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फसल बीमा योजना में बदलाव का किसानों को क्या फायदा मिलेगा?

19 फरवरी को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में. इसमें किसानों से जुड़ा फैसला लिया गया. यह फैसला था, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को किसान की मर्जी पर छोड़ने का. अभी तक यह योजना अनिवार्य थी. इसके चलते लोन लेने पर किसानों को फसल बीमा लेना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. वर्तमान में कुल किसानों में से 58 फीसदी किसान लोन लेने वाले हैं. कैबिनेट बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि फसल बीमा योजना के बारे में कुछ शिकायतें मिल रही थी. इन्हें सुधारने के लिए योजना में बदलाव किए गए हैं.

सरकार ने क्या कहा-

# कैबिनेट ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना में बदलाव को मंजूरी दी है.
# प्रधानमंत्री बीमा योजना के बारे के कुछ शिकायतें मिली थीं.  अब इस योजना की खामियों को दुरुस्त कर किसानों के लिए स्वैच्छिक बना दिया गया है.

# बीमा कंपनियों को टेंडर के जरिए चुना जाएगा. इन्हें तीन सालों की जिम्मेदारी दी जाएगी. अभी यह समयसीमा एक से तीन साल तक के लिए है.

# प्रीमियम सब्सिडी में केन्द्र सरकार का हिस्सा उत्तर-पूर्व के राज्यों के लिए बढ़ाया गया है. इसे 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 90 प्रतिशत किया जाएगा. बाकी का 10 फीसदी राज्य सरकार देगी. इसका मतलब है कि प्रीमियम यानी फसल के बीमा के लिए दी जाने वाली रकम में केन्द्र सरकार 100 में से 90 रुपये देगी.

# बाकी के राज्यों में केन्द्रीय सब्सिडी की दर असिंचित क्षेत्रों/फसलों यानी पानी की कमी वालों इलाकों में 30 प्रतिशत तक सीमित होगी.  यानी ऐसी जगहों पर केंद्र सरकार 100 रुपये में से 30 रुपये देगी. बाकी का पैसा राज्य सरकार देगी. पहले ये 50 प्रतिशत था.

#सिंचित क्षेत्रों/फसलों के लिए यह सब्सिडी 25 प्रतिशत तक सीमित रखी गई है. यानी 100 में से 25 रुपये.

# सरकार फसल बीमा पॉलिसी की जरूरत के बारे में किसानों को जागरूक करने का अभियान शुरू करेगी.

# ये बदलाव आने वाली खरीफ की सीजन से लागू होंगे.

फसल बीमा योजना के बारे में मोदी सरकार ने दावा किया था कि इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी.
फसल बीमा योजना के बारे में मोदी सरकार ने दावा किया था कि इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी.

क्या है ये योजना और इसको लेकर क्या समस्याएं थी-

भारत में फसल बीमा की शुरुआत 1972 में हुई थी. इसके बाद राजीव गांधी ने भी 1985 में फसल बीमा योजना शुरू की थी. 1999 में नेशनल एग्रीकल्चरल इंश्योरेंस स्कीम और फिर 2010 में संशोधित नेशनल एग्रीकल्चरल इंश्योरेंस स्कीम आई. लेकिन पारदर्शिता में कमी, बीमा भुगतान में देरी और महंगे प्रीमियम की वजह से किसान इन योजनाओं से जुड़ नहीं पाए.

साल 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उनकी सरकार ने भी फसल बीमा योजना लाने की बात कही. दो साल बाद यानी 2016 में यह योजना लॉन्च हुई. इस योजना ने पहले से चल रही नेशनल एग्रीकल्चर इंश्योरेंस और मोडिफाइड नेशनल एग्रीकल्चर इंश्योरेंस की जगह लो ली.

फसल बीमा योजना लागू का मकसद किसानों को आर्थिक मदद देना था.
फसल बीमा योजना लागू का मकसद किसानों को आर्थिक मदद देना था.

योजना है क्या?

# 13 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना लॉन्च की थी. फसल बीमा योजना के तहत किसानों को फसल बोने के दस दिनों के भीतर बीमा कराना होता है. बाढ़, बारिश, ओला या अन्य किसी प्राकृतिक आपदा से यदि फसल को नुकसान पहुंचता है तो किसान को बीमा का लाभ दिया जाता है.

#किसान के पास खेत हो या न हो, वो खेती करता है, तो उसकी फसल का बीमा होगा. बाढ़, बारिश, ओला, सूखा या आंधी जैसी किसी प्राकृतिक आपदा से फसल खराब हो जाती है, तो मुआवजा मिलेगा.

# फसल बोने के 10 दिन के अंदर बीमा करवाना ज़रूरी होता है. अगर फसल कटने के 14 दिन बाद तक बारिश या किसी और वजह से फसल खराब हो जाए, तो बीमा का पैसा मिलेगा.

# किसी भी किसान को खरीफ के लिए कुल बीमा की राशि का 2 फीसदी प्रीमियम देना पड़ता है. रबी की फसल के लिए कुल बीमा राशि का 1.5 फीसदी प्रीमियम देना पड़ता है. अगर कोई नकदी फसल या बागवानी की फसल है तो इसके लिए किसान को कुल बीमा राशि का 5 फीसदी प्रीमियम देना पड़ता है. बाकी का पैसा केंद्र और राज्य सरकारें इंश्योरेंस कंपनियों को देती हैं, जैसा हमने ऊपर बताया है.

#फसल खराब होने की स्थिति में किसान बीमा कंपनी को सूचना देता है. अगर फसल खराब हुई है तो बीमा कंपनियां अपने प्रतिनिधियों के जरिए सर्वे करवाती हैं. सर्वे करवाने के 30 दिन के अंदर पैसे किसानों के खाते में भेज दिए जाते हैं. अगर किसान बीमा कंपनी से संपर्क नहीं कर पाता है, तो किसान अपने नज़दीकी बैंक या फिर अधिकारी को सूचना दे सकता है.

पिछले कुछ सालों में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से फसलों को नुकसान होने के मामले काफी हुए हैं.
पिछले कुछ सालों में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से फसलों को नुकसान होने के मामले बढ़े हैं.

प्रीमियम कैसे तय होता है-
प्रीमियम की रकम राज्यवार अलग होती है. जैसे राजस्थान में अलग और पंजाब में अलग. हर फसल की इंश्योरेंस राशि अलग होती है. प्रीमियम की रकम जिला तकनीकी समिति की रिपोर्ट पर तय होती है. इस समिति में जिला कलेक्टर, जिला कृषि अधिकारी, मौसम विभाग का अधिकारी, किसानों के प्रतिनिधि और इंश्योरेंस कंपनी शामिल होती है. प्रत्येक सीजन से पहले यह रिपोर्ट भेजी जाती है. इसके बाद इंश्योरेंस कंपनियां रिपोर्ट के आधार पर प्रीमियम तय करती हैं.

मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने की बात कह रही है.
मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात कह रही है.

क्या शिकायतें रहीं-

#प्रीमियम के मुकाबले भुगतान कम मिलता था. पिछले चार साल में ऐसा देखा गया है. किसान संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि सरकारी लापरवाही के कारण निजी बीमा कंपनियां किसानों को पूरे दावे का भुगतान नहीं कर रही हैं. पिछले साल यानी 2019 में इस योजना से 5.5 करोड़ किसान जुड़े. 13 हजार करोड़ रुपए का प्रीमियम जमा हुआ. इसमें से 7 हजार करोड़ रुपए दावे के तौर पर भुगतान किए गए. इसी तरह सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2017  में खरीफ फसल में 3.47 करोड़ ने 3.40 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में लगी फसल का बीमा कराया था. फसलों को नुकसान के एवज में बीमा कंपनियों ने उन्हें 17209 करोड़ रुपये बतौर मुआवजा दिया था. जबकि केंद्र और राज्य सरकारों ने निजी व सरकारी बीमा कंपनियों को 19768 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में भरे थे. नीचे की तस्वीर देखिए-

साल 2016 और 2017 की खरीफ की फसल का रिपोर्ट कार्ड.
साल 2016 और 2017 की खरीफ की फसल का रिपोर्ट कार्ड.

#योजना में एक सबसे बड़ी कमी खेत के बजाए गांव या पंचायत को एक यूनिट मानना है. यानी अगर आप के खेत में किसी प्राकृतिक वजह से नुकसान हुआ, लेकिन आसपास के बाकी खेतों में नहीं हुआ तो इंश्योरेंस नहीं मिलता है.

# समय पर मुआवजे की रकम का न मिलना. किसानों को फसलों के नुकसान पर मिलने वाला पैसा काफी देरी से मिलने की शिकायतें भी रही हैं. इस वजह से किसानों को परेशानी हो रही थी. कई राज्यों से ऐसी शिकायतें आईं.

# योजना शुरू होने के चार साल बाद भी कई राज्यों ने प्रीमियम का हिस्सा ही दिया. इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और पश्चिम बंगाल ने 2017-18 का प्रीमियम ही जमा नहीं कराया. बिहार और पंजाब में तो यह योजना ही लागू नहीं हुई है.

# कंपनियां किसानों से बिना पूछे प्रीमियम की राशि काट लेती थीं. जैसे ही किसान लोन लेता कंपनियां उसमें से प्रीमियम के पैसे काट लेती थी. इस वजह से किसानों को पता ही नहीं चल पाता था कि कितना प्रीमियम गया.

अब देखना होगा कि सरकार ने योजना में जो नए बदलाव किए हैं वह कितने कारगर होंगे.


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