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एंजेला मर्केल के बाद कौन बन सकता है जर्मनी का चांसलर?

परिवर्तन सत्य है और शाश्वत भी. ये अपने साथ आशंकाओं और संभावनाओं की बयार लेकर आता है.

ये पंक्ति आज के दिन जर्मनी पर सटीक बैठती है. यहां 26 सितंबर को लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया. वोटिंग के कुछ घंटे बाद ही परिणाम सामने आ गया. लगातार 16 सालों से सत्ता पर काबिज़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) इस बार के चुनाव में दूसरे नंबर पर छूट गई है. इस नतीजे की बड़ी वजह एंजेला मर्केल भी हैं. मर्केल ने इस दफा चुनाव न लड़ने का ऐलान किया था. भले ही चुनाव का रिजल्ट लगभग साफ़ हो गया हो, लेकिन सरकार बनने में हफ़्तों या फिर महीनों का समय लग सकता है. 2013 में नतीजों के तीन महीने बाद सरकार बनी थी. 2017 में ये गैप बढ़कर 6 महीने हो गया था. इस बार इंतज़ार बढ़ता है या घटता है, ये देखना दिलचस्प होगा.

आज हम जानेंगे कि जर्मनी में चुनाव होते कैसे हैं? वहां नई सरकार कैसे चुनी जाती है? एंजेला मर्केल के फ़ैसले ने चुनाव पर क्या असर डाला है? और, जर्मन चुनाव के नतीजों का यूरोपियन यूनियन और बाकी दुनिया की जियो-पॉलिटिक्स पर क्या असर पड़ेगा?

बर्लिन की दीवार और बियर की बोतल

साल 1989. तारीख़ 9 नवंबर. बर्लिन शहर को दो हिस्सों में बांटने वाली दीवार गिराई जा रही थी. इसके साथ ही सोवियत संघ का तिलिस्म भी टूट रहा था. ईस्ट जर्मनी में एक महिला अपने दोस्त के साथ सॉना बाथ के लिए निकली. ये उसका हर गुरुवार का रूटीन था. घर से निकलते ही उसे दीवार के गिरने की ख़बर मिल चुकी थी. पहले उसने अपना रूटीन पूरा किया. फिर वो बर्लिन वॉल तक पहुंची. उसने भारी भीड़ के बीच से दीवार पार किया और दूसरी तरफ़ जाकर एक बीयर की बोतल खरीदी. उस बोतल पर वेस्टर्न ब्लॉक की किसी कंपनी का लेबल चिपका था. ये लेबल उसकी आज़ादी का सबूत था. जो उसे तय समय से 25 बरस पहले मिल चुकी थी. ये विवरण थोड़ा कंफ़्यूजिंग लग रहा होगा, इसको सुलझा देते हैं.

Berlin Wall
बर्लिन की दीवार.

दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी को चार हिस्सों में बांट दिया गया था. इन हिस्सों पर अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन और सोवियत संघ का क़ब्ज़ा हुआ. फिर अमेरिका, फ़्रांस और ब्रिटेन ने अपना हिस्सा मिलाकर एक कर लिया. इसे कहा गया, वेस्ट जर्मनी. जो हिस्सा सोवियत संघ के पास था, उसे ईस्ट जर्मनी कहा गया. बाद में ईस्ट जर्मनी की सत्ता स्थानीय नेताओं को ट्रांसफ़र की गई. हालांकि, सोवियत सेना और कम्युनिस्टम सिस्टम लंबे समय तक वहां मौजूद रहा. ये समझिए कि ईस्ट जर्मनी, सोवियत संघ की छत्रछाया में ही चल रहा था.

जुलाई 1954 में वेस्ट जर्मनी के हैम्बर्ग में एक बच्ची पैदा हुई. मां-बाप ने बड़े प्यार से नाम रखा, एंजेला. जब वो तीन साल की हुई तो उसके पिता को ईस्ट जर्मनी के एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. जिस दौर में लोग नए अवसरों की तलाश में ईस्ट से वेस्ट का रुख कर रहे थे, एंजेला के पिता ने उल्टी दिशा पकड़ी. उस समय तक लोग एक से दूसरे इलाके में आसानी से आ-जा सकते थे.

एंजेला का बचपन

अगस्त 1961 में अचानक से सब बदल गया. राजधानी बर्लिन के बीच रातोंरात दीवार खड़ी हो चुकी थी. वहां सैनिकों की गश्ती बढ़ गई. वॉच टॉवर्स तैयार हो गए. जो लोग दीवार फांदकर वेस्ट की तरफ़ जाने की कोशिश करते, उन्हें गोली मार दी जाती.

जब बर्लिन वॉल का निर्माण हो रहा था, उस समय एंजेला मात्र सात साल की थी. उसकी दुनिया ईस्ट जर्मनी के घुप्प कमरे तक महदूद हो गई. जैसे-जैसे वो बड़ी हुई, उसके सपनों का दायरा बढ़ा. उसे अमेरिका जाना था. लेकिन ईस्ट जर्मन कानून उसे ऐसा करने से रोक रहा था. वो नियम क्या था? ईस्ट जर्मनी 60 साल से ऊपर के लोगों को ही पश्चिमी देशों तक जाने की इजाज़त देता था. एंजेला को उस मुकाम तक पहुंचने के लिए लंबा इंतज़ार करना था. उसने इसी बंद दुनिया को अपनी नियति मान लिया था. लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था. बर्लिन वॉल के गिरने के बाद ईस्ट और वेस्ट जर्मनी एक हो गए. समूचा जर्मनी अब एक था और आज़ाद भी.

कुछ सालों के बाद एंजेला इसी आज़ाद मुल्क़ ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे ताक़तवर शख़्सियतों में से एक होने वाली थी. ये कहानी एंजेला मर्केल की है. वो लगातार 16 सालों तक जर्मनी की चांसलर रहीं. जर्मनी में चांसलर सरकार का मुखिया होता है. राष्ट्रपति का पद सेरेमोनियल यानी सांकेतिक है. असली शक्ति चांसलर के पास होती है. जब 2005 में पहली बार एंजेला मर्केल का नाम इस पद के लिए चर्चा में आया, तब उनकी पार्टी के भीतर के रुढ़िवादी हंसते थे. उन्हें ये मज़ाक लगता था. इससे ज़्यादा उनकी आशंका इस बात पर भी थी कि क्या एक महिला जर्मनी को संभाल पाएगी?

16 बरस बाद की स्थिति भी जान लीजिए. एंजेला मर्केल ने इस बार चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया था. इसके चलते उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर खिसक गई है. उनका सत्ता से बाहर होना तय माना जा रहा है. इसके साथ ही यूरोपियन यूनियन में जर्मनी का प्रभुत्व भी घटने की आशंका है. कहा जा रहा है कि मर्केल के जाने से एक राजनैतिक युग का अंत हो जाएगा. इससे एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है. क्या कोई नेता उनकी जगह को भर पाएगा?

Merkel
एंजेला मर्केल के सत्ता से हटने से जर्मनी की राजनीति में एक युग का अंत हो गया है.

इस वैक्युम की वजह क्या है?

1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ. उस समय चांसलर थे, हेलमत कोल. उन्होंने अपनी कैबिनेट में एंजेला मर्केल को जगह दी. मर्केल को यूथ एंड वीमेन अफ़ेयर्स मिनिस्ट्री मिली. सत्ता के गलियारों में चर्चा चलती थी कि मर्केल, कोल के बिना कुछ भी नहीं हैं. एक बार कोल बीत गए तो एंजेला मर्केल गायब हो जाएंगी. उन्होंने इस दावे को ग़लत साबित किया.

साल 2005 में उन्होंने चुनाव जीता और फिर CDU के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई. तीन साल बाद ही उनके पॉलिटिकल कैरियर का बड़ा इम्तिहान हुआ. 2008 में आर्थिक मंदी ने अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया था. ऐसे दौर में मर्केल ने लोगों को भरोसा दिलाया कि सरकार उनका पैसा डूबने नहीं देगी. उन्होंने जर्मनी को वैश्विक मंदी के दौर से सुरक्षित निकाल लिया था.

2014 में रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया था. इस दौरान भी उन्होंने रूस और यूक्रेन से बातचीत की. जानकार बताते हैं कि धैर्य मर्केल की सबसे बड़ी ताक़त है. वो किसी भी बड़े मसले को बातचीत की मेज पर बैठकर सुलझा सकती हैं. चाहे इस काम में कितना ही समय क्यों न लगे. उन्होंने यही तरीक़ा रूस और चीन के साथ भी अपनाया है.

इसके बाद 2015 में प्रवासी संकट आया. मध्य-पूर्व से प्रवासियों और शरणार्थियों का रेला यूरोप की तरफ़ आया. जर्मनी ने अपनी सीमाएं बंद करने से मना कर दिया. इसके चलते उन्हें यूरोपियन यूनियन में तो विरोध झेलना ही पड़ा, अपनी पार्टी के भीतर भी लोग उनके ख़िलाफ़ हो गए. इसके बावजूद वो अपने फ़ैसले पर अडिग रहीं. उन्होंने साफ़ किया कि अगर संकट के समय हमें विकल्प चुनना पड़े तो ये हमारा देश नहीं हो सकता. वो आज भी अपने बयान पर अटल हैं.

उन्हें इसका नुकसान भी उठाना पड़ा. 2018 के क्षेत्रीय चुनावों में उनकी पार्टी के उम्मीदवारों की करारी हार हुई. अक्टूबर 2018 में उन्होंने ऐलान कर दिया कि वो अगला चुनाव नहीं लड़ेंगी. इसके बाद से ही चर्चा शुरू हो गई कि उनके बाद कौन?

मर्केल ने 16 सालों में अपनी वो छवि कायम की है कि जर्मनी और उसके इर्द-गिर्द की पॉलिटिक्स मुंह बाए खड़ी है. उन्हें यूरोपियन यूनियन का डि फ़ैक्टो लीडर कहा जाता है. चुनाव से ठीक पहले उनकी अप्रूवल रेटिंग यूरोप के नेताओं के बीच सबसे ज़्यादा थी. उनके नेतृत्व वाला जर्मनी बड़े वैश्विक विवादों का मध्यस्थ था. मर्केल के बाद क्या यथास्थिति बरकरार रहेगी? इस सवाल का जवाब आना बाकी है. फिलहाल, जो आया है वो है, चुनावों का रिजल्ट.

नतीजे क्या कहते हैं?

ये कहते हैं कि लगातार 16 सालों तक शासन चलाने वाली CDU का सत्ता से बाहर जाना तय है. सेंटर-लेफ़्ट विचारधारा वाली सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ जर्मनी (SPD) ने सबसे ज़्यादा 25.7 फ़ीसदी वोट हासिल किए हैं. उन्हें CDU से 1.6 फीसदी अधिक वोट मिले हैं. जर्मन चुनाव का प्रोसेस क्या है? जर्मनी की संसद में दो सदन हैं. जनता के द्वारा चुना जाने वाला सदन बुन्डेस्टाग और राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला बुन्डेस्हाट.

आज बात बुन्डेस्टाग की. आमतौर पर इसमें सदस्यों की संख्या 598 होती है. लेकिन, समय-समय पर इसमें सीटें बढ़ाई जाती रहीं है. 2017 में बुन्डेस्टाग में 111 सीटें जोड़ीं गई थी. इस साल इसे बढ़ाकर 135 कर दिया गया है. मतलब ये कि बुन्डेस्टाग में इस बार 735 सदस्य बैठेंगे.

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इस बार जर्मनी में कहा जा रहा है कि लगातार 16 सालों तक शासन चलाने वाली CDU का सत्ता से बाहर जाना तय है.

जर्मनी में वोट कैसे डाले जाते हैं? 18 या 18 साल से अधिक उम्र का हर नागरिक वोटिंग में हिस्सा लेने का हकदार होता है. हर एक वोटर के पास दो वोट होते हैं. एक वोट कैंडिडेट के पर्चे पर, जबकि दूसरा वोट पार्टी वाले पर्चे पर डाला जाता है. ये ज़रूरी नहीं कि जिस पार्टी का कैंडिडेट पसंद आए, वो पार्टी भी पसंद हो. यानी आप पहला वोट एक पार्टी के कैंडिडेट को और दूसरा वोट किसी अलग पार्टी को दे सकते हैं. उम्मीदवारों वाले वोट में क्या होता है? उसमें जो सबसे ज़्यादा वोट पाए, उस कैंडिडेट की जीत हो जाती है. पार्टी वाले वोट का क्या हिसाब है? उसमें पूरे देश में पार्टी को मिले वोट का अनुपात निकाला जाता है. उसी अनुपात में सीटों का बंटवारा किया जाता है. यहां पर एक ध्यान देने वाली बात. अगर किसी पार्टी को पांच फीसदी से कम वोट मिलें तो उसे गिनती से बाहर कर दिया जाता है. मतलब ये कि पास होने के लिए पांच फीसदी वोट ज़रूरी हैं. वरना उसके उम्मीदवार संसद में नहीं बैठ सकते.

चांसलर कब चुना जाता है?

जब सरकार बन जाए. तो सरकार कब बनेगी? जब कोई गठबंधन बहुमत जुटा ले. बहुत कम संभावना होती है कि कोई पार्टी अकेले दम पर बहुमत हासिल कर पाए. इस बार के चुनाव में भी स्थिति वैसी ही है. सोशल डेमोक्रेट्स बहुमत के आंकड़े से काफ़ी पीछे हैं. लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उन्हें सबसे पहले मौका मिलेगा. अब लंबा मान-मनौव्वल चलेगा. विचारधारा के आधार पर योग्य सहयोगियों की तलाश की जाएगी. फिर समझौते होंगे. 2015 के प्रवासी संकट के बाद से जर्मनी में ज़बरदस्त ध्रुवीकरण हुआ है. ऐसे में गठबंधन बनाना इतना आसान नहीं होगा. जानकारों का कहना है कि सरकार बनने में कम-से-कम दिसंबर तक का टाइम तो लगेगा. अगर SPD सरकार बनाने में नाकाम रही, तब CDU को मौका मिलेगा. इस समय SPD के ओलाफ़ सोज़ चांसलर पद की दावेदारी में सबसे ऊपर चल रहे हैं. वो फिलहाल वाइस-चांसलर और वित्तमंत्री के पद पर हैं.

जब तक नया चांसलर चुना नहीं जाता, तब तक एंजेला मर्केल कुर्सी पर बनी रहेंगी. जर्मनी अगले बरस जनवरी में ताक़तवर जी-7 देशों का अध्यक्ष बनने वाला है. नई सरकार के लिए चुनौती आसान नहीं होने वाली है. उन्हें कोरोना के बाद की अर्थव्यवस्था, क्लाइमेट चेंज़, सोशल वेलफ़ेयर, नाटो और यूरोपियन यूूनियन के मुद्दे पर उन्हें अहम फ़ैसले लेने होंगे. एंजेला मर्केल की उदार विरासत को वे कैसे संभाल पाते हैं, इस पर सबकी निगाहें बनी रहेंगी.


चांसलर एंजेला मर्केल ने बताया जर्मनी में कितना खतरनाक है कोरोना वायरस?

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