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पीएम मोदी के पारदर्शिता के दावे और PM CARES फंड की सच्चाई में अंतर है?

पारदर्शिता. अंग्रेज़ी में- ट्रैंस्पेरेंसी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस शब्द का इस्तेमाल बहुतेरे भाषणों में करते हैं. 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले वो कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता होने के दावे करते थे. वक्त बदला. भारी जनसमर्थन से मोदी प्रधानमंत्री दफ़्तर पहुंचे. मोदी ने भी पारदर्शिता शब्द का साथ नहीं छोड़ा. जैसे 15 अगस्त 2016 को लाल किले से देश के नाम संबोधन ही ले लीजिए. उन्होंने कहा-

“सरकारें पहचान बनाने के लिए लोकरंजन काम करती हैं, खज़ाना खाली करती हैं. लेकिन मैंने खुद को इस मोह से दूर रखने का पूरा प्रयास किया है. इसलिए ट्रैंस्पेरेंसी के साथ ट्रांसफॉर्मेशन करने का प्रयास किया है.”

9 मार्च 2016 को राज्यसभा में भी दावा किया कि उन्होंने प्राकृतिक संसाधन से लेकर स्पैक्ट्रम नीलामी तक, पारदर्शिता लाकर भारत के बारे में दुनिया की धारणा बदल दी है.

23 अक्टूबर 2018 को मोदी ने अपनी पार्टी- भारतीय जनता पार्टी को दिए डोनशन की रसीद जनता से शेयर की. एक मक़सद जनता को डोनेशन के लिए प्रोत्साहित करना रहा होगा, लेकिन दूसरा कहीं ना कहीं सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता को सामने रखना रहा होगा.

9 जनवरी 2019 यानी लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले मोदी महाराष्ट्र के सोलापुर पहुंचे थे. वहां उन्होंने भाषण में कहा

“पहले मलाई बिचौलिए खाते थे, आज वो सारा बंद हो गया है. चोरी-लूट की दुकानों को ताले लग गए हैं. वो लोग (कांग्रेस) चाहे ज़ोर-ज़ोर से झूठ बोलें, लेकिन ये चौकीदार, ये सफाई बंद नहीं करेगा.”

यानी कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले कार्यकाल के अंत तक सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के अहम होने की बात कहते रहे हैं. अब आप कहेंगे कि हेडिंग में तो PM CARES फंड की बात कही है, लेकिन यहां अलग ही ज्ञान चल रहा है!

दरअसल, PM CARES फंड की वजह से पीएम मोदी की उसी पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, जिसे वो बार-बार दोहराते हैं.

28 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने इस नए फंड का ऐलान किया था. आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, PM CARES फंड एक पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट है, जो किसी भी आपदा की स्थिति में राहत कोष की तरह काम करेगा.

प्रधानमंत्री के ऐलान के तीन दिन के भीतर ही इस नए फंड में 3 हज़ार करोड़ इकट्ठे हो गए. सरकार के मुताबिक, इसमें से वेंटिलेटर ख़रीदने और लॉकडाउन में राहत कार्य के लिए रकम दी गई.

नए फंड के ऐलान पर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने सवाल उठाए. कांग्रेस का कहना था कि जब पहले से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PM NRF) है, तो नए फंड की क्या ज़रूरत? 31 मार्च को एक ट्वीट में कांग्रेस ने सवाल उठाया कि क्या PM CARES छवि चमकाने का ज़रिया है?

इसके बाद कांग्रेस लगातार मांग करती रही कि PM CARES के पैसे को PM NRF में ट्रांसफर किया जाए, ताकि ‘पारदर्शिता’ सुनिश्चित हो सके.

PM CARES की ये बहस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची. और वहां आखिरी फैसला सरकार के हक़ में आया.

क्या हैं PM CARES और PM NRF?

PM CARES और PM NRF

दोनों पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट हैं, जिनकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं. दोनों ट्रस्टों के ट्रस्टी (या अधिकारी) अवैतनिक आधार पर सेवाएं देते हैं.

क्यों बनाए गए?

PM NRF 24 जनवरी 1948 को बनाया गया था. मक़सद था पाकिस्तान छोड़कर भारत आ रहे लोगों की मदद करना. कुछ सालों बाद से इसका इस्तेमाल प्राकृतिक आपदा जैसे- बाढ़, चक्रवात, भूकंप से लेकर दंगा प्रभावित लोगों मदद के लिए तक में किया जाने लगा.

PM CARES के फ्रेमवर्क में किसी भी आपात स्थिति या ख़राब हालत में फंड देने का प्रावधान है. यानी इसका दायरा PM NRF से बड़ा है.

डोनशन

PM NRF में सबसे छोटा योगदान 100 रुपये का हो सकता है. PM CARES इससे भी छोटे योगदान स्वीकार करता है. यहां 10 रुपये न्यूनतम राशि है. डोनेशन कैश, ड्राफ्ट, नेट बैंकिंग या UPI के ज़रिए किया जा सकता है.

– दोनों फंड्स में डोनेशन देने पर इनकम टैक्स के सेक्शन 80(G) के तहत छूट मिलती है.

ट्रस्ट में और कौन-कौन होता है?

PM NRF की स्थापना के समय यानी 1948 में प्रधानमंत्री के अलावा उप-प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, टाटा ट्रस्ट का नुमाइंदा और एक उद्योग जगत का नुमाइंदा इस ट्रस्ट की कमिटी में शामिल था. हर तरह के ख़र्च को यही कमिटी मंजूरी देती थी.

1985 में बतौर प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में ट्रस्ट के सदस्यों ने PM NRF के इस्तेमाल की सारी शक्तियां प्रधानमंत्री को सौंप दीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने फंड के संचालन के लिए एक सेक्रेटरी की नियुक्ति की.

मौजूदा वक्त में फंड से जुड़े कामों को सुचारू रखने के लिए एक जॉइंट सेक्रेटरी और एक डायरेक्टर अवैतनिक आधार पर काम करते हैं. प्रधानमंत्री विवेकानुसार आपदा राहत के लिए राशि जारी करने का फैसला लेते हैं.

PM CARES के चेयरमैन प्रधानमंत्री होते हैं. इसके अलावा रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी हैं. इस ट्रस्ट के चेयरमैन के पास शोध, विज्ञान, सामाजिक कार्य, स्वास्थ्य, कानून, समाजसेवा या प्रशासनिक पृष्ठभूमि के तीन नामचीन लोगों को बतौर ट्रस्टी चुनने का अधिकार भी है.

स्पेशल नोट:

सोशल मीडिया पर एक फेक न्यूज़ खूब फैली है कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष आज भी PM NRF का सदस्य होता है. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा कई बार ये बात बोल चुके हैं. वो एक नाम हैं, सार्वजनिक जीवन जीने वाले ऐसे कई लोग हैं, जो ये भ्रामक दावा करते हैं. (आर्काइव लिंक)

दिल्ली हाई कोर्ट में PM NRF vs असीम तक्यार मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट और जस्टिस सुनील गौड़ की बेंच ने नोट किया था कि 1985 में PM NRF की सारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास आ गई थीं. ऐसे में PM NRF का संचालन पूर्ण रूप से प्रधानमंत्री कार्यालय करता है, कांग्रेस अध्यक्ष पद का PM NRF से अब कोई नाता नहीं है.(आर्काइव लिंक)

PM NRF की वेबसाइट पर भी इस फंड को मैनेज करने के बारे में सिर्फ प्रधानमंत्री, जॉइंट सेक्रेटरी और डायरेक्ट का ज़िक्र है.

PM CARES पर आपत्तियां

CSR पर सवाल

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत कंपनियां अपने आखिरी 3 सालों के औसत मुनाफ़े का 2% सामाजिक कार्यों में ख़र्च करती हैं. PM CARES के ऐलान के बाद कंपनी मामलों के मंत्रालय ने एक सर्कुलर और निकला. इसमें बताया गया कि कंपनियों की ओर से PM CARES में किए गए डोनेशन को CSR माना जाएगा.

वहीं, PM NRF में कंपनियां CSR का पैसा नहीं दे सकतीं. इसके नियमों पर कम से कम दो बार हाई पावर कमिटियां बैठ चुकी हैं. द वायर में छपे संचिता श्रीधर के लेख के मुताबिक, दोनों बार कमिटियां इसी नतीजे पर पहुंचीं कि CSR का इस्तेमाल PM NRF में डोनेशन के लिए नहीं हो सकता. इनके तर्क थे कि-

-कंपनियां चाहती होंगी कि CSR में पैसा डोनेट करें और इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के तहत मिलने वाली छूट का दोहरा फायदा उठा सकें और सामाजिक कार्यों में लगने वाली मेहनत से भी बचा जा सके.
– दूसरा, CSR के पैसे का इस्तेमाल सरकारी खज़ाने के लिए नहीं किया जा सकता. ये CSR एक्ट की मूल भावना के ख़िलाफ़ है. CSR के तहत जो प्रोजेक्ट चलाए जाएं, उनका असर सरकारी स्कीमों से कई गुना हो.

PM CARES में CSR का फायदा मिलना भी कॉर्पोरेट की ओर से यहां बड़े डोनेशन दिए जाने का एक कारण हो सकता है.

इन्हीं बातों के चलते राजस्थान सरकार केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ले गई है. राजस्थान सरकार का कहना है कि अगर PM CARES में CSR का पैसा लिया जा सकता है तो CM रिलीफ फंड में क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल इस पर सुनवाई चल रही है.

सुप्रीम कोर्ट में PM CARES

एक NGO है सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL). इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में PM CARES में जुटा फंड नेशनल डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फंड (NDRF) में ट्रांसफर करने के लिए याचिका डाली थी. NDRF आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 46 के तहत बना फंड है. राज्यों के पास आपदा से निपटने के लिए फंड की कमी होने पर इससे मदद दी जाती है.

CPIL के वकील दुष्यंत दवे ने आरोप लगाया था कि PM CARES में फंड जमा करना आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का उल्लंघन है. उन्होंने यह आपत्ति भी जताई कि PM CARES का ऑडिट भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी CAG करें, ना कि कोई प्राईवेट ऑडिटर.

19 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच ने इस मामले में फैसला दिया. कहा- PM CARES फंड आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का उल्लंघन नहीं करता है. जस्टिस अशोक भूषण, आर. सुभाष रेड्डी और एम.आर. शाह की बेंच ने कहा-

“PM CARES एक चेरिटेबल ट्रस्ट है. ऐसे में पैसे को NDRF जैसे वैधानिक फंड में ट्रांसफर करने का निर्देश देने की बात ही नहीं आती. ये फंड पूरी तरह ऐच्छिक योगदान पर बना है. इसमें सरकारी पैसा नहीं लगा है. हां, अगर सरकार चाहे तो इस पैसे को NDRF में ट्रांसफर करने के लिए स्वतंत्र है.”

CAG की ओर से ऑडिट ना करने की बात पर कोर्ट ने कहा

“NDRF और PM CARES फंड पूरी तरह से अलग हैं. NDRF एक्ट, 2005 के तहत भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के NDRF का ऑडिट करने का प्रावधान है. लेकिन CAG की ओर से पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट का ऑडिट कभी नहीं किया गया है.”

PMCARES और PMNRF की वेबसाइट्स के मुताबिक, SARC एंड एसोसिएट नाम की कंपनी इन दोनों फंड्स का ऑडिट करेगी.

मोदी सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला PM CARES की स्वीकार्यता और वैधता के सर्टिफिकेट की तरह है. बावजूद इसके, जिस पारदर्शिता का दावा मोदी करते हैं, उस पर विपक्षी अब भी लगातार सवाल उठा रहे हैं. 19 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी के लगातार हो रहे घेराव से राहत ज़रूर दी है. लेकिन अब PM CARES से ख़रीदे-गए वेंटिलेटर्स में फ़र्ज़ीवाड़े के आरोप लगने लगे हैं. इस बारे में और जानने के लिए देखिए ये वीडियो.

वीडियो- पीएम केयर्स फंड के जरिए खरीदे गए दो फर्म के वेंटिलेटर्स क्लिनिकल ट्रायल में फेल हो गए!

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