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अगर कोरोना वायरस संक्रमण हो गया, तो क्वारंटीन में आपके साथ क्या-क्या किया जाएगा?

इधर प्रधानमंत्री ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की, उधर पूरे मोहल्ले में हल्ला हो गया. तो लोग एक-दूसरे से अपना पैनिक बांटने लगे. जुनेजा आंटी अपनी पड़ोसन से कहने लगीं, ‘ऐसी बीमारी है कि अगर आपको हो गई. और सरकार को पता चल गया. तो कम से कम 15 दिन के लिए जेल भेज देगी.’

जिस शब्द को आंटी खोज रही थीं, वो असल में ‘क्वारंटीन’ है. मगर उन्होंने कहा ‘जेल’. क्या क्वारंटीन का अर्थ सचमुच जेल होता है? समझेंगे. लेकिन पहले एक कहानी सुनिए.

कहानी 700 साल पहले की. योरप में ‘प्लेग’ महामारी फैली थी. चूहों के शरीर पर बसने वाले पिस्सुओं से इंसानों में आई थी. फैलने का ज़रिया थूक और छींक यानी शरीर से निकले द्रव्यों के कॉन्टैक्ट में आना. इटली में ये बीमारी विदेश से आ रही थी. उस समय व्यापार सारा पानी के जहाज़ों से होता था. तो जो लोग जहाजों से लौटते थे, उनके संक्रमित होने के सबसे ज्यादा चांस थे.

Triumph Of Death
पीटर ब्रुएगेल की ऑइल पेंटिंग ‘द ट्रायंफ ऑफ़ डेथ’. साल 1562 की इस पेंटिंग को ‘ग्रेट प्लेग’ यानी ‘ब्लैक डेथ’ से जोड़कर देखा जाता है. (फोटो: फ्री सोर्स)

तो इटली ने अपने सभी पोर्ट, यानी जहां जहाज आते थे, वहां के लिए एक नियम निकाला. कि जहाज के किनारे पर लगने के बाद उसे 40 दिनों तक खोला नहीं जाएगा. जिससे अगर कोई संक्रमित है तो उसका पता वहीं चल जाए. 40 दिन को इटैलियन भाषा में कहते हैं क्वारंता जिओर्नी. क्वारंता का मतलब चालीस. जिओर्नी का मतलब दिन. इसी क्वारंता से शब्द बना क्वारंटीन. जिसका अर्थ हुआ अलग रखना.

अलग रखने का मकसद ये नहीं था कि व्यापारियों की किसी बात की सजा दी जा रही थी. या भेदभाव किया जा रहा था. इसका मकसद सिर्फ इतना था कि बीमारी देश में न आए.

एक दूसरे के कॉन्टैक्ट से फैलने वाली बीमारी को रोकने का सबसे कारगर तरीका क्वारंटीन हुआ. क्योंकि कोई भी देश अचानक आई किसी महामारी के लिए कभी तैयार नहीं होता. चाहे 600 साल पहले की बात हो, चाहे आज की.

प्लेग और कॉलरा जैसी बीमारियां इतिहास में कई बार महामारी बन चुकी हैं. इंडिया समेत कई देशों में. मगर उसकी बात फिर कभी.

‘क्वारंटीन’ शब्द सुनते ही दिमाग में कई सवाल आते हैं. कुछ सवालों के जवाब आप यहां जान सकते हैं.

1. क्या क्वारंटीन में केवल बीमार लोग रहते हैं?

नहीं, क्वारंटीन का मतलब केवल ऑब्जरवेशन में रखना होता है. आप विदेश से लौटे. खासकर किसी ऐसे देश से जहां बीमारी पहले से थी. तो सरकार की ये जिम्मेदारी हो जाती है कि वो चेक करे कि कहीं आप संक्रमित तो नहीं हैं. सेफ्टी के लिए वो आपको सबसे अलग कर देगी. ताकि जबतक सरकार आपको ऑब्जर्व कर रही है. तबतक ये आपसे किसी और में न जाए. अगर तय दिनों में आपमें कोई संक्रमण नहीं निकला तो आपके जाने दिया जाता है.

2. क्या बीमारी के लक्षण दिखने पर क्वारंटीन करते हैं?

ऐसा कतई नहीं है. क्योंकि कई बीमारियों के लक्षण डेवलप होने में 4 दिन से एक हफ्ता लग सकता है. अगर ढिलाई की तो बहुत बुरा नतीजा हो सकता है. उदाहरण के लिए:

सिंगर कनिका कपूर लंदन से 9 मार्च को लौटीं. सबकी तरह उन्हें भी सेल्फ़-क्वारंटीन की हिदायत दी गई. मगर उनको कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे. तो वो पार्टीज में गईं. जिनमें बड़े-बड़े नेता आए थे. अगर कोई बड़ा नेता संक्रमित हो जाता तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी अदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी तक खतरे में आ जाते.

Kanika Kapoor
कनिका कपूर जिस पार्टी में थीं, उसमें शामिल सभी लोग संदिग्ध माने जा रहे हैं. (फोटो: सोशल मीडिया)

3. बीमार निकले तो?

ऐसा हुआ तो आपके इलाज की व्यवस्था की जाती है. आपको अस्पताल या किसी ऐसी सर्विस में मूव किया जाता है जहां आपका इलाज आइसोलेशन में हो सके. आइसोलेशन यानी सबसे अलग-थलग.

4. क्या क्वारंटीन का मतलब कमरों में बंद कर देना ही होता है?

क्वारंटीन किस लेवल पर लागू करना है, ये सरकार के फैसले और सुविधाओं पर निर्भर करता है. कोरोना वायरस के चलते इंडिया में बाहर से लौटे इंडियन्स को सेल्फ़-क्वारंटीन करने के लिए कहा गया था. यानी वे अपने घर पर अकेले ही रहें. किसी से मिले जुलें न. और अगर लक्षण दिखें तो सूचित करें. जो लोग परिवार के साथ रहते हैं उनसे कहा गया कि खुद को एक कमरे में बंद कर लें और किसी से कुछ भी शेयर न करें. घर वालों के संपर्क में न आएं.

अगर आपको किसी सरकारी फैसिलिटी के तहत क्वारंटीन किया गया है तो सरकार से अपेक्षित है कि वो आपको अलग कमरे में बंद रखे. ऐसा न हो तो कम से कम दूसरों से इतनी दूरी पर रखे कि आपस में रोग न फैले. आपकी सेहत, हाइजीन और सुविधाओं का खयाल रखे. हालांकि ऐसी कुछ रिपोर्ट्स आईं जिनमें कहा गया कि सरकार की तरफ से क्वारंटीन फसीलिटीज में पुख्ता इंतज़ाम नहीं हैं.

5. क्वारंटीन से खुद को बचा लिया तो क्या होगा?

क्वारंटीन कोई जेल नहीं कि खुद को बचाया जाए. ये सबकी सेफ्टी के लिए लागू किया गया नियम है. मगर इंडिया में ऐसे कई केस आए जब लोगों ने क्वारंटीन से खुद को बचाए रखा. और नतीजा बहुत बुरा हुआ. इसका सबसे बड़े उदाहरण है:

केरल का एक परिवार जो इटली से 29 फरवरी को लौटा. मगर सरकार के बार-बार कहने के बावजूद अपनी ट्रेवल हिस्ट्री शेयर नहीं की. न ही सेल्फ़-क्वारंटीन किया. अपने रिश्तेदारों से मिलते रहे. और ट्रेवल करते रहे. नतीजा ये हुआ कि वो तीनों और उनके 4 और रिश्तेदार संक्रमित पाए गए. उनकी गैर-जिम्मेदाराना हरकतों की वजह से लगभग 12 हजार लोगों को ऑब्जरवेशन में डालना पड़ा. जो कि प्राइमरी या सेकेंडरी तौर पर उनके कॉन्टैक्ट में आए थे. इसमें सरकार की जाने कितनी रिसोर्सेज लग गईं जिन्होंने परिवार के पूरे मूवमेंट को ट्रैक किया. सीसीटीवी फुटेज निकाली. और फिर मेडिकल टीम्स भेजी गईं. ये सब अवॉइड किया जा सकता था.

Kerala Doctors
केरल से अबतक कोरोना वायरस के 118 केस आ चुके हैं. (तस्वीर: बिजनेस टुडे)

6. क्या क्वारंटीन का उल्लंघन करने पर सज़ा होगी?

जी बिलकुल. क्वारंटीन कोई नया नियम नहीं है. एपिडेमिक डिजीजेस एक्ट, 1897 के मुताबिक़: भारत या उसके अधीन किसी भाग में महामारी फ़ैल चुकी है या फैलने का ख़तरा है, तो रेल या बंदरगाह या अन्य तरीके से यात्रा करने वालों को, जिनके बारे में ये शंका हो कि वो महामारी से ग्रस्त हैं, उन्हें किसी अस्पताल या अस्थायी आवास में रखने का अधिकार होगा. इसके अलावा ये भी लिखा है कि महामारी के संबंध में कोई भी सरकारी आदेश न मानना अपराध होगा. इस अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड की धारा 188 के तहत सज़ा मिल सकती है.

Social Distancing
सोशल डिस्टेंसिंग का बेहतरीन नमूना. गुजरात की एक दुकान में लोग अपनी तय जगह पर खड़े होकर राशन खरीदते हुए. (क्रेडिट: ट्विटर/किरण बेदी)

7. क्या प्रधानमंत्री ने सेल्फ़-क्वारंटीन करवाने के लिए ‘लॉकडाउन’ की घोषणा की?

घर पर रहना सेल्फ़-क्वारंटीन नहीं कहलाता. घर पर रहना, दूरी बनाना, लोगों से मिलना जुलना बंद कर देना, ये सोशल डिस्टेंसिंग कहलाते हैं. कोई जरूरी दवा लानी हो या गैस सिलिंडर लेना हो. तो सोशल डिस्टेंसिंग के पीरियड में भी ये काम कर सकते हैं. पर सेल्फ़-क्वारंटीन के पीरियड में नहीं कर सकते. अगर सख्ती के लिहाज से देखा जाए तो सोशल डिस्टेंसिंग पहला कदम है. सोशल डिस्टेंसिंग में सबसे कम, क्वारंटीन में उससे ज्यादा और आइसोलेशन (यानी इलाज का समय) सबसे ज्यादा सख्त होता है.

*

तो जुनेजा आंटी के लिए एक सच्चाई. कि कोरोना संक्रमण हुआ तो जेल नहीं भेजते. बल्कि लोगों से अलग करते हैं. ताकि बाकी सभी लोग सुरक्षित हो सकें. बीमार हुए तो इलाज करते हैं. क्वारंटीन को जेल समझकर जिन लोगों ने उससे खुद को बचा लिया था. उन्होंने बाद में पाया कि उन्होंने सरकार नहीं, बल्कि अपने और अपनों के साथ धोखा किया था.


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