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जापान का वॉर-टाइम सेक्स स्लेवरी कांड क्या है?

अमेरिका में एक सामाजिक कार्यकर्ता हुईं. ताउम्र महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ीं. नाम, जेन एडम्स. 1931 में उन्हें नोबेल पीस प्राइज़ दिया गया. एडम्स ने एक बार लिखा था,

Ture peace is not merely the absence of war, It is the presence of Justice.

यानी,

शांति सिर्फ़ युद्ध खत्म होने से नहीं आती, इसके लिए न्याय का होना भी ज़रूरी है.

युद्ध बीत जाते हैं. युद्ध के अपराध बचे रहते हैं. जब तक कि उनके ऊपर ज़रूरी न्याय का मरहम ना लगा दिया जाए, उन अपराधों के घाव रिसते रहते हैं. जैसा कि हज़ारों कोरियाई महिलाओं के साथ हो रहा है. इन महिलाओं को जापानियों ने ज़बरदस्ती सेक्स स्लेव बनाकर रखा था. उनमें से कई नाबालिग थीं.

अपराध होने के पांच दशक बाद साउथ कोरिया में न्याय की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुए. जापान से माफ़ी और मुआवजे की उनकी मांग को तीन दशक पूरे हो चुके हैं. इसके बावजूद उन्हें बार-बार निराशा हाथ लगती है. युद्ध भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन चोट के निशान कायम हैं. ये कभी मिटेंगे भी, ये कहना मुश्किल है.

आज जानेंगे, जापान का वॉर-टाइम सेक्स स्लेवरी कांड क्या है? जापान पर क्या आरोप लगते हैं? और, क्या कभी पीड़ित महिलाओं को न्याय मिल पाएगा? सब विस्तार से बताएंगे.

सबसे पहले तीन सच्चे अनुभव सुन लीजिए.

नबंर एक.

वो 1936 का साल था. मैं 17 साल की थी. एक दिन गांव का मुखिया हमारे घर आया. उसने मुझे फ़ैक्ट्री में नौकरी दिलाने का वादा किया. मेरा परिवार बहुत ग़रीब था. मैं उसकी बात पर राज़ी हो गई. फिर मुझे एक जापानी ट्रक में भरकर स्टेशन ले जाया गया. वहां 20 से अधिक कोरियन लड़कियां पहले से बैठीं थी. हमें ट्रेन पर बिठाकर चीन भेज दिया गया. हमें फ़ैक्ट्री में काम देने का वादा किया गया था. लेकिन जब हम ट्रेन से उतरे तो वहां फ़ैक्ट्री का कोई नामोनिशान तक नहीं था.

हर लड़की को एक छोटा सा कमरा मिला था. उसमें सोने के लिए एक चटाई भर थी. कमरे के दरवाज़े पर नंबर लिखा होता था. हमें वहां आए दो दिन हो चुके थे. तीसरे दिन एक जापानी सैनिक तलवार लेकर कमरे में आया. उसने मुझे मारने की धमकी दी. बोला, जैसा कहता हूं वैसा करो.

इसके बाद उसने मेरा बलात्कार किया. जब वो बाहर गया. तब अगला सैनिक अंदर घुसा. उसने भी मेरे साथ वैसा ही किया. उस रात 15 से 20 जापानी सैनिकों ने मेरा यौन शोषण किया. ये सिलसिला कई सालों तक चला.

उस कैंप में लगभग हर हफ़्ते लड़कियों का टेस्ट किया जाता था. जिनमें भी कोई बीमारी या संक्रमण पकड़ में आता, वे अचानक से गायब हो जातीं. उन लड़कियों को अनजान जगहों पर दफ़ना दिया जाता था.

अनुभव नंबर दो.

नार्सिसा क्लेवेरिया फ़िलिपींस की राजधानी मनीला में रहतीं है. उनकी उम्र 90 के पार पहुंच चुकी है. जब जापानियों ने उन्हें किडनैप किया, तब उनकी उम्र मात्र 12 साल थी. उन्हें भी सालों तक सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया था.

दिसंबर 2020 में नेशनल पब्लिक रेडियो से बात करते हुए नार्सिसा ने कहा था,

‘अगर मैं सूर्य को अस्त होने से रोक सकती तो मैं वैसा ज़रूर करती. क्योंकि जैसे ही रात ढलती थी, वे मेरा रेप करना शुरू कर देते थे.’

अनुभव नंबर तीन.

सेकंड वर्ल्ड वॉर की बात है. बुसान में रहने वाली ली ओक-सोन 14 साल की थी. एक शाम ली बाहर घूमने निकली. तभी एक कार उसके पास आकर रुकी. ली को किडनैप कर चीन ले जाया गया. उसे जापानी सैनिकों के हवाले कर दिया गया. फिर कई साल तक उसके साथ रेप और टॉर्चर होता रहा. वॉर खत्म होने के बाद ही ली की को मुक्ति मिल सकी. हालांकि, दर्द बयां करने में कई दशक बीत गए.

क़ैद से छूटने के लगभग सत्तर बरस बाद ली ओक-सोन जर्मनी गईं. वहां उन्होंने अपने बारे में बस इतना कहा,

‘वो जगह इंसानों के लिए नहीं थी. वो एक कसाईखाना था.’’

ये तीन कहानियां तो बस उदाहरण मात्र हैं. असली आंकड़ा लाखों में है. जापानी सैनिकों ने 1910 से 1945 के बीच कम-से-कम दो लाख महिलाओं का बलात्कार किया. सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म होने के बाद जापानियों ने बहुत सारे दस्तावेज़ जला दिए थे. जो कुछ आंकड़े बाहर आए, वे इतिहासकारों की गणना पर आधारित हैं. वास्तविकता कहीं अधिक भयानक हो सकती है.

अत्याचार का पहला सिरा 1910 से शुरू होता है. उस साल क्या हुआ था? 1910 में जापान ने कोरिया पर हमला को अपने साम्राज्य में मिला लिया था. कोरिया उस समय तक साउथ और नॉर्थ में नहीं बंटा था.

कोरिया के बाद जापान का मन और बढ़ा. आने वाले समय में उसने चीन, वियतनाम, मलेशिया फ़िलिपींस समेत कई एशियाई देशों पर क़ब्ज़ा किया. जापानी सैनिकों के हमले का एक पैटर्न होता था. वे जिस भी शहर में घुसते, वहां नरसंहार मचाते हुए जाते थे. वे किसी को क़ैद करके रखना पसंद नहीं करते थे. इससे उनके ऊपर बोझ पड़ता था. क़ैद करने की बजाय वे उनका सिर काट दिया करके थे. वे महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख़्शते थे.

इस पैटर्न में एक बड़ा मोड़ दिसंबर 1937 में आया. उस समय जापान, चीन के साथ युद्ध लड़ रहा था. शंघाई को जीतने के बाद जापान का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच चुका था. 13 दिसंबर को जापानी सैनिक नान्जिंग में घुसे. वहां कुछ गिनती के चीनी सैनिक ही बचे थे.

उन्हें मारने के बाद जापानियों ने आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू किया. अगले छह हफ़्तों तक भीषण नरसंहार चला. इसमें तीन लाख से अधिक बेगुनाह लोगों की हत्या की गई. जापानी यहीं नहीं रुके. उन्होंने नान्जिंग में लगभग 80 हज़ार महिलाओं का रेप किया.

‘द वर्ल्ड्स ब्लडिएस्ट हिस्ट्री’ नामक किताब में जोसेफ़ कमिंस ने सेना के साथ चल रहे एक जापानी पत्रकार के हवाले से लिखा,

नान्जिंग में जापान के तेज़ी से आगे बढ़ने की एक वजह है. दरअसल, वरिष्ठ अधिकारियों ने सैनिकों को लूट और बलात्कार की खुली छूट दे रखी है.

उसी समय जेम्स मैक्कलम नाम का एक मिशनरी भी नान्जिंग में मौजूद था. उसने अपनी डायरी में लिखा,

मैंने अपने जीवन में ऐसी बर्बरता कभी नहीं देखी. रेप, रेप, रेप! उस समय नान्जिंग में हर रोज़ एक हज़ार से अधिक महिलाओं का बलात्कार हो रहा था.

नान्जिंग की घटना पूरी दुनिया में फैल गई. जापान के तत्कालीन सम्राट हिरोहितो को अपनी इमेज की चिंता सताने लगी. उनके आदेश का मजमून था, सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से होने चाहिए. मात्रा का ख़्याल रखो.

सम्राट ने आदेश दिया कि सैनिकों के लिए कम्फ़र्ट स्टेशनों की संख्या बढ़ाई जाए. जापानी सैनिकों के लिए कम्फ़र्ट स्टेशन वाला सिस्टम बहुत पहले से काम कर रहा था. सम्राट के आदेश के बाद उनको हरी झंडी मिल गई थी. कम्फ़र्ट स्टेशन सैनिकों की सेक्स की चाह की पूर्ति के लिए बनाए गए थे. इनमें इच्छा से आईं या किडनैप कर लाईं गई लड़कियों और महिलाओं को रखा जाता था.

नान्जिंग की घटना के बाद कम्फ़र्ट स्टेशन्स की संख्या अचानक से बढ़ गई. महिलाओं की कमी होने लगी. ऐसे में जापानियों ने नया रास्ता निकाला. वे अपने नियंत्रण वाले इलाकों से नाबालिग बच्चियों का अपहरण करने लगे. जापानियों ने गांवों में अपने एजेंट्स छोड़ रखे थे.

जो नौकरी का झांसा देकर लड़कियों को लाते और फिर उनसे ज़बरदस्ती ग़लत काम करवाते थे. उनके निशाने पर अक्सर ग़रीब परिवार की लड़कियां होतीं. वे ग़रीबी के चंगुल से निकलने की कोशिश में दूसरे जाल में फंस जातीं थी. कम्फ़र्ट स्टेशन में काम करने वाली महिलाओं को नाम दिया गया, ‘कम्फ़र्ट वीमेन’.

ये सिलसिला सेकंड र्ल्ड वॉर तक चलता रहा. अगस्त 1945 में नागासाकी और हिरोशिमा पर अमेरिका ने परमाणु बम गिरा दिया. जापान को हारकर आत्मसमर्पण करना पड़ा. तब जाकर कम्फ़र्ट स्टेशन बंद हो पाए. लेकिन पूरी तरह से नहीं. 2007 में एपी ने एक रिपोर्ट पब्लिश की.

इस रिपोर्ट की मानें तो कुछ कम्फ़र्ट स्टेशन जापानियों की हार के बाद भी चल रहे थे. उन्हें अमेरिकी सैनिकों के लिए खुला रखा गया था. आख़िरकार, जनरल डगलस मैकआर्थर के आदेश के बाद 1946 में ये सिस्टम पूरी तरह से बंद हो गया.

फिर सर्वाइव करने वाली महिलाओं को उनके घर वापस भेजा जाने लगा. लेकिन समाज ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया. जो कुछ उनके साथ घटा था, उसके लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया. सैकड़ों महिलाएं यौन बीमारियों के चलते गुज़र गईं. कईयों ने आत्महत्या कर ली. जहां तक जापान की बात है, वो इस अपराध से लगातार इनकार करता रहा. जापान ने कम्फ़र्ट स्टेशनों के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिए.

होते-होते 1980 का दशक आ गया. 1987 में साउथ कोरिया में लोकतंत्र की वापसी हुई. तब कोरियन महिलाओं ने अपने साथ हुए अत्याचार की कहानियां सुनानी शुरू कीं. धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या बढ़ती गई. साउथ कोरिया की सरकार ने उनका पक्ष लिया और जापान से भरपाई की मांग की.

आख़िरकार, 1993 में जापान ने कम्फ़र्ट स्टेशन्स में महिलाओं के साथ बर्बरता के आरोपों को स्वीकार लिया. उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी मांगी. लेकिन ये आधिकारिक माफ़ी नहीं थी.

जापान ने कभी खुले दिल से अपना अपराध स्वीकार नहीं किया. और, ना ही कभी न्याय देने की कोशिश की. कई जापानी नेता आज भी कम्फ़र्ट स्टेशन्स का इतिहास नहीं मानते. जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने 2007 में ये कहकर सनसनी फैला दी थी कि कम्फ़र्ट स्टेशन में महिलाएं अपनी मर्ज़ी से गईं थी. उन्हें किसी ने वहां जाने के लिए मज़बूर नहीं किया था. इस बयान के बाद भारी बवाल मचा. आबे को अपने बयान के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी थी.

तब से ये मामला कहीं न कहीं जाकर अटकता रहा है. 2015 में जापान ने सर्वाइवर्स को मुआवजा देने का ऐलान किया. दोनों देशों के बीच इसको लेकर समझौता भी हुआ. कहा गया कि इस मुद्दे पर आगे कोई बात नहीं होगी.

2016 में साउथ कोरिया की सरकार ने रिव्यू पैनल बिठाया. इस पैनल ने जांच के बाद कहा कि ये पर्याप्त नहीं है. जापान को अपना अपराध स्वीकार करना होगा.

जापान ने ये मांग मानने से साफ़ इनकार कर दिया. जो फ़ंड जापान ने दिया था, कुछ कम्फ़र्ट वीमेन ने उसे स्वीकार किया. कईयों ने उसे पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया. उनकी मांग है कि जापान अपनी आंखों में थोड़ा सा पानी लाए और अपने गुनाहों की समुचित माफ़ी मांगे.

सर्वाइवर्स की संख्या कुछ सौ के आस-पास बची है. 90 फीसदी से अधिक कम्फ़र्ट वीमेन वर्ल्ड वॉर खत्म होने से पहले ही मारी जा चुकीं थी. जो अभी जीवित हैं, उन्हें भी जीते-जी न्याय मिलने की संभावना दिनोंदिन क्षीण होती जा रही है.

आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?

08 जनवरी 1992 को पहली बार इन महिलाओं ने अपना संघर्ष शुरू किया था. जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री किची मियाज़ावा साउथ कोरिया के दौरे पर थे. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी महिलाओं के साथ मिलकर मियाज़ावा के दौरे का विरोध किया था.

वो दिन बुधवार का था. तब से हर बुधवार को लोग सियोल में जापानी दूतावास के पास इकट्ठा होते हैं. और, जापान से आधिकारिक माफ़ी की मांग को दोहराते हैं. इसे ‘वेन्सडे रैली’ का नाम दिया गया है. इस साल पांच जनवरी को रैली के तीस बरस पूरे हो गए. अभी तक 1525 बार ये रैली आयोजित हो चुकी है.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि जापान अपने गुनाहों की माफ़ी नहीं मांग लेता.

ऐसा कब होगा, ये अभी तय नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर तय है कि ये सदियों तक जापान की समृद्धि के माथे पर बदनुमे दाग की तरह चिपका रहने वाला है. ये उसे हमेशा सालता रहेगा.


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