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नई कैबिनेट के बाद अब पीएम मोदी क्या करने वाले हैं?

पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में सबसे बड़े बदलाव के बाद आज दिनभर मंत्रियों के पदभार ग्रहण करने वाले वीडियो आते रहे. नए मंत्रियों ने आज चहकते चेहरों के साथ अपने नए दफ्तर संभाल लिए. दिनभर आती तस्वीरों से ऐसा लगा कि जैसे नई सरकार बनने के बाद मंत्री अपने विभाग संभाल रहे हों. पीएम मोदी ने अपनी टीम 36 नए चेहरों को लिया है. कुछ अहम मंत्रालय में भी बड़े बदलाव किए हैं. तो क्या है मोदी सरकार की नई योजनाएं हैं, किस भरोसे पर नए मंत्रियों को लाया गया है. हम उन 5 मंत्रियों की बात करेंगे जिन्हें बड़ी जिम्मेदारी पीएम मोदी ने दी है.

सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है मनसुख मंडाविया की

कल जब स्वास्थ्य मंत्रालय से डॉ हर्षवर्धन ने इस्तीफा दिया तो हर तरफ उत्सुकता ये जानने में थी कि नए स्वास्थ्य मंत्री कौन होंगे. कोरोना काल के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय बहुत अहम रहा है. महामारी को लेकर भारत सरकार के रेस्पॉन्स की पूरी दुनिया में स्क्रूटनी होती रही है. कोरोना की दूसरी लहर में जब ऑक्सीजन की कमी पर हाहाकार मचा तो इंटरनेशनल मीडिया में रिपोर्ट्स छपी. मोदी सरकार की इमेज पर आंच आई. सरकार की वैक्सीन पॉलिसी पर भी सवाल उठे. और डॉ हर्षवर्धन को हटाकर एक तरह से पीएम मोदी ने भी कुबूल लिया है कि कोरोना मैनेजमेंट में कमी रह गई थी. डॉ हर्षवर्धन की छवि एक ईमानदार और मेहनती नेता की रही है. वो खुद डॉक्टर हैं तो इस लिहाज से उन्हें अनुभवी कहा जा सकता है. तो उन्हें हटाने के बाद सबकी नज़रें इस पर थी कि नया स्वास्थ्य मंत्री कौन बनता है. और पीएम मोदी ने ये जिम्मेदारी दी मनसुख मंडाविया को. आज उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय का प्रभार भी संभाल लिया है. मनसुख मंडाविया मेडिकल बैकग्राउंड से नहीं हैं. उन्होंने गुजरात की भावनगर यूनिवर्सिटी से एमए किया है. 2002 में वो पहली बार गुजरात में विधायक बने थे. विधायक रहते लड़कियों की शिक्षा पर जागरुकता के लिए मनसुख मंडाविया की पदयात्रों की तारीफ की जाती है. 2012 में वो पहली बार राज्यसभा में भेजे गए. मोदी सरकार में उन्हें रसायन और उर्वरक के अलावा औषधि विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया. बतौर राज्य मंत्री उनके हिस्से में 5100 जन औषधि स्टोर खुलवाने का श्रेय जाता है. जन औषधि केंद्रों के ज़रिए महिलाओं के लिए सेनेट्री पेड बांटने के मामले में उन्हें यूनीसेफ से भी सम्मानित किया गया था.

अब बतौर स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया के लिए चुनौतियां बड़ी हैं. अभी देश में कोरोना वाला संकट खत्म नहीं हुआ है. तीसरी लहर आने के भी अंदेश जताए जा रहे हैं. इसके अलावा सरकार ने दिसंबर तक सबके टीकाकरण का लक्ष्य रखा है. अभी सिर्फ 36 करोड़ डोज़ लगाए गए हैं. उनमें से भी सिर्फ 7 करोड़ लोगों को ही दोनों डोज़ अभी तक लगे हैं. इन सारे मामलों में मनसुख मंडाविया को साबित करना होगा कि वो हर्षवर्धन से बेहतर हैं.

मंत्री बनने के बाद से सोशल मीडिया पर मनसुख मंडाविया को उनकी खराब अंग्रेज़ी के लिए ट्रोल भी किया जा रहा है. उनके पुराने ट्वीट निकाले जा रहे हैं जिनमें गलत अंग्रेजी लिखी गई है. इस बारे में हमारा कहना ये है कि किसी की अच्छी या खराब अंग्रेज़ी से उसकी काबिलियत का पैमाना तय नहीं किया जा सकता. अंग्रेज़ी एक भाषा है. हम स्कूलों में सीखते हैं. और हो सकता है कि हमें में से कई लोगों की अंग्रेज़ी अच्छी ना हो. ये भी हो सकता है कि किसी की अंग्रेज़ी अच्छी हो लेकिन हिंदी उतनी अच्छी नहीं हो. तो इस हिसाब से किसी के काम को जज नहीं किया जा सकता.

मोदी कैबिनेट में दूसरा अहम नाम है – अश्विनी वैष्णव का

ये नाम भी एक सरप्राइजिंग एलिमेंट की तरह था. शायद बहुत लोगों ने पहली बार ही अश्विनी वैष्णव का नाम सुना होगा. अश्विनी वैष्णव को कैबिनेट मंत्री बनाया गया और फिर रेलवे और आईटी जैसे अहम मंत्रालय उनको सौंपे गए. उन्होंने भी आज कार्यभार संभाल लिया है. अश्विनी वैष्णव के लिए कहा जा रहा है कि इनकी सीवी के आधार पर ही इन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है. तो क्या है इनकी सीवी में. आईआईटी कानपुर से एमटेक हैं. 1994 में आईएएस बने. पूरे देश में 27वीं रैंक मिली थी. ओडिशा कैडर मिला. ओडिशा के कई ज़िलों में डीएम रहे. 2003 में अश्विनी को उस वक्त के पीएम अटल बिहार वाजपेयी का डिप्टी सेक्रेटरी बनाया गया था. कहते हैं कि उसी दौरान अश्विनी, नरेंद्र मोदी के भी संपर्क में आए थे. आईएएस से इस्तीफा देने के बाद कॉरपोरेट सेक्टर की कंपनियों में डायरेक्टर रहे. अमेरिका की प्रतिष्ठित वार्टन बिजनेस स्कूल से एमबीए किया है. आंत्रप्रेन्योर भी बने, नई कंपनी शुरू की. और फिर 2019 में अश्विनी वैष्णव को बीजेपी ने नवीन पटनायक की बीजेडी के सहयोग से राज्यसभा भेजा. और अब अश्विनी वैष्णव को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया गया है. रेल मंत्रालय दिया गया है.

केंद्र में रेलवे को बहुत अहम मंत्रालय माना जाता रहा है. 2014 से पहले गठबंधन वाली सरकारों में रेल मंत्रालय कांग्रेस या बीजेपी अपने बड़े सहयोगियों को दिया करती थी. ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे नेता पहले की एनडीए और यूपीए सरकारों में रेल मंत्री रहे हैं. मोदी सरकार के दौर में रेल मंत्रालय का पॉलिटिकल वेटेज घटा दिया गया. पिछली सरकार में सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाया गया था, फिर पीयूष गोयल को रेल मंत्रालय दिया गया और अब अश्विनी वैष्णव को इस रेल मंत्रालय का प्रभार दिया गया. इसके पीछे सरकार का विज़न रेलवे को तकनीकी तौर पर मॉर्डन बनाना बताया जा रहा है. अश्विनी वैष्णव को रेलवे के साथ ही सूचना और प्रोद्योगिकी मंत्रालय भी दिया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक रेलवे और आईटी दोनों का एक ही मंत्री बनाया गया, ताकि सामंजस्य से रेलवे में तकनीक का इस्तेमाल बेहतर किया जा सके.

बतौर सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री भी अश्विनी वैष्णव के सामने कई चुनौतियां हैं. वो ऐसे दौर में ये मंत्रालय संभाल रहे हैं जब दुनिया की बड़ी कंपनी ट्विटर का सरकार से झगड़ा चल रहा है. ट्विटर से झगड़े को सही से हैंडल करने में रविशंकर प्रसाद नाकाम दिखे. सरकार की साख पर सवाल उठे. माना जा रहा है कि इसलिए उनकी कुर्सी गई.

तीसरा नाम है – ज्योतिरादित्य सिंधिया का

सिंधिया को नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया है. उनके पिता माधवराव सिंधिया भी 1991 से 1993 के बीच नरसिम्हा राव सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री थे. अब 27 साल बाद ये मंत्रालय ज्योतिरादित्य को मिला है. मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भी प्राथमिकता में रखा गया है. पहले कार्यकाल से ही मोदी सरकार ने सस्ते विमान किराए या और घरेलू उड़ानें बढ़ाने पर खास ज़ोर दिया था. देश में 100 एयरपोर्ट बनाने का लक्ष्य उडान योजना के तहत रखा गया था. इसके अलावा मौजूदा एयरपोर्ट्स के प्राइवेटाइजेशन का काम भी चल रहा है. अब तक हरदीप पुरी के पास ये मंत्रालय था. अब यहां से आगे ले जाने का जिम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया है. नागरिक उड्डयन मंत्रालय में अभी चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं. कोरोना की वजह से एयरलाइंस कंपनियों का भारी नुकसान हुआ है. पैसेंजर कम हैं, ईंधन के दाम बढ़ रहे हैं, कंपनियां का कर्ज़ बढ़ रहा है. और ये भी पता नहीं है कि कोरोना कब खत्म होगा और कब इस सेक्टर में रौनक लौटेगी. दूसरी तरफ, एयर इंडिया में विनिवेश की कोशिश सरकार लंबे वक्त से कर रही है. अभी तक कोई खरीदार नहीं मिला है. तो ये ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने बड़ी चुनौती होगी. ज्योतिरादित्य सिंधिया की दक्षता पर भी कोई सवाल नहीं. वो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं और अमेरिका की स्टेनफोर्ड बिजनेस स्कूल से एमबीए हैं.

चौथा नाम है धर्मेंद्र प्रधान का

पहले पेट्रोलियम मंत्री थे अब शिक्षा मंत्रालय दिया गया है. बतौर पेट्रोलियम मंत्री, तेल की बढ़ी कीमतों पर बयानों को लेकर वो कई बार ट्रोल हुए. कभी उन्होंने कहा कि सर्दियों की वजह से तेल के दाम ज़्यादा हैं, कभी कहा कि तेल के दामों का असर आम आदमी पर नहीं पड़ेगा. और इन बयानों का फिर सोशल मीडिया पर मज़ाक बनाया गया. उनके दौर में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर गई. लेकिन अब पेट्रोलियम मंत्रालय से शिक्षा मंत्रालय में भेजा जाना धर्मेंद्र प्रधान का प्रमोशन कहा जा रहा है. क्योंकि शिक्षा के मामले में मोदी सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं अधूरी पड़ी हैं. पिछले साल मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति का ऐलान किया था. इसके ज़रिए शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव करने की योजना है. कोरोना की वजह से ये काम शुरू नहीं हो पाया. अब ये जिम्मा धर्मेंद्र प्रधान के कंधों पर है. इसके अलावा कोरोना काल में परीक्षाओं का काम भी अस्त-व्यस्त है. पिछले साल मार्च के बाद परीक्षाएं ठीक से हो नहीं पाई. नीट और जेईई जैसी परीक्षाएं भी करवानी हैं. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नए शिक्षा मंत्री और राज्य मंत्रियों के अलावा कुछ बड़े सस्थानों के निदेशकों के साथ वर्चुअल बैठक की. यानी पीएम मोदी का भी इस मंत्रालय पर खास ज़ोर है. तो अब देखना है कि धर्मेंद्र प्रधान नए विभाग में कैसे साबित होते हैं.

पांचवां नाम है अनुराग ठाकुर का

हिमाचल प्रदेश से आने वाले बीजेपी नेता. पहले वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री थे. अब कैबिनेट में शामिल हुए हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय मिला है. इस मंत्रालय से प्रकाश जावडेकर ने कल इस्तीफा दिया था. और वजह ये बताई गई कि मोदी सरकार की मीडिया में इमेज को प्रकाश जावडेकर ठीक से मैनेज नहीं कर पाए. अब ये काम अनुराग ठाकु को दिया गया है. पीएम मोदी के दौर में सरकार की छवि पर बहुत ध्यान दिया जाता है. ऐसे में अनुराग ठाकुर के लिए भी ये काम तलवार की धार पर चलने जैसा होगा. सूचना प्रसारण के अलावा उन्हें खेल और युवा मामलों का मंत्रालय दिया गया है.

तो इन पांच मंत्रियों के अलावा भी हरदीप पुरी, जी किशन रेड्डी, किरण रिजिजू जैसे मंत्रियों का कद बढ़ाया गया है, बड़े पॉर्टफोलियो दिए गए हैं. हरदीप पुरी को पेट्रोलियम मंत्रालय दिया गया है. वो भी ऐसे दौर में जब देश के ज्यादातर हिस्सों में पेट्रोल 100 के पार चला गया है. अब जो सवाल पिछले तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से पूछे जाते थे वो हरदीप पुरी से पूछे जाएंगे. सवाल कि तेल की कीमतें कब कम होंगी.

मंत्रिमंडल में विस्तार के बाद आज पीएम मोदी ने कैबिनेट की पहली बैठक की. कैबिनेट बैठक के बाद पूरी मंत्री परिषद के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक की. नई कैबिनेट की पहली बैठक में आज कृषि और स्वास्थ्य पर सरकार ने कई फैसले लिए. मीटिंग के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि मंडियों को खत्म करने के बजाय सरकार और मजबूत कर रही है. APMC के जरिए 1 लाख करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम किया जाएगा. कृषि मंत्री के बाद नए स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने 23 हजार करोड़ के इमरजेंसी हेल्थ पैकेज का ऐलान किया.

तो पहली बैठक के फैसलों से सरकार की पॉजिटिव छवि बनाने वाली कोशिश दिखती है. मंत्रिमंडल में विस्तार के बाद अब पीएम मोदी और बीजेपी की अगली योजना क्या है. इसे लेकर टिप्पणीकार कयास लगा रहे हैं कि अब बीजेपी के संगठन में बड़ा बदलाव होगा. भूपेंद्र यादव जैसे नेताओं के सरकार में आने से संगठन में जो जगह खाली हुई हैं, वहां नई नियुक्तियां होंगी. अनुमान है कि मंत्रिमंडल की तरह ही संगठन में भी बहुत बड़ा बदलाव होने वाला है. इन बदलावों का लक्ष्य अगले साल के विधानसभा चुनाव और अंतिम लक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव हैं. लेकिन मंत्री और नेता बदलने से सरकार की लोगों में छवि कितने बदलती है, ये देखने के लिए अभी कुछ इंतजार करना पड़ेगा.


विडियो- कैबिनेट विस्तार में बने सहकारिता मंत्रालय का काम समझिए, जिसके मुखिया अमित शाह हैं

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