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क्या है ऑरवेलियन स्टेट जिसके खतरे के बारे में जॉर्ज ऑरवेल ने 70 साल पहले ही लिख दिया था?

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21 दिसंबर 2018. खबर आई कि देश की 10 जांच एजेंसियों को गृह मंत्रालय ने ये अधिकार दे दिया कि वे देश के लोगों की फोन कॉल और इंटरनेट डेटा को देख सकते हैं और इंटरसेप्ट कर सकते हैं. विपक्षी पार्टियों ने गृह मंत्रालय के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि मोदी सरकार देश को ऑरवेलियन स्टेट बनाना चाहती है.

31 अक्टूबर 2019. खबर आई कि वॉट्सएप से जासूसी हो रही है. इजराइली स्पाईवेयर पेगेसस भारत के पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी कर रहा है. ये पता लगते ही हड़कंप मच गया. क्योंकि इस स्पाईवेयर का ऐसा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. अब सवाल उठ रहे हैं कि इसके ऐसे इस्तेमाल की मंजूरी किसने दी? किस-किसकी जासूसी हुई? फिर कहा गया कि देश ऑरवेलियन स्टेट बनने की ओर बढ़ रहा है.

7 नवंबर 2019. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रिटायर्ड जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने कहा कि हम धीरे-धीरे ऑरवेलियन स्टेट बनने की तरफ बढ़ रहे हैं. जस्टिस श्रीकृष्णा डेटा प्रोटेक्शन को लेकर बनाई गई विशेषज्ञों की समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उन्होंने कहा,

“मैं बेहद चिंतित हूं. अगर रिपोर्ट्स सच हैं तो हम नॉवेल ‘1984’ में दिखाए गए ऑरवेलियन स्टेट की ओर बढ़ रहे हैं. जहां हमेशा बिग ब्रदर की नजर आप पर होती हैं. ये नागरिकों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है. इसके खिलाफ मजबूत जनमत तैयार होना चाहिए.”

 

क्या है ये ऑरवेलियन स्टेट?
अंग्रेजी के एक मशहूर उपन्यासकार हुए हैं जॉर्ज ऑरवेल. बिहार के मोतिहारी जिले में पैदा हुए थे. 25 जून 1903 को. उनके पिता ब्रिटिश इंडिया में आईसीएस अधिकारी थे. ऑरवेल जब आठ साल के थे तो परिवार इंग्लैंड लौट गया. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑरवेल कॉलेज नहीं गए. कॉलेज की बजाय वे ब्रिटिश इम्पीरियल पुलिस में शामिल होकर बर्मा चले गए. अपनी गरीबी और ब्रिटिश राजशाही की नीतियों से निराश होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी. और लिखना शुरू कर दिया. ऑरवेल के उपन्यासों में नॉवेल में सामाजिक अन्याय, मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग की गरीबी और उनके दोगलेपन पर कड़ी आलोचना की गई है. 1945 में उनका सबसे चर्चित उपन्यास प्रकाशित हुआ. नाम था Animal Farm. और 1949 में उन्होंने लिखा 1984. ये नॉवेल बहुत ही गंभीर तरीके से लिखा गया था. इसमें ऐसे भविष्य और ऐसे समाज की कल्पना की गई जहां प्यार करने वालों को सज़ा दी जाती है. जहां लोगों की निजता लूट ली गई है. जहां सच को तोड़ा जाता है. ऑरवेलियन स्टेट अपने समय से आगे के वक्त की कल्पना करती है. 1949 में ये 1984 की बात करती है. ऑरवेल ने इस नॉवेल में एक ऐसे राज्य की कल्पना की है जिसमें सत्ता अपने नागरिकों पर हर वक्त नजर रखती हैं. नागरिकों की आजादी कुचलने के पक्ष में होती है. ऑरवेल के इस काल्पनिक राज्य को ही ऑरवेलियन स्टेट कहते हैं.
इस नॉवेल की एक लाइन बहुत मशहूर है – BIG BROTHER IS WATCHING YOU.

व्हाट्सएप का कहना है कि उसने भारत सरकार को इस बारे में पहले ही बता दिया था.
व्हाट्सएप का कहना है कि उसने भारत सरकार को इस बारे में पहले ही बता दिया था.

‘1984’ में क्या होता है?

1984. ओशनिया. ओशनिया में राज चलता है पार्टी का. इस पार्टी का नेता है बिग ब्रदर. बिग ब्रदर के पोस्टर हर चौराहे, हर गली-कूचे और इमारतों पर लगे हैं. जिन पर लिखा है – Big brother is watching you. यानी कि बिग ब्रदर तुम्हे (हर नागरिक को) देख रहा है. पार्टी लोगों का ब्रेनवॉश कर चुकी है. अपना प्रॉपगैंडा फैलाने के लिए पार्टी ने एक भाषा बनाई है जिसे न्यूजपीक के नाम से जाना जाता है. न्यूजपीक का काम लोगों की सोचने की क्षमता को कम करना और पार्टी के सिद्धांतों को आगे बढ़ाना है. इस भाषा में दोहरापन है. मतलब विरोधाभास. ये विरोधाभास और दोहरापन पार्टी के नारों में स्पष्ट दिखाई देता है.जैसे,

युद्ध ही शांति है.
आजादी ही गुलामी है.
अज्ञानता ही ताकत है.

ये पार्टी के प्रमुख नारे हैं. पार्टी में चार मंत्रालय हैं. सच्चाई मंत्रालय (Ministry of Truth), शांति मंत्रालय (Ministry of Peace), प्रेम मंत्रालय (Ministry of Love), संपन्नता मंत्रालय (Ministry of Plenty). सच्चाई मंत्रालय का नाम भले ही सच्चाई मंत्रालय हो लेकिन काम झूठ फैलाना है. सच्चाई मंत्रालय पार्टी के हिसाब से शिक्षा, साहित्य, मीडिया और कला पर कंट्रोल करती है. प्रेम मंत्रालय का काम प्रेम नहीं बल्कि टॉर्चर देना है. पार्टी का विरोध करने वाले लोग इनके निशाने पर होते हैं. संपन्नता मंत्रालय का काम संसाधनों के वितरण को दबाना है. शांति मंत्रालय का काम युद्ध देखना है. लोगों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए पार्टी ने ‘थॉट पुलिस’ बना रखी है. ओशनिया हमेशा युद्ध में ही रहता है. कभी ईस्ट एशिया के साथ तो कभी यूरेशिया के साथ. फिलहाल ओशनिया की लड़ाई यूरेशिया से चल रही है.

1956 में रिलीज हुई फिल्म 1984 का एक सीन. फिल्म जॉर्ज ऑरवेल की किताब पर ही बनी थी.
1956 में रिलीज हुई फिल्म 1984 का एक सीन. फिल्म जॉर्ज ऑरवेल की किताब पर ही बनी थी.

इसकी कहानी लंदन में घटती है. जो एक न्यूक्लियर वॉर में तबाह हो चुका है. नॉवेल का हीरो विंस्टन स्मिथ लंदन में ही रहता है. विंस्टन मिनिस्ट्री ऑफ ट्रूथ, यानी सच्चाई मंत्रालय में काम करता है. उसका काम पार्टी के हिसाब से इतिहास को दोबारा लिखना है. हर पार्टी मेंबर के घर में और पूरे शहर में जगह जगह टेलीस्क्रीन लगा हुआ है. जिसके जरिए पार्टी अपने नागरिकों की निगरानी करती रहती है. आप पार्टी से कुछ भी छिपा नहीं सकते हैं. विंस्टन पार्टी की दमनकारी सत्ता के अंतर्गत नहीं रहना चाहता. वो एक डायरी लिखता है – DOWN WITH BIG BROTHER (अर्थात – बिग ब्रदर हाय हाय). डायरी में वो पार्टी के खिलाफ बातें लिखता है. आजादी की बातें लिखता है. उसे पता है कि अगर ये बातें किसी दूसरे को पता चल गई तो उसका जेल जाना निश्चित है. इसके बावजूद वो डायरी लिखना जारी रखता है. उसे ओ ब्रायन नाम के एक सीनियर पार्टी मेंबर पर विश्वास था. विंस्टन उससे पार्टी विरोधी बातें करता था. विंस्टन को लगता था कि ओ ब्रायन एक विद्रोही गुट ब्रदरहुड से जुड़ा हुआ है.

1984 प्रकाशित होने के एक साल बाद ही जॉर्ज ऑरवेल की 47 साल की उम्र में मौत हो गई थी. (AP)
1984 प्रकाशित होने के एक साल बाद ही जॉर्ज ऑरवेल की 47 साल की उम्र में मौत हो गई थी. (AP)

ओ ब्रायन के अलावा विंस्टन पार्टी विरोधी बातें जूलिया से भी शेयर करता था. जूलिया भी विंस्टन के साथ ही काम करती थी. विंस्टन और जूलिया दोनों एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जो युद्ध और उत्पीड़न से मुक्त हो. दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. जबकि ऐसा करना प्रतिबंधित था. ओ ब्रायन दोनों को मिलने के लिए बुलाता है. वहां पता चलता है कि ओ ब्रायन थॉट पुलिस का अंडर कवर एजेंट है. विंस्टन और जूलिया दोनों गिरफ्तार कर लिए जाते हैं. विंस्टन को थॉट पुलिस टॉर्चर करती है. विंस्टन टॉर्चर के बावजूद अपनी बातों पर अड़ा रहता है. जब तक कि उसे रूम नं. 101 में नहीं भेजा जाता. जहां ओ ब्रायन चूहों के एक पिंजरे को उसके सिर पर बांध देता है. चूहों से डरने वाला विंस्टन झुक जाता है और ओ ब्रायन से माफी मांगता है. विंस्टन को छोड़ दिया जाता है. विंस्टन बिग ब्रदर के प्रति वफादार हो जाता है. और जूलिया को भूल जाता है.

जॉर्ज ऑरवेल ने नॉवेल 1984 में भविष्य की कल्पना की थी. टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग करके सत्ता या सरकारों द्वारा लोगों की आवाज, अभिव्यक्ति और आजादी को नियंत्रित करने का एक खाका उन्होंने इसमें खींचा था. इस नॉवेल को आए 70 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है. और इस अवधि में कई बार लोगों ने ऑरवेल की कल्पना को सच होते देखा है. ये आलोचना की जा रही है कि अगर सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग तय करने लगे कि किसे कितना बोलना है, क्या बोलना है, क्या खाना है और क्या पहनना है? तो ये संकेत भी ऑरवेलियन स्टेट बनने का ही है. या फिर ये कि जब किसी देश में नागरिक को अपनी वफादारी सिद्ध करनी पड़े. अगर ऐसा नहीं है तो वो कौन लोग हैं जो कुछ पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और आम लोगों की जासूसी कर रहे थे, उनके व्हाट्सएप मैसेज चेक कर रहे थे? जिस स्पाईवेयर पेगेसस के जरिए ये सब हो रहा था उसे सिर्फ सरकारों को ही उनके उपयोग के लिए बेचा जाता है, और कोई उसका उपयोग नहीं कर सकता है. तो क्या ये माना जाए कि सरकार ने ही इस स्पाईवेयर के जरिए लोगों की निजता में घुसपैठ की?


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