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क्या है इंडियन स्टैंडर्ड टाइम, जिससे हमारे देश की घड़ी सेट होती है

”मैं समय हूं.”

‘महाभारत’ टीवी सीरियल में इस भारी-भरकम आवाज़ के साथ एक मोनोलॉग आता था. अगर समय को सच में एक किरदार बना दें, तो इसे सुनने पर एक ठसक का भाव आता है. समय का स्वैग. मानो ऐसे ही अपना परिचय देने के बाद आगे वो कहेगा, ”मैंने सब देखा हुआ है. धरती का पूरा इतिहास. कई सभ्यताएं. डायनासोर-वायनासोर, आदिमानव-वादिमानव से लेकर तुम नए लोगों तक और आगे भी देखता रहूंगा. मैं अनंत हूं.”

समय विराट है. इसे समझना मुश्किल है. इसलिए इंसान ने अपनी सुविधा के लिए उसे बांट रखा है. सदी, दशक, साल, महीने, हफ्ते, दिन, रात, घंटे, मिनट और सेकंड में. पहले ऐसा नहीं था. हमारे लिए समय, धरती के सूरज के चारों तरफ और अपनी धुरी पर घूमने से जुड़ा है. पहले लोग सूरज की रोशनी से समय का अनुमान लगाते थे. बाद में कैलेंडर से लेकर घड़ियां बनाई गईं. इसके बाद क्या हुआ? हमने स्टैंडर्ड टाइम मान लिए, ताकि ठीक-ठीक टाइम पता चल सके. दिनचर्या बनाई जा सके.

पूरी दुनिया का भी एक स्टैंडर्ड टाइम है, जिसे ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) कहते हैं. लेकिन यहां हम इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (IST) की बात करेंगे, जिसे आज़ादी से कुछ दिनों बाद 1 सितंबर, 1947 से अपनाया गया था. ये होता क्या है? इसकी ज़रूरत क्यों होती है? रोज़मर्रा के जीवन में ये कितना फायदेमंद है?

पहले देखिए, अक्षांश और देशांतर रेखाएं क्या हैं

बचपन वाली भूगोल की किताबों की तरफ लौटते हैं. धरती पर हमने कुछ काल्पनिक रेखाएं खींच रखी हैं. ग्लोब या नक्शे के सहारे इन्हें दिखाया जाता है. इन्हें अक्षांश और देशांतर रेखाएं कहते हैं. Latitude और Longitude. पड़ी रेखाएं अक्षांश हैं और खड़ी रेखाएं देशांतर. देशांतर यानी खड़ी रेखाओं का समय निर्धारित करने में बड़ा रोल है. धरती की पूरी 360 डिग्री गोलाई में एक-एक डिग्री के अंतर पर इन्हें खींचा जाता है. हमें पता है कि धरती पश्चिम से पूरब घूमती है. अपनी धुरी पर पूरा 360 डिग्री घूमने में धरती 24 घंटे का समय लेती है. 15 डिग्री घूमने में 60 मिनट और एक डिग्री घूमने में चार मिनट का समय लगता है. इस घूमने के दौरान कहां, कितना बज रहा है, ये डिसाइड होता है स्टैंडर्ड टाइम से. इसे उदाहरण से समझें.

पड़ी रेखाएं अक्षांश (Lattitude), खड़ी रेखाएं देशांतर (Longitude). फोटो: LattitudeLongitude.net
पड़ी रेखाएं अक्षांश (Latitude), खड़ी रेखाएं देशांतर (Longitude). फोटो: LattitudeLongitude.net

इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (IST) क्या है

भारत में पश्चिम से पूर्व तक की दूरी 2,933 किलोमीटर है और देशांतर रेखाओं में भारत 68.7 डिग्री पूर्व से 97.25 डिग्री पूर्व के बीच है. पश्चिम में सबसे किनारे गुजरात और पूर्व में सबसे किनारे अरुणाचल प्रदेश हैं. इन दोनों के बीच 29 डिग्री देशांतर का अंतर है. जब धरती इतनी डिग्री घूमती है, तो दोनों प्रदेशों के समय में करीब दो घंटे का अंतर आ जाता है. मतलब अरुणाचल में सूरज की किरणें गुजरात से दो घंटे पहले पड़ेंगी. इससे दिक्कत हो सकती है. ट्रेन, फ्लाइट की टाइमिंग से लेकर तारीख में. तो हमने क्या किया कि पूरे देश में स्टैंडर्ड टाइम के लिए बीच की एक देशांतर रेखा पकड़ ली, जो कि 82.5 डिग्री पूर्व है. इसके हिसाब से पूरे देश के लिए घड़ी सेट कर दी. ये देशांतर रेखा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है. हमारा स्टैंडर्ड टाइम प्रयागराज (इलाहाबाद) के पास मिर्ज़ापुर से जोड़ा जाता है और स्थानीय समय की देख-रेख के लिए इलाहाबाद ऑब्जर्वेटरी है. इस काम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी है.

82.5 डिग्री से गुजरने वाली देशांतर रेखा, जो भारत का स्टैंडर्ड टाइम निर्धारित करती है. बीच में लाल बिंदु मिर्ज़ापुर है. फोटो: New World Encylopedia
82.5 डिग्री से गुजरने वाली देशांतर रेखा, जो भारत का स्टैंडर्ड टाइम निर्धारित करती है. बीच में लाल बिंदु मिर्ज़ापुर है. फोटो: New World Encylopedia

पहले दो स्टैंडर्ड टाइम होते थे

भारत का स्टैंडर्ड टाइम ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) से साढ़े पांच घंटे आगे है. GMT को यूनिवर्सिल को-ऑर्डिनेट टाइम (UGT) भी कहते हैं. ग्रीनविच नाम की जगह यूनाइटेड किंगडम में है. यहां से साढ़े पांच घंटे आगे होने का मतलब है कि लंदन में अगर कोई क्रिकेट मैच दोपहर में दो बजे शुरू हो, तो हमें शाम साढ़े सात बजे से शुरू होता दिखेगा. ये फर्क देशांतर की डिग्रियों की वजह से होता है.

पहले भारत में दो स्टैंडर्ड टाइम होते थे. बॉम्बे टाइम और कलकत्ता टाइम, जिन्हें ब्रिटेश राज में 1884 में स्थापित किया गया था. तब दोनों शहरों के बीच एक घंटे 9 मिनट का अंतर होता था. पूरे देश के लिए 1 सितंबर, 1947 को इंडियन स्टैंडर्ड टाइम स्वीकार किया गया. इसके बाद 1948 में बॉम्बे टाइम और 1955 में कलकत्ता टाइम खत्म कर दिया गया.

लाल रंग में ग्रीनविच मीन टाइम निर्धारित करने वाली रेखा. इसे प्राइम मेरीडियन भी कहते हैं. फोटो: mapsofworld.com
लाल रंग में ग्रीनविच मीन टाइम निर्धारित करने वाली रेखा. इसे प्राइम मेरीडियन भी कहते हैं. फोटो: mapsofworld.com

टाइम ज़ोन कैसे बने

1879 में कनाडा के सर सैंडफोर्ड फ्लेमिंग ने पूरे विश्व के लिए टाइम ज़ोन का कॉन्सेप्ट दिया था. बाद में 1884 में इंटरनेशनल मेरीडियन कॉन्फ्रेंस में 24 घंटे को एक दिन मानने का प्रस्ताव पास हुआ. दुनिया में 24 टाइम ज़ोन हैं. स्टैंडर्ड टाइम निर्धारित करने से फायदा ये है कि देश के लिए एक ही टाइम ज़ोन हो जाता है. लेकिन कई देशों में एक से ज़्यादा टाइम ज़ोन भी होते हैं. जैसे- रूस जैसे बड़े क्षेत्रफल वाले देश में 11 टाइम ज़ोन हैं. भारत में भी दो टाइम ज़ोन बनाने की मांग होती रही है. असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई नॉर्थ-ईस्ट के लिए अलग टाइम ज़ोन की मांग करते रहे हैं. इसके लिए तर्क दिया जाता है कि सनलाइट और वर्कफोर्स का सही से इस्तेमाल नहीं हो पाता. नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी के काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रीसर्च (CSIR-NPL) ने भी दो टाइम ज़ोन का प्रस्ताव दिया था. फिलहाल ऐसा हुआ नहीं है.


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