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जानिए आधार जैसी इस हेल्थ आईडी के बारे में, जहां एक क्लिक पर मिलेगी आपकी सेहत का कुंडली

बहुत देर से दर पे आँखें लगी थीं,
हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी,
मसीहा मेरे तूने बीमार-ए-ग़म की
दवा लाते-लाते बहुत देर कर दी

ये लाइनें वैसे तो शायर ने अपने महबूब के लिए लिखीं थीं लेकिन इनमें देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की भी झलक मिलती है. डॉक्टर कम हैं, मरीज ज्यादा. डॉक्टर बड़े महंगे हैं, मरीज के पास संसाधन बहुत कम. कुल मिलाकर देश का हेल्थ सेक्टर खुद ही बीमार है. इस बीमारी के इलाज के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन की शुरुआत करने की बात कही है. क्या है यह नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन, आइए जानते हैं आसान भाषा मेंः


क्या बला है NDHM या नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन?

आप जब भी किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो पहले वो पूछता है- पहले कब बीमार पड़े थे? क्या इलाज चल रहा है? कोई पुरानी बीमारी तो नहीं थी? पुराने टेस्ट के कागज दिखाओ. आप भी अपने परचों के पुलिंदे को खंगालते रहते हैं. कभी कोई डॉक्युमेंट मिलता है, कभी नहीं मिलता. डॉक्टर फिर टेस्ट लिख देता है. कुल मिलाकर बीमार की परेशानी और बढ़ जाती है. ऐसे में लगता है कि कितना अच्छा हो कि कोई हमारी दवा-दारू के सारे पर्चे सहेज ले और जरूरत पड़ने पर दे दे. ऐसी ही कुछ मुश्किलें आसान करना चाहता है नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन. इस मिशन में एक हेल्थ आईडी बनाने का प्लान है. इस आईडी में आपकी हेल्थ को लेकर सारी जानकारी स्टोर रहेगी. मतलब मरीज की पूरी हेल्थ कुंडली तैयार की जाएगी। पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा है कि आपकी हर चिकित्सा जांच, हर बीमारी, आपको किस डॉक्टर ने कौन-सी दवा दी, कब दी, आपकी रिपोर्ट्स क्या थीं, ये सारी जानकारी इसी एक स्वास्थ्य पहचान पत्र में स्टोर रहेंगी। इसे बनवाने के लिए इंसान को अपनी बेसिक जानकारी जैसे नाम, पता, उम्र आदि के अलावा मोबाइल नंबर और आधार नंबर बताना होगा. इन सबको मिलाकर एक यूनिक हेल्थ आईडी जेनरेट की जाएगी. इस यूनिक आईडी के जरिए ही वह शख्स अपने स्वास्थ्य से जुड़ी हर जानकारी ले सकेगा. इस डिजिटल प्लेटफॉर्म में हेल्थ आईडी, पर्सनल हेल्थ रिकॉर्ड, डिजी डॉक्टर और हेल्थ फेसेलिटी रजिस्ट्री जैसे चार फीचर्स होंगे.

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पटियाला में कोविड 19 का टेस्ट करते स्वास्थ्यकर्मी.

अब जानिए, यह काम कैसे करेगा?

हेल्थ आईडी के लिए रजिस्टर करने वाले को एक यूनिक आईडी कार्ड यानी पहचान पत्र मिलेगा. ये आधार जैसा ही होगा। इसके जरिए किसी भी मरीज की निजी मेडिकल हिस्ट्री पता चल सकेगी. मुमकिन है, अगर आप देश के किसी भी कोने में इलाज के लिए जाएंगे तो आपको कोई जांच रिपोर्ट या पर्ची ले जाने की जरूरत नहीं होगी. सारी जानकारी हेल्थ कार्ड में मौजूद होगी. डॉक्टर सिर्फ आपकी आईडी से ये जान सकेंगे कि आपको पहले कौन-सी बीमारी रही है और आपका कहां पर क्या इलाज हुआ था. इसका सारा डेटा एक सेंट्रल सर्वर में रखा जाएगा. इसमें सिर्फ मरीज ही नहीं, इलाज करने वाले और अन्य पक्षों को भी जोड़ा जाएगा. नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के प्लेटफॉर्म पर अस्पताल, क्लीनिक, डॉक्टर, टेलीमेडिसिन कंपनियां, लैब्स और हेल्थ इंश्योरेंश कंपनियों को भी लाया जाएगा. इन सबका भी इस प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन किया जाएगा.

यह प्रोजेक्ट शुरू कहां से होगा?

इसकी शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर केंद्र शासित प्रदेशों से होगी. इनमें पुडुचेरी, चंडीगढ, लद्दाख, दादर और नागर हवेली, दमन-दीव, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप से होगी. यहां पर मिले परिणामों के आधार पर ही इसे पूरे भारत में लागू करने के बारे में प्लान तैयार होगा.

तो क्या इसे बनवाना जरूरी होगा?

जी नहीं, इसे जो चाहें बनवाए जो चाहें न बनवाए. नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के अनुसार, जो भी अपने हेल्थ रेकॉर्ड्स की जानकारी देकर हेल्थ आईडी बनवाना चाहते हैं, उन्हें यह सुविधा दी जाएगी. अभी सरकार इसे सबके लिए अनिवार्य नहीं करेगी, लेकिन कोशिश यही है कि आधार की तरह धीरे-धीरे सभी इस सिस्टम में आ जाएं जिससे पर्सनल हेल्थ रिकॉर्ड रखना आसान हो जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे आयुष्मान भारत मिशन के तहत मुफ्त या सस्ता इलाज मुहैया कराना और आसान हो जाएगा. सरकार का कहना है कि जो लोग इसमें रजिस्टर नहीं कराएंगे, उन्हें भी सभी सुविधाएं पहले की तरह मिलती रहेंगी. यह योजना बस सुविधाओं को ज्यादा व्यवस्थित करने का एक प्रयास भर है.


क्या ऐसा करने वाला भारत अकेला देश है?

भारत से पहले ऐसी ही एक योजना 2005 में ब्रिटेन ने शुरू की थी. इसे वहां पर नेशनल हेल्थ सर्विस नाम दिया गया और 2010 तक इसे पूरा करने का टारगेट रखा था. लोगों ने अपने हेल्थ आईडी बनवाए और हॉस्पिटलों ने इसे अपने डेटाबेस में शामिल भी किया लेकिन मामला बीच में ही ठप्प हो गया. ये सब करना सरकार को इतना महंगा पड़ रहा था कि उसके हाथ-पांव ठंडे पड़ गए. जब इस प्रोग्राम को खत्म किया गया, उस वक्त तक इस पर 12 बिलियन पाउंड यानी तकरीबन 11 अरब रुपए खर्च हो चुके थे. इसे दुनिया का सबसे महंगा आईटी फेल्योर प्रोजेक्ट कहा गया. ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ के मुताबिक, इस योजना में किए गए बार-बार के बदलाव और सप्लायर के बीच में आए टकराव के चलते यह प्रोजेक्ट बरसों पिछड़ गया. यही इसके फेल होने की सबसे बड़ी वजह बनी.

जहां तक बात भारतीय नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन की है तो इसकी कल्पना नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 में की गई थी. इसे 2020 में साकार करने का बीड़ा उठाया जा रहा है. जानकारों का मानना है कि दूरदराज के लोगों तक इस मिशन को ले जाना चुनौती भरा काम है. साथ ही, डेटा को सेफ रखना भी बड़ा चैलेंज है. अब इन चुनौतियों से सरकार कैसे निपटेगी, यह तो वक्त ही बताएगा.

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