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'Paytm का IPO एक फ्रॉड है' कहना कितना सही?

साहिर लुधियानवी लिखते हैं:

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

चलिए इसे अपनी ख़बर से जोड़ते हैं. कहते हैं पुराने साथियों का साथ कभी न छोड़ो, साथ छोड़ो भी तो नाराज़ करके न छोड़ो. क्यूंकि वो तुम्हारी छठी-पसली का हाल जानते हैं, तरक्की के रास्ते पर जब आपके कदम सरपट पड़ रहे होंगे तो अचानक से कोई पुराना नाराज़ साथी रोड-ब्रेकर की मानिंद सामने आ जाएगा और आपकी रफ़्तार थम जाएगी.

लेकिन ये मामला सिर्फ़ पुरानी नाराज़गी का नहीं है. ये बात आम लोगों के करोड़ों रुपये के इन्वेस्टमेंट से जुड़ी है. इसलिए बताना ज़रूरी है. दरअसल अप्रूवल के लिए खासे इंतज़ार के बाद पेटीएम ने 8 नवंबर को अपना IPO लॉन्च कर दिया. पिछले महीने जब Paytm ने IPO के अप्रूवल के लिए अप्लाई किया था, उसके बाद कंपनी के को-फाउंडर अशोक कुमार सक्सेना भी सेबी (SEBI) के पास पहुंच गए थे. इस IPO के लॉन्च को रुकवाने. बाकायदा दिल्ली पुलिस को एक कंप्लेन्ट भी दी थी. मामला कोर्ट पहुंच गया था. सक्सेना ने अपनी शिकायत में कहा था कि उन्होंने कंपनी में पैसे लगाए थे, जिसका रिटर्न उन्हें वापस नहीं मिला.

IPO लॉन्च के लिए कंपनी को शेयर बाज़ार में अपनी लिस्टिंग करानी होती है (फोटो सोर्स- Getty Image)
IPO लॉन्च के लिए कंपनी को शेयर बाज़ार में अपनी लिस्टिंग करानी होती है (फोटो सोर्स- Getty Image)

विस्तार से सारी कहानी बताएंगे. IPO यानी Initial Public Offer क्या होता है, पेटीएम के IPO की स्टेटिस्टिक्स,  इसके फ्यूचर-प्लान सब.

#क्या होता है IPO?

सबसे पहले ये जान लीजिए कि IPO होता क्या है? देश में हज़ारों प्राइवेट कंपनियां हैं. अब इन कंपनियों को या तो कोई एक सुपरबॉस चला रहा होता है या कई बार कुछ अलग-अलग फर्म्स यानी छोटी कंपनियां या शेयर होल्डर्स मिलकर एक बड़ी कंपनी चलाते हैं. ऐसे में जब किसी कंपनी को पैसे की ज़रूरत होती है तो वो ख़ुद को शेयर बाज़ार में लिस्ट करवा देती है. इसी लिस्टिंग के प्रॉसेस का एक ज़रूरी और फाइनल स्टेप है IPO. फलां कंपनी ने अपना IPO जारी कर दिया. इसका मतलब है कि अब उस कंपनी ने अपने शेयर्स पहली बार आम लोगों और बड़े इन्वेस्टर्स को अलॉट कर दिए हैं. माने अब उस कंपनी का मालिक कोई अकेला सुपरबॉस नहीं है, बल्कि उसके छोटे-बड़े सभी शेयर होल्डर्स की हिस्सेदारी उस कंपनी में है. उदाहरण से समझते हैं. आओ सुनाऊं पान की एक कहानी.

माताप्रसाद एक पान की दुकान खोलता है- बनारसी पान भंडार. अपने दम पर. माताप्रसाद को इसमें प्रॉफिट होना शुरू हो जाता है. तो माताप्रसाद सोचता है, क्यूं न लोन लिया जाए और इस पान की दुकान को बड़ा कर इसे परचून की दुकान में बदल दिया जाए. लेकिन एक दिक्कत है. उसे कहीं से लोन मिल नहीं रहा. मिल भी रहा तो आधा अधूरा. कहीं बहुत ज़्यादा ब्याज देना पड़ रहा है तो कहीं सिक्योरिटी में अपनी पान की दुकान गिरवी रखनी पड़ रही है. माताप्रसाद मन मसोस कर रह जाता है. और इस तरह का रिस्की लोन लेने के बजाय वापस पान बेचने में लग जाता है. एक दिन उसके पास पान खाने असलम चचा आते हैं. बोलते हैं-

पान की दुकान तो बहुत अच्छी जगह लगाई है. यहां पर परचून की दुकान खोल लो, आधे पैसे मैं दूंगा. मगर आधा प्रॉफिट भी मेरा.

पान की दूकान (प्रतीकात्मक तस्वीर - आज तक)
पान की दूकान (प्रतीकात्मक तस्वीर – आज तक)

बेशक असलम चचा ने माताप्रसाद के मन की बात छीन ली थी. लेकिन माताप्रसाद नहीं माना. और कारण भी वैलिड है. चूंकि माताप्रसाद ने अपनी दुकान को बहुत मेहनत से एस्टैब्लिश किया था. साथ ही उसकी दुकान पहले से ही है,जहां से उसे प्रॉफिट मिल ही रहा है. कम ही सही. तो सिर्फ़ आधे पैसे लगाकर असलम चचा आधी कंपनी (बनारसी पान भंडार) के मालिक बन जाएंगे. लेकिन पिछले सारे पैसों का क्या?उसकी प्राइम लोकेशन का क्या?दो साल से जो गुडविल कमाई है उसका क्या?ये सब चीज़ें ध्यान में रखकर तय होता है कि आगे आने वाले रिनोवेशन के सारे पैसे असलम चाचा देंगे. लगभग5लाख रुपए. और इसके बाद प्रॉफिट,लॉस,दुकान के सारे सामान में से10प्रतिशत हिस्सा उनका रहेगा. अगर दुकान बिकती है,तो उसका भी.

यूं5लाख रुपए में असलम चचा को10प्रतिशत की हिस्सेदारी मिल जाती है. अब माताप्रसाद4ऐसे और लोगों को ढूंढता है,उन्हें भी5-5लाख में दुकान की10-10प्रतिशत हिस्सेदारी दे देता है. यानी माताप्रसाद अपनी दुकान की50%हिस्सेदारी बेच के पच्चीस लाख कमा लेता है. ये जो50प्रतिशत हिस्सेदारी माताप्रसाद ने बेची उसे कहते हैं IPO. यानी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग.

प्रतीकात्मक तस्वीर (बिज़नेस टुडे)
प्रतीकात्मक तस्वीर (बिज़नेस टुडे)

कहानी यहां ख़त्म नहीं होती. माताप्रसाद तो अपने पचास प्रतिशत हिस्से को बेचकर निश्चिंत हो जाता है और अपने काम में लग जाता है. वही दुकान खोलना,वही रिनोवेशन. वही फायदे का50%बाकी5लोगों में दे देना. लेकिन बाकी5लोग अपने-अपने शेयर खरीदने-बेचने लग जाते हैं. जैसे असलम चचा अपने दस प्रतिशत शेयर में से5प्रतिशत शेयर4लाख में बेच देते हैं. इसे कोई सातवां खरीद लेता है. कोई और अपने शेयर नुकसान में बेचता है,क्यूंकि उस वक्त माताप्रसाद का बिज़नस घाटे में चल रहा होता है. कोई दस के बदले अपने शेयर12प्रतिशत शेयर कर लेता है. यूं माताप्रसाद के पास तो अपने50प्रतिशत शेयर हमेशा रहते हैं,लेकिन बाकी के शेयर जो माताप्रसाद नेइनिशियलीबेचे थे,उनका भी व्यापार होना शुरू हो जाता है. इसे ही ट्रेडिंग कहते हैं. वो देखते हैं न आप सेंसेक्स ऊपर गया. नीचे गया. ये वही है.

शेयर ट्रेडिंग प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडिया टुडे)
शेयर ट्रेडिंग प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडिया टुडे)

#Paytm का IPO और उसकी स्टैटिस्टिक्स यानी माली हालत

मोबाइल के लिए टॉपअप करने से शुरू करके ‘पेटीएम मॉल’ के थ्रू शॉपिंग करवाने तक का सफ़र पेटीएम ने बहुत कम वक़्त में तय किया है. नोटबंदी के बाद पेटीएम तेज़ी से चर्चा में आया था. तबसे बढ़ता ही गया. इसकी चादर बड़ी होती रही. अब इस डिजिटल पेमेंट कंपनी ने 8 नवंबर को अपना IPO लॉन्च कर दिया है.आम लोगों के लिए IPO 8 नवंबर को खुला और दो दिन बाद यानी 10 नवंबर तक सब्सक्रिप्शन लिया जा सकेगा.

IPO में दो चीज़ें शामिल होंगीं.

# पहला – 8,300 करोड़ रुपये के नए इक्विटी शेयर जारी होंगे और

# दूसरा – मौजूदा शेयरहोल्डर्स के लिए 10,000 करोड़ के ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) शेयर्स भी जारी होंगें. 

इन आकंड़ों के हिसाब से 2010 में कोल इंडिया का IPO आने के बाद से ये देश में अबतक की सबसे बड़ी IPO पेशकश होगी. कितनी बड़ी? कुल मिलाकर 2.4 अरब डॉलर यानी 18,300 करोड़ की.

प्रतीकात्मक तस्वीर (बिज़नेस टुडे)
प्रतीकात्मक तस्वीर (बिज़नेस टुडे)

बुलेट पॉइंट्स में पेटीएम के IPO की हाईलाइट्स रखें तो,

# शुरुआती शेयर बिक्री तेजी से हो इसलिए पेटीएम ने ‘प्री-IPO फंडिंग राउंड’ छोड़ दिया है.

# एंट ग्रुप, सॉफ्टबैंक के विजन फंड और बर्कशायर हैथवे जैसे दिग्गज इंवेस्टर्स ने पेटीएम की फ़ंडिंग की है. बैकिंग मतलब ऐसे समझें कि लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ एंट ग्रुप पेटीएम का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है. ओएफएस के जरिये, पेटीएम की पैरेंट कंपनी ONE97 के एमडी और सीईओ विजय शेखर शर्मा 402.65 करोड़ तक के शेयर बेचेंगे, जबकि एंटफिन होल्डिंग्स (नीदरलैंड्स) 4,704.43 करोड़ तक के अपने शेयर बेचेगी.

# पेटीएम को पिछले महीने अपने IPO के लिए कैपिटल मार्केट रेगुलेटर्स से मंजूरी मिली थी. जबकि सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड अपनी मंजूरी पहले ही दे चुका था.

# पेटीएम ने अपने ऑपरेशंस से 2021-22 की पहली तिमाही में रेवेन्यू में 62 फ़ीसद की ग्रोथ की है.

# पिछले साल यानी 2021 में कंपनी ने 4 लाख करोड़ रुपये के सकल व्यापारिक मूल्य यानी Gross Merchandise Value की रिपोर्ट दी थी.

# फाइनेंशियल ईयर 2022 के पहले क्वार्टर में पेटीएम की अपनी सारी सर्विसेज़ से कमाई 689.4 करोड़ की थी. ये पेटीएम की टोटल कमाई का लगभग 77 फ़ीसद है.  हालांकि पेटीएम की फाइनेंस रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पिछले साल पहले क्वार्टर में पेटीएम को 2.9 करोड़ का घाटा हुआ था.

# को-फ़ाउंडर वाला विवाद क्या है?

रॉयटर्स की एक ख़बर के मुताबिक़पेटीएम का ये 2.2 अरब डॉलर का देश का अबतक का सबसे बड़ा IPO दिक्कतों में है. पेटीएम के एक्स. डायरेक्टर अशोक कुमार सक्सेना ने कुछ दिन पहले ही SEBI से इस IPO लॉन्च को रोक देने को कहा था. आरोप लगाया था कि वोपेटीएम के को-फाउंडर हैं,और करीब दो दशक पहले यानी साल 2001 में उन्होंने पेटीएम में 27,500 डॉलर का इन्वेस्टमेंट किया था. लेकिन उन्हें इसके बदले न तो शेयर्स में कोई हिस्सेदारी मिली और न प्रॉफिट में.

रॉयटर्स के मुताबिक़ इस केस के लीगल डाक्यूमेंट्स में पेटीएम का कहना है कि अशोक का दावा और दिल्ली पुलिस को दी गई उनकी शिकायत में पेटीएम पर जो धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए हैं वो सिर्फ़ कंपनी को हैरेस और परेशान करने की कोशिश भर हैं. हालांकि इस पुलिस केस का ज़िक्र पेटीएम के जुलाई के IPO प्रॉस्पेक्ट्स में बाकायदा शामिल है.

इसपर अशोक सक्सेना का कहना ये था कि उनका इरादा उत्पीड़न का नहीं है और पेटीएम जैसी हाई प्रोफाइल कंपनी को उनके जैसा आम आदमी परेशान कर भी कैसे सकता है.

इधर सक्सेना ने IPO को रोकने के लिए सेबी को ये तर्क दिया था कि अगर उनका दावा सही साबित होता है,तो इन्वेस्टर्स को अपना पैसा गंवाना पड़ सकता है. शेयरहोल्डर एडवाइजरी फर्म इनगवर्न के श्रीराम सुब्रमण्यम ने भी कहा था कि इस टकराव से सेबी की इन्क्वारी वगैरह बढ़ सकती है, IPO को लेकर सेबी पेटीएम से ये अश्योरेंस मांग सकती है कि लिस्टिंग के बाद आम शेयरहोल्डर्स पर इसका असर नहीं पड़ेगा.

सेबी का फैसला जो भी रहा हो, IPO तो अब शुरू हो चुका है. हां, कानूनी पचड़ा आगे भी पेटीएम के लिए दिक्कतें खड़ी कर सकता है. यहां ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि पेटीएम के इंटरनेशनल इन्वेस्टर वो चाहें चीन का अलीबाबा हो या जापान का सॉफ्ट बैंक, पेटीएम के लीगल स्टेटस के बारे में चिंतित तो ज़रूर होंगें.

#विवाद की जड़ सिर्फ़ एक कागज़ है?

रॉयटर्स की ख़बर के मुताबिक़, इस पूरी कंट्रोवर्सी के सेंटर में 2001 का एक डॉक्यूमेंट है. कैसा? अशोक सक्सेना और पेटीएम के अरबपति सीईओ विजय शेखर शर्मा के बीच साइन किया हुआ. सिंगल पेज के इस डॉक्यूमेंट के मुताबिक सक्सेना को पेटीएम की पैरेंट कंपनी वन97 कम्युनिकेशंस में 55 फीसद इक्विटी की हिस्सेदारी लेनी थी. बाकी हिस्सेदारी विजय शर्मा की थी. बीती 29 जून को पेटीएम ने इस बारे में पुलिस से कहा कि ये सिर्फ एक लेटर ऑफ़ इंटेंट यानी आशय पत्र था. जिसपर कोई अमल नहीं किया गया. न आगे कोई समझौता हुआ. इसके बाद पेटीएम ने पुलिस को वन97 के शेयरहोल्डर्स के साथ किया गया अग्रीमेंट लेटर भी दिखाया,जिसपर दो लोगों के साइन थे.

सरकारी डेटाबेस में दर्ज पेटीएम के डाक्यूमेंट्स में भी साफ़ है कि साल 2000 और 2004 के बीच अशोक सक्सेना कंपनी के को-डायरेक्टर थे. और इस बात से पेटीएम भी एग्री करता है कि अशोक कंपनी के पैरेंट ऑर्गेनाईजेशन के शुरुआती डायरेक्टर्स में से थे और और उन्होंने कंपनी के रेवेन्यू जनरेशन में भी रोल अदा किया था, लेकिन बाद में कंपनी के साथ उनके इंटरेस्ट ख़त्म होने लगे.

ये बात तो पेटीएम कहता है. सक्सेना ने जो इन्वेस्टमेंट वन97 में किया था, उसपर पेटीएम आगे कहता है कि उसने 2003-2004 के आसपास,सक्सेना के शेयर्स को एक इंडियन फर्म को ट्रांसफ़र कर दिया था. वो फर्म जिससे सक्सेना बाद में जुड़ गए थे. हालांकि सक्सेना का कहना है कि उन्हें न कोई शेयर्स मिले और न ही वो ऐसी किसी फर्म से जुड़े थे.

रॉयटर्स के मुताबिक, ये पूछे जाने पर कि वो इतने सालों तक चुप क्यों रहे,सक्सेना का जवाब था कि उनके परिवार में कुछ मेडिकल कंडीशंस थीं, और उन्होंने केस से रिलेटेड कागजात खो दिए थे, जो उन्हें पिछली गर्मियों में वापस मिल पाए हैं.

सक्सेना आगे कहते हैं-

शेयर और पैसा एक अलग चीज़ है, लेकिन मैं भी चाहता हूं कि मैं ‘ऐज़ अ को-फाउंडर’ पहचाना जाऊं. इट इज़ अ मैटर ऑफ़ प्रॉस्पैरिटी.

# अब सवाल ये है कि क्या पेटीएम का IPO एक फ्रॉड है?  

दरअसल ये सवाल उठाना हमारा काम नहीं है, तब तो बिल्कुल नहीं जब सेबी ने इसे मंजूरी दे दी है. IPO की लिस्टिंग के लिए मंजूरी मिलना आसान नहीं होता. कभी स्कूल कॉलेज में एडमिशन लेना हो तो, उस स्कूल या कॉलेज का एक प्रॉस्पेक्ट्स मिलता है. इस प्रॉस्पेक्ट्स में उस संस्थान की सारी डिटेल होती है. फ़ीस से लेकर बिल्डिंग तक. बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं की भी पूरी जानकारी होती है.

इसी तरह जब कोई कंपनी अपने IPO के लिए अप्लाई करती है तो उसे एसईसी यानी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन को अपना एक प्रॉस्पेक्ट्स देना होता है. नाम होता है रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्ट्स. इसमें IPO के शेयर्स से लेकर कंपनी के बिज़नेस तक की सारी इनफार्मेशन होती है. बाकायदा पूरे डिटेल के साथ. इसे कंपनी का फाइनेंस से जुड़ा हुआ पूरा कच्चा-चिट्ठा कह सकते हैं. इसी प्रॉस्पेक्ट्स के जरिये कंपनी सरकार की सारी शर्तें और नियम मंज़ूर करती है. और अब चूंकि पेटीएम के IPO को मंजूरी मिल ही गई है तो जाहिर है सेबी ने सारी चीज़ें चेक कर ली होंगीं. ऐसे में इस IPO को फ्रॉड तो कहा ही नहीं जा सकता.

अब दूसरी बात आती है को-फाउंडर अशोक सक्सेना के आरोप की. सक्सेना का कहना है कि इस IPO में इन्वेस्टर्स के पैसे डूब जायेंगे, अगर मेरी ‘बात’ सच निकली तो.

सक्सेना की इन्वेस्टर्स के पैसे डूबने वाली बात का ये मतलब है कि उनके आरोप सही साबित होने के बाद पेटीएम दिक्कतों में आ जाएगा. ये बात मानी भी जा सकती है. क्योंकि आजकल कंपनियों के एक ऐड पर बवाल कट जाता है, लोग बॉयकट के नारे लगाने लगते हैं, कंपनियों के शेयर प्राइस तक गिर जाते हैं, ऐसे में पेटीएम अगर आगे भी कानूनी पचड़े में पड़ता है तो दिक्कतें आना लाजिम है.

एक दूसरी दिक्कत ये भी है कि पेटीएम इस वक़्त अपनी अलग-अलग सर्विसेज़ में बहुत अच्छा बिज़नेस नहीं कर पा रहा. 2016 में 8 नवंबर को  नोटबंदी वाला मोदीजी का भाषण तो आपको याद ही होगा! लोगों के लिए पेमेंट की दिक्कत खड़ी हो गई थी. पेटीएम ने इस दिक्कत को भांप लिया और इसे दूर करने की ठान ली, ऐड चलने लगे – पेटीएम करो. पेटीएम का वॉलेट लोग फ़ोन में रखने लगे और दुकानों पर कोड स्कैन वाला प्लास्टिक का स्टैंडी रख दिया गया. इस नई चीज़ यानी पेटीएम की चल निकली, बिज़नेस तेज़ी से बढ़ता गया. लेकिन कुछ ही वक़्त बाद मार्केट में एक और नई चीज़ आ गई, मोदीजी का वो दूसरा भाषण भी आपने सुना हो शायद, BHIM ऐप लॉन्च वाला. हालांकि ये बहुत सफ़ल नहीं हुआ, लेकिन इस कांसेप्ट को गूगल ने उठा लिया और बना दिया ‘गूगल पे’. इसी तरह का एक और ऑनलाइन पेमेंट मेथड आया- इसे भी आप जानते ही हैं -फ़ोन पे.

पेटीएम IPO से जुड़े कुछ फ़िगर्स.
पेटीएम IPO से जुड़े कुछ फ़िगर्स.

पेटीएम वॉलेट इन सबसे अलग था और कमज़ोर भी. कमज़ोरी ये कि गूगल पे, फ़ोन पे वगैरह UPI पर काम करते थे, पैसा सीधे बैंक खाते से कटता था और खाते में ही आता था, कोई फ़ीस भी नहीं. जबकि पेटीएम से पेमेंट करने के लिए पैसे को पहले बैंक अकाउंट से वॉलेट में ट्रान्सफर करना होता था फिर पेमेंट होता था. हर बार ऐसा करना झंझटी काम तो था ही, इस काम के लिए पेटीएम 2 से 5% तक चार्ज भी लेता था. बस इसी दिक्कत की वजह से पेटीएम कमज़ोर होता चला गया.

हालांकि मार्केट शेयर जब गिरने लगा तो पेटीएम ने बिज़नेस डाइवर्सिफ़ाई करने की भी सोची. पेटीएम मॉल से लोगों को शॉपिंग कराना शुरू कर दिया. फ़ास्टटैग, ई-टिकटिंग वगैरह करना शुरू कर दिया. गूगल पे की तरह UPI भी ले आया. लेकिन दोनों चीज़ें कामयाब नहीं हुईं, क्यूंकि बहुत देर हो चुकी थी. न तो गूगल पे और फ़ोन पे के यूजर वापस पेटीएम पर आए और न ही दूसरे बिज़नेसेज़ से कंपनी को ग्रोथ मिली. ई-टिकटिंग के लिए Make My Trip जैसी बीस साल पुरानी कंपनी से टक्कर थी और शॉपिंग के लिए तो आप जानते ही हैं फ्लिपकार्ट और एमेजॉन किस पोजीशन पर बैठे हैं.

ऐसे में देश के अबतक के सबसे बड़े IPO के जरिये इन्वेस्टर्स से पैसा लेकर पेटीएम लिक्विडिटी भले मेंटेन कर ले, लेकिन बिज़नेस ग्रोथ के बारे में उसे सोचना होगा. अगर बिज़नेस ग्रोथ नहीं होगी तो क्या कमाएगा, और इन्वेस्टर्स को कमाके देगा?

 #कैसे करते हैं IPO में इन्वेस्ट?

अब आख़िर में बात कर लें इन्वेस्टमेंट की. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि फाइनेंस टेक कंपनीज़ में इन्वेस्ट करने में सावधानी रखनी चाहिए. कंपनी की ओवरऑल बिज़नेस परफॉर्मेंस पर भी गौर करें तो बेहतर है. चूंकि सरकारी बैंक भी अब डिजिटल मोड में काम कर रहे हैं, ऐसे में प्राइवेट फिनटेक कंपनीज़ के फ्यूचर पर भी ध्यान देना जरूरी है.

पेटीएम हो या किसी भी और कंपनी का IPO, यहां भी इंवेस्ट करने के लिए शेयर ट्रेडिंग के तरीके आना ज़रूरी है. एक डीमैट अकाउंट भी होना चाहिए. जिसके जरिये आप IPO में इन्वेस्ट कर सकते हैं.

शुरू में हमने आपसे कहा था कि पुराने दोस्तों से नाराज़गी ठीक नहीं होती. ऐसे में पेटीएम का IPO तो लॉन्च हो ही रहा है, लेकिन को-फाउंडर रहे अशोक सक्सेना और पेटीएम के बीच का विवाद लॉन्च के बाद आगे IPO पर क्या इफ़ेक्ट डालता है ये देखने वाली बात होगी. और आखिर में डिस्क्लेमर के तौर पर हम वही लाइन दोहराए देते हैं, शेयर मार्केट के बारे में जो आपने अक्सर सुनी होगी-

निवेश बाज़ार जोखिमों के अधीन है.


(ये स्टोरी शिवेंद्र ने लिखी है.)  


 पिछला वीडियो देखें: खर्चा-पानी: Paytm को लेकर RBI ने क्या बड़ा फ़ैसला दिया है?

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