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PM मोदी ने हमारी सेहत की कुंडली खोलने वाली योजना को पूरे देश में लागू कर दिया है

मेडिकल डॉक्युमेंट सहेज कर रखना कभी-कभी काफी झंझट का काम लगता है. हर चीज का ध्यान रखने के बाद भी आप श्योर नहीं होते के सारे मेडिकल डॉक्युमेंट आपके पास सेव हैं और सही क्रम में हैं. घर में कोई बुजुर्ग बीमार है या किसी अन्य सदस्य की लंबी बीमारी का इलाज चल रहा है या कोई अन्य वजह हो, मेडिकल डॉक्युमेंट की जरूरत पड़ती रहती है. डॉक्टर को दिखाओ तो वो पहले यही पूछता है कि इससे पहले भी बीमार पड़े थे क्या. तब किस डॉक्टर को दिखाया था और क्या दवाएं दी गई थीं, वगैरा-वगैरा. कहने का मतलब ये कि किसी मर्ज का इलाज शुरू से करना है या पिछले इलाज को ध्यान में रखते हुए आगे का ट्रीटमेंट करना है, ये सब तय करने में मेडिकल डॉक्युमेंट काम आते हैं.

लेकिन इतने सारे दस्तावेजों को संभाल कर रखना आसान नहीं है. कोई गंभीर बीमारी ना हो तो लोग आम तौर पर डॉक्टरों से मिले प्रिस्क्रिप्शन और दूसरे मेडिकल रिकॉर्ड्स संभाल कर नहीं रखते.

स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन (NDHM) के तहत डिजिटल हेल्थ कार्ड बनाने की अपनी योजना आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की मंजूरी दे दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त पर भाषण देते हुए इस योजना की घोषणा की थी. तब इसे देश के 6 केंद्रशासित प्रदेशों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत लागू किया गया था. अब सोमवार 27 अगस्त 2021 को पीएम मोदी ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन को पूरे देश में चलाने का ऐलान कर दिया है.

Ayushman Bharat Digital Mission
आयुष भारत डिजिटल मिशन को लॉन्च करते पीएम मोदी. (तस्वीर- पीटीआई)

क्यों लाई गई योजना?

बहुत देर से दर पे आँखें लगी थीं,
हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी
मसीहा मेरे तूने बीमार-ए-ग़म की
दवा लाते-लाते बहुत देर कर दी

ये लाइनें वैसे तो शायर ने अपने महबूब के लिए लिखीं थीं, लेकिन ABDM के लिए भी ये सही बैठती हैं. दशकों से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद ही बीमार है. डॉक्टर कम हैं, मरीज ज्यादा. डॉक्टर बड़े महंगे हैं, मरीज के पास संसाधन बहुत कम. इस ‘बीमारी’ के इलाज के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल लाल किले से NHDM की शुरुआत करने की बात कही थी, जिसके तहत ABDM को लॉन्च किया गया है.

क्या है ABDM?

आप जब भी किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो पहले वो पूछता है- पहले कब बीमार पड़े थे? क्या इलाज चल रहा है? कोई पुरानी बीमारी तो नहीं थी? पुराने टेस्ट के कागज दिखाओ. आप भी अपने पर्चों के पुलिंदे को खंगालते रहते हैं. कभी कोई डॉक्युमेंट मिलता है, कभी नहीं मिलता. डॉक्टर फिर टेस्ट लिख देता है. कुल मिलाकर बीमार की परेशानी और बढ़ जाती है.

ऐसे में लगता है कि कितना अच्छा हो कि कोई हमारी दवा-दारू के सारे पर्चे सहेज ले और जरूरत पड़ने पर सामने रखे दे. ऐसी ही कुछ मुश्किलें आसान करना चाहता है नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन. इस मिशन में एक हेल्थ आईडी बनाने का प्लान है. इस आईडी में आपकी हेल्थ से जुड़ी सारी जानकारी स्टोर रहेगी.

मतलब मरीज की पूरी हेल्थ कुंडली तैयार की जाएगी. पिछले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में योजना पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि आपकी हर चिकित्सा जांच, हर बीमारी, आपको किस डॉक्टर ने कौन-सी दवा दी, कब दी, आपकी रिपोर्ट्स क्या थीं, ये सारी जानकारी इसी एक स्वास्थ्य पहचान पत्र में स्टोर रहेंगी. इसे बनवाने के लिए आपको अपनी बेसिक जानकारी जैसे नाम, पता, उम्र आदि देनी होगी. इसके अलावा मोबाइल नंबर और आधार नंबर बताना होगा.

इन सबको मिलाकर एक यूनिक हेल्थ आईडी जनरेट की जाएगी. इस आईडी के जरिए ही वो शख्स अपने स्वास्थ्य से जुड़ी हर जानकारी ले सकेगा. इस डिजिटल प्लेटफॉर्म में हेल्थ आईडी, पर्सनल हेल्थ रिकॉर्ड, डिजी डॉक्टर और हेल्थ फेसेलिटी रजिस्ट्री जैसे फीचर्स होंगे.

mansukh manviya, health card id
योजना की लॉन्चिंग के मौके पर हेल्थ मिनिस्टर मनसुख मांडविया. (तस्वीर- पीटीआई)

ये काम कैसे करेगा?

हेल्थ आईडी के लिए रजिस्टर करने वाले को एक यूनिक आईडी कार्ड यानी पहचान पत्र मिलेगा. ये आधार जैसा ही होगा. इसके जरिए किसी भी मरीज की निजी मेडिकल हिस्ट्री पता चल सकेगी. मुमकिन है कि ये आईडी बनने के बाद अगर आप देश के किसी भी कोने में इलाज के लिए जाएंगे तो आपको कोई जांच रिपोर्ट या पर्ची ले जाने की जरूरत नहीं होगी. सारी जानकारी हेल्थ कार्ड में मौजूद होगी. डॉक्टर सिर्फ आपकी आईडी से जान सकेंगे कि आपको पहले कौन-सी बीमारी रही है और आपका कहां पर क्या इलाज हुआ था.

इस सबका डेटा एक सेंट्रल सर्वर में रखा जाएगा. इसमें सिर्फ मरीज ही नहीं, इलाज करने वाले और अन्य पक्षों को भी जोड़ा जाएगा. नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के प्लेटफॉर्म पर अस्पताल, क्लीनिक, डॉक्टर, टेलीमेडिसिन कंपनियां, लैब्स और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों को भी लाने की बात कही जाती रही है. इन सबका भी इस प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन किया जाएगा.

पायलट प्रोजेक्ट के तहत हुई थी शुरुआत?

ABDM की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर केंद्र शासित प्रदेशों से हुई थी. योजना के तहत पहले इसे पुडुचेरी, चंडीगढ़, लद्दाख, दादर और नागर हवेली, दमन-दीव, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप में लागू किया गया था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इन जगहों से मिले परिणामों के आधार पर ही इसे पूरे भारत में लागू करने का प्लान तैयार किया गया है.

हेल्थ आईडी बनवाना जरूरी होगा?

इस बारे में अभी क्या अपडेट है, ये साफ नहीं है. लेकिन पिछले साल की घोषणा में कहा गया था कि जो चाहें बनवाए जो चाहें न बनवाएं. ABDM को लागू करने में नेशनल हेल्थ अथॉरिटी की भूमिका अहम रहने वाली है. पिछले उसने कहा था कि जो भी लोग अपने हेल्थ रेकॉर्ड्स की जानकारी देकर हेल्थ आईडी बनवाना चाहते हैं, उन्हें ये सुविधा दी जाएगी. अभी सरकार इसे सबके लिए अनिवार्य नहीं करेगी, लेकिन कोशिश यही है कि आधार की तरह धीरे-धीरे सभी इस सिस्टम में आ जाएं जिससे पर्सनल हेल्थ रिकॉर्ड रखना आसान हो जाएगा.

सरकार का मानना है कि इससे आयुष्मान भारत मिशन के तहत मुफ्त या सस्ता इलाज मुहैया कराना और आसान हो जाएगा. हालांकि जो लोग इसमें रजिस्टर नहीं कराएंगे, उन्हें भी सभी सुविधाएं पहले की तरह मिलती रहेंगी. ABDM बस सुविधाओं को ज्यादा व्यवस्थित करने का एक प्रयास है.

क्या ऐसा करने वाला भारत अकेला देश है?

भारत से पहले ऐसी ही एक योजना ब्रिटेन में बनी. असल में ब्रिटेन में साल 1948 से ही नेशनल हेल्थ मिशन नाम का प्लान चल रहा है. जब तकनीक आगे बढ़ी तो 80-90 के दशक में सोचा गया सब डिजिटाइज़ कर दिया जाए. इसके लिए NHSIT नाम का एक प्रोजेक्ट बना और इस पर खूब पैसे भी खर्च हुए लेकिन ये परवान नहीं चढ़ा. इसके बाद साल 1999 में  NHS Information Authority (NHSIA) बनाया गया. इसके जरिए फिर से सब कुछ सही करने की कवायद शुरू हुई लेकिन नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’. साल 2005 तक आते-आते फिर से NHSIA के कई टुकड़ों में तोड़ दिया गया. इस दौरान साल 2002 में  NHS National Programme for IT (NPfIT) की शुरुआत कर दी गई. इसके जरिए लोगों को अपने हेल्थ आईडी बनवाने और अस्पतालों ने इसे अपने डेटाबेस में शामिल करने की शुरुआत हुई. इसमें कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में अपडेट को लेकर भारी देरी हुई. तंग आकर इस प्रोग्राम को भी खत्म किया गया, हालांकि उस वक्त तक इस पर 1200 करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च हो चुके थे. इसे दुनिया का सबसे महंगा आईटी फेल्योर प्रोजेक्ट कहा गया.

ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ के मुताबिक, इस योजना में किए गए बार-बार के बदलाव और सप्लायर्स के बीच में आए टकराव के चलते ये प्रोजेक्ट काफी पिछड़ गया. यही इसके फेल होने की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है.

बहरहाल, जहां तक बात भारतीय नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन की है तो इसकी कल्पना नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 में की गई थी. इसे साकार करने का बीड़ा 2020 उठा गया. जानकारों का मानना है कि दूरदराज के लोगों तक इस मिशन को ले जाना चुनौती भरा काम होगा. साथ ही, डेटा को सेफ रखना भी बड़ा चैलेंज है. अब इन चुनौतियों से भारत सरकार कैसे निपटेगी, ये तो वक्त ही बताएगा.

ये स्टोरी 17 अगस्त 2020 को पब्लिश की गई थी, जिसे नई अपडेट्स के साथ रीपब्लिश किया गया है.


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