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चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तकरार की वजह क्या है?

पिछले कुछ दिनों से एक ख़बर इंटरनेशनल मीडिया में छाई हुई है. चीन बनाम ताइवान. चीन लगातार ताइवान की हवाई सीमा में अपने फ़ाइटर जेट्स भेज रहा है. ये पहली बार नहीं है. चीन इससे पहले भी ऐसा करता रहा है. वो ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. और किसी भी विधि से उसे हड़पने की जुगत में लगा हुआ है. अपनी सीमा में हो रही घुसपैठ से ताइवान नाराज़ है. उसने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा चलता रहा तो मिसफ़ायर का ख़तरा बढ़ जाएगा. यानी, इस स्थिति में लड़ाई की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. ताइवान की गणना है कि 2025 तक चीन उसके ऊपर क़ब्ज़ा करने में पूरी तरह सक्षम हो जाएगा.

इस झगड़े के बीच अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जनरल ने एक खास रिपोर्ट पब्लिश की है. इसके मुताबिक, अमेरिका की स्पेशल फ़ोर्सेज़ की एक टीम पिछले एक साल से ताइवान में है. वे वहां ताइवान के सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. इस तैनाती का असल मकसद अभी अज्ञात है. लेकिन, इसे सीधे-सीधे चीन के बढ़ते आक्रामक रुख से जोड़कर देखा जा रहा है.

आज जानेंगे, चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तकरार की वजह क्या है? चीन अपने फ़ाइटर जेट्स ताइवान की सीमा में क्यों भेज रहा है? अमेरिका ने अपने सैनिकों को ताइवान में क्यों तैनात कर रखा है? और, क्या ताइवान के मसले पर अमेरिका और चीन आपस में भिड़ने वाले हैं? आज की ख़बर लेने से पहले अतीत के कुछ पन्ने पलट लेते हैं. ताकि अभी वाली घटना का तिया-पांचा आसानी से समझ में आ जाए.

क्या है ताइवान का इतिहास?

साल 1927. चीन में सिविल वॉर शुरू हुआ. माओ ज़ेदोंग की कम्युनिस्ट पार्टी और च्यांग काई-शेक की कुओमितांग पार्टी के बीच. शुरुआती सालों में कुओमितांग का पलड़ा भारी रहा. जब जापान ने चीन पर हमला किया, तब दोनों पार्टियां साथ आ गईं. उन्होंने मिलकर जापान से लोहा लिया. सेकेंड वर्ल्ड वॉर ख़त्म होने के बाद जापान बाहर निकल गया. एक मशहूर कहावत है, दुनिया में ऐसा कोई युद्ध नहीं हुआ, जिसने दूूसरे युद्ध की आशंका को समाप्त कर दिया हो.

चीन में वही हुआ. वर्ल्ड वॉर के बाद बचा-खुचा सिविल वॉर फिर शुरू हुआ. इस फ़ेज में माओ ने च्यांग काई-शेक को घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया. 1948 आते-आते साफ़ हो चुका था कि जीत कम्युनिस्ट पार्टी की होगी. कुओमितांग के नेताओं ने सोचा, आगे क्या करें? विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि फ़ॉरमोसा द्वीप चला जाए. इसे ही ताइवान के नाम से जाना जाता है. ये द्वीप पेइचिंग से लगभग दो हज़ार किलोमीटर दूर था. सामरिक दृष्टि से भी ये मुफ़ीद जगह थी.

Taiwan Map 2
Taiwan Map 2

अगस्त 1948 में शिफ़्टिंग का काम शुरू हुआ. च्यांग काई-शेक की सरकार ने धन-दौलत से लेकर संस्थानों तक को उठा लाए. शिफ़्टिंग का काम दिसंबर 1949 में पूरा हो गया. तब तक मेनलैंड चीन में माओ की सरकार बन चुकी थी.

Chiang Kai Shek And Mao Zedong
Chiang Kai Shek And Mao Zedong

शुरुआत में ब्रिटेन और अमेरिका, दोनों च्यांग काई-शेक को चीन का लेजिटिमेट लीडर मानते थे. इन्होंने माओ के चीन को मान्यता नहीं दी. 1945 में जब UN बना, तब मेनलैंड चीन ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ हुआ करता था. वो UN के शुरुआती सदस्यों में था. च्यांग काई-शेक ने फ़ॉरमोसा में सरकार बनाई तो उसका नाम ‘रिपब्लिक ऑफ़ चाइना’ रखा. माओ ने अपने हिस्से के चीन का नाम रखा, ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना’.

शुरुआत में च्यांग काई-शेक वाले चीन यानी ताइवान को मान्यता मिली थी. 25 अक्टूबर, 1971 को UN ने ताइवान को निकालकर कम्युनिस्ट चीन को अपना लिया. कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ भिड़ रहे थे. अमेरिका को लगा कि अगर चीन हमारे साथ रहा तो बेनिफ़िट हो सकता है. यही सोचकर 1978 में उसने भी चीन को मान्यता दे दी.

राष्ट्रपति चुनाव में कुओमितांग की जीत

च्यांग क्रूर तानाशाह थे. उन्होंने जनता को दबाकर रखा था. 1975 में च्यांग की मौत हो गई. इसके बाद कुओमितांग पार्टी का प्रभाव कम होने लगा. 80 के दशक में लोकतंत्र की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू हुए. आख़िरकार, 1996 में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव हुआ.

इस चुनाव में भी कुओमितांग जीत गई. इस पार्टी की नीतियां चीन के लिए उतनी ख़तरनाक नहीं थी. कुओमितांग के लिए चीन और ताइवान एक इकाई हैं. वो ताइवान के स्वतंत्र अस्तित्व में भरोसा नहीं रखता. 1992 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमितांग के बीच एक समझौता हुआ था. इसमें ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर सहमति बनी थी. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि ताइवान और चीन एक ही है. हालांकि, दोनों पक्षों को इस बात की आज़ादी थी कि वे ताइवान वाले रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को मानें या कम्युनिस्ट चाइना को. चीन, ताइवान के प्रभुत्व को क्यों ही स्वीकार करता. इसको लेकर ताइवान की ‘आज़ाद-ख़याल’ जनता में नाराज़गी फैली. उन्हें लगा कि कुओमितांग पार्टी चीन के साथ उनकी आज़ादी का सौदा कर रही है.

Taiwan Parliament/abacus
कुओमितांग

साल 2005 में चीन ने एंटी-सेशेसन लॉ लागू किया. इस कानून में क्या था? अगर ताइवान ने अलग होने की कोशिश की तो चीन के पास हिंसक तरीके अपनाने का पूरा अख़्तियार होगा. मतलब ये कि चीन, ताइवान को रोकने के लिए ताक़त का इस्तेमाल कर सकता है. इसके बावजूद 2008 में ताइवान सरकार ने चीन के साथ संबंध बढ़ाने की वक़ालत की. जनता में फिर से चीनी क़ब्ज़े का डर पैदा हुआ.

2016  मे आया बड़ा मोड़

ऐसे में 2016 के चुनाव में बड़ा मोड़ आया. इस साल के राष्ट्रपति चुनाव में कुओमितांग की ज़बरदस्त हार हुई. साइ इंग-वेन के नेतृत्व में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) ने सरकार बनाई. DPP की पॉलिसी साफ़ है. वे ताइवान को संप्रभु देश मानते हैं. वे चीन के साथ एकीकरण की संभावनाओं से इनकार करते हैं. उन्हें ‘वन कंट्री, टू सिस्टम’ का छलावा मंज़ूर नहीं है. और, वे चीन की आक्रामकता का जवाब देने के लिए तैयार रहेंगे.

जब ट्रंप ने अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव जीता, तब साइ ने उन्हें फ़ोन किया था. ऐसा 1979 के बाद पहली बार हो रहा था. अमेरिका ने ताइवान को हरसंभव मदद देने का भरोसा दिया है. ट्रंप के कार्यकाल में हथियारों की डील भी हुई. 2021 में जो बाइडन सत्ता में आए. उन्होंने भी ट्रंप की ताइवान पॉलिसी को ही आगे बढ़ाया है.

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बाइडन सत्ता में आए. उन्होंने भी ट्रंप की ताइवान पॉलिसी को ही आगे बढ़ाया है.

साइ इंग-वेन की दूसरी जीत से क्या बदला?

2020 में ताइवान में हुए चुनाव में साइ इंग-वेन ने लगातार दूसरी जीत दर्ज़ की. इन सारी बातों से चीन की बौखलाहट बढ़ी हुई है. जब से साइ इंग-वेन ने सत्ता संभाली है, तब से दो चीज़ों में बढ़ोत्तरी हुई है. पहली, ताइवान बाकी दुनिया के साथ संपर्क बढ़ाने में जुटा हुआ है. उसने अमेरिका के साथ हथियारों की कई डील्स की हैं. अमेरिका के कई बड़े अधिकारी ताइवान आ चुके हैं. चीन इससे उखड़ा रहता है. उसका दावा है कि ताइवान चीन का हिस्सा है. इसलिए, ताइवान की बजाय हमसे बात करो.

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साइ इंग-वेन

दूसरी चीज़ जो बढ़ी है, वो है चीन की आक्रामकता. चीन लगातार अपनी सैन्य ताक़त का प्रदर्शन करता रहा है. ताइवान और चीन के बीच 180 किलोमीटर चौड़ा समंदर है. इसे ताइवान जलसंधि कहते हैं. इसी के बीचोंबीच एक काल्पनिक लाइन खींची है. उसका नाम मीडियन लाइन है. ये दोनों देशों के बीच की सीमा है. चीन न तो इस सीमा को आधिकारिक मानता है और न ही उसके उल्लंघन से बाज आता है. वो लगातार अपने लड़ाकू विमान ताइवान की सीमा में भेजता रहता है. इसे उकसावे की कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है.

आज के दिन इसकी चर्चा क्यों?

दरअसल, हालिया घटनाक्रम भी उसी उल्लंघन से जुड़ा है. पिछले एक हफ़्ते में चीन ने अपने 150 से अधिक लड़ाकू विमान ताइवान की हवाई सीमा में भेजे हैं. इनमें J-16 फ़ाइटर जेट और एच-6 न्युक्लियर बॉम्बर भी शामिल थे. चीन की इस बेताबी की वजह क्या है?

Taiwan China
चीन ने अपने 150 से अधिक लड़ाकू विमान ताइवान की हवाई सीमा में भेजे थे.

10 अक्टूबर को ताइवान ‘राष्ट्रीय दिवस’ के तौर पर सेलिब्रेट करता है. 1911 में इसी दिन चिंग वंश का पतन हुआ था और रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना का रास्ता साफ़ हुआ था. जानकारों का कहना है कि चीन को इस बात का डर है कि ताइवान इस साल राष्ट्रीय दिवस के मौके पर अपनी आज़ादी का ऐलान कर सकता है. चीन ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहता है. इसलिए, वो अपनी सैन्य-शक्ति का प्रदर्शन कर ताइवान को काबू में रखना चाहता है.

हालांकि, ताइवान की राष्ट्रपति ने बार-बार कहा है कि हमारे देश का अपना संविधान है, एक सेना है और चुनी हुई सरकार भी है. इसलिए, हम आज़ाद भी हैं और संप्रभु भी. हमें इस बात का ऐलान करने की कोई ज़रूत नहीं है.

पांच अक्टूबर को राष्ट्रपति साइ ने ‘फॉरेन अफ़ेयर्स’ मैगज़ीन में एक लेख लिखा. इसका शीर्षक है, Taiwan and the fight for Democracy ताइवान और लोकतंत्र के लिए संघर्ष

Foreign Affairs Mag
राष्ट्रपति साइ ने ‘फॉरेन अफ़ेयर्स’ मैगज़ीन में एक लेख लिखा था.

इसमें उन्होंने लिखा है कि हम चीन के साथ युद्ध नहीं चाहते. लेकिन अगर ज़रूरत पड़ी तो हम पीछे नहीं हटेंगे. साइ ने अपने लेख में चेताया कि अगर चीन ने ताइवान पर क़ब्ज़ा किया तो ये एशिया में शांति और लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक साबित होगा.
उन्होेंने लिखा,

‘इससे दुनिया में ये संदेश जाएगा कि निरंकुशता और अधिकारवाद का वजन लोकतंत्र से कहीं अधिक है.’

साइ लोकतंत्र में आस्था रखने वाले देशों से साथ आने की अपील कर रहीं थी. इससे हालिया तनाव की गंभीरता समझ में आती है. एक और उदाहरण सुनिए.

सात अक्टूबर को ताइवान की एक संसदीय कमिटी में रक्षामंत्री चिउ कू-चेंग ने अपनी बात रखी. इसमें उन्होंने कहा कि चीन और ताइवान के बीच का तनाव पिछले चालीस सालों के सबसे वीभत्स मोड़ पर पहुंच चुका है. जिस तरह से हवाई सीमा का उल्लंघन बढ़ रहा है, मिसफ़ायर का ख़तरा हावी हो गया है. ऐसी स्थिति में युद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. कू-चेंग ने चेताया कि चीन अभी भी हमला करने में सक्षम है, लेकिन वो 2025 तक क़ब्ज़ा करने की हालत में होगा.

ताइवान बढ़ते ख़तरे के मद्देनज़र अरबों का डिफ़ेंस बिल लाने पर विचार कर रहा है. इसके तहत मिसाइलों और युद्धपोतों का निर्माण किया जाएगा. ये तो हुआ ताइवान का पक्ष. इस मसले पर चीन क्या कहता है?

चीन का क्या रुख है?

चीन अपने रुख पर कायम है. उसका कहना है कि ताइवान हमारा हिस्सा था और रहेगा. चाहे इसके लिए कोई रास्ता अपनाना पड़े. चीन, ताइवान के मसले पर अमेरिका को भी धमकी देता रहा है. उसने कहा है कि ताइवान की आज़ादी का समर्थन करने का मतलब है, युद्ध का ऐलान. चीन ने ये चेतावनी भरे लहजे में कहा अमेरिका को ताइवान की ‘अलगाववादी’ शक्तियों का साथ देना छोड़ देना चाहिए.
चीन और ताइवान के बीच अमेरिका कहां से आया?

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चीन ने चेतावनी भरे लहजे में कहा अमेरिका को ताइवान की ‘अलगाववादी’ शक्तियों का साथ देना छोड़ देना चाहिए.

जब 1978 में अमेरिका ने कम्युनिस्ट चीन को मान्यता दी तो उसने ताइवान के साथ डिप्लोमैटिक रिश्ते समाप्त कर लिए थे. आज तक अमेरिका ने ताइवान को मान्यता नहीं दी है. ताइवान को मान्यता देने वाले गिनती के छोटे-छोटे देश हैं. यहां पर चीन की बादशाहत दिखती है.
चीन ने ताइवान को भले ही मान्यता नहीं दी, लेकिन उसने एक बायपास निकाला. 1979 में अमेरिकी संसद ने ताइवान रिलेशन्स ऐक्ट को मंज़ूरी दी. इसमें तय हुआ कि अमेरिका ताइवान को बाहरी आक्रमण से सुरक्षा के लिए हर तरह से मदद करेगा. अमेरिका इसी कानून के तहत ताइवान को हथियार बेचता है.

जब 1996 में ताइवान में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव होने थे, तब चीन ने इसे रोकने की पूरी कोशिश की थी. उसने मिसाइल टेस्ट किया, हथियार इधर-उधर तैनात किए. उस समय अमेरिका ने अपने एयरक्राफ़्ट कैरियर्स को चीन की तरफ़ मोड़ दिया था. तब जाकर चीन शांत पड़ा था. इस बार मामला उतना सीधा भी नहीं है. चीन ने अपनी सैन्य-क्षमता कई गुणा बढ़ा ली है. ग्लोबल पॉलिटिक्स में उसका प्रभाव भी काफ़ी बढ़ चुका है. ऐसे में उसे रोक पाना आसान नहीं होगा.

जानकार बताते हैं कि जब चीन अपने फ़ाइटर जेट्स को ताइवान की सीमा में भेजता है, तब ताइवान भी अपने एयरक्राफ़्ट्स को हवा में उतार देता है. इस दौरान एक ग़लत सिग्नल शांति को भंग करने के लिए काफ़ी है. अगर कभी शक्ति-प्रदर्शन के दौरान ग़लती से कोई हिंसा हुई तो युद्ध रोकना मुश्किल हो जाएगा.

अब अमेरिका का पक्ष जान लेते हैं

राष्ट्रपति बनने के बाद से जो बाइडन ने कहा था कि ताइवान की सुरक्षा के लिए उनकी सरकार काम करती रहेगी. हालिया तनाव के बीच 06 अक्टूबर को जो बाइडन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बात की. इस दौरान ताइवान का मुद्दा भी उठा. हालांकि, उनके बीच क्या बात हुई, इस पर कोई खुलासा नहीं हुआ. बाइडन और जिनपिंग के फ़ोन कॉल के एक दिन बाद अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सलिवन ने चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी से मुलाक़ात की.

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अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सलिवन

सात अक्टूबर को सलिवन ने बीबीसी को एक इंटरव्यू दिया. इसमें उनसे पूछा गया कि क्या ताइवान की रक्षा के लिए आप मिलिटरी ऐक्शन लेंगे. इस पर सलिवन ने कहा कि हम वैसी स्थिति पैदा होने से रोकने की पूरी कोशिश करेंगे. हालांकि, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि, इसमें कोई दोराय नहीं है कि हम अपने सहयोगियों और अपने हितों के लिए हमेशा साथ खड़े रहेंगे. यही हमारा इकलौता मकसद है.

अमेरिका, ताइवान की मदद के लिए कितना तैयार है, इसका एक उदाहरण वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट से मिलता है. अख़बार ने अज्ञात सोर्सेज़ के हवाले से छापा है कि अमेरिका के दो दर्ज़न से अधिक सैनिक पिछले एक साल से ताइवान की सेना को ट्रेनिंग दे रहे हैं. ये समय-काल वही है जिसमें चीन की आक्रामकता बढ़ी है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ट्रेनर्स ताइवान में अस्थायी तौर पर हैं.
ताइवान और अमेरिका, दोनों ने इस मसले पर किसी भी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया है. हालांकि, इतना तो तय है कि ये खुलासा चीन को बहुत चुभने वाली है. वो इसका जवाब किस तरह से देता है, ये देखने वाली बात होगी.


दनियादारी: ताइवान की हवाई सीमा में चीन इतने फ़ाइटर जेट्स क्यों भेजता है?

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