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बिहार चुनाव: बीजेपी का 3-N फॉर्मूला क्या है?

बिहार चुनाव की तारीख़ों का ऐलान हो चुका है. तीन चरणों में वोटिंग होगी- 28 अक्टूबर, तीन नवंबर  और सात नवंबर को. नतीजे आएंगे 10 नवंबर को. पूरा शेड्यूल यहां देख सकते हैं.

बीजेपी इस समय देश की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी है. बिहार में उसकी क्या तैयारी है? बीजेपी की तैयारी और उसकी रणनीति टिकी है 3-N पर. कौन हैं ये 3-N, जानते हैं.

नरेंद्र मोदी: सबसे ऑब्वियस नाम

जब ये तय हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी एनडीए का चेहरा होंगे, तो नीतीश कुमार ने एनडीए का साथ छोड़ दिया. लेकिन मोदी के दम पर एनडीए को 31 सीटें मिलीं. फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और लालू साथ आ गए. मोदी पर जमकर जुबानी हमले हुए. बिहारी डीएनए का मुद्दा उठा. मोहन भागवत के बयान के बाद आरक्षण का मुद्दा भी उठा. साथ आए नीतीश और लालू चुनाव जीत गए. सरकार भी बनी लेकिन ज्यादा समय तक चली नहीं. इस चुनाव में नीतीश फिर एनडीए का हिस्सा हैं. इस बार के चुनाव में जेडीयू के पोस्टर पर एक बार फिर नरेंद्र मोदी दिख रहे हैं.

जब नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के राजनीतिक रिश्तों का ज़िक्र होता है तो नीतीश की एक भूल का भी ज़िक्र आता है. दरअसल बिहार में 34 फीसदी लोग अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं और 28 फीसदी पिछड़ा वर्ग से. नीतीश कुमार ने 2012-13 में एक दांव चला. बिहार में एक समुदाय विशेष को पिछड़ा से हटाकर अति पिछड़ा में डाल दिया. लेकिन उनका ये दांव साल भर के भीतर ही ब्लंडर साबित हो गया. 2013-14 में देश की राजनीति में नरेंद्र मोदी तेजी से उभरे. मोदी ख़ुद भी उसी समुदाय से आते थे, जिसे अति पिछड़ा में किया गया था. लिहाजा अति पिछड़ा समुदाय बीजेपी की तरफ हो लिया. और फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेेले 22 सीटें जीतीं. नीतीश अवाक रह गए.

ये एक बानगी भर था कि किस तरह बिहार में जातीय समीकरण काम करते हैं. अब ‘ब्रैंड मोदी’ की अपील को देखते हुए 2020 में एक तरह से नीतीश के पास ज़्यादा विकल्प बचे भी नहीं हैं. नरेंद्र मोदी का फैक्टर इस बार भी काफी अहम होगा.

नित्यानंद राय: बीजेपी का यादव कार्ड

नित्यानंद राय बिहार के उजियारपुर से सांसद हैं. हाजीपुर के रहने वाले हैं. केंद्र में गृह राज्यमंत्री हैं. और बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. संघ की शाखाओं से निकले हुए नेता हैं. एबीवीपी में भी रहे. अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. हाजीपुर से लगातार चार बार विधायक रहे. फिर 2014 में उजियारपुर से पहली बार सांसद बने. 2016 में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने. इसके बाद 2019 में बीजेपी ने बिहार में कुल 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी 17 सीटों पर जीत मिली. खुद नित्यानंद भी फिर से उजियारपुर से सांसद बने. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को हराकर.

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नित्यानंद राय को अमित शाह का करीबी माना जाता है. (फाइल फोटो- PTI)

नित्यानंद राय यादव कम्युनिटी से आते हैं. बिहार में 12 फीसदी यादव वोटर हैं. यही वो सबसे बड़ी वजह है, जो नित्यानंद राय को बिहार में बीजेपी के लिए बहुत अहम बना देती है. बीजेपी को उम्मीद है कि नित्यानंद के सहारे वो लालू के ‘यादव वोट बैंक’ में सेंध लगाने में कामयाब हो सकेंगे. उनको ये भरोसा शायद इसलिए भी है, क्योंकि वैशाली, हाजीपुर, जैसी जगहों पर जहां लालू की चौधर थी, उसे नित्यानंद राय ने लगभग खत्म कर दिया है. वैशाली लोकसभा सीट 1998 से लेकर 2014 तक आरजेडी की रही. लेकिन नित्यानंद राय के उभरने के साथ-साथ यहां आरजेडी का वर्चस्व टूटा और नतीजा एनडीए के सहयोगी दल लोजपा की जीत हुई.

नागेंद्र नाथ: संगठन के आदमी

नागेंद्र की बिहार में वही हैसियत है, जो यूपी में सुनील बंसल की. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी को यूपी में प्रचंड बहुमत मिला था, तो सुनील बंसल के संगठन में रोल को काफी सराहा गया था. नागेंद्र एक दशक से भी ज़्यादा समय से बिहार में बीजेपी संगठन का चेहरा बने हैं. लेकिन 2015 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद नागेंद्र नाथ के संगठन की सबसे बड़ी परीक्षा इस बार ही होगी.

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नागेंद्र नाथ और नरेंद्र मोदी. ये तस्वीर नागेंद्र नाथ ने अपनी ट्विटर कवर फोटो लगा रखी है.

कोविड काल में बीजेपी के लिए एक बड़ी चिंता ये भी है कि वो अपने फॉरवर्ड वोट बैंक को कैसे पोलिंग बूथ तक लेकर आए. ऐसे में ही गली-मोहल्ले में फैला संगठन काम में आ सकता है. और यहीं पर नागेंद्र की चुनौती है.


नेता नगरी: 30 सालों में बिहार विधानसभा का ये पहला चुनाव, जब ये दो मुद्दे नहीं होंगे!

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