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मोदी सरकार ये काम थोड़ा पहले कर लेती तो कोरोना की दूसरी लहर में इतनी तबाही से बचा जा सकता था!

पिछले कुछ दिनों सुर्खियों में डॉ. शाहिद जमील का नाम छाया रहा. शाहिद जमील देश के नामी वायरोलॉजिस्ट्स में से एक हैं. इंडिया में कोरोनावायरस का जेनेटिक कोड पता करने वाले ग्रुप का नेतृत्व कर रहे थे. जमील ने 16 मई 2021 को सरकार की ओर से बनाए गए जीनोम सीक्वेंसिंग ग्रुप से इस्तीफा दे दिया. शाहिद जमील ने अपने इस्तीफे का कोई कारण नहीं बताया. हालांकि इस्तीफे से तीन दिन पहले शाहिद ने अमरीकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में एक आर्टिकल लिखा था. इसमें शाहिद ने कोरोना को लेकर भारत सरकार की अड़ियल पॉलिसी मेकिंग पर सवाल खड़े किए थे.

शाहिद जमील का काम जीनोम सीक्वेंसिंग से जुड़ा था. कई एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत में जीनोम सीक्वेंसिंग को लेकर लापरवाही बरती गई. ये जीनोम सीक्वेंसिंग क्या होती है? कोविड की सेकंड वेव से लड़ने में ये कैसे काम आ सकती थी? और इंडिया इसमें कहां चूक गया? ये सब जानेंगे इस एपिसोड में.

जीनोम और इसकी सीक्वेंसिंग क्या है?

मेरा जीनोम, मेरी पहचान.

आपने ‘जीन’ के बारे में सुना होगा? पैंट वाली जीन नहीं, पैरेंट्स वाली जीन. मैं जब भी किसी शादी में जाता हूं, एक रैंडम रिश्तेदार मुझसे आकर ये ज़रूर पूछता है – तुम अनीता के मोड़ा हो का? क्योंकि मेरा चेहरा मेरी मम्मी से काफी मिलता-जुलता है.

ज़्यादातर लोगों का नाक-नक्श अपने मम्मी-पापा जैसा क्यों होता है? वो इसलिए क्योंकि हमारे कुछ जीन्स मम्मी-पापा के जीन्स से मेल खाते हैं. जीन हमारी जैविक विशेषताएं फिक्स करते हैं. उदाहरण के लिए हमारा कद, आंखों का रंग, बालों का घनत्व जैसी तमाम विशेषताएं इनसे जुड़े जीन्स पर तय होते हैं. सिर्फ मनुष्यों की ही नहीं, इस दुनिया में मौजूद हर जीव की बनावट उसके जीन्स तय करते हैं.

जीन तो समझ गए लेकिन जीनोम क्या होता है?

जीनोम का मतलब है किसी जीव का कुल जमा जेनेटिक मैटेरियल. किसी जीव की बनावट का संपूर्ण जेनेटिक कोड जीनोम कहलाता है. जीनोम के छोटे-छोटे हिस्सों को जीन कहते हैं. यूं समझिए कि अगर जीनोम किसी जीव को बनाने वाली किताब है तो जीन इस किताब के छोटे-छोटे पैराग्राफ हैं.

यहां पॉइंट टू बी नोटेड ये है मी-लॉर्ड कि हमारे कुछ जीन मम्मी-पापा से मिलते ज़रूर हैं. लेकिन हमारा और मम्मी-पापा का जीनोम कभी पूरा मैच नहीं कर सकता. किन्हीं भी दो जीवों का जीनोम कभी एक जैसा नहीं होता. यानी ये जीनोम बायोलॉजी की दुनिया का पहचान पत्र है. हमारे आधार कार्ड पर एक वाक्य लिखा होता है, ‘मेरा आधार, मेरी पहचान’. बायोलॉजी वालों का बस चले तो उसे बदलकर ‘मेरा जीनोम, मेरी पहचान’ कर दें.

अपन लोगों की दुनिया में कई तरह के पहचान पत्र चलते हैं, आधार कार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस वगैरह-वगैरह. बायोलॉजी की दुनिया में दो तरह के जीनोम होते हैं. होमो सेपियन्स समेत अधिकतर जीवों का जीनोम DNA वाला होता है. इसलिए आम बोलचाल की भाषा में जीनोम की जगह DNA शब्द का इस्तेमाल भी होता है. लेकिन कोरोना जैसे टुच्चे वायरसों का जीनोम DNA न होकर RNA होता है. आपने खबरों में सुना होगा कि कोराना एक RNA-बेस्ड वायरस है.

जीनोम किस टाइप का है, इस बात से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता. ज़रूरी बात ये है कि जीनोम को स्टडी करने से किसी जीव की बनावट और काम करने का तरीका समझा जा सकता है.

ये जीनोम दिखता कैसा है? इसे स्टडी कैसे करते हैं?

जीनोम बहुत सूक्ष्म होता है. आंखों से दिखाई नहीं देता. अगर इसे किसी माइक्रोस्कोप से देखा भी जाए तो बहुत उलझाऊ और जटिल मालूम होगा. इसलिए वैज्ञानिक जीनोम को समझने के लिए उसे एक कोड में तब्दील कर देते हैं. और इस कोड को पता करने की तकनीक को जीनोम सीक्वेंसिंग कहते हैं.

Genome
जीनोम में इस दुनिया के सभी जीवों की कुंडली छिपी होती है. (फोटो साभार न्यू साइंटिस्ट)

कोविड महामारी को नियंत्रित करने में जीनोम सीक्वेंसिंग का क्या रोल है, और इसमें हम कहां चूक गए, ये समझने के लिए हमने कुछ वायरस एक्सपर्ट्स से बात की.

जीनोम की घेराबंदी

दिलीप कुमार अमेरिका के बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन में वायरोलॉजिस्ट हैं. दिलीप बताते हैं –

जब कोरोनावायरस किसी मनुष्य को इन्फेक्ट करता है तो अंदर जाकर वो अपनी कॉपी (नकल) बनाता है. ये कॉपी बनाने का प्रोसेस पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता है. इससे वायरस के सीक्वेंस में म्यूटेशन हो जाता है. अधिकांश समय ये म्यूटेशन इतना महत्वपूर्ण नहीं होता. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि म्यूटेशन से वायरस का इन्फेक्टिविटी (संक्रमण) या मॉर्टेलिटी रेट (मृत्युदर) बढ़ जाता है.

मान लीजिए, किसी जगह कोरोना के नंबर अचानक बढ़ने लगें तो आप वहां से रैंडमली सैंपल इकट्ठे कर लेते हो. और उन्हें सीक्वेंस करते हो. सीक्वेंस करने के बाद ये देखा जाता है कि क्या उस सीक्वेंस में कुछ बदलाव आ रहे हैं. और क्या उस बदलाव की वजह से वहां नंबर बढ़ रहे हैं. तो इस तरह जीनोम सीक्वेंसिंग से ये पता लगाता है कि किसी जगह जो केस बढ़ रहे हैं, वो नए वेरिएंट की वजह से हैं या पुराने वेरिएंट की वजह से. अगर वो किसी नए वेरिएंट की वजह से हैं तो आप उस हिसाब से अपनी स्ट्रैटजी बना सकते हैं. और उसे फैलने से रोक सकते हैं.’

गौरव श्रीवास्तव अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में वायरोलॉजिस्ट हैं. गौरव के मुताबिक-

जीनोम सीक्वेंसिंग से हमें पता चलता है कि कोई आउटब्रेक हुआ है, कि नहीं हुआ है. जीनोम सीक्वेंसिंग हमें बताता है कि वायरस कैसे इवॉल्व हो रहा है. उसमें कौन-कौन से म्यूटेशन हो रहे हैं. वो वायरस आया कहां से है.

उदाहरण के लिए यूके वेरिएंट को ही ले लीजिए, जो भारत में आया. इसकी फैलने की शक्ति काफी ज़्यादा है.

भारत सरकार ने दिसंबर 2020 में INSACOG की स्थापना की. INSACOG का पूरा नाम है Indian SARS-CoV-2 Genome Sequencing Consortia. ये ग्रुप 10 नेशनल लैबोरेटरीज़ को एक साथ लाने का काम करता है. INSACOG पर कोरोनावायरस वेरिएंट की स्टडी करने की ज़िम्मेदारी है. इसी ग्रुप के अध्यक्ष शाहिद जमील हुआ करते थे. जिन्होंने इस्तीफा दे दिया.

Shahid Jameel
शाहिद जमील देश के नामी वायरोलॉजिस्ट्स में से एक हैं.

3 मई को न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने INSACOG से जुड़े वैज्ञानिकों से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट पब्लिश की. वैज्ञानिकों ने आरोप लगाया कि सरकार ने कोविड से जुड़ी चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया. INSACOG के एक सदस्य वैज्ञानिक का कहना था कि उन्हें इंडियन वेरिएंट कहे जा रहे B.1.617 के बारे में फरवरी में ही पता चल गया था. INSACOG ने मार्च की शुरुआत में शीर्ष अधिकारियों को इसकी चेतावनी भी दे दी थी. लेकिन सरकार ने इससे बचने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

एकता गुप्ता दिल्ली के ILBS में क्लिनिकल वायरॉलजी की प्रफेसर हैं. हमने उनसे ये समझना चाहा कि भारत सरकार से जीनोम सीक्वेंसिंग में क्या बड़ी चूक हुई. एकता के मुताबिक-

अगर हम थोड़ा सा पहले अक्टूबर में ही एक्टिव सर्विलांस करते, ज़्यादा सैंपल्स लेते, स्टेट वाइस डेटा रिलीज़ करते और राज्यों में उस हिसाब एक्शन लेते तो इस वेरिएंट को फैलने से रोका जा सकता था.

वायरस एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?

वायरस विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने कायदे से जीनोम सीक्वेंसिंग की शुरुआत करने में बहुत देर कर दी. साथ ही हमने कम सैंपल्स की जीनोम सीक्वेंसिंग की. आदर्श स्थिति में कम से कम एक्टिव केस के 5 प्रतिशत सैंपल्स को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भेजा जाना चाहिए था. लेकिन भारत में कई जगहों पर 1 प्रतिशत से भी कम सैंपल्स भेजे गए.

भारत से उलट न्यूज़ीलैंड का उदाहरण देखिए. पहली बार कोरोना को हराने के बाद अगस्त 2020 में न्यूज़ीलैंड ने कोरोना की दूसरी लहर देखी. इस आउटब्रेक के दौरान न्यूज़ीलैंड में जीनोम सीक्वेंसिंग ने अहम भूमिका निभाई. न्यूज़ीलैंड में कई जगहों पर कोरोना पॉज़िटिव केस के 78 प्रतिशत सैंपल्स की ज़ीनोम सीक्वेंसिंग की गई. इसे लेकर एक मज़बूत रणनीति बनाई गई और कोरोना को मात दे दी. अक्टूबर 2020 में न्यूज़ीलैंड कोरोना से दोबारा मुक्त हो गया.

अक्टूबर 2020 में भारत में यूके वेरिएंट के शुरुआती केस मिले थे. अगर तभी सरकार सचेत हो जाती तो कोरोना की दूसरी लहर में इतनी तबाही से संभवत: बचा जा सकता था.


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