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42 साल पुराना मुलगावकर केस क्या है, जिसे कोर्ट ऑफ कंटेंम्प्ट की लक्ष्मण रेखा कहा जाता है

कोर्ट की अवमानना मामले में सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण की सजा के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में 20 अगस्त को सुनवाई हुई. इस दौरान प्रशांत के वकील राजीव धवन ने 42 साल पुराने एक मामले का जिक्र किया. इसे मुलगावकर केस कहा जाता है. जस्टिस कृष्णा अय्यर के इस फैसले को अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में और कोर्ट की कथित अवमानना के विपक्ष में एक नज़ीर की तरह देखा जाता है. धवन ने इसका जिक्र करते हुए दलील दी थी कि मुलगावकर केस में जस्टिस अय्यर ने कहा था कि न्यायपालिका को अपने ऊपर किए जाने वाले कमेंट्स को नजरअंदाज करना चाहिए. मुलगावकर केस को कोर्ट ऑफ कंटेंप्ट मामलों में लक्ष्मण रेखा की तरह देखा जाता है.

तो क्या है मुलगावकर केस?

यह केस साल 1978 का है. इसे शामलाल-मुलगावकर केस भी कहा जाता है. अंग्रेजी के दो बड़े अखबारों टाइम्स ऑफ इंडिया के एडिटर शामलाल और इंडियन एक्सप्रेस के एस मुलगावकर पर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगा था. एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने आर्टिकल लिखा था. वहीं इंडियन एक्सप्रेस ने एक ओपिनियन पीस लिखा. इन दोनों में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले को लेकर जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ और पीएन भगवती की आलोचना की गई. साथ ही, जस्टिस मिर्जा हमीदुल्लाह बेग पर भी सवाल उठाए गए. यह मामला इमरजेंसी के दौरान 1976 का था. उस वक्त इमरजेंसी लगी हुई थी.

शुक्ला का मामला क्या था?

दरअसल, हुआ यह था कि शिवकांत शुक्ला नाम के व्यक्ति को इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार किया गया था. लेकिन शुक्ला ने आरोप लगाया कि उन्हें कोर्ट के सामने पेश ही नहीं किया गया. उन्हें बिना किसी आरोप के जेल में रखा गया. शुक्ला ने गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने हैबियस कॉर्पस यानी गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करने की अर्जी दी. तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एएन रे की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय बेंच ने दो महीने तक सुनवाई के बाद सरकार के पक्ष में फैसला दिया. बेंच में सीजेआई एएन रे के अलावा जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़, पीएन भगवती, एमएच बेग और एचआर खन्ना भी थे. फैसला 4-1 के बहुमत से आया. केवल जस्टिस एचआर खन्ना ने ही सरकार के पक्ष को सही नहीं माना.

इमरजेंसी हटी तो मीडिया में हुई फैसले की खिंचाई

उस वक्त इमरजेंसी लगी हुई थी, ऐसे में ज्यादा कुछ लिखा नहीं जा सका क्योंकि सरकार ने कथित तौर पर मीडिया पर शिकंजा कस रखा था. बाद में, इस फैसले की काफी आलोचना हुई. 1977 में जब इमरजेंसी हटी तो इस मामले में कोर्ट के फैसले को लेकर मीडिया में काफी कुछ लिखा गया. इंडियन एक्सप्रेस ने 13 दिसंबर 1977 को ओपिनियन कॉलम छापा. यह आर्टिकल मशहूर वकील एजी नूरानी ने लिखा था.

वहीं, 7 जनवरी 1978 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने 52 बुद्धिजीवियों का लिखा एक मेमोरेंडम अखबार में छापा. मेमोरेंडम लिखने वालों में कई वकील और पूर्व जज भी शामिल थे. इन दोनों आर्टिकल्स में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में फैसले को लेकर जस्टिस मिर्जा हमीदुल्लाह बेग (जो तब तक चीफ जस्टिस बन चुके थे), वाईवी चंद्रचूड़ और पीएन भगवती पर सवाल उठाए गए. दिलचस्प बात थी कि जस्टिस चंद्रचूड़ और भगवती अगले सीजेआई बनने की दौड़ में थे. दोनों के मुख्य न्यायाधीश बनने को लेकर चिंता जताई गई.

भारत के पूर्व चीफ जस्टिस मिर्जा हमीदुल्लाह बेग.
भारत के पूर्व चीफ जस्टिस मिर्जा हमीदुल्लाह बेग.

चीफ जस्टिस ने अवमानना के नोटिस भेज दिए

28 फरवरी को चीफ जस्टिस एमएच बेग ने दो अलग-अलग नोटिस दोनों अखबारों के एडिटर्स को भेज दिए. दोनों नोटिस स्वत: संज्ञान लेकर भेजे गए. इसमें कहा गया कि उन्होंने कोर्ट की अवमानना की है. लेकिन चीफ जस्टिस बेग के इस कदम का सुनवाई में शामिल बाकी जजों ने समर्थन नहीं किया. जस्टिस उंटवालिया और कैलाशम ने माना कि टाइम्स ऑफ इंडिया में जो रिपोर्ट छपी थी, उसमें कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट जैसा कुछ नहीं था. दोनों ने अपने फैसले में बिना कोई टिप्पणी किए लिखा-

इस मामले के अच्छे और बुरे सभी पक्ष देखने के बाद हमने माना कि यह अवमानना का केस चलाने लायक मामला नहीं है. ऐसे में हम कार्रवाई को खत्म करते हैं.

वहीं तीसरे जज यानी सीजेआई बेग ने रिपोर्ट पर कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की. लेकिन 2-1 से फैसला शामलाल के पक्ष में गया. जस्टिस बेग ने अपने फैसले में लिखा था,

मेरे दो काबिल भाइयों का यह मत है कि हमें इस तरह की खबरों को नज़रअंदाज करना चाहिए और आगे कार्यवाही नहीं करनी चाहिए. मैं अपना असंतोष जाहिर करते हुए कार्यवाही को खत्म करने के मिलेजुले फैसले पर दस्तखत करने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता.

फैसले में कहा, आलोचना से डरें नहीं

इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर मुलगावकर के फैसले में जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर और जस्टिस कैलाशम ने माना कि मामला अवमानना का नहीं है. इस मामले में जस्टिस अय्यर ने केवल केस को खत्म करने तक ही अपने को सीमित नहीं किया बल्कि यह भी बताया कि क्यों वे सीजेआई बेग से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा कि हमने सर्वसम्मति से अवमानना केस की कार्यवाही को रद्द करने का फैसला किया है. जैसे नदियां अलग-अलग होती हैं, वैसे ही दिमाग भी अलग होते हैं. यह केस भी ऐसा ही है. उन्होंने कहा-

# कथित अवमानना के हरेक कदम पर गुस्सा नहीं होना चाहिए या फिर सजा की मांग नहीं करनी चाहिए क्योंकि जज न्यायसम्मत होते हैं. उनकी वीरता अहिंसा में होती है. खुद को सुरक्षा देना उनका गुण नहीं है. न्याय कोई शेखी बघारना नहीं है. विवेकशील होना कायरता नहीं है. विशेष रूप से तब, जब जज खुद फरियादी हो और तब दया करना ताकत होती है न कि कमजोरी की निशानी.

# न्यायिक प्रवृत्ति के लिए शांति, संतुलन और आतंरिक समरसता सबसे उत्कृष्ट श्रेणी के होने चाहिए, जो आवेश, उत्तेजना या अपमान के सामने भी डिगे नहीं. न्यायिक प्रक्रिया की आधारशिला शांति और नीति होनी चाहिए. जिससे कि आलोचना चाहे वह फर्जी हो या जायज, प्रमाणित हो या अप्रमाणित, उनका कोर्ट की विचार प्रक्रिया पर असर नहीं दिखे. इतिहास गवाह है कि सत्य की चुप्पी भी लाखों बयानों या लिखावटों से ज्यादा ताकतवर होती है. अवमानना के मसले की बात की जाए तो चुप्पी ताकत का प्रतीक होती है क्योंकि हमारी ताकत व्यापक है. हम जज और अभियोजक हैं.

# जजों के खिलाफ खुले मन से बेनेफिट ऑफ डाउट दिए जाने की जरूरत है. छोटी सी गलतियों पर अपमानित होने की बजाए झगड़ालू, भ्रष्ट, बेरहम और कपटी अवमानना करने वालों पर कानून की सर्वोच्चता साबित करनी चाहिए.

# निष्पक्षता से जजों की आलोचना करना अपराध नहीं है बल्कि एक आवश्यक अधिकार है.

# इंग्लैंड के एक जज लॉर्ड डेनिंग ने 1968 में कहा था कि हमें न्यायिक क्षेत्राधिकार को अपने सम्मान की रक्षा के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ना ही इसका इस्तेमाल अपने खिलाफ बोलने वालों पर करना चाहिए. हमें आलोचना का न तो डर होना चाहिए और न इस पर गुस्सा करना चाहिए. जनता से जुड़े मसलों पर सभी को सही बात कहने का अधिकार है.

# इस बात का अंतर साफ करना चाहिए कि कोर्ट की अवमानना क्या होती है और यह जजों से अलग होती है. किसी जज के किसी भी कदम या व्यवहार की सही, तार्किक आलोचना होनी चाहिए.

# भारत के पूर्व चीफ जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने एक फैसले में कहा था कि इसमें कोई शक नहीं है कि बाकी संस्थानों की तरह कोर्ट भी उचित आलोचना से बचे हुए नहीं हैं.

# कोर्ट लोगों के हितों के संरक्षक हैं. लगातार यह कहा जाता है कि अवमानना जैसे कदम बहुत सावधानी और तार्किक आधार पर होने चाहिए.

# न तो कोर्ट और न ही प्रेस लोगों से ऊपर हैं. ऐसे में मूल्यों का संतुलन मुश्किल और नाजुक है लेकिन यह बेहद जरूरी है.

# अमेरिका के जस्टिस जैकसन ने एक मामले में कहा था कि जज को मोटी चमड़ी या खुले दिमाग का होना चाहिए.

मुलगावकर के केस में भी सीजेआई बेग ने कहा कि ओपिनियन आर्टिकल कंटेंम्प्ट के लायक है. लेकिन एक बार फिर से केस रद्द कर दिया गया और मुलगावकर अवमानना के आरोप से बरी हो गए. तब से ही मुलगावकर केस को कोर्ट ऑफ कंटेंम्प्ट में एक नजीर की तरह माना जाता है.


Video: अदालत की अवमानना के वो मामले जब जजों पर टिप्पणी करने की वजह से लोगों पर केस दर्ज हो गया

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