. उन्होंने कुछ सांसदों को साथ मिला लिया था. उन्होंने अगले चुनाव में सपोर्ट खींचने की धमकी दी. आखिरकार, रूज़वेल्ट ने जहाज को एंट्री देने से मना कर दिया. सेंट लुईस को वापस यूरोप भेज दिया गया. जहाज पर सवार 250 से अधिक लोग हिटलर के होलोकॉस्ट में मारे गए.

इन हत्याओं के सबसे बड़े ज़िम्मेदार हल थे. फिर भी नोबेल कमिटी ने उन्हें शांति का अगुआ घोषित किया था. इसकी आलोचना भी हुई.

यूएन की स्थापना का एक मकसद युद्ध रोकना भी था. दुनिया ने वर्ल्ड वॉर की वीभीषिका देखी थी. नुकसान से बचने के लिए देशों ने एक साझा प्लेटफ़ॉर्म बनाया. हालांकि, शुरुआती दौर में ही समझ आ चुका था कि लालच और घृणा का कोई अंत नहीं है. सेकंड वर्ल्ड वॉर के फौरन बाद कोल्ड वॉर शुरू हो गया. अमेरिका और सोवियत संघ लड़ाई के लिए नए सहयोगी और नए मैदान तलाशने लगे.

इसी दौर में वियतनाम वॉर शुरू हुआ. वियतनाम वॉर 20 सालों तक चला. इसमें लाखों लोगों की मौत हुई.

जनवरी 1973 में युद्धविराम पर सहमति बनी. उस समय अमेरिका के विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर थे. किसिंजर के आदेश पर अमेरिकी सेना ने युद्धविराम के बीच में हनोई पर बमबारी की थी. किसिंजर को कई देशों में सरकार गिराने के लिए भी जाना जाता है. इन सब आरोपों के बावजूद उन्हें 1973 में नोबेल पीस प्राइज़ मिला. नॉर्थ वियतनाम के नेता ली डक थो के साथ. थो ने किसिंजर के साथ अवॉर्ड लेने से मना कर दिया. अवॉर्ड कमिटी के दो सदस्यों ने किसिंजर के विरोध में इस्तीफ़ा भी दिया था.

1994 में फ़िलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (PLO) के मुखिया यासिर अराफ़ात को नोबल पीस प्राइज़ दिया गया. इज़रायल के दो दिग्गज नेताओं यित्हाक राबिन और सिमोन पेरेज के साथ. उन्होंने ओस्लो पीस अकॉर्ड्स को अमलीजामा पहनाया था. इसके तहत इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच शांति स्थापित करने का वादा किया गया था. लेकिन ये समझौता कभी सफ़ल नहीं हो सका.

इसके अलावा, अराफ़ात पर आतंकी हमलों और हाईजैकिंग के संगीन आरोप भी थे. फिर भी उन्हें ये अवॉर्ड मिला.

हालिया समय में नोबेल पीस प्राइज़ पर विवाद के दो बड़े उदाहरण इथियोपिया और म्यांमार में मिलते हैं. 1991 में आंग सान सू ची को ये अवॉर्ड मिला था. सैन्य शासन के ख़िलाफ़ तनकर विरोध करने के लिए. सूची मानवाधिकारों के लिए लड़तीं थी.

लेकिन जब वो सत्ता में आईं और सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार किया, तब वो चुप बैठीं रही. उन्होंने कभी उसका विरोध नहीं किया. हालांकि, सेना का मौन समर्थन भी उन्हें बचा नहीं पाया. फ़रवरी 2021 में सेना ने उन्हें कुर्सी से उतारकर जेल में बिठा दिया. कई मामलों में उन्हें सज़ा भी सुनाई जा चुकी है.

इथियोपिया के प्रधानमंत्री एबी अहमद अली को 2018 में नोबेल पीस प्राइज़ मिला था. एरिट्रिया के साथ चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए.

2020 से एबी अहमद अपने ही एक प्रांत के साथ सिविल वॉर लड़ रहे हैं. इस लड़ाई में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. हज़ारों महिलाओं का बलात्कार हो चुका है. लाखों लोग पलायन कर चुके हैं. आबादी के एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की कगार पर खड़ा है. इन सबके बीच एबी अहमद अली अपनी जनता को युद्ध के लिए उकसाते हैं.

इसी तरह 2009 में बराक ओबामा को नोबेल पीस प्राइज़ दिया गया. ओबामा ने इराक़ वॉर में सेना की तैनाती बढ़ाई थी.

2012 में यूरोपियन यूनियन (EU) को ये अवॉर्ड मिला. EU दुनियाभर के देशों में हथियार बेचती है. उसने युद्ध और हिंसा को बढ़ावा ही दिया है.

इस तरह के विवादित मामलों में नोबेल कमिटी का एक तर्क है. वो ये कि किसी भी व्यक्ति को नोबेल उसकी हालिया उपलब्धि के लिए दिया जाता है. ये जीवनपर्यंत नहीं है. उन्होंने बाद में क्या किया, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता.

यहां पर सवाल ये उठता है कि आगे नहीं तो पीछे के रेकॉर्ड की पड़ताल तो की ही जा सकती है. अगर ये संभव नहीं है तो नोबेल पुरस्कारों से जुड़े लंबे-चौड़े विशेषण हटा लेने चाहिए.

ये तो हुई अवॉर्ड देने की बात.

अगर बाद में विवाद हो तो क्या कमिटी अवॉर्ड छीन सकती है?

कतई नहीं. अवॉर्ड देने वाली कमिटी का कहना है कि ना तो अल्फ़्रेड नोबेल की ऐसी इच्छा थी और ना ही कमिटी ने कभी ऐसा सोचा. आज तक नोबेल दिए जाने के बाद किसी से वापस नहीं लिया गया है.

अब चलते हैं विदेशी मीडिया में छप रही सुर्खियों की तरफ़.

आज की सबसे बड़ी ख़बर मेक्सिको से है. मेक्सिको के चियापस स्टेट में प्रवासी मज़दूरों से भरा एक ट्रक पलट गया. इस दुर्घटना में पचास से अधिक लोग मारे गए. ट्रक में सौ से अधिक मज़दूर सवार थे. ये लोग सेंट्रल अमेरिका से मेक्सिको में घुस रहे थे.

पीड़ितों की पहचान की जा रही है. सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं. शुरुआती जांच से पता चला है कि ड्राइवर ट्रक को तेज़ी से भगाने की कोशिश कर रहा था. तभी उसका नियंत्रण छूट गया और हादसा हो गया.

न्यू यॉर्क टाइम्स की सुर्खी है,

Mexico Migrant Truck Crash Leaves 53 Dead

ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट ‘न्यूज़ डॉट कॉम’ की ख़बर है,

Dozens die in horror Mexico truck crash

अगली ख़बर ताइवान से जुड़ी है. ताइवान को मान्यता देने वाले देशों की संख्या लगातार कम हो रही है. अबकी बार निकारागुआ ने ताइवान से आधिकारिक संबंध तोड़ लिए हैं. उसने ऐसा पहले भी किया था. साल 1985 में. लेकिन पांच बरस बाद वो वापस ताइवान के पास चला गया. अब 13 देश और वेटिकन ही ताइवान को संप्रभु देश मानते हैं. 2017 में ये संख्या 21 थी.

निकारागुआ अब चीन के साथ डिप्लोमैटिक रिश्तों की शुरुआत करेगा. चीन की पॉलिसी साफ़ है. उसका कहना है कि ताइवान उसी का एक प्रांत है. उसे किसी न किसी दिन मेन चाइना के साथ मिलना ही है. इसलिए, ताइवान के मसले पर हमसे बात करो.

निकारागुआ के हृदय-परिवर्तन पर न्यू यॉर्क टाइम्स ने लिखा,

Taiwan loses Nicaragua as Ally as tensions with China Rise

मतलब,

चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच निकारागुआ ने ताइवान का साथ छोड़ा

CNN ने सुर्खी लगाई है,

Nicaragua ends relations with Taiwan in a diplomatic victory for China

यानी,

निकारागुआ का ताइवान के साथ रिश्ते खत्म करने का फ़ैसला चीन की बड़ी कूटनीतिक जीत है

चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने चीनी विदेश मंत्री के बयान को प्रमुखता से जगह दी है. ग्लोबल टाइम्स की सुर्खी है,

‘Right Choice’ to cut ties with Taiwan Island: Chinese FM

इसी मामले में ग्लोबल टाइम्स की एक और ख़बर ध्यान खींचती है. ताइवान को टाटा बाय-बाय करने के तीन घंटे के अंदर निकारागुआ सरकार के प्रतिनिधि चीन में थे. जानकारों का कहना है कि ये सब प्री-प्लान्ड था. चीन लंबे समय से निकारागुआ को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहा था. अब उसे कामयाबी मिल गई है.

चीन से एक और बड़ी ख़बर है. 2022 में बीजिंग में विंटर ओलंपिक्स होने हैं. सबसे पहले अमेरिका ने इन खेलों का डिप्लोमैटिक बहिष्कार करने का ऐलान किया था. यानी, खिलाड़ी तो आएंगे, लेकिन सरकार अपना प्रतिनिधि नहीं भेजेगी. अमेरिका का दावा है कि उसने ये कदम शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के नरसंहार के विरोध में उठाया. अमेरिका के बाद ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा भी इसी लीक पर चले. चीन इससे नाराज़ है. उसने कहा है कि करारा जवाब मिलेगा.

ब्लूमबर्ग ने सुर्खी लगाई है,

Olympic boycotts put China in a Quandary

यानी, ओलंपिक खेलों के बहिष्कार के फ़ैसले ने चीन को व्याकुल कर दिया है.

चीन के बाद चलते हैं ऑस्ट्रेलिया.

ऑस्ट्रेलिया में बीयर शॉर्टेज़ का मसला छाया हुआ है. क्रिसमस का त्यौहार नजदीक आ रहा है. ऐसे में बीयर की कमी ऑस्ट्रेलियाई जनता के लिए सदमे की तरह है. कोरोना के कारण सप्लाई चेन में आई बाधा के चलते समस्या आ रही है. कई कंपनियों ने बीयर के ऑर्डर पर लिमिट तय कर दी है.

ब्लूमबर्ग की सुर्खी है,

Beer Shortage is a nightmare before Christmas for Australians

यानी,

क्रिसमस से पहले बीयर की कमी ऑस्ट्रेलिया की जनता के लिए किसी दुस्वप्न की तरह है.

पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) फिर से सुर्खियों में है. 25 अक्टूबर 2021 को पाकिस्तान सरकार और TTP के बीच संघर्षविराम समझौता हुआ. सरकार ने 102 क़ैदियों को रिहा करने की बात कही. दोनों पक्षों ने इस अवधि में हथियार रखने की बात भी कही. इस समझौते की मध्यस्थता की थी, अफ़ग़ान तालिबान ने. एक नवंबर से समझौता लागू हो गया. एक महीने के लिए. उस समय कहा गया कि सब ठीक रहा तो इसको आगे बढ़ाया जाएगा.

दिसंबर का महीना आ चुका है. डेडलाइन ख़त्म हो चुकी है. TTP ने कहा कि हम संघर्षविराम को खत्म करते हैं. TTP का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया.

‘डॉन’ ने इस ख़बर को होमपेज पर जगह दी है.

डॉन में पाक पीएम इमरान ख़ान का बयान आकर्षित करता है. इमरान ख़ान ने ‘इस्लामाबाद कॉनक्लेव – 2021’ में भारत से बातचीत को लेकर अपनी राय रखी. इमरान ने कहा कि कश्मीर का मुद्दा बातचीत से ही सुलझ सकता है. लेकिन जब तक भारत में बीजेपी की सरकार है, तब तक उनसे बातचीत संभव नहीं है.

अल-जज़ीरा ने विकीलीक्स के फ़ाउंडर जूलियन असांज की ख़बर छापी है. सुर्खी है,

The US wins appeal over the extradition of WikiLeaks founder Assange

अमेरिका ने विकीलीक्स के फ़ाउंडर असांज का प्रत्यर्पण केस जीता

विकीलीक्स पहली बार 2010 में चर्चा में आया था. तब उसने इराक़ वॉर में अमेरिकी सैनिकों द्वारा नागरिकों और पत्रकारों की हत्या का एक वीडियो रिलीज़ किया था. इसके बाद विकीलीक्स ने हज़ारों क्लासीफ़ाइड डॉक्यूमेंट्स पब्लिक डोमेन में डाले हैं. अमेरिका असांज को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताता है. वो उनके ऊपर केस चलाना चाहता है.

इसी डर से असांज ने 2012 में लंदन में इक़्वाडोर के दूतावास में शरण ले ली थी. 2019 में उन्हें दूतावास से गिरफ़्तार कर लिया गया. अमेरिका ने उन्हें अपने यहां लाने की अर्ज़ी डाली. निचली अदालत ने अर्ज़ी खारिज कर दी. आज ब्रिटिश हाई कोर्ट ने उस फ़ैसले को पलट दिया. अदालत ने कहा कि असांज को अमेरिका भेजा जा सकता है.

अब गेंद ब्रिटेन की गृहमंत्री प्रीति पटेल के पाले में है. प्रत्यर्पण पर अंतिम फ़ैसला उन्हीं के हाथ में है.

हालांकि, असांज के पास अभी अपील का अधिकार बचा हुआ है. उनकी टीम ने कहा है कि वो जल्दी ही फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेंगे.


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