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इज़रायल या फिलिस्तीन, किसके साथ है मोदी सरकार?

आज 17 मई है. इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच हिंसा शुरू एक हफ़्ता बीत चुका है. इस हिंसा में अब तक 58 बच्चों समेत 198 फिलिस्तीनी मारे गए हैं. इज़रायल के कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में भी सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ के हाथों 13 फिलिस्तीनी मारे गए. उधर हमास द्वारा छोड़े गए सैकड़ों रॉकेट्स से इज़रायल में दो बच्चों समेत 10 लोगों की मौत हुई है.

इस हिंसा के खिलाफ़ दुनिया के कई शहरों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं. कोई फ़िलिस्तीन का पक्ष ले रहा है, कोई इज़रायल का. भारत में भी सोशल मीडिया फीड ‘आई सपोर्ट फिलिस्तीन वर्सेज़ आई सपोर्ट इज़रायल’ से भरी हुई है. कई लोग इज़रायल का सपोर्ट करने के साथ-साथ इस्लामोफ़ोबिया का भी भद्दा प्रदर्शन कर रहे हैं. न्यूक्लियर हमले और नरसंहार जैसी भीषण अपीलें कर रहे हैं. इन सबके बीच एक ट्वीट को लेकर काफी कौतुहल दिखा लोगों में. ये ट्वीट था, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का. 16 मई के अपने इस ट्वीट में नेतन्याहू ने अमेरिका और ब्रिटेन समेत 25 देशों का झंडा लगाया. इसके साथ नेतन्याहू ने लिखा-

इज़रायल के साथ सुदृढ़ता से खड़े रहने के लिए शुक्रिया. आतंकी हमलों के विरुद्ध अपनी सुरक्षा के हमारे अधिकार का समर्थन करने के लिए आपका धन्यवाद.

इस ट्वीट पर भारतीयों के भी कई कॉमेंट आए. कई भारतीयों ने ताज्जुब जताया कि नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में भारत का झंडा क्यों नहीं लगाया? ये बड़ा सवाल है. मगर इसका जवाब नेतन्याहू के पास नहीं. क्योंकि ये मामला जुड़ा है, भारतीय विदेश नीति से. विदेश नीति, यानी किसी दुनियावी मसले पर एक देश का आधिकारिक स्टैंड. फिलिस्तीन और इज़रायल के मुद्दे पर क्या है भारत का आधिकारिक स्टैंड? किसके हक़ में है भारत?आज़ादी से लेकर अब तक, इस मुद्दे पर भारतीय विदेश नीति में क्या बड़े बदलाव आए?

Benjamin Netanyahu
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू. (तस्वीर: एपी)

शुरू से शुरुआत करते हैं

15 अगस्त, 1947 को भारत एक आज़ाद देश बना. इस वक़्त तक इज़रायल के गठन का कैंपेन अपने चरम पर पहुंच चुका था. इस मसले पर 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र में एक वोटिंग होनी थी. वोटिंग का विषय था, फिलिस्तीन का बंटवारा. इसे दो भाग में बांटना. एक हिस्सा, यहूदियों का देश. दूसरा, अरबों यानी फिलिस्तीनियों का देश. इस वोटिंग से पहले ही यहूदी राष्ट्रवादी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे.

उनकी नज़र भारत पर भी थी. ये भारत को आज़ादी मिलने के ठीक पहले की बात है. भारत में प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, जवाहर लाल नेहरू. अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेहरू की बहुत प्रतिष्ठा थी. चाइनीज़ गृह युद्ध से लेकर पूंजीवाद और सोवियतवाद, अंतरराष्ट्रीय मसलों में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ़ चल रहे वैश्विक संघर्ष में वो एक बड़ी अथॉरिटी माने जाते थे. स्पष्ट था कि दुनियावी मामलों में उनकी राय का आज़ाद भारत की आगामी विदेश नीति पर भी असर पड़ने वाला था. ऐसा हुआ भी. इसीलिए फिलिस्तीन और इज़रायल के मुद्दे पर भारत का स्टैंड समझने के लिए नेहरू का विचार जानना बहुत ज़रूरी है.

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भारत के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू. (तस्वीर: एएफपी)

यहूदियों पर क्या राय थी नेहरू की?

नेहरू यहूदी समर्थक थे. वो नात्ज़ी जर्मनी द्वारा किए गए यहूदी नरसंहार के पहले से यहूदी अधिकारों की हिमायत करते आए थे. मसलन, 1930 के दशक में नेहरू ने यहूदियों के बारे में लिखा था-

यहूदी जहां भी गए, दुत्कारे गए. उनकी हत्या हुई. यहां तक कि यहूदी शब्द को ही गाली बना दिया गया. इतने भीषण अत्याचार सहने के बावजूद बिना किसी घर, बिना किसी शरण के यहूदियों ने जिस तरह अपनी पहचान को बनाए रखा, वो इतिहास का एक करिश्मा है.

तो क्या नेहरू फिलिस्तीन की ज़मीन पर यहूदी देश बनाए जाने के भी समर्थक थे? फिलिस्तीन जिस मिट्टी पर बसा था, उसे यहूदी अपने पूर्वजों की ज़मीन मानते हैं. वो उसे बतौर देश फिर से हासिल करना चाहते थे. इसी मुद्दे पर 19वीं सदी में यूरोप के भीतर एक बड़ी मुहिम शुरू हुई. इसका नाम था- ज़ायनिज़म. ज़ायनिज़म शब्द बना है, ज़ायॉन से. हिब्रू भाषा में जेरुसलम का एक नाम ‘ज़ायॉन’ है.

ज़ायनिज़म का मतलब है, यहूदी राष्ट्रवाद. इसके सपोर्टर्स को कहा जाता है- ज़ायनिस्ट. ये मूवमेंट मानता था कि यहूदी धर्म और यहूदी राष्ट्र एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं. उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और भौगोलिक पहचान एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. जैसे फ्रांस पर फ्रेंच का और अमेरिका पर अमेरिकन्स का हक़ है, ठीक उसी तरह अपनी प्राचीन भूमि पर देश बनाने का हक़ यहूदियों को भी है. इसी मूवमेंट के चलते 20वीं सदी में आकर मॉडर्न इज़रायल के गठन की राह बनी.

फिलिस्तीन पर नेहरू की क्या राय थी?

अब फिर से लौटते हैं नेहरू पर. नेहरू मानते थे कि जहां फिलिस्तीन बसा है, उस ज़मीन से यहूदियों की प्राचीन जड़ें जुड़ी हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आधुनिक काल में भी उस भूभाग पर यहूदियों का अधिकार है. नेहरू ने 1939 में लिखा था-

ये सच है कि यहूदियों के लिए फिलिस्तीन उनकी पवित्र ज़मीन है. मगर फिलिस्तीन कोई निर्जन भूभाग नहीं. वो अरबों का घर, उनका वतन है.

यहां भारत के ऐतिहासिक बैकग्राउंड का ज़िक्र भी ज़रूरी है. भारत दशकों तक यूरोपीय पावर्स का ग़ुलाम रहा. बहुत संघर्ष के बाद हमें आज़ादी मिली. इसीलिए नेहरू समेत कांग्रेस की बड़ी लीडरशिप साम्राज्यवाद से संघर्ष कर रहे सभी देशों को सपोर्ट करती थी. नेहरू कहते थे कि अंग्रेज़ फिलिस्तीन के भीतर भी अपनी मनमानी कर रहे हैं. डिवाइड ऐंड रूल की नीति चला रहे हैं. ऐसे में फिलिस्तीनियों का संघर्ष केवल धार्मिक नहीं है. वो साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष भी है. इसीलिए भारत को फिलिस्तीन के साथ खड़े होना चाहिए.

अगर यहूदियों को आज़ाद भारत का सपोर्ट चाहिए था, तो ज़रूरी था कि नेहरू के विचार बदले जाएं. इसका जिम्मा मिला, मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को. आइंस्टाइन थोड़ी हिचक के साथ ही सही, मगर ज़ायनिज़म के सपोर्टर थे. नेहरू आइंस्टाइन के प्रशंसक थे. इसीलिए ज़ायनिस्ट लीडर्स ने नेहरू को मनाने का टास्क आइंस्टाइन को सौंपा था.

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वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के साथ भारत के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू. (तस्वीर: एएफपी)

13 जून, 1947 को आइंस्टाइन ने चार पन्नों की एक चिट्ठी भेजी नेहरू को. इसमें उन्होंने हिटलर के हाथों हुए यहूदी नरसंहार का हवाला देते हुए नेहरू से अपील की कि वो यहूदी राष्ट्र का समर्थन करें. इसके जवाब में नेहरू ने 11 जुलाई, 1947 को तीन पन्नों की एक चिट्ठी भेजी. नेहरू ने लिखा कि वो यहूदियों के लिए हमदर्दी रखने के साथ-साथ अरबों के प्रति भी सहानुभूति रखते हैं. वो फिलिस्तीनी भूमि के बंटवारे और यहूदी राष्ट्र के गठन को सपोर्ट नहीं कर सकते. इस चिट्ठी में नेहरू ने एक और ज़रूरी बात लिखी थी. उन्होंने लिखा था-

दुर्भाग्य से लीडर्स को अपने मुल्क का हित देखते हुए स्वार्थी फैसले लेने पड़ते हैं.

नेहरू की बातों का क्या मतलब था?

कई जानकार मानते हैं कि नेहरू की इन पंक्तियों का संदर्भ था भारत का बंटवारा. धर्म के नाम पर भारत के दो टुकड़े हो रहे थे. सांप्रदायिक नफ़रत के चलते राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता बड़ी चुनौतियां थीं. देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की एक बड़ी आबादी थी. वो ज़ायनिज़म का विरोध करते थे.

ऐसे में फिलिस्तीनी अधिकारों की मुखालफ़त से वो आहत हो सकते थे. एक बड़ा ख़तरा पाकिस्तान से भी था. उसके साथ युद्ध की नौबत आती, तो भारत को इंटरनैशनल सपोर्ट की ज़रूरत पड़ती. पाकिस्तान को काउंटर करने के लिए अरब और मुस्लिम देशों का भी समर्थन चाहिए होता. ये मुस्लिम देश फिलिस्तीन के समर्थक थे. शायद ये भी एक बड़ी वजह थी कि आज़ाद भारत ने फिलिस्तीनी अधिकारों के साथ खड़े होने का विकल्प चुना.

हमने आपको बताया था 29 नवंबर, 1947 को फिलिस्तीन और इज़रायल के मुद्दे पर UN में एक वोटिंग होनी थी. इसके दो रोज़ पहले भी ख़ाइम वाइज़्मन, जो आगे चलकर इज़रायल के पहले राष्ट्रपति बने, ने नेहरू को मनाने की कोशिश की. लिखा कि भारत फिलिस्तीन के बंटवारे का विरोध कैसे कर सकता है? मगर ज़ाइनिस्ट्स की कोशिश नाकाम रही. 29 नवंबर, 1947 को जब UN में वोटिंग हुई, तो भारत ने पार्टिशन रेजॉल्यूशन के विरोध में मतदान किया. इस प्रस्ताव के समर्थन में 33 वोट डले. विरोध में 13 वोट आए. और ब्रिटेन समेत 10 मुल्क वोटिंग से गायब रहे.

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इज़रायल के पहले राष्ट्रपति ख़ाइम वाइज़्मन. (तस्वीर: एएफपी)

अमेरिका और ब्रिटेन, इन दो सुपरपावर्स के सपोर्ट के चलते इज़रायल का गठन हो गया. 14 मई, 1948 को इज़रायल ने स्वतंत्र देश के गठन की घोषणा की. इस मसले पर जून 1949 में एक और सत्र हुआ UN का. यहां भी भारत ने बतौर राष्ट्र इज़रायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया. जबकि स्पष्ट था कि इज़रायल बन चुका है?

भारत ने इज़रायल को मान्यता देने से इनकार क्यों किया?

जानकारों के मुताबिक, इसकी एक वजह कश्मीर मुद्दा था. आज़ादी के समय से ही भारत और पाकिस्तान में कश्मीर को लेकर झगड़ा था. दोनों के बीच युद्ध भी हो चुका था. पाकिस्तान इस मसले को UN सिक्यॉरिटी काउंसिल से शिफ़्ट करके जनरल असेंबली ले जाना चाहता था.

भारत को डर था कि अगर उसने इज़रायल को मान्यता दी, तो कहीं अरब मुल्क इस मुद्दे पर पाकिस्तान को सपोर्ट ना करें. इसके अलावा अरब देश ऑइल सप्लायर थे. उन्हें नाराज़ करने पर मिडिल-ईस्ट में भारतीय हितों को नुकसान पहुंच सकता था.

तो क्या भारत ने इज़रायल को कभी मान्यता नहीं दी?

दी. वो भी इज़रायल के गठन के दो ही साल बाद सितंबर 1950 में. ऐसा क्यों किया भारत ने? क्योंकि इस वक़्त तक मिडिल-ईस्ट के दो बड़े देश- ईरान और तुर्की, इज़रायल को मान्यता दे चुके थे. यहां ध्यान रखिएगा कि इस समय का ईरान, 1979 में स्थापित कट्टरपंथी इस्लामिक ईरान नहीं था.

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1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान को कट्टरपंथ की ओर धकेल दिया था. (तस्वीर: एएफपी)

यानी, अब इज़रायल को मान्यता देकर भारत मिडिल-ईस्ट में अलग-थलग नहीं होता. इसके बाद 1953 में इज़रायल ने बंबई में अपना पहला वाणिज्यिक दूतावास खोला. प्रचलित तरीका यही था कि अब भारत भी इज़रायल में दूतावास खोले. मगर भारत इज़रायल के साथ सीमित रिश्ते रखना चाहता था. इसीलिए भारत ने इज़रायल में अपनी ऐम्बैसी या कॉन्स्युलेट नहीं खोला.

भारत-इज़रायल रिश्तों का एक बड़ा एपिसोड आया स्वेज़ संकट के समय

ये नहर इज़िप्ट के भूभाग में थी. मगर इसपर कंट्रोल था ब्रिटेन और फ्रांस का. इज़िप्ट इसपर अपना कंट्रोल चाहता था. उसने स्वेज को नैशनलाइज़ कर दिया. जवाब में पहले इज़रायल, फिर ब्रिटेन और फ्रांस ने स्वेज पर हमला कर दिया. इस मामले में भारत ने इज़िप्ट का पक्ष लिया. उसने कहा, इस केस में इज़रायल आक्रमणकारी है. UN ने जब इज़िप्ट में अपनी पीसकीपिंग सेना भेजी, तो भारत ने भी उसमें अपने सैनिक भेजे. भारतीय सपोर्ट के बदले इज़िप्ट ने यूनाइटेड नेशन्स की इमरजेंसी फोर्स में पाकिस्तान की हिस्सेदारी का विरोध किया.

क्या इस एपिसोड का मतलब ये था कि भारत और इज़रायल के बीच तल्ख़ियां आ गईं? नहीं. भारत ने उसके साथ डिप्लोमैटिक रिश्ते भले न कायम किए हों, लेकिन उसकी इज़रायल से कोई शत्रुता नहीं थी. जैसा कि 1957 में एक दफ़ा लोकसभा को संबोधित करते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री वी के मेनन ने कहा भी था-

जहां तक इज़रायल का प्रश्न है, तो हमारी उससे कोई दुश्मनी नहीं.

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1957 में भारत के रक्षा मंत्री वी के मेनन. (तस्वीर: एएफपी)

इस दौर में भारत मिडिल-ईस्ट और कश्मीर पॉलिसी के चलते इज़रायल के साथ के साथ अपने रिश्तों में बहुत एहतियात बरतता था. इस पॉलिसी में बड़ा बदलाव आया चीन के कारण. 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. ये युद्ध नेहरू की चाइना नीति की करारी हार थी. साथ ही, अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहे भारत के पास चीन का मुकाबला करने की सैन्य क्षमता भी नहीं थी. भारत को हथियारों और कूटनीतिक समर्थन के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद मांगनी पड़ी.

27 अक्टूबर, 1962 को नेहरू ने इज़रायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को भी पत्र भेजा. जवाब में गुरियन ने भारत के साथ हमदर्दी जताते हुए हथियार देने की पेशकश की. इज़रायल ने भारत को आर्म्स सपोर्ट दिया भी, मगर सीमित. इस प्रकरण के चलते इज़रायल और भारत करीब तो आए, मगर फिर 1967 के सिक्स-डे वॉर के चलते दोनों में दूरी आ गई.

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1962 में इज़रायली पीएम डेविड बेन गुरियन. (तस्वीर: एएफपी)

1967 के युद्ध में क्या हुआ था?

इसमें इज़रायल ने UN पार्टिशन प्लान में फिलिस्तीन को आवंटित इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया. इस समय तक भारत ख़ुद सीमा विवाद के चलते तीन युद्ध झेल चुका था. ऐसे में भारत का आधिकारिक पक्ष यही था कि सीमा विवाद का निपटारा युद्ध से नहीं, वार्ता से होना चाहिए. भारत ने इज़रायली कब्ज़े पर भी यही स्टैंड लिया. कहा कि इज़रायल कब्ज़े वाले इलाके खाली करे. शांतिपूर्ण तरीकों से विवाद सुलझाने की कोशिश करे. साथ ही, फिलिस्तीनी शरणार्थियों के हितों की भी रक्षा करे. UN में अपना पक्ष रखते हुए भारत ने कहा कि आक्रमण करने वाले पक्ष को आक्रमण का फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए. दोनों पक्षों को चाहिए कि वो युद्ध से पहली वाली स्थिति पर लौट जाएं.

एक तरफ इंटरनैशनल घटनाक्रम था. दूसरी तरफ भारत की अपनी चिंताएं थीं. चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती के आगे भारत की अपनी सीमाएं सुरक्षित करने की चिंताएं भी बढ़ रही थीं. पाकिस्तान के सवाल पर इंदिरा गांधी सरकार के आगे अमेरिका का प्रेशर था. गवर्नमेंट को सोवियत के अतिरिक्त भी इंटरनैशनल बैकअप चाहिए था. इस तस्वीर में इज़रायल की एंट्री दिखती है 1971 के बांग्लादेश युद्ध में. इस टाइम भारत को हथियारों की ज़रूरत पड़ी. सरकार ने इज़रायल से मदद मांगी. और उसने भारत को लिमिटेड सपोर्ट भी दिया.

लेकिन इस सपोर्ट के बावजूद भारत ने फिलिस्तीन का पक्ष नहीं छोड़ा. इसी क्रम में 1975 के साल भारत ने यासिर अराफ़ात के PLO, यानी फिलिस्तीनियन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन को फिलिस्तीन देश के प्रतिनिधि की मान्यता दी. ऐसा करने वाला पहला ग़ैर-अरब मुल्क था भारत. इस वक़्त तक भारत की पॉलिसी में फिलिस्तीन के प्रति थोड़ा झुकाव दिखता है.

मगर फिर मिडिल-ईस्ट की तस्वीर तेज़ी से बदलने लगी. 1978 में इज़िप्ट ने इज़रायल से संधि कर ली. 1979 में ईरान के भीतर इस्लामिक कट्टरपंथियों की सरकार बन गई. अब सऊदी और ईरान के बीच मुसलमानों का अगुआ बनने की होड़ शुरू हुई. अंदर ही अंदर अरब देशों का इज़रायल के प्रति नज़रिया बदलने लगा. उन्हें लगने लगा कि ईरान को काउंटर करने के लिए अमेरिका और इज़रायल ज़रूरी हैं.

मिडिल-ईस्ट के इस बदलते घटनाक्रम का असर भारतीय पॉलिसी पर भी पड़ा. भारत अब भी फिलिस्तीनी अधिकारों की बात तो करता था, मगर पहले जितनी मुखरता से नहीं. अब भारत के अप्रोच में बैलेंसवाद ज़्यादा नज़र आने लगा. इज़रायल के प्रति उसके स्वर शांत होने लगे. मसलन, 1985 में अरब देश UN जनरल असेंबली में एक प्रस्ताव लाए. इसमें इज़रायल की आक्रामकता का हवाला देकर उसे UN से बर्ख़ास्त करने की अपील की गई थी. भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया.

अब भारत में भी इज़रायल के साथ आधिकारिक रिश्ते जोड़ने की हलचल तेज़ हो गई. राजीव गांधी का कार्यकाल इस मायने में काफी अहम रहा. 1985 में राजीव बतौर प्रधानमंत्री UN जनरल असेंबली के 40वें सत्र में हिस्सा लेने गए. यहां उन्होंने इज़रायली PM शिमोन पेरेज़ के साथ अलग से मुलाकात की. ये भारत और इज़रायली नेतृत्व के बीच हुई पहली पब्लिक मीटिंग थी.

Rajiv Gandhi
भारत के पूर्व पीएम राजीव गांधी (तस्वीर: एएफपी)

कोल्ड वॉर में सोवियत संघ की हार के बाद दुनिया बदल गई!

भारत ने भी अपनी विदेश नीति में बदलाव किया. वो अपने लिए नए सामरिक पार्टनर्स खोजने लगा. अमेरिका के साथ उसके रिश्ते बेहतर होने लगे. इसी के चलते पहले गल्फ़ वॉर के दौरान भारत ने अमेरिका को लिमिटेड सपोर्ट भी दिया. भारत को उन्नत हथियार और सैन्य तकनीक की भी बहुत ज़रूरत थी. भारत अपनी रक्षा ज़रूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर था. आर्म्स और डिफेंस टेक्नॉलज़ी में इज़रायल बड़ी पावर था.

ऐसे में इज़रायल से दूर रहना भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसान था. इसीलिए पी वी नरसिम्हा राव सरकार ने इज़रायल पर अपनी आधिकारिक पॉलिसी बदल ली. 1975 में UN के भीतर एक प्रस्ताव आया था. इसे कहते हैं, UNGA रेजॉल्यूशन नंबर 3,379. इसमें ज़ायनिज़म की तुलना नस्लवाद से की गई थी. तब भारत ने इस प्रस्ताव को सपोर्ट किया था. दिसंबर 1991 में इसी मसले पर अमेरिका एक और प्रस्ताव लाया. इसमें रेजॉल्यूशन 3,379 को वापस लाने का प्रस्ताव था. भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. फिर 29 जनवरी, 1992 को आया सबसे बड़ा फ़ैसला. इस तारीख़ को भारत ने इज़रायल के साथ आधिकारिक कूटनीतिक रिश्ते कायम करने की घोषणा की.

Narsimha Rao
भारत के पूर्व पीएम पी वी नरसिम्हा राव (तस्वीर: एएफपी)

भारत और इज़रायल कैसे नज़दीक पहुंचे?

भारत और इज़रायल के करीब आने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ. 1993 में इज़रायल के विदेश मंत्री भारत आए. उन्होंने शिमला समझौते का समर्थन किया. कहा कि इसी को नींव बनाकर कश्मीर मुद्दा सुलझाया जाना चाहिए. इज़रायल और भारत के बीच विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी कई करार हुए. इसके एक बरस बाद 1994 में दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौता हुआ.

फिर जनवरी 1997 में इज़रायल के तत्कालीन राष्ट्रपति ऐज़र वाइज़मैन भारत के दौरे पर आए. ये पहली बार था जब कोई इज़रायली राष्ट्रपति भारत आए हों. इसके बाद से ही भारत और इज़रायल के बीच रक्षा सहयोग ने भी तेज़ी पकड़ी. भारत हथियारों का बड़ा खरीदार था. इज़रायल हथियारों का बड़ा विक्रेता था. भारत को बेहतर हथियार चाहिए थे और इज़रायल को बड़ा ख़रीदार चाहिए था. ऐसे में इज़रायल ने डिफेंस रिसर्च में भारत को कोऑपरेट करना शुरू किया.

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1997 में इज़रायल के राष्ट्रपति ऐज़र वाइज़मैन (तस्वीर: एएफपी)

केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के बाद इज़रायल-भारत संबंध और मज़बूत हुए. पोकरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत की आलोचना की. आर्थिक प्रतिबंध लगाए. मगर अमेरिका का सहयोगी होने के बावजूद इज़रायल ने भारत की निंदा नहीं की. बल्कि उसने डिफेंस से जुड़े मामलों में भारत की मदद ही की. दोनों देशों के रिश्तों में एक और बड़ा जंप हमें दिखता है कारगिल युद्ध के दौरान. इस वक़्त इज़रायल ने भारत को हथियार दिए. कारगिल में जीत के बाद भारत ने इज़रायल से हथियार खरीदने का बड़ा सौदा किया. इनमें ड्रोन्स, रेडार्स और मिसाइलें शामिल थीं. इसी बढ़ती दोस्ती के चलते 2003 में इज़रायली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन भारत दौरे पर आए. 2009 में इज़रायल ने आठ बराक एयर डिफेंस सिस्टम बेचे भारत को.

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भारत के पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी. (तस्वीर: एएफपी)

ये सारा बैकग्राउंड बताने के बाद आते हैं मोस्ट रीसेंट हिस्ट्री पर

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनती है. ये वो समय था, जब मिडिल-ईस्ट में अरब स्प्रिंग के बाद की हिंसा चल रही थी. सीरिया और इराक में लड़ाई चल रही थी. एर्दोगान के नेतृत्व वाला तुर्की कट्टरपंथी हार्ड लाइन फॉलो कर रहा था.

भारत का पुराना दोस्त ईरान अलग-थलग था. अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती दोस्ती के चलते ईरान के साथ हमारे रिश्तों में ठंडापन भी आया था. ईरान चीन के पाले में चला गया था. वो जब-तब कश्मीर मसले को लेकर भारत की आलोचना करता था. जबकि मोदी सरकार कश्मीर पर और सख़्त रवैया अपनाना चाहती थी.

एक और बड़ा फ़ैक्टर था यहां. क्या? मोदी सरकार का हिंदुत्व के प्रति झुकाव. भारतीय मुसलमान हमेशा से ही फिलिस्तीनी अधिकारों के प्रति भावुक रहे हैं. ये एक बड़ी वजह थी कि पहले की सरकारों ने फिलिस्तीन का हमेशा पक्ष लिया. मोदी सरकार ऐसी किसी रियायत के लिए तैयार नहीं थी. इनका अप्रोच हार्डलाइन था. इसका एक असर इज़रायल के साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा. इज़रायल कई मायने में मिडिल-ईस्ट के भीतर भारत का सबसे मज़बूत पार्टनर बन गया.

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तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगान. (फोटो: एपी)

इसकी शुरुआत हुई 2014 में. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी UN जनरल असेंबली के सत्र में हिस्सा लेने न्यू यॉर्क गए. यहां उन्होंने इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अलग से मुलाकात की. अब इज़रायल के प्रति शिफ़्ट हो रहा भारतीय झुकाव साफ़ दिखने लगा था. मसलन, 2015 में UN मानवाधिकार कमीशन में इज़रायल पर एक वोटिंग हुई. मामला था, गाज़ा में इज़रायल द्वारा किए गए कथित युद्ध अपराधों की जांच रिपोर्ट. 2014 में जब इस जांच का गठन हुआ, तब भारत ने इसे सपोर्ट किया था. लेकिन 2015 में जब कमीशन अपनी जांच रिपोर्ट लेकर आया, तो भारत वोटिंग में ग़ैर-हाज़िर रहा.

बढ़ते झुकाव के इसी क्रम में साल 2015 में तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इज़रायल पहुंचे. ये पहली बार था जब भारत के राष्ट्रपति इज़रायल दौरे पर गए हों. 2016 में इज़रायली राष्ट्रपति रॉवेन रिवलिन भी छह दिन की भारतीय यात्रा पर आए. ये यात्राएं एक हिस्टोरिकल दौरे की ज़मीन तैयार कर रही थीं. कौन सा हिस्टोरिकल दौरा? जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इज़रायल दौरा. मोदी का स्वागत करते हुए नेतन्याहू ने तब कहा था-

हम बहुत वक़्त से आपका इंतज़ार कर रहे थे. हम 70 सालों से आपकी राह देख रहे थे.

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जुलाई 2017 में पीएम नरेंद्र मोदी ने इज़रायल का दौरा किया था. (तस्वीर: एपी)

नेतन्याहू और मोदी, दोनों ने दोस्ती का प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लोगों ने उनके रिश्ते को नाम दिया, ब्रोमांस. नेतन्याहू बोले कि भारत और इज़रायल का रिश्ता ‘स्वर्ग में तय हुई शादी’ सा है. हालांकि यही लाइन उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से भी कही थी. ख़ैर, तो मोदी ने अपनी उस यात्रा में नेतन्याहू को भी भारत आने का न्योता दिया. इसके बाद 2018 में नेतन्याहू भी छह दिन के भारत दौरे पर आए.

सारा संदर्भ समझने के बाद अब आते हैं मौजूदा प्रकरण पर?

इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच पिछले एक हफ़्ते से हिंसा जारी है. भारत का क्या पक्ष है इसपर? भारत ने दोनों की साइड ली है. भारत ने कहा कि वो हमास द्वारा रॉकेट्स दागे जाने का भी विरोध करता है. और इज़रायल द्वारा गाज़ा पर की जा रही बमबारी की भी मुख़ालफ़त करता है. 16 मई को मिडिल-ईस्ट के इस घटनाक्रम पर एक वार्ता हुई. इसमें UN में भारत के प्रतिनिधि टी एस तिरुमूर्ति ने ये बात कही. तिरुमूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहा कि मौजूदा हिंसा के चलते बहुत सारे लोगों की जान गई है. इनमें औरतें और बच्चे भी शामिल हैं. इसीलिए भारत दोनों पक्षों से संयम की अपील करता है.

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UN में भारत के प्रतिनिधि टी एस तिरुमूर्ति.

यानी, इस हिंसक प्रकरण में भारत हिंसा करने वाले सभी पक्षों की निंदा करता है. फिर चाहे वो हमास हो, या इज़रायल. यही है भारत का आधिकारिक स्टैंड. जहां तक फिलिस्तीनी अधिकारों का सवाल है, तो भारत अभी भी उसके अधिकारों की साइड लेता है. वो कहता है कि फिलिस्तीन को उसके देश का हक़ है. भारत स्टेटस को बनाए रखने का पक्ष लेता है. स्टेटस को मतलब, 1967 के युद्ध के पहले की स्थिति. यानी इज़रायल ने जिन फिलिस्तीनी इलाकों पर कब्ज़ा किया हुआ है, उन्हें फिलिस्तीन को लौटाया जाए. इसीलिए 2017 में जब अमेरिका ने जेरुसलम को इज़रायली राजधानी के तौर पर मान्यता देने की बात कही, तो UN में भारत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया.

कई लोग भारत की फिलिस्तीन-इज़रायल पॉलिसी को कन्फ़्यूज्ड मानते हैं. कुछ कहते हैं, भारत अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक पॉलिसी बदलता गया. कुछ कहते हैं, भारत ने बैलेंस बनाने की कोशिश की. कई लोग फिलिस्तीन के मुकाबले इज़रायल के प्रति भारत के बढ़ते झुकाव की आलोचना करते हैं. तो कुछ कहते हैं कि इज़रायल बड़ी इकॉनमी है. रक्षा और तकनीक में बहुत उन्नत है. उससे अलग-थलग रहकर भारत को नुकसान होगा.

ये सच है कि पिछले 25 सालों में भारत की इज़रायल के साथ दोस्ती लगातार गहरी होती गई है. मगर भारत ने फिलिस्तीनी पक्ष को पूरी तरह छोड़ा भी नहीं है. ऐसा इसलिए कि किसी भी देश की विदेश नीति रातोरात नहीं बदलती. उसमें 180 डिग्री का बदलाव नहीं आ सकता. इज़रायल के साथ बढ़ती नज़दीकियों के बावजूद भारत समय-समय पर फिलिस्तीन के साथ भी खड़ा होता है. वो फिलिस्तीन के अस्तित्व का पक्ष लेता है. और शायद इसीलिए नेतन्याहू के उस थैंक यू ट्वीट में भारत का नाम नहीं था.


विडियो- इज़रायल के कवच आयरन डोम का हमास ने क्या तोड़ निकाला?

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