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Facebook ऐसा क्या बनाने जा रहा है कि दुनिया अभी से हिली हुई है?

फेसबुक के फाउंडर मार्क जक़रबर्ग ने एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने की घोषणा कर दी है जिससे इंटरनेट की दुनिया पूरी तरह से बदल जाएगी. हालांकि इस मेटावर्स नाम की तकनीक को लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं. (फोटो-पीटीआई)

साल 2018 में हॉलिवुड की एक धांसू साइंस फिक्शन मूवी रिलीज हुई. नाम था Ready Player One. कहानी है साल 2047 की. दुनिया तबाही की कगार पर पहुंच चुकी है और मशीनें इंसान पर हावी हैं. ऐसे में वेड वॉट्स नाम का एक लड़का एक खास वीडियो गेम खेल कर गेमिंग से लेकर असल दुनिया में तहलका मचा देता है. फिल्म में मौजूद एक खास गेम वर्चुअल रिएलिटी के सहारे हर शख्स को एक नई दुनिया और नया अवतार लेने की ताकत देता है.

ये फिल्म आपको ले जाती है मेटावर्स की दुनिया में. मेटावर्स, मतलब वो दुनिया जो असल नहीं है लेकिन तकनीक उसे असल जितनी ही साक्षात बना देती है. ये सब मुमकिन होता है वर्चुअल रिएलिटी और आर्टिफिशियल रिएलिटी के मेलजोल से. कुछ ऐसा ही काम फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग शुरू कर रहे हैं. खबर है कि वो मेटावर्स बनाने में जुटे हैं. इसके लिए उन्होंने हायरिंग भी शुरू कर दी है. अगले 5 साल तक फेसबुक मेटावर्स बनाने के लिए यूरोपियन यूनियन के देशों से 10 हजार लोगों की भर्ती करेगा. तो आइए जानते हैं कि मार्क जकरबर्ग ऐसा क्या बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसे इंटरनेट की दुनिया का गेमचेंजर कहा जा रहा है.

क्या है Metaverse?

मेटावर्स को आसान भाषा में समझें तो ये हमारी समझ से बाहर के यूनिवर्स से आगे जाने की बात है. मतलब ये जो सब चांद-सितारे और आकाश गंगाएं हैं उससे भी आगे. ऐसी जगह जो किसी ने देखी-सुनी तक न हो. ऐसा सिर्फ तकनीक से ही मुमकिन था. हर तकनीक कभी पहले मात्र कल्पना थी. ऐसा ही कुछ मेटावर्स के साथ भी है. मेटावर्स शब्द पहली बार 1992 में तब चर्चा में आया जब अमेरिकी लेखक नील स्टीफेंसन (Neal Stephenson) ने अपनी साइंस फिक्शन नॉवल स्नो क्रैश (Snow Crash) में इसका इस्तेमाल किया. नॉवल में इस शब्द के जरिए इंटरनेट पर आधारित वर्चुअल रिएलिटी को समझाया गया था.

स्टीफेंसन के अनुसार मेटावर्स एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जिसमें कोई भी अपने मर्जी से अपने अवतार को बदल कर मनचाही दुनिया की सैर कर सकता है. ये नॉवल काफी पॉपुलर हुआ और ट्रेंड चल निकला. इसके बाद विलियम गिब्सन (William Gibson) ने अपनी शॉर्ट स्टोरी ‘बर्निंग क्रोम’ और ‘न्यूरोमेंसर’ (Neuromancer) में इसका जिक्र किया. न्यूरोमेंसर पर बाद में मशहूर फिल्म मैट्रिक्स बनी.

ऐसी ही आभासी दुनिया रचना चाहते हैं फेसबुक के फाउंडर मार्क जकरबर्ग. इसे ही मेटावर्स नाम दिया जा रहा है. इस दुनिया में कोई भी एक चार्ज देकर पहुंच सकता है. अपने मन के मुताबिक अवतार भी चुन सकता है और साथ ही उस दुनिया या कहें कि मेटावर्स को भी चुन सकता है जिसमें वो जाना चाहता है.

ये काम कैसे करता है?

मेटावर्स की दुनिया में छलांग लगाने के लिए आपको कुछ टूल्स की जरूरत होगी. इनमें सबसे जरूरी है वर्चुअल रिएलिटी हेड सेट. ये हेडफोन की तरह की डिवाइस है. इसे आंख और कानों में फिट किया जाता है. फेसबुक पहले ही अपना वीआर सेट ऑक्युलस लॉन्च कर चुका है. ऑक्युलस नाम के इस वीआर हेडसेट को बनाने वाली कंपनी को फेसबुक ने साल 2014 में खरीदा था. इसके बाद साल 2019 में फेसबुक ने इस हेडसेट के साथ कनेक्ट हो सकने वाली वर्चुअल दुनिया होराइज़न को लॉन्च किया. इस दुनिया में एंट्री के लिए फेसबुक की तरफ से खास इनविटेशन की जरूरत पड़ती थी. ऑक्युलस हेडसेट लगाकर इस दुनिया में दाखिल हुआ जा सकता था.

कोरोना संकट के चलते जब घर ऑफिस बन गए तब अगस्त 2021 में फेसबुक ने होराइज़न वर्करूम्स लॉन्च किया. इसमें ऑफिस में काम करने वाला कोई भी शख्स वीआर हेडसेट्स पहन कर ऐसा महसूस कर सकता था कि वो असल में ऑफिस के मीटिंग रूम में ही है. हालांकि वर्चुअल रूम में उसे अपना कार्टून अवतार ही नजर आता था.

असल में ये सारी मशक्कत इस पूरे खेल को अगली स्टेज तक ले जाने की थी. मेटावर्स इस सबका एक ज्यादा सॉफेस्टिकेडेट वर्जन होगा. मतलब ज्यादा बेहतर दुनिया, ज्यादा बेहतर अवतार और बेहतर अहसास. तकनीकी कंपनियों में पैसा लगाने वाले एक वेंचर कैपिटलिस्ट मैथ्यू बॉल ने अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा था,

“मेटावर्स एक पूरी तरह से काम करती इकॉनमी की तरह होगा. जहां बिजनेस और लोग कुछ भी बनाने और बेचने के लिए आजाद होंगे. गोमिंग टोकन तो पहले ही मार्केट में आ चुके हैं जिन्हें खरीदा-बेचा जा सकता है. इसके अलावा नॉन फंजीबल टोकन (NFT) भी सिर्फ डिजिटल रूप में ही उपलब्ध हैं. मेटावर्स एक ऐसा अनुभव होगा जो तकनीक की आभासी दुनिया से लेकर असल दुनिया तक फैला होगा. इसके जरिए अभूतपूर्व तरीके से डेटा, असेट और कंटेंट का आदान-प्रदान होगा.’

वहीं मार्क जकरबर्ग ने मेटावर्स के बारे में बताते हुए द वर्ज वेबसाइट से कहा था,

“मेटावर्स सिर्फ वर्चुअल रिएलिटी नहीं है. इसे वर्चुअल और ऑग्मेंटेड रिएलिटी दोनों ही तरह के प्लेटफॉर्म से ऑपरेट किया जा सकता है. इसके लिए सिर्फ पर्सनल कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन ही काफी है. ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और असल दुनिया का एक हाईब्रिड रूप होगा. जैसे हम सोशल मीडिया पर रोज़ लोगों को देखते हैं वैसे ही वहां भी देख सकेंगे. लेकिन फर्क बस इतना होगा कि हम उस दुनिया के भीतर ही मौजूद होंगे.”

वर्चुअल रिएलिटी (VR) और ऑग्मेंटेड रिएलिटी (AR) को भी समझें

वर्चुअल रिएलिटी का मतलब है असली-सा लगने वाला ऐसा अनुभव जो असल में मौजूद नहीं है. मिसाल के तौर पर अगर आप जानना चाहते हैं कि सियाचिन का नॉर्थपोल कैसा दिखता होगा, तो इसका एक तरीका पारंपरिक टीवी स्क्रीन है जो आपको वहां की तस्वीर दिखा सकती है. इसके उलट वीआर हेडसेट्स के जरिये वही तस्वीर आंखों के सामने इस तरह प्रोजेक्ट की जाती है कि आपको वहां होने का आभास होता है. आप जिस तरफ सिर घुमाते हैं, उस तरफ की तस्वीरें दिखाई देती हैं. अडवांस्ड वीआर हेडसेट्स में साउंड और मोशन के हिसाब से भी डिस्प्ले अपनी सेटिंग्स बदलता रहता है.

वर्चुअल बैटलफील्ड में युद्धाभ्यास करती ब्रिटेन की रॉयल आर्टिलरी. फोटो: Wikimedia

ऑग्मेंटेड रिएलिटी, वर्चुअल रिएलिटी का ही अडवांस रूप है. इस तकनीक में आपके आसपास के वातावरण से मेल खाता ऐसा माहौल रच दिया जाता है जो असल सा मालूम पड़ता है. कुछ साल पहले इससे जुड़ा एक मोबाइल गेम काफी पॉपुलर हुआ था. उसका नाम था पोकेमॉन गो. इस गेम में जैसे ही आप अपना मोबाइल कैमरा किसी भी धरातल पर फोकस करते हैं तो वहां मोबाइल स्क्रीन पर एक आभासी जानवर नजर आता है. मोबाइल स्क्रीन पर ही उसे कैप्चर करके पॉइंट्स बनाए जाते हैं. मतलब ये कि जो असल दुनिया में नहीं है उसे एक प्लेटफॉर्म पर तैयार कर दिया गया है.

ऑग्मेंटेड रिएलिटी किसी भी तरह के माहौल में एक वर्चुअल कैरेक्टर तैयार कर सकती है. पोकेमॉन गो इस तकनीक पर आधारित पॉपुलर गेम है.

ये कब तक बन कर तैयार होगा?

तैयारी तो तगड़ी है. अगले 5 साल तक 10 हजार इंजीनियर इस प्रोजेक्ट में जुटेंगे. करोड़ों रुपए लगाए जाएंगे. हालांकि मामला जटिल है. फेसबुक रिएलिटी लैब्स के वाइस प्रेसिडेंट एंड्रयू बॉसवर्थ और कंपनी के ग्लोबल वीपी ने सितंबर 2021 के अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा था,

“मेटावर्स कोई ऐसा प्रोडक्ट नहीं है जिसे कोई एक कंपनी बना कर खड़ा कर सके. एक बार बनने के बाद ये बना रहेगा चाहें फेसबुक रहे या न रहे. ये मेटावर्स कोई रातों-रात नहीं बन सकते. इन्हें बनने में 10-15 साल का वक्त लग सकता है.

एक दूसरे पोस्ट में फेसबुक कंपनी यूरोप में हायरिंग करते वक्त लिखती है,

“कोई एक कंपनी मेटावर्स को नहीं चला सकती. इसकी खासियत ही यही होगी कि ये सबके लिए खुला होगा और इसमें आराम से बदलाव किया जा सकेगा. इसका मतलब दुनिया की बड़ी कंपनियों के बीच सहयोग से ही काम आगे बढ़ेगा.”

डेटा प्राइवेसी का क्या होगा?

फेसबुक पहले ही डेटा प्राइवेसी को लेकर दुनियाभर के पॉलिसी मेकर्स के निशाने पर है. हाल ही में कंपनी की एक व्हिसलब्लोअर ने अमेरिकी संसद को बताया कि फेसबुक को बस अपने फायदे की चिंता है. ऐसे में जब इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा हुई तो कई सवाल उठ रहे हैं. कुछ बड़े सवालों का जवाब अभी किसी ने नहीं दिया है, जैसे-

# इस पूरी कसरत में जो डेटा जमा होगा उसका क्या होगा?
# डेटा इस्तेमाल करने का अधिकार किस कंपनी को होगा?
# जिस शख्स का डेटा होगा उसके क्या अधिकार होंगे?
# डेटा सेफ्टी को लेकर फेसबुक क्या कर रहा है, उसका डेटा सेफ्टी प्लान क्या है?

द वॉशिंगटन पोस्ट ने बीते सितंबर की अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि मेटावर्स की बात कर फेसबुक लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है. अखबार ने लिखा,

“ये उस बड़ी कोशिश का हिस्सा है जिसके जरिए कंपनी पॉलिसी मेकर्स के सामने अपनी छवि सुधारना चाहती है. इसके जरिए कंपनी इंटरनेट तकनीक की अगली लहर को लेकर आने वाले रेग्युलेशन को एक रूप देने की कोशिश कर रही है.”

अब देखने वाली असल लड़ाई ये होगी कि जहां यूरोपियन यूनियन प्राइवेसी को लेकर सख्त नियम बनाने का पहरुआ बना हुआ है, वहीं पर फेसबुक कैसे एक ऐसा टेक प्लेटफॉर्म खड़ा करेगा जिसे लेकर प्राइवेसी के पहरेदार बड़ी-बड़ी चिंताएं जता रहे हैं. वैसे मेटावर्स जब बनेगा तब बनेगा, लेकिन आप मेटावर्स पर बनी बेहतरीन मूवी Ready Player One का लुत्फ अमेजन प्राइम वीडियो पर आज ही उठा सकते हैं.

वीडियो – ‘मारकाट-बवाल चलते रहें, फेसबुक को बस पैसा चाहिए’, कंपनी की कर्मचारी ने पोल खोल दी!

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