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मोदी सरकार के 7 सालों में कितने महंगे हुए LPG, पेट्रोल-डीजल, कितनी बढ़ी महंगाई?

बिना सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर के दाम 1 सितंबर 2021 को 25 रुपये बढ़ गए. इससे दिल्ली में 14.2 किलो के सिलेंडर की कीमत अब 884.50 रुपये हो गई है. वहीं, 19 किलो का कमर्शियल गैस सिलेंडर 75 रुपये महंगा हो गया है. दिल्ली में अब इसकी कीमत 1693 रुपये तक पहुंच गई है. मात्र 15 दिन में ही गैर-सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर का दाम 50 रुपये बढ़ा है. इससे पहले 17 अगस्त को कीमतें बढ़ी थीं. इस पूरे साल की बात की जाए तो जनवरी 2021 से 1 सितंबर 2021 तक 9 बार LPG की कीमत बढ़ी है.

इसी बहाने हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के आने के बाद पिछले 7 सालों में LPG, PNG, पेट्रोल और डीज़ल के दामों में कितना अंतर आया है. जानेंगे कि 7 साल पहले दाम क्या थे और अब क्या हैं? उस समय क्रूड ऑयल का दाम क्या था और अब क्या है? महंगाई उस समय क्या थी, अब क्या है?

पहले LPG सिलेंडर की बात

LPG गैस की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से तय होती हैं. देश में आधी से ज्यादा रसोई गैस बाहर से आयात होती है. गैस के भाव इम्पोर्ट पैरिटी प्राइस के फॉर्मूले से तय होते हैं. इस फॉर्मूले में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में LPG के भाव के साथ ही समुद्री किराया, पोर्ट ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी ये सब मिलाकर डॉलर में रेट तय होता है. फिर भारतीय रुपयों में कंवर्ट कर रेट निकाला जाता है. इसके बाद ऑयल मार्केटिंग कंपनियां देश के अलग अलग हिस्सों में गैस पहुंचाने का किराया भाड़ा, सिलेंडर भरने का खर्चा, डीलर का कमिशन, जीएसटी ये सब जोड़कर प्रति सिलेंडर का रेट निकालती हैं. अब अगर डॉलर के मुकाबले रुपया कमज़ोर होता है या फिर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गैस के दाम बढ़ते हैं तो भारत में भी कंपनियां LPG के दाम बढ़ाती हैं.

Protest Against Lpg Price Hike In Amritsar
Lpg Price Hike को लेकर विपक्ष कई बार प्रदर्शन कर चुका है. (सांकेतिक फोटो-PTI)

दाम बढ़ने पर भी जनता को कम कीमत में रसोई गैस मिले, इसके लिए सरकार सब्सिडी देती थी. जो अब लगभग बंद हो गई है. वित्त वर्ष 2020-21 के लिए सरकार ने बजट में रसोई गैस और केरोसिन पर 40 हज़ार 915 करोड़ रुपये सब्सिडी के लिए रखे थे. पूरे साल में सरकार ने करीब 39 हज़ार करोड़ खर्च किए. लेकिन 2021 के बजट में सरकार ने  सब्सिडी को घटाकर एक-तिहाई कर दिया है. इस साल 14 हज़ार करोड़ रुपये ही रसोई गैस और केरोसिन पर बतौर सब्सिडी रखे गए हैं.

यानी सरकार एलपीजी पर टैक्स बढ़ाकर नहीं कमा सकती तो सब्सिडी घटा कर पैसा बचा रही है. इसीलिए जब कंपनियां गैस के दाम बढ़ाती हैं तो वो सीधे आम लोगों की जेब से निकलता है. डीज़ल और पेट्रोल की तरह रसोई गैस का मामला भी लगभग बाज़ार के हवाले है.

कितने बढ़ गए दाम?

7 साल पहले की तुलना में LPG के दाम दोगुने हो गए हैं. पिछले दिनों मार्च में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद में बताया था कि मार्च 2014 में LPG सिलेंडर का रेट 410 रुपये था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक मार्च 2014 को LPG सिलेंडर 401.50 रुपये का था, जो एक सितंबर 2021 को दिल्ली में 884.50 रुपये हो गया. यानी दोगुने से भी ज़्यादा.

हर महीने गैस सिलेंडर की कीमतें तय होती हैं. इस साल LPG की कीमत 9 बार बढ़ी है और ये 190 रुपये महंगा हुआ है. नॉन सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम कैसे बढ़ते चले गए, ये आप यहां देख सकते हैं. इसके साथ एक बात ध्यान रखनी होगी कि अब पहले की तुलना में सरकार ने सब्सिडी भी बहुत कम कर दी है.

बीती 29 अगस्त को सीएनजी की कीमतें भी बढ़ा दी गईं. दिल्ली में अब सीएनजी 45.20 रुपये प्रति किलो मिल रही है. 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने नेचुरल गैस की कीमतों के निर्धारण के लिए एक फॉर्मूला तय किया था. इसके तहत, नेचुरल गैस का इस्तेमाल उर्वरकों के उत्पादन और बिजली बनाने के लिए किया जाता है. गैस सीएनजी और पीएनजी में कंवर्ट की जाती है, जिनका इस्तेमाल वाहनों में ईंधन और घरों में कुकिंग गैस के रूप में होता है. हालांकि इस फॉर्मूले के बाद भी CNG की कीमतों में उस तरह का बदलाव देखने को नहीं मिला है जैसा कि पेट्रोल-डीजल या LPG की कीमतों में देखने को मिला है.

3 मई 2014 को दिल्ली में CNG की कीमत 38.15 रुपये प्रति किलो थी. मई 2015 में ये 15 पैसे घटी. लेकिन एक अप्रैल 2018 को इसमें 2.61 रुपये की बढ़ोतरी हुई और ये 40.61 रुपये हो गई. एक साल बाद यानी 1 अप्रैल 2019 को इसमें 5.09 रुपये की बढ़ोतरी हुई और ये 45.7 रुपये प्रति किलो हो गई. इसके बाद सीएनजी की कीमतें घटती बढ़ती रहीं. आप इसे यहां देख सकते हैं.

पेट्रोल-डीज़ल

फरवरी 2014 को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 71.41 रुपये प्रति लीटर थी. वहीं डीजल की कीमत 56.71 रुपये प्रति लीटर. आज यानी 1 सितंबर 2021 को दिल्ली में पेट्रोल 101.34 और डीजल 88.71 रुपये प्रति लीटर है. पेट्रोल डीजल पर राज्य सरकारें और केंद्र सरकार अलग-अलग टैक्स लेती हैं.

#  फरवरी 2014 में पेट्रोल का बेस प्राइस 47.13 रुपये था. केंद्र सरकार 10.38 रुपये टैक्स लेती थी. राज्य सरकारों का टैक्स होता था 11.90 रुपये. डीलर का कमीशन होता था 2 रुपये. एक लीटर पेट्रोल मिलता था 71.41 रुपये प्रति लीटर

# डीजल की बात करें तो डीजल का बेस प्राइस था 44.45 रुपये प्रति लीटर. केंद्र टैक्स लेता था 4.52 रुपये, डीलर कमीशन होता था 1.19 रुपये. राज्य का टैक्स होता था 5.55  रुपये. डीजल मिलता था 56.71 रुपये लीटर.

पेट्रोल-डीजल पर कई राज्यों ने वैट बढ़ाया है. वहीं केंद्र सरकार ने एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाई है. वो अभी पेट्रोल पर 32 रुपये 90 पैसे एक्साइज़ ड्यूटी लेती है. डीज़ल पर 31 रुपये 80 पैसे एक्साइज़ ड्यूटी है. वहीं राज्यों की बात करें तो ये लगभग पेट्रोल पर 20 रुपये और डीजल पर लगभग 12 रुपये है.

जब तेल भराने के लिए भागा भागी होगी ही नहीं तो ऐसे नज़ारे ही दिखाई देंगे, पंप पर ख़ाली बैठे लोग लूडो वग़ैरह खेलेंगे. तस्वीर ANI
पेट्रोल-डीजल से सरकार की कमाई बढ़ी है. सांकेतिक तस्वीर ANI

आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में 13 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई गई है, लेकिन घटी सिर्फ तीन बार. नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद से केंद्र सरकार पेट्रोल पर तीन गुना और डीजल पर 7 गुना टैक्स बढ़ा चुकी है.

सरकार कितना कमा रही?

पेट्रोलियम मंत्री ने संसद को बताया था कि 2013 में पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स से सरकार की कमाई 52 हज़ार 573 करोड़ थी. 2019-20 में ये बढ़कर 2 लाख 13 हज़ार करोड़ रुपये हो गई. और 2020-21 के 11 महीनों में ये कमाई बढ़कर 2 लाख 94 हज़ार करोड़ हो गई. यानी सरकार ने 7 साल में पेट्रोल-डीज़ल से अपनी कमाई 5 गुना से भी ज्यादा बढ़ा ली है.

राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर कई तरह के टैक्स और सेस लगाती हैं. इनमें सबसे प्रमुख वैट और सेल्स टैक्स होता है. पूरे देश में सबसे ज्यादा वैट/सेल्स टैक्स राजस्थान सरकार वसूलती है. यहां पेट्रोल पर 38 प्रतिशत और डीजल पर 28 प्रतिशत टैक्स लगता है. इसके बाद मणिपुर, तेलंगाना और कर्नाटक हैं, जहां पेट्रोल पर 35 फीसदी या उससे अधिक टैक्स लगता है. इसके बाद मध्य प्रदेश में पेट्रोल पर 33 फीसदी वैट लगता है.

क्रूड ऑयल

मई 2014 में जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 106.85 डॉलर प्रति बैरल थी. एक बैरल यानी 159 लीटर. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने बाद सितंबर में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के नीचे आ गई. ये गिरावट आगे भी जारी रही और जनवरी 2021 में कच्चे तेल की कीमत 54.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. यानी मनमोहन सरकार जाने के बाद से कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हुई हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि क्रूड ऑयल की कीमत कम हुई है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़े हैं.

2014 Crud Oil
चार्ट देखें. 2014 में कच्चे तेल की कीमत क्या रही और पेट्रोल डीजल की कीमत क्या रही.

इस तरह से कीमत बदलती गई

Data

रुपया के मुकाबले डॉलर

रुपये की कीमत जिस तेज़ी से गिर रही है और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच में कंपीटिशन चल रहा है, किसकी आबरू तेज़ी से गिरेगी. देश जब आज़ाद हुआ तब एक रुपया एक डॉलर के बराबर था. जब अटलजी ने पहली बार सरकार बनाई, तब तक मामला पहुंच गया था 42 रुपये तक, जब अटलजी ने छोड़ा तो 44 रुपये पर पहुंच गया था, लेकिन इस सरकार में और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रुपये पर पहुंच गया है.

नरेंद्र मोदी ने ये भाषण तब दिया था जब वे गुजरात के सीएम थे. मई 2014 में जब मोदी पीएम बने तो डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 के स्तर के आसपास था. आज एक सितंबर 2021 को डॉलर के मुकाबले रुपया 73.06 के आसपास है.

डॉलर को वैश्विक करेंसी का रुतबा हासिल है. ज़्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं. हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है. विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है. रुपये के कमजोर होने से महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है. कच्चे तेल का इंपोर्ट महंगा हो जाता है. डॉलर में होने वाला भुगतान कॉस्टली पड़ता है.

ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर महंगाई पर पड़ता है. थोक मूल्य सूचकांक अंग्रेजी में कहें तो Wholesale Price Index (WPI) में पेट्रोल और डीजल का कंबाइंड वेटेज 4.7 प्रतिशत है. इस साल फरवरी में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार से पेट्रोल और डीजल से जुड़े अप्रत्यक्ष करों में कटौती करने का आग्रह किया था.

विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोलियम का दाम 10 फीसदी बढ़ने पर खुदरा महंगाई करीब एक फीसदी बढ़ जाती है. सड़क परिवहन में डीजल इस्तेमाल होने की वजह से उससे ढोए जाने वाले सामान की लागत भी बढ़ती है, जिसमें खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा के सामान शामिल हैं.

हालांकि इंडिया टुडे हिन्दी के एडिटर और एक्सपर्ट अंशुमान तिवारी का कहना है कि एक सिंतबर को जिस तरह LPG का दाम बढ़ा, उससे यही लगता है कि सरकार पेट्रोल-डीजल जैसे उत्पादों पर टैक्स लगाना चाहती है, वहीं LPG पर सब्सिडी खत्म करना चाहती है. अंशुमन तिवारी का कहना है कि 1 सितंबर के फैसले से यही संकेत मिलता है.


नरेंद्र मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल और LPG के बढ़ते दाम पर ये पूरा सच क्यों नहीं बताती?

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