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50 रुपये वाली वैक्सीन के लिए मोदी सरकार ने क्या डील की है?

वैक्सीन की भारी कमी के बीच अब केंद्र की मोदी सरकार कुछ कोर्स करेक्शन में लगी है. सरकार ने पहले से चली आ रही वैक्सीन खरीद की नीति में एक बदलाव किया है. उस वैक्सीन के डोज़ बुक करवा दिए हैं जो अभी लॉन्च भी नहीं हुई है. केंद्र सरकार ने बायोलॉजिकल ई वैक्सीन के 30 करोड़ डोज़ बुक कराए हैं. और उत्पादन में सहयोग के लिए भारत सरकार वैक्सीन की डिलिवरी से पहली ही 1500 करोड़ रुपये दे देगी. ये वैक्सीन अभी तैयार नहीं है. इस वैक्सीन का नाम है कोरबेवैक्स.

अमेरिका में ह्यूस्टन की बेयलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन में पिछले साल से ही वैक्सीन पर रिसर्च शुरू हो गई थी. भारत में इसका करार बायोलॉजिकल ई कंपनी के साथ है. माना जा रहा है कि ये सबसे सस्ती मेड इन इंडिया वैक्सीन होगी. सरकार अगर 30 करोड़ वैक्सीन डोज़ के लिए 1500 करोड़ रुपये दे रही है तो 50 रुपये प्रति डोज़ का हिसाब बैठता है. अभी कोविशिल्ड के लिए केंद्र की सरकार 150 रुपये प्रति डोज़ दे रही है. इसकी एक तिहाई लागत में ही बॉयोलॉजिकल ई वैक्सीन मिल सकती है. हालांकि अभी इसकी फाइनल कीमत तय नहीं है. तय इसलिए नहीं है क्योंकि अभी वैक्सीन लॉन्च ही नहीं हुई है. तो कब लॉन्च होगी? अगस्त के महीने तक. 40 दिन पहले इसके तीसरे फेज़ का ट्रायल शुरू हुआ था. ये दो महीने और चलेगा. ट्रायल का रिजल्ट कंपनी ड्रग कंट्रोलर को सौंपेगी और उसके आधार पर इमरजेंसी यूज़ का लाइसेंस मिलेगा. यानी अभी इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा.

टीके क्यों टीके कम पड़ने लगे?

ये पहली बार है कि मोदी सरकार ने लाइसेंस मिलने से पहले ही वैक्सीन बुक करवाई गई है. वैक्सीन की किल्लत के बीच मोदी सरकार पर सवाल उठे. कि जब दुनिया के और देश पिछले साल वैक्सीन बुक करवा रहे थे तो हमारी सरकार क्यों पीछे थी? हमने वैक्सीन क्यों नहीं बुक कराई थी. अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देशों ने पिछले साल ही वैक्सीन बुक करवा दी थी. जब मॉडेर्ना और फाइज़र के ट्रायल चल रहे थे, तब उनके पास बुकिंग के ऑर्डर आना शुरू हो गए थे. लेकिन हमारी सरकार ने ऐसा नहीं किया. ट्रायल के बाद वैक्सीन्स को आधिकारिक अनुमति मिलने का इंतजार किया. इस साल जनवरी में जब कोविशिल्ड और कोवैक्सीन को इमरजेंसी यूज़ परमिशन मिली, उसके बाद ही सरकार ने ऑर्डर दिए. इसलिए हमारे पास विकल्प कम रह गए. कोरोना की दूसरी लहर से लड़ने के लिए जब तेज़ गति से टीकाकरण की ज़रूरत हुई तो टीके कम पड़ने लगे. कोविशिल्ड और कोवैक्सीन के अलावा बाहर से टीके लेने की ज़रूरत पड़ी. लेकिन ऑर्डर बुक नहीं हो पा रहे थे.

मई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा था कि फाइज़र और मॉडेर्ना ने सरकार को बताया है कि उनके ऑर्डर पहले से फुल हैं. यानी हमने बुक कराने में काफी देर कर दी थी. हालांकि सरकार ने कभी खुले तौर पर ये नहीं माना कि उसकी टीका खरीदने की नीति में कोई खामी है या टीके पर्याप्त नहीं हैं. वैक्सीन पर्याप्त हैं वाली बात सरकार ने तब भी कही जब विदेश में वैक्सीन भेजने पर सवाल उठे. मार्च में विदेश मंत्रालय ने वैक्सीन मैत्री पर संसद में जवाब दिया था. विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश में पर्याप्त वैक्सीन होने के आधार पर ही विदेश में भेजने का फैसला लिया गया है. टीके की घरेलू जरूरत को लगातार मॉनिटर किया जा रहा है. ऐसे जवाबों से सरकार लगातार अपने वैक्सीन पर अपने विज़न को सही बताती रही. लेकिन देश में सबसे बड़े टीकाकरण के लिए टीके कितने पर्याप्त हैं, ये अब सबके सामने है. और अब ऐसा कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि टीके बुक कराने का जो काम अमेरिका जैसे देश पिछले साल कर रहे थे हमारी सरकार को भी करना चाहिए था.

जो नहीं हुआ, उसका नतीजा हम सब भुगत रहे हैं. अब सरकार कोर्स करेक्शन करती नज़र आ रही है. लेकिन ये देर आयद क्या दुरुस्त आयद भी है, समय ही बताएगा.

डॉक्टर्स क्यों इस्तीफ़ा दे रहे?

अब बात करेंगे उन कोरोना वॉरियर्स डॉक्टर्स की, जिनके लिए हमारी सरकार ने पिछले साल थाली बजवाई थी, तालियां बजवाई थी. फूल बरसाए थे. खूब मान-सम्मान हुआ भी था. होना भी चाहिए. लेकिन ये ही डॉक्टर्स जब सरकार से कुछ मांग लेते हैं तो बात सरकार को पसंद नहीं आती है. और फिर 3 हज़ार डॉक्टर्स एक साथ इस्तीफा दे देते हैं.

मध्य प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से ये ही हो रहा है. 31 मई से जूनियर डॉक्टर्स हड़ताल पर हैं. सरकार से अपनी कुछ मांगें मनवाने के लिए. सरकार की तरफ से कोई ठोस जवाब नहीं आया. तो डॉक्टर्स ने हड़ताल भी खत्म नहीं की. सरकार कह रही है कि कोरोना के दौर में डॉक्टर्स हठधर्मिता कर रहे है. और डॉक्टर्स कह रहे हैं कि सरकार हमसे बात करने तक नहीं आई. ये मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में गया. शैलेंद्र नाम के एडवॉकेट ने याचिका दायर कर कहा कि कोरोना के दौर में डॉक्टरों की हड़ताल से संकट बढ़ जाएगा. गुरुवार को हाईकोर्ट का फैसला आया. हड़ताल को गैरकानूनी बताते हुए खत्म करने का आदेश दिया. खत्म नहीं करने पर सरकार से कड़ी कार्रवाई करने को कहा. इसके बाद एमपी की सरकारी मेडिकल कॉलेजों के 3 हज़ार से ज़्यादा डॉक्टर्स ने एक साथ इस्तीफा दे दिया.

इसके साथ ही अस्पतालों से वो तस्वीरें भी आ रही हैं जो आमतौर पर डॉक्टर्स की हड़ताल के दौरान आती हैं. डॉक्टर्स की कमी से मरीजों को परेशानी की तस्वीरें. डॉक्टर्स पर आरोप लग रहा है कि वो कोरोन महामारी के दौरान सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं. लेकिन जूनियर डॉक्टर्स एसोसिशन का कहना है कि ये उनकी पुरानी मांगें हैं. इनके लिए वो 6 महीने में कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं. इस साल 6 मई को भी पूरे मध्य प्रदेश में हड़ताल रखी गई थी. लेकिन 24 घंटे से पहले ही खत्म कर दी गई. क्योंकि स्वास्थ्य मंत्री ने मांगें मानने का मौखिक भरोसा दिया था. हालांकि कोई लिखित आदेश नहीं निकाला गया. डॉक्टर्स कह रहे हैं कि अब तक मांग मानने का कोई संकेत नहीं मिला, इसलिए दोबारा हड़ताल करनी पड़ी.

तो डॉक्टर्स सरकार से चाहते हैं क्या हैं, उनकी मांग क्या हैं?

>> हड़ताल कर रहे डॉक्टर्स का कहना है कि 3 साल पहले स्टाइपेंड या वेतन में 6 फीसदी बढ़ोतरी का वादा किया था. वो नहीं हुआ तो अब 24 फीसदी हाइक दी जाए. जिसमें 6 फीसदी कोरोना इनसेंटिव्ज भी हो.
>> आगे से हर साल 6 फीसदी की वेतन में बढ़ोतरी हो.
>> डॉक्टर्स या उनके परिवार को कोरोना होने पर अस्पतालों में बेड की प्राथमिकता दी जाए.
>> सुरक्षा के लिए कोरोना ब्लॉक के सामने पुलिस चौकी हो
>> जितना जल्दी हो सके थर्ड ईयर की पीजी परीक्षाएं करवाई जाएं
>> रेजिडेंट डॉक्टर्स के लिए 1 साल गांव में सेवा देनी वाली शर्त में छूट दी जाए क्योंकि कोरोना में ड्यूटी दी है.

सरकार पर आरोप है कि वो प्रदर्शनकारी डॉक्टर्स से बात तक करने को तैयार नहीं है. इसके बजाय एसोसिशन के नेताओं के घर पुलिस भेजकर उनको धमकाया जा रहा है, हड़ताल खत्म करने का दबाव बनाया जा रहा है. ऐसे आरोप प्रदर्शनकारी डॉक्टर्स के ही हैं.

सरकार का क्या कहना है?

अब सरकार के पक्ष पर आते हैं. मध्य प्रदेश के मेडिकल शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा है कि सरकार ने डॉक्टर्स की स्टाइपेंड बढ़ाने वाली मांग तो मान ली है, पर वो गांवों में ड्यूटी के लिए नहीं जाना चाहते.

तो मंत्री जी के हिसाब से सरकार ठीक है, सारी कमी हड़ताल कर रहे डॉक्टर्स में ही है. आज 4 जून है. यानी हड़ताल का 5वां दिन. मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां डॉक्टर्स पहले से ही कम हैं, वहां 3 हज़ार डॉक्टर्स के इस्तीफे का संकट हम समझ सकते हैं. सरकार और डॉक्टर्स वाले झगड़े का नुकसान मरीज़ों को हो रहा है. बड़ी जिम्मेदारी सरकार की बनती है. डॉक्टर्स से बात करके भरोसे में लेना चाहिए. मांगों पर जो फैसले लिए हैं उनका लिखित प्रमाण देना चाहिए. ताकि ये संकट खत्म हो. हम उम्मीद करते हैं मध्य प्रदेश की सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ हड़ताल कर रहे डॉक्टर्स के साथ पेश आएगी.


विडियो- कोरोना में मध्य प्रदेश के 3500 जूनियर डॉक्टरों ने इस्तीफ़ा क्यों दे दिया?

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