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टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप में नस्लभेद पर हंगामा क्यों मचा है?

सबसे पहले एक तस्वीर देखिए.

Take The Knee

इसमें एक अश्वेत व्यक्ति दिख रहा है. कमर पर धोती के अलावा पूरे बदन पर एक धागा तक नहीं है. उसका एक घुटना ज़मीन पर टिका है. हाथों और पैरों में ज़ंजीर बंधी है. भिंची हुई मुट्ठी हवा में उठी हुई है. नीचे कैप्शन में लिखा है,

Am I not a man and a brother?

क्या मैं एक इंसान और भाई नहीं हूं?

साल 1787. उस समय ब्रिटेन में दासप्रथा को खत्म करने की मुहिम चल रही थी. मई 1787 में दिग्गज उद्योगपति जोसिया वेजवुड और उनके कुछ साथियों ने मिलकर एक संस्था बनाई. सोसाइटी फ़ॉर अफ़ेक्टिंग दी अबॉलिशन ऑफ़ स्लेव ट्रेड. ये संस्था ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख्त के ख़िलाफ़ कानून बनाने के लिए अभियान चला रही थी. जोसिया वेजवुड ने 1759 में ‘वेजवुड’ नाम की एक कंपनी बनाई थी. ये कंपनी मिट्टी की कलाकृतियां बनाकर दुनियाभर में बेचती थी.

जब संस्था का काम शुरू हुआ, तब वेजवुड ने कैंपेन के लिए एक प्रतीक-चिह्न लाने के बारे में सोचा. जंज़ीरों में जकड़े घुटने टिकाए अफ़्रीकी ग़ुलाम की तस्वीर वेजवुड की कंपनी से ही बाहर आई थी. ये तस्वीर असल में एक तमगे पर उकेरी गई थी. जिसे संस्था ने देशभर में बांटा. कुछ ही समय में इसने तहलका मचा दिया था. ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप में दासप्रथा के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा. बहुत सारे लोग मुहिम से जुड़े. इस तस्वीर की लोकप्रियता का आलम जोसिया वेजवुड के एक साथी ने बयां किया था,

‘महिलाएं इसे अपने ब्रेसलेट में पहन रहीं थी. कुछ इसे अपने बालों में पिन की तरह इस्तेमाल करने लगीं. कुछ ही समय में ये फ़ैशन का हिस्सा बन चुका था. फ़ैशन एक समय बेकार की चीज़ों तक सीमित था, लेकिन इस बार उसे न्याय, मानवता और आज़ादी के मिशन को बढ़ावा देने वाले प्रतिष्ठित माध्यम के तौर पर देखा जा रहा था.’

इस तस्वीर को 18वीं सदी की सबसे प्रभावशाली कलाकृतियों में गिना जाता है. इससे फैली जागरुकता की बदौलत 1807 में ब्रिटेन ने अपने यहां ग़ुलामों के व्यापार पर रोक लगाई. 1833 में ब्रिटेन ने अपने शासन-क्षेत्र में दासप्रथा को पूरी तरह ख़त्म कर दिया.

आज इस तस्वीर पर चर्चा की वजह क्या है?

इसकी वजह है, गेस्चर. हिंदी में बोलें तो मुद्रा. तस्वीर में व्यक्ति जिस मुद्रा में बैठा है. वो आज के समय में नस्लभेद-विरोधी आंदोलनों का प्रतीक बन चुका है. ‘टेक द नी’ या ‘नी बेंडिंग’.

इन दिनों यूएई में टी-20 वर्ल्ड कप खेला जा रहा है. टूर्नामेंट में हिस्सा ले रही टीमें अपने-अपने तरीके से नस्लभेद का विरोध कर रहीं है. जैसे, भारतीय टीम के खिलाड़ियों ने अपने पहले मैच में घुटने मोड़े थे, जबकि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने सीने पर हाथ रखकर कैंपेन को समर्थन दिया था. टूर्नामेंट में साउथ अफ़्रीका का पहला मैच ऑस्ट्रेलिया के साथ था. मैच से पहले कुछ साउथ अफ़्रीकन खिलाड़ियों ने घुटने मोड़े, जबकि कईयों ने इसे पूरी तरह से इग्नोर कर दिया. इसको लेकर बवाल मचा. तब टीम मैनेजमेंट ने साफ़ निर्देश जारी किया कि हर मैच से पहले खिलाड़ियों को ‘टेक द नी’ वाली मुद्रा अपनानी होगी. साउथ अफ़्रीका में रंगभेद का लंबा इतिहास रहा है. रंगभेद की नीति के चलते टीम को कुछ सालों के लिए इंटरनैशनल क्रिकेट से बैन भी किया गया था.

साउथ अफ़्रीका का दूसरा मैच 26 अक्टूबर को वेस्टइंडीज़ के साथ था. मैच से ठीक पहले विकेटकीपर बल्लेबाज क्विंटन डी कॉक ने खेलने से मना कर दिया. शुरुआत में रिपोर्ट आई कि डी कॉक निजी कारणों से मैच नहीं खेलेंगे. लेकिन दिन की समाप्ति तक असली ख़बर बाहर आ चुकी थी. तब समझ में आया कि साउथ अफ़्रीकन ड्रेसिंग रूम के अंदर सब ठीक नहीं चल रहा है. दरअसल, डी कॉक ने टीम मैनेजमेंट के निर्देशानुसार नस्लभेद के विरोध में घुटने मोड़ने से इनकार कर दिया था.

क्रिकेट साउथ अफ़्रीका ने बाद में अपना बयान जारी किया. उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ़्रीका के अतीत पर गौर करने के बाद मैनेजमेंट ने ये निर्देश दिए थे. ये फ़ैसला लेते वक़्त खिलाड़ियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखा गया था. बोर्ड ने कहा कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में विविधता को बिल्कुल जगह मिलनी चाहिए. लेकिन जब बात नस्लभेद के ख़िलाफ़ खड़े होने की आती है, वहां दो राय होने की कोई गुंज़ाइश नहीं रहती.

बोर्ड टीम मैनेजमेंट की रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहा है. इसके बाद वो डी कॉक पर आगे की कार्रवाई करेगा. संभव है कि डी कॉक को हमेशा के लिए दक्षिण अफ़्रीका की टीम से बाहर कर दिया जाए. डी कॉक के फ़ैसले के पक्ष और विपक्ष में तमाम तर्क हो सकते हैं. उन पर चर्चा फिर कभी. आज इस ख़बर के बहाने हम नस्लभेद के ख़िलाफ़ होने वाले प्रोटेस्ट के इतिहास पर बात करेंगे. जानेंगे, ‘टेक अ नी’ का कॉन्सेप्ट शुरू कहां से हुआ और ये स्पोर्ट्स में कैसे आया? साथ ही, नस्लभेद-विरोधी अभियान के कुछ चुनिंदा प्रतीकों की कहानी जानेंगे. इसके अलावा, वेस्ट इंडीज़ के महान गेंदबाज और अब कमेंटेटर की भूमिका निभा रहे माइकल होल्डिंग का नस्लभेद पर दिया बयान भी बताएंगे, जिसे हर किसी को निष्पक्षता से सुनना चाहिए.

थोड़ा पीछे चलते हैं

साल 1865. अमेरिका ने अपने यहां दासप्रथा को बैन कर दिया. सदियों से ग़ुलाम बनाकर रखे गए अफ़्रीकी अश्वेतों को आज़ादी मिल गई. तीन साल बाद ही उन्हें नागरिकता का अधिकार भी मिल गया. हालांकि, ये अधिकार बस काग़ज़ तक सीमित रहा. अश्वेत वोटर्स को पोलिंग बूथ से ही लौटा दिया जाता था. 1870 में अमेरिकी संसद ने 15वें संविधान संशोधन को मंज़ूरी दे दी. इसमें लिखा था,

‘यूनाइटेड स्टेट्स के किसी भी नागरिक को रंग, नस्ल या दासत्व के इतिहास के आधार पर वोट देने से रोका नहीं जाएगा.’

केंद्र ने तो संविधान में लिख दिया. लेकिन बहुत सारे राज्य इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने अश्वेत वोटर्स को रोकने के लिए नए तिकड़म लगा दिए. उनके ऊपर पोल टैक्स लगाया गया था. कई राज्य अश्वेत वोटर्स की साक्षरता जांचते थे. कुछ राज्यों ने अपने यहां ‘ग्रैंडफ़ादर क्लॉज़’ लगा रखा था. इसमें क्या प्रावधान था? अगर आपके दादा ने अतीत किसी चुनाव में वोटिंग नहीं की तो आप भी नहीं कर सकते. इस कसौटी पर खरा उतर पाना अश्वेतों के लिए असंभव था.

इसी तरह घटिया उपाय लगाकर उन्हें वोटिंग से रोका जाता रहा. 50 और 60 के दशक में इसके ख़िलाफ़ भारी प्रोटेस्ट शुरू हुआ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर इस आंदोलन के अगुआ लोगों में से एक थे. 1964 में अमेरिका में सिविल राइट्स ऐक्ट के जरिए सावर्जनिक जगहों और सेवाओं में नस्लभेद पर पूर्ण बैन लगा दिया गया. ये बात वोटिंग पर भी लागू हुई. लेकिन दक्षिण के राज्यों में जब अश्वेत वोटर्स रजिस्ट्रेशन के लिए गए, तो उनका काफ़ी विरोध हुआ. तब किंग ने अलाबामा के सेल्मा को ब्लैक वोटर रजिस्ट्रेशन कैंपेन का केंद्र बनाने का फ़ैसला किया. एक फ़रवरी 1965 को किंग और उनके ढाई सौ समर्थकों ने काउंटी कोर्टहाउस तक मार्च किया. उन्हें इस मार्च की इजाज़त नहीं मिली थी. पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने पहुंची हुई थी. उससे ठीक पहले किंग और उनके समर्थक घुटनों के बल बैठ गए. वे अपना सिर झुकाकर प्रार्थना करने लगे. इसके बाद उन्हें जेल ले जाया गया.

‘टेक अ नी’

अमेरिका ने अगस्त 1965 में वोटिंग राइट्स ऐक्ट को मंज़ूरी दी. इसके ज़रिए अश्वेतों को वोटिंग से रोकने में लगी सभी बाधाओं को ध्वस्त कर दिया. फ़रवरी 1965 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के विरोध का तरीका पॉपुलर कल्चर में ‘टेक अ नी’ का पहला उदाहरण है. हालांकि, इसे असली लोकप्रियता लगभग 50 बरस बाद मिली.

अगस्त 2016 की बात है. अमेरिका में नेशनल फ़ुटबॉल लीग चल रही थी. इसी दौरान एक मैच में बीच मैदान एक वाकया हुआ. मैच से ठीक पहले अमेरिका का नेशनल एंथम बजा. मैदान में मौज़ूद हर व्यक्ति अपनी जगह पर खड़ा था. एक को छोड़कर. सैन फ़्रैंसिस्को फ़ोर्टी-नाइनर्स के कोलिन कैपरनेक न सिर्फ़ बैठे रहे, बल्कि उन्होंने अपना एक घुटना भी मोड़ दिया. ये एक तरह से नेशनल एंथम और नेशनल फ़्लैग का अपमान था.

कैपरनैक ने कहा कि वो किसी ऐसे देश के झंडे का सम्मान नहीं करेंगे, जो अश्वेत लोगों पर अत्याचार करता है. उन्होंने ये भी जोड़ा कि ये मेरे लिए ये फ़ुटबॉल से बढ़कर है और मैं इससे मुंह नहीं मोड़ सकता. इस घटना पर हंगामा मच गया. अचानक से लोग दो धड़ों में बंट गए. एक तरफ़ लोग कैपरनिक को नेशनल एंथम का अपमान करने के लिए लताड़ लगा रहे थे. जबकि दूसरा धड़ा उनकी हिम्मत की दाद दे रहा था.

बहस के बीच कई टीमों और खिलाड़ियों ने कैपरनिक के स्टैंड को हाथों-हाथ लिया. तब से ये स्पोर्ट्स का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. मई 2020 में जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के बाद से ‘टेक अ नी’ ब्लैक लाइव्स मैटर मूवमेंट का प्रतीक बन चुका है. लगभग हर बड़े टूर्नामेंट में खिलाड़ियों ने मूवमेंट के समर्थन में घुटने मोड़े हैं. ये आईपीएल में भी देखने को मिला था. वेस्ट इंडीज़ की टीम पिछले कई महीनों से अपने हर मैच में इस परंपरा को निभा रही है. यूएई में खेला जा रहा टी-20 वर्ल्ड कप इस कड़ी का नया हिस्सा बना है.

एक और प्रतीक

अब एक और संकेत की बात करते हैं. 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में दो अश्वेत अमेरिकी एलीट्स ने पोडियम पर नंगे पांव खड़े होकर तहलका मचा दिया था. टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने अपनी मुट्ठियां हवा में तान दीं थी. 50 हज़ार लोगों से भरा स्टेडियम वो दृश्य देखकर अवाक रह गया था. वे अश्वेतों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में पूरी दुनिया को बताना चाहते थे. टॉमी स्मिथ ने बाद में कहा था,

‘हमें दिखना पड़ा क्योंकि हमें सुना नहीं जा रहा था.’

इस घटना के चलते स्मिथ और कार्लोस को ओलंपिक टीम से बाहर निकाल दिया गया. उनके परिवार को धमकियां दी गईं. उन्हें लंबे समय तक विलेन के तौर पर देखा गया. स्मिथ और कार्लोस ने मुट्ठी भींचने वाली मुद्रा को पॉपुलर बना दिया था. हालांकि, इसका इस्तेमाल बहुत पहले से होता आ रहा था. इसका पहला उदाहरण 1848 की फ़्रेंच क्रांति में दिखा था. इसमें लोगों ने लुई फिलिप़ को अपदस्थ कर दिया था. इस क्रांति के दौरान लोगों का उत्साह देखकर मशहूर फ़्रेंच पेंटर ऑनरे डॉमिए ने एक तस्वीर बनाई थी. इस तस्वीर का मुख्य किरदार हवा में मुट्ठी ताने हुआ दिखता है. डॉमिए का मानना था कि वो मुट्ठी लोगों की ‘इच्छाशक्ति, उनकी मज़बूती और उनके दृढ़-संकल्प’ का प्रतीक थी.

1930 के दशक में इसका इस्तेमाल स्पेन में हुआ. स्पेनिश सिविल वॉर के दौरान तानाशाह फ़्रैंसिस्को फ़्रैंको के ख़िलाफ़ लड़ने वाले क्रांतिकारियों ने भिंची मुट्ठी को अपने संघर्ष का प्रतीक बनाया. 1960 के दशक में अमेरिका में ये सिंबल ब्लैक पैंथर पार्टी के संघर्ष की पहचान बना. बाद के सालों में नेल्सन मंडेला समेत कई दिग्गज नेताओं ने इस प्रतीक को अपनाया. कई क्रांतियों, आंदोलनों, प्रोटेस्ट मार्च आदि में भिंची हुई मुट्ठी ‘संघर्ष, एकता और ज़ुल्मत के ख़िलाफ़ जंग’ की पहचान बनती रही. इसका एक लंबा इतिहास है. उस पर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे. नए दौर में ‘भिंची हुई मुट्ठी’ मई 2020 के बाद से ब्लैक लाइव्स मैटर मूवमेंट का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.

चैप्टर माइकल होल्डिंग

हमने नस्लभेद के विरोध में होने वाले प्रोटेस्ट के इतिहास पर बात की. अब चलते हैं उस चैप्टर की तरफ़, जिसमें एक समाधान सुझाया गया है.

तारीख़, 09 जुलाई 2020. साउथैम्पटन में इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज़ के बीच सीरीज़ का पहला टेस्ट चल रहा था. दूसरे दिन के खेल के बीच में बारिश आ गई. उसी ब्रेक के बीच कमेंटेटर्स आपस में बात कर रहे थे. उन दिनों नस्लभेदी की दो घटनाएं ख़ूब चर्चा में थी. पहली, मिनियापोलिस में पुलिस कस्टडी में अश्वेत युवक जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या. एक व्हाइट पुलिस अधिकारी ने फ़्लॉयड का गला घुटने से दबा दिया था. जिसके चलते उसकी मौत हो गई थी.

दूसरी घटना न्यू यॉर्क के एक पार्क की थी. वहां एमी कूपर नाम की एक महिला कुत्ता घुमा रही थी. इसी दौरान उसने कुत्ते को खुला छोड़ दिया. इस पर एक अश्वेत युवक क्रिश्चियन ने टोक दिया. एमी इससे नाराज़ हो गई. उसने 911 डायल कर पुलिस बुलाने की धमकी दी. जब तक पुलिस पार्क में पहुंची, तब तक दोनों वहां से जा चुके थे. बाद में इस घटना का वीडियो वायरल हुआ.

जॉर्ज फ़्लॉयड और क्रिश्चियन, दोनों अश्वेत थे. दोनों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले व्हाइट थे. इसको लेकर अमेरिका समेत पूरी दुनिया में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ कैंपेन ज़ोर-शोर से चल रहा था. साथी कमेंटेटर ने माइकल होल्डिंग से इस विषय पर राय मांगी. होल्डिंग ने अपने जवाब में कहा,

हर कोई जानता है कि लाइट बल्ब का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया था. लेकिन ये बात कितनों को पता है कि उस बल्ब को लंबे समय तक जलाने के लिए ज़रूरी कार्बन फ़िलामेंट किसने बनाया था. वो थे, लुइस लातिमेर. कितने लोगों ने लातिमेर का नाम सुना है?

होल्डिंग ने आगे कहा,

इतिहास विजेताओं की कलम से लिखा जाता है. उसमें पराजितों का कोई पक्ष नहीं होता. हमारे समाज ने इतिहास लिखने का ज़िम्मा उन लोगों को दिया है, जो बर्बादी के ज़िम्मेदार थे. उन लोगों ने पीड़ितों का दर्द गायब कर दिया. हमें इतिहास में जाकर उसे ठीक करना होगा. हमें आने वाली पीढ़ियों को दोनों धड़ों का इतिहास पढ़ाना होगा. जब तक हम ऐसा नहीं करते. जब तक हम पूरी मानव-जाति को इससे रू-ब-रू नहीं करा देते, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी.

माइकल होल्डिंग ने कटु सत्य कहा था. नस्लभेद की घटनाएं अभी भी देखने को मिल रहीं है. क्विंटन डी कॉक इसका एक ताज़ा उदाहरण हैं. हमें अभी ये पता नहीं है कि एक प्रतीकात्मक इशारे से उनकी आपत्ति की वजहें क्या हैं. लेकिन इतना तो तय है कि उनकी आपत्ति से कई सवाल खड़े हो गए हैं.

मसलन,

क्या टीम के अंदर अश्वेत खिलाड़ियों के लिए सही माहौल नहीं है?

क्या साउथ अफ़्रीकन क्रिकेट टीम में फूट पड़ गई है?

और, अंत में सबसे ज़रूरी सवाल, क्या साउथ अफ़्रीका अभी भी नस्लभेद के दौर में जी रहा है?
डी कॉक के फ़ैसले ने कई बड़े विवादों को जन्म दे दिया है. ये विवाद वाजिब भी हैं. डी कॉक को इन पर विराम लगाने के लिए बहुत ठोस तर्कों के साथ आना होगा. क्या उनके पास तर्क बचे हैं, ये देखने वाली बात होगी.


T20 विश्वकप में ब्लैक लाइव्स मैटर पर बहस क्यों हो रही है?

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