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क्या अफगान शरणार्थियों को शरण देने में इस्लामिक देश भारत और अमेरिका जैसे देशों से पीछे हैं?

अफगानिस्तान के लोग तालिबान के खौफ से अपना सबकुछ छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने पर मजबूर हैं. ऐसा 1996 के तालिबान शासन के शुरू होने के बाद भी देखा गया था. 2001 में अमेरिका ने नाटो सेनाओं के साथ अफगानिस्तान में एंट्री ली और तालिबान को पीछे ढकेला. इसके बावजूद दूर-दराज के इलाकों में तालिबान ने कहर बरपाए रखा. इसलिए कम मात्रा में ही सही लोग अफगानिस्तान से पलायन करते रहे.

अब चूंकि करीब पूरे देश पर ही तालिबान का कब्जा हो गया है तो दुनिया के कई देशों में अफगान शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई है. आखिर कौन से देश हैं जो अफगानिस्तान के शरणार्थियों को सबसे ज्यादा मात्रा में शरण दे रहे है. कहा जाता है कि सबसे बड़ा दिल अमेरिका और भारत जैसे देशों का ही है. इस बीच सोशल मीडिया पर ये बातें भी चल रही हैं कि जब इस्लामिक देश खुद अफगानिस्तान के लोगों को शरण नहीं दे रहे तो हम क्यों दें. क्या वाकई में ऐसा है? आइए जानते हैं. साथ में ये भी जानेंगे कि किस देश ने अफगान शरणार्थियों को सबसे ज्यादा मात्रा में शरण दी है.

हाल क्या है?

अफगानिस्तान दुनिया के उन देशों में शुमार है जिनके नागरिक बड़ी संख्या में दुनिया के दूसरे देशों में शरण ले चुके हैं. यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीस (UNHCR) के अनुसार, साल 2020 तक 28 लाख अफगान शरणार्थी दुनिया के अलग-अलग देशों में शरण लेकर रह रहे हैं. इस मामले में सीरिया सबसे आगे है. वहां के 68 लाख लोग शरणार्थी के रूप में दूसरे देशों में रह रहे हैं.

Evacuation Process In Madrid
स्पेन पहुंचा अफगान शरणार्थियों का एक जत्था. (तस्वीर- पीटीआई)

अगर रिफ्यूजी या शरणार्थी की परिभाषा की बात कहें तो UNHCR के अनुसार,

“जिसने भी अपना देश अत्याचार, युद्ध या हिंसा की वजह से छोड़ा है वो रिफ्यूजी माना जाएगा. रिफ्यूजी के भीतर किसी विशेष सामाजिक समूह में जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीतिक राय या सदस्यता की वजह से अत्याचार का भय होता है. ज्यादातर ऐसे लोग अपने घर नहीं लौट सकते या ऐसा करने से डरते हैं. युद्ध, जातीय, धार्मिक या अन्य प्रकार की हिंसा शरणार्थियों के अपने देशों से भागने की प्रमुख वजहें हैं.”

क्या इस्लामिक देश नहीं दे रहे शरण?

देश-दुनिया का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देता है. आम लोगों से लेकर जानकार और जिम्मेदार पदों पर रहे लोग भी ऐसा ही मानते हैं कि इस्लामिक देश अफगान नागरिकों को शरण देने में पीछे हैं. मसलन, जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद्य को ले लीजिए. ट्विटर पर वैद्य काफी एक्टिव हैं. सिक्योरिटी से लेकर जम्मू-कश्मीर के मसले पर ट्वीट करते रहते हैं. 22 अगस्त को उन्होंने एक ट्वीट किया. इसमें लिखा था,

“दुनिया में 45 इस्लामिक देश हैं. लेकिन जब अफगानिस्तान संकट के चलते मुस्लिम शरणार्थियों को शरण देने की बात आती है तो अमेरिका, पश्चिमी देश और भारत ही उन्हें स्वीकार करता नजर आता है. मुस्लिम उम्माह (एकता) का क्या? इसके बावजूद पश्चिमी मीडिया भारत को अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित मानता है.”

इस ट्वीट के समर्थन में भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल वेद मलिक ने भी ट्वीट किया. लेकिन एक जर्नलिस्ट ने जब उन्हें इस तथ्य के गलत होने से रूबरू कराया तो उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया और खेद भी जताया. बाद में एसपी वैद्य ने भी अपना ट्वीट हटा लिया.

असलियत क्या है?

UNHCR के साल 2020 के डेटा के मुताबिक, अफगानिस्तान से तकरीबन 28 लाख लोगों ने दूसरे देशों में शरण ली है. इसमें सबसे ज्यादा रिफ्यूजी पाकिस्तान में शरण पाए हैं. रिपोर्ट यहां पर क्लिक करके देखें.

UNHCR के हवाले से नीचे दी गई लिस्ट में देख सकते हैं कि साल 2020 में किन पांच देश ने सबसे ज्यादा अफगान शरणार्थियों को अपने देश में पनाह दी है.

# पाकिस्तान – 14 लाख 50 हजार
# ईरान – 7 लाख 80 हजार
# जर्मनी – 1 लाख 81 हजार
# तुर्की – 1 लाख 29 हजार
# ऑस्ट्रिया – 46 हजार 600

वहीं भारत की बात करें तो हमने 8 हजार और अमेरिका ने सिर्फ 2 हजार अफगान शरणार्थियों को शरण दी है. शरण देने वाले अन्य मुख्य देशों को इस चार्ट में देखा जा सकता है.

Infographic: Where Afghan Refugees Are Located | Statista पाकिस्तान और ईरान का अफगान शरणार्थियों को पनाह देना इस लिहाज से स्वाभाविक भी है कि दे दोनों ही अफगानिस्तान के पड़ोसी हैं. किसी भी साधन से अफगानिस्तान से भाग कर शरणार्थी यहीं पहुंचते हैं. UNHCR की रिपोर्ट कहती है कि शरणार्थी देने वाले देशों की लिस्ट में पाकिस्तान का नंबर दुनिया में तीसरा है.

शरणार्थियों पर रवैया नरम-गरम

हैरानी नहीं कि अफगानिस्तान के हालिया संकट के चलते वहां से भागने वाले ज्यादातर शरणार्थी पड़ोस के देशों में दाखिल हो रहे हैं. इनमें से कुछ देश तो उन्हें आने की इज़ाजत दे रहे हैं, लेकिन कुछ देश अपने बॉर्डर सील कर चुके हैं. मिसाल के तौर पर ताजिकिस्तान जहां शरणार्थियों को शरण देने में दिलचस्पी दिखा रहा है, वहीं उज्बेकिस्तान ने अपने बॉर्डर पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक शरण देने वाले देशों में हालात कुछ ऐसे हैं.

पाकिस्तान – प्रधानमंत्री इमरान खान ने जून 2021 में कहा था कि अगर तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा होता है तो वो सीमा सील कर देंगे. हालांकि रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के कम से कम एक बॉर्डर से कुछ हजार लोग पाकिस्तान पहुंच चुके हैं.

ईरान – यहां शरणार्थियों को लिए इमरजेंसी टेंट की व्यवस्था की गई है. ये टेंट अफगानिस्तान से लगने वाले तीन राज्यों की सीमाओं पर लगाए गए हैं. हालांकि ईरान के अधिकारियों का कहना है कि जब हालात स्थिर हो जाएंगे तो इन लोगों को वापस अफगानिस्तान भेज दिया जाएगा. फिलहाल ईरान 35 लाख अफगान शरणार्थियों का ठिकाना बना हुआ है.

यूके – यूनाइटेड किंगडम ने लंबे प्लान के तहत 20 हजार अफगान शरणार्थियों को शरण देने की घोषणा की है. ब्रिटिश सरकार की अफगान सिटीजन रीसेटलमेंट स्कीम के तहत पहले साल में 5000 अफगान नागरिकों को ब्रिटेन में बसाया जाएगा. इनमें महिलाओं, बच्चों और उन समूहों पर फोकस रहेगा जिन्हें तालिबान से सबसे ज्यादा खतरा है.

अमेरिका – अमेरिका ने फिलहाल अफगान शरणार्थियों को लेकर कोई संख्या तो नहीं बताई है. लेकिन प्रेसिडेंट बाइडेन ने मदद के लिए 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की घोषणा जरूर कर दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका उन 10 हजार लोगों को शरण दे सकता है जिन्होंने साल 2001 से 2021 तक अफगानिस्तान में रहने के दौरान उनकी मदद की थी. इनमें ट्रांसलेटर, ऑफिस में काम करने वाले लोग और एनजीओ के कर्मचारी शामिल हैं.

भारत – हमने खुलकर नहीं बताया है कि अफगान शरणार्थियों को लेकर हमारी क्या नीति होगी. फिलहाल भारत ने अफगानिस्तान से आए सभी नागरिकों के लिए इमरजेंसी ई-वीजा की व्यवस्था कर दी है. हालांकि बुधवार को सरकार ने प्रेस रिलीज जारी कर ये भी कहा कि अब अफगान नागरिक बिना ई-वीजा के भारत में नहीं आ सकते.

Afghan Refugees Protest In Delhi
दिल्ली स्थित यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करते अफगान शरणार्थी. (तस्वीर- पीटीआई)

शरणार्थियों को लेकर भारत की नीति केस-बाई-केस डील करने की है. मतलब ये कि भारत पहले देखेगा कि कौन और किन परिस्थितियों में शरण मांग रहा है, उसके बाद ही वो शरण देगा. भारत ने 1951 में कन्वेंशन ऑफ रिफ्यूज पर साइन भी नहीं किए हैं, जिसकी वजह से वो किसी विश्व संगठन के दबाव में भी नहीं है.

भारत में अफगानिस्तान कम्यूनिटी के नेता अहमद जिया गनी ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया था कि 23 अगस्त तक भारत में तकरीबन 21000 अफगान नागरिक मौजूद हैं. इनमें से 13 हजार ऐसे हैं, जिनके पास डॉक्युमेंट्स तक नहीं हैं.


वीडियो – अफगानिस्तान: तालिबान लड़ाकों के पास कहां से आ रहे आधुनिक हथियार?

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