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क्या है वह एनएसए कानून, जिसमें पुलिस किसी को भी धर के 'भूल' जाती है!

आठ महीने तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद रहने के बाद डॉक्टर कफील खान को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1 सितंबर को रिहा करने का फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि कफील खान पर एनएसए नाम के जिस कानून के तहत मामला दर्ज किया गया, उसका कोई आधार नही हैं और उन्हें फौरन रिहा किया जाए. कफील खान को यूपी सरकार ने एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया था. क्या है यह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और इसे किस तरह के अपराधों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है. आइए जानते हैं-

 

क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या रासुका?

नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या फिर रासुका, एक ऐसा कानून है जिसके तहत किसी खास खतरे के चलते व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है. अगर स्थानीय प्रशासन को किसी शख्स से देश की सुरक्षा और सद्भाव का संकट महसूस होता है तो ऐसा होने से पहले ही वह उस शख्स को पकड़ सकती है. यह कानून प्रशासन को किसी व्यक्ति को महीनों तक हिरासत में रखने का अधिकार देता है. इस कानून को 1980 में देश की सुरक्षा के लिए सरकार को ज्यादा शक्तियां देने के लिए जोड़ा गया था. कुल मिलाकर ये कानून सरकार को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की गिरफ्तारी की शक्ति देता है। सरकार को यदि लगता है कि कोई शख्स देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कामों को करने से उसे रोक रहा है, तो भी उस शख्स को गिरफ्तार किया जा सकता है। इस कानून का इस्तेमाल जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त, राज्य सरकार अपने सीमित दायरे में कर सकती है। अगर सरकार को लगे कि कोई व्यक्ति बिना किसी मतलब के देश में रह रहा है और उसे गिरफ्तार किए जाने की जरूरत है तो सरकार उसे भी गिरफ्तार करवा सकती है।
नाल्सर यूनिवर्सिटी हैदराबाद के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा का कहना है कि

एनएसए कानून में यह बताया ही नहीं गया है कि नैशनल सिक्योरिटी क्या है, ये कानून सिर्फ इस बात की जानकारी देता है कि किस स्थिति में खतरा महसूस होने पर गिरफ्तारी की जा सकती है. एनएसए के सेक्शन 3 का सब क्लॉज 2 सरकार को गिरफ्तारी की ताकत देता है. इसमें कहा गया है कि सरकार किसी ऐसे शख्स को गिरफ्तार कर सकती है, जिससे पब्लिक ऑर्डर या कानून व्यवस्था को खतरा हो.

 

आइए जानते हैं इस कानून का इतिहास

एनएसए एक प्रिवेंटिव या निरोधक कानून है. मतलब इसमें किसी घटना के होने से पहले ही सरकार किसी को गिरफ्तार कर सकती है. प्रिवेंटिव कानूनों का इतिहास आजादी से पुराना है. 1881 में अंग्रेज सरकार ने बंगाल रेगुलेशन थर्ड नाम का एक्ट बनाया था. इसमें भी घटना होने से पहले गिरफ्तारी की व्यवस्था थी. फिर 1919 में रौलट एक्ट आया. इसमें ट्रायल की व्यवस्था तक नहीं थी, मतलब हिरासत में लिया शख्स कोर्ट भी नहीं जा सकता था. इसे गलघोंटू या गैंगिंग एक्ट कहा गया. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान ही जलियांवाला बाग कांड हुआ था.
अगर आजाद भारत की बात करें तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सबसे पहले 1950 में प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट लाए थे. 31 दिसंबर 1969 में इस एक्ट की अवधि खत्म हो रही थी. ऐसे में इंदिरा गांधी के पीएम रहते हुए 1971 में सरकार विवादित कानून मीसा या मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) लाई. 1975 में इमरजेंसी के दौरान इस राजनैतिक विरोधियों के दमन के लिए इस कानून का बहुत सख्ती से इस्तेमाल किया गया. इमरजेंसी खत्म होने के बाद जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, तब इस कानून को 44वें संविधान संशोधन के तहत खत्म किया गया. इंदिरा गांधी जनवरी 1980 में फिर प्रधानमंत्री बनीं. उनकी सरकार ने 23 सितंबर 1980 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून संसद से पास करवाया। 27 दिसबंर 1980 को ये तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की मंजूरी के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या रासुका के रूप में जाना जाने लगा।

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एनएसए कानून 1980 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते वक्त लाया गया.

क्या हैं इस कानून के नियम-कायदे?

रासुका में संविधान से मिले सबसे बड़े अधिकार मतलब आजादी के अधिकार पर रोक लगाई जाती है. इसके नियमों में शामिल है-

# कानून के तहत किसी को भी 3 महीने तक बिना जमानत के हिरासत में रखा जा सकता है।

# जरूरत पड़ने पर 3-3 महीने के लिए हिरासत की अवधि बढ़ाई जा सकती है।

# रासुका या एनएसए के तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना कोई आरोप लगाए 12 महीने तक जेल में रखा जा सकता है।

# गिरफ्तारी के बाद जिला अधिकारी को राज्य सरकार को बताना पड़ता है कि किस आधार पर गिरफ्तारी की गई है।

# हिरासत में लिया गया व्यक्ति सिर्फ हाई कोर्ट के एडवाइजरी बोर्ड के सामने अपील कर सकता है।

# मुकदमे के दौरान रासुका लगे व्यक्ति को वकील की अनुमति नहीं मिलती। जब कोर्ट में मामला जाता है तो सरकारी वकील मामले की तफ्सील कोर्ट को देता है और जज ही उसकी मेरिट जांचता है.

 

क्या हमेशा गलत लोगों पर ही लगाया जाता है एनएसए या रासुका?

जानकारों का कहना है कि रासुका जैसे कानूनों को अपराधी के भीतर डर पैदा करने के लिए बनाया गया था लेकिन इसके कथित राजनैतिक इस्तेमाल से दिक्कतें पैदा हो रही हैं. सरकारों पर ऐसे लोगों के खिलाफ भी रासुका का इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं, जो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लेते हैं. ऐसे ही मामले में डॉ. कफील पर रासुका लगाया गया था, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है. कोर्ट में सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि कफील के सिर्फ भाषण भर देने से कानून-व्यवस्था का संकट पैदा हो गया था. ऐसी ही स्थिति दलित एक्टिविस्ट चंद्रशेखर रावण के मामले में देखने को मिली थी. उन पर भी सरकार ने एनएसए लगाया था लेकिन कोर्ट में इस कानून के टिकने लायक जवाब नहीं दे सकी.ट

ऐसा नहीं है कि हमेशा गलत लोगों पर ही रासुका लगाई जाती है. खतरनाक अपराधियों पर भी रासुका लगाकर सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि वे कानूनी शिकंजे से छूटने न पाएं. ऐसे मामलों में कोर्ट भी रासुका लगाने की इजाजत देता है. देशभर में कई राज्यों में सरकारें एनएसए का इस्तेमाल दुर्दांत अपराधियों के खिलाफ करती रही हैं. मिसाल के तौर पर कानपुर में 8 पुलिसवालों की हत्या के मामले में विकास दूबे के 23 सहयोगियों को पकड़ा गया है और उन पर रासुका लगाने की कार्रवाई चल रही है. नोएडा में 2009 में कार रोककर 10 लोगों ने एक महिला के साथ उसके दोस्त के सामने रेप किया. इस मामले में पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ एनएसए लगाया. उड़ीसा की बेरहामपुर पुलिस ने 10 हत्याओं के आरोपी कैलाश गदेई पर रासुका लगाया. कुल मिलाकर कानून से ज्यादा उसके इस्तेमाल करने वालों पर इसके इस्तेमाल की जवाबदेही है.

डॉ. कफील के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में तफ्सील से समझाया है कि एनएसए जैसे कानून का इस्तेमाल कैसे होना चाहिए. कोर्ट का कहना है कि-

ऐसे सख्त कानून का इस्तेमाल बहुत ही अभूतपूर्व स्थिति में, और कोई रास्ता न मिलने पर ही किया जाए.

उम्मीद है सरकारें माननीय न्यायालय की बातों को ध्यान से सुन रही होंगी.

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