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दुनिया के सबसे महंगे शहर तेल अवीव का इतिहास क्या है?

कैसे बना तेल अवीव दुनिया का सबसे महंगा शहर?

आज जानेंगे, रेत के ढेर पर खड़े 66 परिवारों की कहानी. जिनके हाथों में दो सीप रखे थे. एक उजला और दूसरा सफेद. एक पर नाम लिखा था, दूसरे पर नंबर. नंबर माने ज़मीन का टुकड़ा. फिर उन परिवारों ने वहां पर नया गांव बसाया. वो साल 1909 था. 112 बरस बाद वो गांव दुनिया का सबसे महंगा शहर बन चुका है. पैरिस, टोक्यो, ओसाका, सिंगापुर और हॉन्ग कॉन्ग जैसे चिर-परिचित नामों को पीछे छोड़कर.

ये शहर कौन सा है और इसकी पूरी कहानी क्या है? महंगे शहरों वाली लिस्ट कैसे तैयार होती है? और, लिस्ट में पांच सबसे महंगे और सबसे सस्ते शहर कौन से हैं?

लेकिन पहले इतिहास की बात.

साल 1515. ऑटोमन साम्राज्य ने मिडिल-ईस्ट के शहर याफ़ा पर कब्ज़ा कर लिया. याफ़ा का ज्ञात इतिहास 16वीं शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होता है. इस पर सबसे पहले ईजिप्ट ने राज किया. कालांतर में इस पर अलग-अलग साम्राज्यों का शासन चला. याफ़ा को दुनिया के सबसे पुराने बंदरगाहों में गिना जाता है. इस वजह से इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है. याफ़ा मिडिल-ईस्ट के उस इलाके को बाकी दुनिया से जोड़ता था.

19वीं सदी आते-आते याफ़ा का दायरा काफ़ी बढ़ चुका था. याफ़ा के आस-पास की ज़मीन उपजाऊ थी. इसके अलावा, ये जेरूसलम के क़रीब था. याफ़ा से फलों का निर्यात तो होता ही था. साथ ही साथ, वो तीर्थाटन का केंद्र भी था.

उस समय याफ़ा में यहूदियों के अलावा कई धर्म के लोग भी रहते थे. 19वीं सदी के अंत में यूरोप में यहूदियों को निशाना बनाया जाने लगा था. वे लोग अपना घर-बार छोड़कर भाग रहे थे. 1906 में दूसरा आलियाह शुरू हुआ. आलियाह का अर्थ होता है, पवित्र भूमि की तरफ़ यहूदियों का प्रस्थान. 1948 में इज़रायल की स्थापना के बाद आलियाह को स्टेट पॉलिसी में शामिल कर लिया गया.

दूसरे आलियाह के दौरान हज़ारों की संख्या में यहूदी याफ़ा पहुंचे. फिर उनके बीच अपना अलग शहर बसाने की योजना बनी. उन्होंने ऑटोमन साम्राज्य से 12 एकड़ ज़मीन खरीदी. वो ज़मीन क्या थी, रेत का वीरान मैदान था. ज़मीन के खरीदारों में कुल 66 परिवार शामिल थे. किस को ज़मीन का कौन सा टुकड़ा मिले, इस पर सहमति नहीं बन पा रही थी.

ज़मीन खरीदने वाली सोसायटी के मुखिया थे, अकिवा आरयो वाइस. उन्होंने एक योजना बनाई. वाइस ने रेत के नीचे पड़े सीपें उठाई. कुल 132. उनमें से आधी काले रंग की थी, आधी सफेद. काली सीप पर प्लॉट का नंबर लिखा गया. सफेद वाली पर परिवार का नाम. इस तरह से प्लॉट्स का बंटवारा पूरा हो गया.

अब बात आई नामकरण पर. लंबे समय तक ये तय नहीं हो पाया कि नई सोसाइटी का नाम क्या रखा जाए. कई नाम चर्चा में थे. जैसे, येफ़िफ़िया. यानी सबसे सुंदर. एक नाम था शएनना. यानी सबसे शांत.

आख़िरकार, मई 1910 में उन्हें नया नाम मिल गया. 1902 में थियोडोर हर्ज़ल ने एक नॉवेल लिखी थी. अटनलैंड. हिब्रू भाषा में इसका अनुवाद होता है, तेल अवीव. हर्ज़ल ने यहूदियों के लिए अलग देश बनाने की कल्पना की थी. उन्हें इज़रायल स्टेट का आध्यात्मिक पिता भी कहा जाता है.

हिब्रू में तेल का अर्थ होता है, मलबे का ढेर. जबकि अवीव का अर्थ होता है, वसंत. यहूदियों के लिए तेल अवीव उनके पुराने इतिहास की याद और वर्तमान के गौरव का प्रतीक बना. ये आधुनिक इज़रायल का पहला शहर था.

फिर आया साल 1914. जुलाई में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ. ब्रिटेन और ऑटोमन साम्राज्य एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे. तुर्कों ने यहूदियों पर आरोप लगाया कि वे ब्रिटिश आर्मी की मदद कर रहे हैं. वे हमारे हारने का इंतज़ार कर रहे हैं.

इसके बाद उन्होंने याफ़ा और तेल अवीव से यहूदियों को बाहर निकाल दिया.

कुछ समय बाद पहला विश्व युद्ध खत्म हो गया. ब्रिटेन की जीत हुई. उसने फ़िलिस्तीन पर नियंत्रण कर लिया. इसके बाद ही यहूदी वापस लौट पाए.

1920 के दशक में यूरोप से यहूदियों फिर पलायन करने लगे. वे भागकर तेल अवीव आ रहे थे. इस पलायन की वजह से तेल अवीव की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी. 1921 में अरब-यहूदी दंगों के बाद याफ़ा के यहूदियों को भी तेल अवीव आना पड़ा.

1930 का दशक तो और ख़तरनाक था. एडोल्फ़ हिटलर जर्मनी का चांसलर बन चुका था. वो हमेशा से यहूदी-विरोधी था. चांसलर बनने के बाद उसने यहूदियों को उनके मौलिक अधिकारों से दूर कर दिया. उनकी संपत्तियां ज़ब्त कर ली. और, उन्हें मिटाने के प्लान पर काम शुरू किया. 1938 आते-आते हिटलर पोलैंड और ऑस्ट्रिया पर भी क़ब्ज़ा कर चुका था. जो भी यहूदी निकल पाए, वे भागकर तेल अवीव आने लगे.

इस पलायन से फ़िलिस्तीन की अरब जनता बहुत नाराज़ थी. उन्हें डर था कि यहूदी एक दिन उन्हें अल्पसंख्यक बना देंगे. वे उनके संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर लेंगे. इसके चलते 1936 में अरब विद्रोह शुरू हुआ. अरबों ने तेल अवीव को याफ़ा से अलग-थलग कर दिया. वे यहूदियों की हत्या करने लगे. ये सब 1939 तक चला.

फिर दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ. तब तक हिटलर की हैवानियत अपने चरम पर पहुंच चुकी थी. वो यहूदियों को गैस चैंबर्स में झोंकने लगा था. यहूदियों को बचने के लिए एक ही जगह मिली. फ़िलिस्तीन.

सेकंड वर्ल्ड वॉर ख़त्म होने के बाद एक बार फिर से अरब-यहूदी दंगे शुरू हुए. ये तय हो चुका था कि दोनों समुदाय एक साथ नहीं रह सकते. अगर साथ रहे तो एक-दूसरे को मार कर खा जाएंगे. इससे बचने के लिए नवंबर 1947 में यूनाइटेड नेशंस ने फ़िलिस्तीन का बंटवारा कर दिया. याफ़ा यहूदी स्टेट के बीच में था. वहां अरबों का नियंत्रण रहने दिया गया.

मई 1948 में इज़रायल ने आज़ादी का ऐलान कर दिया. इसके अगले ही दिन ईजिप्ट, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक़ की सेनाओं ने मिलकर इज़रायल पर हमला कर दिया. इज़रायल ने अरब सेना को बुरी तरह हराया. उसने फ़िलिस्तीन के कई इलाकों को भी जीत लिया. इज़रायली सेना याफ़ा पर चढ़कर बैठ गई. 65 हज़ार अरब लोग शहर छोड़कर भाग गए. याफ़ा खाली हो चुका था. साल 1950 में याफ़ा को तेल अवीव के साथ मिला दिया गया.

यूरोप के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग अपने साथ ज्ञान और समृद्धि का भंडार लेकर आए थे. उन्होंने इसका इस्तेमाल तेल अवीव को बेहतर बनाने में किया.

आज तेल अवीव में कई मंत्रालयों के मुख्यालय हैं. दुनिया की दिग्गज कंपनियों के दफ़्तर हैं. कई देशों के दूतावास भी हैं. तेल अवीव के अंदर मौजूद ‘वाइट सिटी’ को यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया हुआ है. कुल मिलाकर, ये इज़रायल की राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संपन्नता का केंद्र बना हुआ है. रेत के मैदान से शुरू हुआ सफ़र वाकई में एक मिसाल है.

आज तेल अवीव की कहानी क्यों?

दरअसल, तेल अवीव रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे महंगा शहर बन गया है. इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट (EIU) पिछले तीन दशक से सबसे महंगे और सबसे सस्ते शहरों की लिस्ट तैयार कर रही है. इस सर्वे को काफी प्रतिष्ठित माना जाता है. इस साल 173 शहरों को रिसर्च में शामिल किया गया था. पिछले साल से 40 अधिक. इस लिस्ट को बनाने के लिए दो सौ से अधिक बुनियादी ज़रूरत की वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की तुलना की गई.

तेल अवीव पिछले साल सबसे महंगे शहरों की लिस्ट में पांचवें नंबर पर था. पहले नंबर पर पैरिस का नाम था. इस बरस पैरिस दूसरे नंबर पर खिसक गया है. तेल अवीव पहली बार सबसे महंगा शहर बना है.

तेल अवीव के महंगे होने की वजह क्या है?

इसकी पहली वजह है, इज़रायल की मुद्रा का मज़बूत होना. वर्ल्ड कॉस्ट ऑफ़ लिविंग की रिपोर्ट में न्यू यॉर्क को बेंचमार्क रखा गया है. वहां डॉलर चलता है. जो भी करेंसी डॉलर के मुकाबले में मज़बूत होगी, वो लिस्ट में ऊपर जाएगी. जिन देशों की मुद्रा डॉलर के मुकाबले में कमज़ोर हुई, उन्हें लिस्ट में नीचे जाना पड़ा.

दूसरी वजह है, महंगाई. कोरोना महामारी के चलते सप्लाई चेन में रुकावट आई है. इसके अलावा, चीज़ों का उत्पादन भी घटा है. इस वजह से दाम ऊपर गए हैं. जिस तरह से ओमीक्रॉन वेरिएंट की चर्चा के बाद अफ़रा-तफरी मची है, इस स्थिति में सुधार की गुंजाइश बेहद कम है.

तेल अवीव शराब और परिवहन के मामले में दूसरा, जबकि पर्सनल केयर की खरीदारी के मामले में पांचवां सबसे महंगा शहर है. पिछले साल की तुलना में इस साल ग्रोसरीज़ में 10 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई है.

इस सर्वे पर एक आपत्ति भी आई है. तेल अवीव के मेयर ने इंटरव्यू में कहा कि सर्वे में प्रॉपर्टी के दामों की तुलना नहीं की गई. इज़रायल में तेल अवीव के अलावा कोई दूसरा बड़ा महानगर नहीं है. लोगों के पास और कोई विकल्प नहीं है. इस वजह से तेल अवीव लगातार महंगा होता जा रहा है.

इसको लेकर जुलाई 2011 में ज़बरदस्त प्रोटेस्ट हुए थे. पूरे इज़रायल में चार लाख से अधिक लोगों ने आर्थिक असमानता और महंगाई के ख़िलाफ़ रैली में हिस्सा लिया. तेल अवीव इस प्रोटेस्ट का सेंटर था. प्रदर्शनकारियों ने शहर के बीच में टेंट में रहना शुरू कर दिया था. ये अक्टूबर 2011 तक चला. उसके बाद प्रोटेस्ट तो ख़त्म हो गया, लेकिन समस्या बरकरार रही. इस घटना को ‘टेंट क्रांति’ के नाम से जाना जाता है.

एक समय तक सताए लोगों का खुली बांहों से स्वागत करने वाले तेल अवीव में मध्यम और निम्न-आय वर्ग के लोगों के लिए जगह नहीं बची है. ये भी एक विडंबना ही है.

ये तो हुई तेल अवीव की बात. लिस्ट में और कौन-कौन हैं?

तेल अवीव के बाद फ़्रांस की राजधानी पैरिस और सिंगापुर का नाम है. दोनों शहर दूसरे नंबर पर हैं. उनके बीच टाई की स्थिति है. चौथा नंबर स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख को मिला है. पांचवें नंबर पर हॉन्ग कॉन्ग आता है.

ये तो हुए महंगे शहर. सस्ते शहर कौन से हैं?

सस्ते शहरों की लिस्ट में पहला नाम सीरिया की राजधानी दमास्कस का है. दूसरे नंबर पर लीबिया की राजधानी त्रिपोली है. दोनों ही शहर पिछले दस सालों से सिविल वॉर का सामना कर रहे हैं. उनकी मुद्रा यूएस डॉलर के मुकाबले लगातार कमज़ोर हुई है. तीसरे नंबर पर उज़्बेकिस्तान के ताशकंद, चौथे पर ट्यूनिश और पांचवें पर कज़ाख़िस्तान के अल्माटी का नाम है. भारत का अहमदाबाद शहर सबसे सस्ते शहरों की लिस्ट में सातवें नंबर पर है. इसके अलावा किसी भी भारतीय शहर को जगह नहीं मिली है.

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