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कांग्रेस के भीतर की वह सर्वशक्तिमान कमेटी कौन है, जो पार्टी में सबका भाग्य तय करती है

कांग्रेस में महामंथन का दौर जारी है. फिर से कांग्रेस वर्किंग कमेटी यानी सीडब्लूसी की बैठकें चल रही हैं. यक्ष प्रश्न यह है कि पार्टी का स्थायी अध्यक्ष कौन हो? कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी का कार्यकाल खत्म होने पर है. ऐसे में मांग उठी है कि कौई गैर नेहरू-गांधी कांग्रेस की कमान संभाले. इस पर फैसला करने के लिए जिस पावरफुल कमेटी सीडब्लूसी का जिक्र बार-बार आता है, आखिर वह है क्या. आइए जानते हैं कांग्रेस के भीतर सर्वशक्तिमान सीडब्लूसी के बारे में-

क्या है यह कांग्रेस वर्किंग कमेटी या CWC?

यह कांग्रेस पार्टी के भीतर सबसे ताकतवर कमेटी है. हर मुद्दे पर इसका कहा ही सर्वमान्य होता है. कांग्रेस पार्टी के संविधान में जो भी लिखा है, उसका क्या मतलब है और उसे कैसे लागू करवाना है, इसकी जिम्मेदारी भी सीडब्लूसी पर ही होती है. कुल मिलाकर यह पार्टी के भीतर उन चंद लोगों की कमेटी है, जिन्हें सबसे ज्यादा अधिकार मिले होते हैं. पार्टी में इनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता.

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सोमवार को हो रही कांग्रेस वर्किंग कमेटी की ऑनलाइट मीटिंग की यह तस्वीर खूब वायरल हुई. (फोटो-ट्विटर)

 

CWC के मेंबर कौन होते हैं?
कांग्रेस के संविधान के अनुसार, कांग्रेस वर्किंग कमेटी में पार्टी अध्यक्ष के अलावा संसद में दल का नेता ( जैसे, वर्तमान में अधीर रंजन चौधरी) के अलावा 23 दूसरे मेंबर होते हैं. इनमें से 12 का चुनाव ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी या एआईसीसी करती है. अब आपको लगेगा कि ये AICC एआईसीसी कहां से आ गई. असल में यह एआईसीसी कांग्रेस पार्टी की फैसला लेने वाली एक केंद्रीय समिति है. इसमें हर प्रदेश कांग्रेस की कमेटी से चुने हुए सदस्य होते हैं. ऐसे में इसके मेंबर लगभग 1000 होते हैं. हालांकि एआईसीसी की अध्यक्षता भी कांग्रेस का अध्यक्ष ही करता है. एआईसीसी में महासचिवों का चुनाव पार्टी प्रेसिडेंट और सीडब्लूसी करती है. तो ये हुई बात AICC की अब वापस आते हैं CWC पर. इसके अलावा बचे 11 सदस्यों का चयन कांग्रेस का अध्यक्ष करता है.


इसकी ताकत कितनी होती है?

जैसा कि हमने बताया कि यह सर्वशक्तिमान होती है. तकनीकी रूप से सीडब्लूसी को पार्टी प्रेसिडेंट को नियुक्त करने और हटाने की ताकत होती है.
आम तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव या फिर से चुनाव के बाद सीडब्ल्यूसी गठन होता है। सीडब्लूसी का पुनर्गठन एआईसीसी के पूर्ण सत्र के दौरान किया जा सकता है.

 

सीडब्लूसी पहली बार कब बनाई गई?

कांग्रेस वर्किंग कमेटी का गठन आजादी से पहले दिसंबर 1920 में नागपुर सेशन के दौरान हुआ था. इसकी अध्यक्षता सी विजयराघवचारी ने की थी. तब इसमें 15 सदस्य होते थे, जिनका चयन ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी करती थी. आजादी की लड़ाई के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंगों में लिए गए. महात्मा गांधी भी वक्त-वक्त पर इन मीटिंग का हिस्सा बनते थे. वक्त के साथ कांग्रेस बदली और सीडब्लूसी में भी बदलाव आया. कांग्रेस में जवाहर लाल नेहरू युग की समाप्ति के साथ ही विरोध के स्वर भी मुखर होने लगे. 1967 में कांग्रेस पहली बार दो टुकड़ों में बंट गई. इनमें से एक धड़ा वो था, जो इंदिरा गांधी के समर्थन में था. दूसरा वह था, जो कांग्रेस के राज्य स्तर के क्षत्रपों का साथ दे रहा था. विरोधी खेमे में कामराज, प्रफुल्लचंद्र सेन, अजोय मुखर्जी और मोराजी देसाई जैसे नेता थे. इससे कांग्रेस वर्किंग कमेटी की ताकत में कमी आई. लेकिन जब इंदिरा गांधी 1971 में भारी बहुमत के साथ चुनकर आईं तो विरोध के स्वर दब गए. इसी के साथ कांग्रेस में राज्य स्तर के नेताओं की ताकत कम करने का दौर शुरू हुआ. इसी के चलते एआईसीसी की ताकत भी कम हुई. अब कांग्रेस वर्किंग कमेटी दिल्ली में होते हुए पूरे देश में पार्टी के फैसले लेने वाली सबसे ताकतवर कमिटी के तौर पर उभरी. यहीं से प्रदेशों में संकट से निपटने के लिए दिल्ली से पार्टी के ऑब्जर्वर भेजने की परंपरा शुरू हुई. ये ऑब्जर्वर ही पार्टी ‘हाईकमान’ का मेसेज प्रदेशों तक पहुंचाने का काम करते थे. यह सिलसिला अब तक जारी है. पिछले दिनों राजस्थान संकट के वक्त 2 ऑब्जर्वर अजय माकन, रणदीप सुरजेवाला इस परंपरा के तहत ही भेजे गए थे.

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1940 में इलाहाबाद में सीडब्लूसी मीटिंग में भाग लेते महात्मा गांधी और सरदार पटेल. (फोटोःविकीपीडिया)

 

आखिर बार सीडब्लूसी का इलेक्शन कब हुआ था?

पिछले 50 सालों में सही मायने में कांग्रेस में सिर्फ 2 बार ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी में इलेक्शन हुआ है. वह भी तब, जब कोई गैर नेहरू-गांधी पार्टी में ताकतवर स्थिति में रहा.

1992 में एआईसीसी की तिरुपति में हुई पूर्ण बैठक में कांग्रेस प्रेसिडेंट पीवी नरसिम्हा राव ने सीडब्लूसी में इलेक्शन करवाए. उन्हें लगा, उनके समर्थन वाला शख्स ही जीतेगा. अपने विरोधियों के बावजूद- सबसे महत्वपूर्ण रूप से अर्जुन सिंह, लेकिन साथ ही शरद पवार और राजेश पायलट – चुने गए. हालांकि, राव ने पूरे सीडब्लूसी को इस्तीफा देने के लिए कहा. कारण बताया कि कोई एससी, एसटी या महिला नहीं चुनी गई थी.

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सोनिया गांधी और राहुल गांधी की अध्यक्षता में सीडब्लूसी में बड़े बदलाव देखने को कम ही मिले हैं.

1997 में सीडब्लूसी के फिर से चुनाव हुए. इस बार पूर्ण बैठक कलकत्ता में हो रही थी. अध्यक्षता कर रहे थे सीताराम केसरी. इस बार जीतने वालों में अहमद पटेल, जितेंद्र प्रसाद, माधव राव सिंधिया, तारिक अनवर, प्रणब मुखर्जी, आर के धवन, अर्जुन सिंह, गुलाम नबी आजाद, शरद पवार और कोटला विजय भास्कर रेड्डी शामिल थे।

इससे पहले 1969 में एक बार युवा तुर्क चंद्रशेखर को लेकर पार्टी में उथल-पुथल की नौबत आई. लगा कि इलेक्शन होगा लेकिन पार्टी ने उन्हें सर्वसम्मति से चुन लिया और विवाद के साथ ही इलेक्शन भी टल गया.

अप्रैल 1998 में सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद ज्यादातर सीडब्लूसी मेंबर सोनिया गांधी के संरक्षण से ही नियुक्त किए जाते रहे हैं.

और पिछली बार सीडब्लूसी का पुनर्गठन कब हुआ था?

राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के 3 महीने बाद मार्च 2018 में एआईसीसी ने उन्हें सीडब्लूसी को पुनर्गठित करने के लिए अधिकृत किया. इससे पहले मार्च 2011 में सोनिया गांधी ने सीडब्लूसी को पुनर्गठित किया था. उन्होंने कोई खास परिवर्तन नहीं किया, बस अर्जुन सिंह और मोहसिना किदवई को मुख्य सीडब्लूसी से हटाकर स्थायी आमंत्रित सदस्यों के तौर पर शामिल कर लिया.

कुल मिलाकर लब्लोलुआब यह है कि हर पार्टी अध्यक्ष अपने हिसाब से सीडब्लूसी चाहता है. कोई नहीं चाहता कि मीटिंग में विरोध के स्वर उठें. वैसे इस तरह की व्यवस्था ही कांग्रेस के संविधान में बनाई गई है. कांग्रेस के संविधान में ही 25 सदस्यों में सिर्फ 12 सदस्यों के चुने जाने का प्रावधान है. बाकी पार्टी अध्यक्ष की मर्जी के लोग ही होते हैं. ऐसे में हमेशा अध्यक्ष ही भारी पड़ता है.

 

CWC का मेंबर बनने के लिए कितना ‘गुणी’ होना चाहिए?

गुण का कोई सीधा पैमाना नहीं है. पार्टी अध्यक्ष के प्रति वफादारी और क्षेत्रीय, जातिगत और संगठन में संतुलन बनाकर कमेटी बनाने की कोशिश की जाती है. महिलाओं को शामिल करने को लेकर कभी बहुत उत्सुकता नहीं दिखी. जिन नेताओं को राज्य के क्षत्रपों के खिलाफ बड़े नेताओं के तौर पर देखा जाता है, उन्हें संतुलन कायम करने के लिए कमेटी में जगह दी जाती है. राजस्थान में हुए पायलट-गहलोत विवाद के सुलझ जाने के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि पायलट को सीडब्लूसी में जगह दी जाएगी. हालांकि बहुत करिश्माई और जननेता को कम ही सीडब्लूसी में जगह मिल पाती है.

राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष रहते हुए सीडब्लूसी में युवा और सीनियर नेताओं के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश की. इसके तहत वह पार्टी सेक्रेटिएट में कई युवा चेहरों को लेकर आए. गौरव गोगोई, आरपीएन सिंह, जितेंद्र सिंह और राजीव सातव जैसे नेताओं को प. बंगाल, झारखंड, ओडीशा और गुजरात का इंचार्ज बनाया गया. हालांकि राहुल गांधी युग के पहले कार्यकाल के समाप्त होने के बाद ये भी ठंडे नजर आए.

 

बीजेपी में भी क्या CWC जैसा कुछ है?

बीजेपी में भी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की तरह पार्टी के लिए बड़े फैसले लेने के लिए एक केंद्रीय संगठन है. इसे बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड या भारतीय जनता पार्टी की ससंदीय परिषद कहा जाता है. इसमें बीजेपी अध्यक्ष द्वारा चुने हुए 11 सदस्य होते हैं. सीडब्लूसी से विपरीत बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग अक्सर होती है. जब भी कोई बड़ा फैसला लेना होता है, बोर्ड की मीटिंग बुलाई जाती है. सन 2013 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड ने ही मुहर लगाई थी. सीडब्लूसी की तरह इसका काम सरकार की नीतियों पर बात करना भी है. लेकिन बोर्ड ने कभी सरकार की पॉलिसी पर कोई बात नहीं की है.

वीडियो – सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के पीछे क्या 23 नेताओं का लेटर है?

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