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जो कानून शेख अब्दुल्ला लाए थे उसी के चलते बेटे फारूक को हिरासत में रखा गया है

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फारूक अब्दुल्ला. जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री. पिछले कुछ दिनों से नज़रबंद हैं. उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 16 सितंबर को सुनवाई हुई. कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा. तमिलनाडु के नेता और एमडीएमके के चीफ वाइको ने याचिका दाखिल की थी. याचिका में कहा गया है कि फारूक अब्दुल्ला की नजरबंदी पर केंद्र सरकार अलग-अलग तर्क दे रही है. बाद में सरकार ने साफ किया कि फारूक को पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट यानी पीएसए के तहत नजरबंद किया गया है.

पिछले महीने, पूर्व आईएएस अधिकारी और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के संस्थापक शाह फैसल को दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया था. वो देश से बाहर जा रहे थे. उन्हें वापस श्रीनगर भेज दिया गया था. उन्हें भी पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था.

यह महज संयोग ही है कि फारूक अब्दुल्ला को जिस ऐक्ट के तहत नज़रबंद किया गया है, उसे उनके पिता शेख अब्दुल्ला ही लेकर आए थे. इस साल जनवरी में, फारूक अब्दुल्ला के बेटे यानी ये कानून लाने वाले शेख अब्दुल्ला के पोते उमर अब्दुल्ला ने वादा किया था कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट को रद्द कर देंगे.

जम्मू-कश्मीर से संबंधित आर्टिकल 370 में संसोधन के बाद राज्य के कई नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था.
जम्मू-कश्मीर से संबंधित आर्टिकल 370 में संसोधन के बाद राज्य के कई नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था.

आखिर पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट है क्या?
हालांकि जब इस कानून को लाया गया तो इसका उद्देश्य बिल्कुल अलग था. 1978 में ये कानून आया था. उस समय जम्मू-कश्मीर में लकड़ी की तस्करी बढ़ गई थी. तस्करों के लिए कोई कड़ा कानून नहीं था. तस्कर गिरफ्तार होते थे. कुछ दिन हिरासत रहते थे फिर छूट जाते थे. फिर आया पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट. लकड़ी की तस्करी में शामिल लोगों को बिना किसी मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता था. पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की तरह है. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अस्तित्व में आने से दो साल पहले ही इसे जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया था. बाद में इस ऐक्ट के दायरे को बढ़ाया गया. आतंकवाद के खिलाफ उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. 1990 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने राज्य में विवादास्पद सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम को लागू किया. बड़े पैमाने पर PSA का इस्तेमाल लोगों को पकड़ने के लिए किया गया.

किस पर लग सकता है?
पिछले कुछ समय में पीएसए का इस्तेमाल आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के खिलाफ किया जाता रहा है. 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी बुरहान वानी की हत्या के बाद कश्मीर घाटी में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पीएसए के तहत 550 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था. यह कानून उस व्यक्ति पर भी लागू हो सकता है जो कस्टडी में है. अगर किसी आरोपी को कोर्ट ने जमानत दे दी है तो भी उस पर पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट लगाया जा सकता है. अगर किसी व्यक्ति को कोर्ट ने बरी कर दिया है तो भी उस पर पीएसए लग सकता है. इसके तहत किसी को दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

पीएसए के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर कोर्ट के सामने पेश नहीं करना होता है. हिरासत में रखा व्यक्ति जमानत के लिए कोर्ट नहीं जा सकता. जिस संस्था ने उसे हिरासत में रखा है उसकी अनुमति के बिना वो वकील भी नहीं कर सकता.

पीएसए लगाने का तरीका क्या है
आमतौर पर पीएसए के तहत अगर किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है तो डीएम को 5 दिन के अंदर लिखित में हिरासत में लिए जाने का कारण बताना होता है. असाधारण परिस्थितियों में डीएम को 10 दिन के भीतर हिरासत में लेने का कारण बताना होता है. बताना इसलिए जरूरी होता है क्योंकि उसी के आधार पर वह इसे चुनौती दे सकता है. हालांकि कुछ केस में डीएम के पास यह भी अधिकार है कि वह उन कारणों का खुलासा नहीं भी कर सकता है. ये तब जब डीएम को लगता है कि कारणों का खुलासा करना पब्लिक इंट्रेस्ट के खिलाफ है.

क्या है सलाहकार बोर्ड की भूमिका
पीएसए को मॉनिटर करने का जिम्मा एक सलाहकार बोर्ड का होता है. इस बोर्ड में तीन सदस्य होते हैं. हाईकोर्ट के पूर्व जज इसके चेयरपर्सन होते हैं. किसी को नज़रबंद करने के चार सप्ताह के अंदर डीएम को नज़रबंदी के आदेश की कॉपी सलाहकार बोर्ड को देनी होती है. हिरासत में लिया गया व्यक्ति भी इस सलाहकार बोर्ड के सामने प्रतिनिधित्व कर सकता है. हिरासत में लिए जाने के आठ हफ्ते के भीतर बोर्ड को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी होती है. इसके बाद सरकार यह निर्धारित करती है कि हिरासत सार्वजनिक हित में है या नहीं. सरकार के लिए इस रिपोर्ट को देना जरूरी है.

पीएसए लगने के बाद क्या अधिकार हैं?

पीएसए को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है.
पीएसए को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है.

पीएसए को चुनौती देने का एकमात्र तरीका ये है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के रिश्तेदार बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएं. क्योंकि इसकी सुनवाई हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही हो सकती है. बंदी प्रत्यक्षीकरण उन लोगों के लिए होता है जिन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है. अगर हिरासत में रह रहा व्यक्ति याचिका दायर कर पाने की स्थिति में नहीं है, तो याचिका को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसकी ओर से दायर किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ही पीएसए को खत्म करने के लिए अंतिम आदेश दे सकता है.


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