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क्या है ‘हवाना सिंड्रोम’, जिसके कारण अमेरिका दुनिया के सामने झेंपता फिर रहा है?

ये क़िस्सा है एक रहस्यमय हमले का. इस हमले के चलते होती है एक मिस्टीरियस बीमारी. एक ख़ास तरह का सिंड्रोम, जिसकी दिलचस्प बात ये है कि ये एक ख़ास विभाग में काम करने वाले लोगों को प्रभावित करता है. इस सिंड्रोम की वजह क्या है, कोई नहीं जानता. लेकिन कई जानकार कहते हैं, ये एक ख़ास तरह की आवाज़ सुनने से होता है. अनुमान है कि इसके पीछे किसी देश की गुप्तचर एजेंसी का हाथ है. इस सिंड्रोम को अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी CIA कोल्ड वॉर के बाद की सबसे अचंभित करने वाली मिस्ट्री मानती है. इसीलिए अब CIA ने इस रहस्य को डीकोड करने की ठानी है. ये पहेली सुलझाने का जिम्मा CIA के उस अफ़सर को दिया गया है, जिसने लादेन को तलाश करने वाले मिशन की अगुआई की थी. ये पूरा मामला क्या है, विस्तार से बताते हैं.

क्यूबा और अमेरिकी दूतावास

कैरेबियन में एक देश है- रिपब्लिक ऑफ़ क्यूबा. अटलांटिक ओशन, कैरेबियन सी और मेक्सिको की खाड़ी के मीटिंग पॉइंट पर बसा छोटा सा द्वीपीय देश. इसकी राजधानी है, हवाना. नॉर्थ अटलांटिक ओशन के किनारे बसे हवाना में  समंदर के किनारे-किनारे, समुद्रतट के समानांतर, एक दीवार बनी हुई है. इसे कहते हैं, मेलेकॉन.

इसी मेलेकॉन के नज़दीक एक छह-मंज़िला इमारत में स्थित है अमेरिकी दूतावास. इस इमारत का निर्माण हुआ था 1953 में. वही साल, जब क्यूबा में क्रांति की शुरुआत हुई थी. रेवॉल्यूशन के दौर में प्रो-गवर्नमेंट फोर्सेज़ को इस इमारत से बहुत मदद मिली. यहीं से ऑपरेट करते हुए CIA और स्टेट डिपार्टमेंट के लोग अपने हैंडपिक्ड क्यूबन डिक्टेटर बतिस्ता की मदद करते. मगर लाख जतन के बाद भी 1959 में कास्त्रो के गुट को कामयाबी मिल गई. इसके बाद क्यूबा और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रिश्ते भी टूट गए.

ये रिश्तेदारी वापस बहाल हुई करीब आधी सदी बाद 20 जुलाई, 2015 को. मार्च 2016  में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा भी क्यूबा पहुंचे. सन् 1928 में प्रेज़िडेंट कैलवन कूलेज़ की विज़िट के बाद ये पहली बार था, जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति क्यूबा आया हो.

क्यूबन लीडरशिप को लग रहा था कि अमेरिका से रिश्ते सुधरने के कारण सैंक्शन्स हटेंगे. इकॉनमी दुरुस्त होगी. ऐसा होने का माहौल भी बन रहा था. मगर फिर 8 नवंबर, 2016 को ट्रंप के चुनाव जीतने की ख़बर आई. ट्रंप थे, ऐंटी-क्यूबा. ट्रंप की जीत के 17 रोज़ बाद 25 नवंबर, 2016 को कास्त्रो चल बसे. कास्त्रो की मौत पर ट्रंप ने बयान जारी किया. कहा- करीब छह दशक तक अपने ही लोगों पर अत्याचार करने वाले एक क्रूर तानाशाह का अंत हुआ.

Trump Castro
कास्त्रो की मौत पर ट्रंप ने कहा- करीब छह दशक तक अपने ही लोगों पर अत्याचार करने वाले एक क्रूर तानाशाह का अंत हुआ.

30 दिसंबर 2016 को क्या हुआ

ये सारा घटनाक्रम मुख्य प्लॉट का बैकग्राउंडर है. इसे जाने बिना आप शायद विषय के संदर्भ-प्रसंग को अच्छी तरह नहीं समझ पाते. क्या है मुख्य प्लॉट? हमने आपको हवाना स्थित अमेरिकी दूतावास बिल्डिंग के बारे में बताया था. इसमें अमेरिकी डिप्लोमैटिक मिशन के कुल 54 स्टाफ़ पोस्टेड थे. इनमें सारे स्टाफ़ डिप्लोमैट्स और सिक्यॉरिटी ऑफ़िसर्स नहीं थे. कुछ लोग CIA के भी थे. ये लोग ऐम्बैसी में सबसे ऊपर, छठी मंज़िल पर बैठते थे. इसी फ़्लोर पर था, CIA का स्टेशन.

ये बात है- 30 दिसंबर, 2016 की. ऐम्बैसी स्थित CIA स्टेशन में पोस्टेड खुफ़िया विभाग का एक अधिकारी दूतावास के हेल्थ ऑफ़िस में पहुंचा. उसने नर्स को बताया कि बीती रात वो अपने घर पर था. वहां उसे अजीब सी ध्वनि सुनाई दी. इसके बाद उसे साउंड सेंसेशन्स महसूस हुए. ऐसा लगा कि उसके सिर पर कोई बहुत बड़ा बोझ लाद दिया गया हो. तब से ही उसके सिर में तेज़ दर्द बना हुआ है और चक्कर भी आ रहे हैं.

CIA को पता था कि क्यूबन इंटेलिज़ेंस के लोग हवाना स्थित अमेरिकी दूतावास में काम करने वाले अमेरिकन्स पर लगातार नज़र रख रहे हैं. क्यूबन इंटेलिज़ेंस के जासूस कई बार अमेरिकन स्टाफ़ के खाली घरों में सेंधमारी भी करते थे. ज़्यादातर बार क्यूबन जासूस इन सेंधमारियों का कोई सबूत नहीं छोड़ते. मगर कभी-कभी वो जान-बूझकर अपने निशान छोड़ जाते. ऐसा करके वो अमेरिकियों को संदेश देना चाहते थे कि उन पर नज़र रखी जा रही है. अमेरिकी स्टाफ़ को पता था कि क्यूबन जासूस भले उन्हें कितना भी तंग करें, मगर शारीरिक क्षति पहुंचाने की कोशिश नहीं करेंगे.

Cuba
क्यूबा स्थित अमेरिकी दूतावास.

क्यूबन इंटेलिजेंस पर पहला शक

ऐसे में 30 दिसंबर, 2016 को CIA का वो अफ़सर जब अजीब से साउंड सेंसेशन की शिकायत लेकर हेल्थ ऑफ़िस पहुंचा, तो ऐम्बैसी अथॉरिटीज़ चौंक गए. उन्हें पहला शक़ क्यूबन इंटेलिज़ेंस पर ही हुआ. ऐम्बैसी को लगा, हो-न-हो, पक्का उन्होंने ही कुछ किया है. उन्होंने अपने सीनियर्स को जानकारी दी. चूंकि ये अपनी तरह का पहला मामला था और घटना ठीक से समझ भी नहीं आ रही थी, इसीलिए सीनियर्स ने इसपर चुप्पी बनाए रखी.

मगर फिर जनवरी 2017 के पहले हफ़्ते में एक और CIA ऑफ़िसर ऐसी ही शिकायत लेकर आया. अगले महीने दो और अधिकारियों ने अपने साथ हुई ऐसी ही घटना रिपोर्ट की. धीरे-धीरे ऐसी हालत हो गई कि ऐम्बैसी स्थित CIA स्टेशन का बमुश्किल ही कोई स्टाफ़ इससे बचा रहा. पीड़ित अधिकारियों को चक्कर आने, हरदम थकान महसूस होने, सिर दर्द और घबराहट जैसे लक्षण थे.

उनका कहना था कि उन्हें ऐसा महसूस होता है, मानो किसी ने उनके सिर पर बमबारी कर दी हो. उन्हें अपने सिर पर असहनीय दबाव महसूस होता है. पीड़ितों का कहना था कि इस अजीबोगरीब घटना के समय उन्हें बहुत ज़ोर की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं. वो आवाज़ें जैसे उनका पीछा कर रही हों. लेकिन जब उन्होंने घर का बाहरी दरवाज़ा खोलकर देखा, तो आवाज़ें रुक गईं. कुछ पीड़ितों का कहना था कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वो एक अजीब सी अदृश्य एनर्जी के केंद्र में खड़े हों.

कई पीड़ितों को गंभीर दिक्कतें भी हो रही थीं. मसलन, वो पांच मिनट पहले की बात याद नहीं रख पाते थे. उन्हें चीजों के प्रति रीस्पॉन्ड करने में दिक्कत होती थी. उनकी ज्ञानेन्द्रियां ठीक से काम नहीं कर रही थीं. कुछ लोग तो इतनी तकलीफ़ में थे कि अपनी ड्यूटी नहीं कर पा रहे थे. उन्हें ऐक्टिव सर्विस छोड़नी पड़ी थी. मगर इन सबकी जड़ में क्या है, इस बात का पता एक्सपर्ट्स और डॉक्टर्स भी नहीं लगा पा रहे थे.

हमला रहस्यमय क्यों?

सबसे हैरानी की बात ये थी कि पीड़ितों में ब्रेन इंज़री का तो पता चल रहा था. मगर इस इंज़री के निशान नहीं थे. मतलब चोट लगी तो थी, चोट का असर भी हुआ था, मगर चोट का कोई निशान नहीं था. ज़्यादातर पीड़ितों के साथ ये वारदात तब हुई, जब वो अपने घर पर थे. वो भी ख़ास रात के समय. मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जो हवाना के किसी होटल में ठहरे थे और वहीं पर उनके साथ ये घटना हुई. शुरुआती पीड़ित ख़ासतौर पर CIA एजेंट्स थे. लेकिन बाद के दिनों में डिप्लोमैट्स के साथ भी ये हुआ. माना गया कि ये डिप्लोमैट्स शायद CIA जासूस होने की ग़लतफ़हमी में टारगेट किए गए हैं.

अमेरिकन्स जानते थे कि कुछ ग़लत हो रहा है. मगर ये ग़लत क्या था, इसका इल्म उन्हें नहीं था. उन्हें पता था कि प्रभावित कर्मियों पर किसी ख़ास चीज से अटैक किया गया है. मगर किस चीज से, ये जानकारी नहीं थी. ऐम्बैसी स्थित CIA के स्टेशन चीफ़ चाहते थे कि इस मामले पर क्यूबन्स से सवाल किया जाना चाहिए. मगर CIA और स्टेट डिपार्टमेंट इसके लिए राज़ी नहीं था.

वियना कन्वेंशन का सहारा

बाद में जब मामले बढ़ने लगे, तब CIA और विदेश विभाग को लगा कि इसे और अनदेखा नहीं किया जा सकता. उन्होंने क्यूबन्स को कन्फ्रंट करने की हरी झंडी दे दी. मगर अमेरिका क्या कहकर क्यूबा से कन्फ्रंट करता? उनके पास इन घटनाओं के पीछे क्यूबा का हाथ होने का कोई सबूत नहीं था. ऐसे में अमेरिका ने सहारा लिया, वियना कन्वेंशन का. इसके तहत होस्ट देश पर जिम्मेदारी होती है कि वो अपने यहां स्थित विदेशी दूतावासों को सुरक्षा दे. वहां काम करने वाले ऐम्बैसी स्टाफ़ को भी सिक्यॉरिटी दे.

Cia
CIA के स्टेशन चीफ़ चाहते थे कि इस मामले पर क्यूबन्स से सवाल किया जाना चाहिए. मगर CIA और स्टेट डिपार्टमेंट इसके लिए राज़ी नहीं था.

हवाना स्थित अमेरिकी दूतावास के तत्कालीन चीफ़ ऑफ़ मिशन थे, जेफ़री डीलॉरेंटिस. उन्होंने फरवरी 2017 में ये मसला क्यूबन विदेश मंत्रालय के आगे रखा. मगर क्यूबन विदेश मंत्रालय का कहना था कि वो तो अमेरिकी डिप्लोमैट्स को फुल सिक्यॉरिटी दे रहे हैं. जल्द ही ये बात क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो तक भी पहुंची. उन्होंने ऐम्बैसी अथॉरिटीज़ से कहा कि इन घटनाओं के पीछे क्यूबा का हाथ नहीं है. राउल ने कहा कि इन रहस्यमय घटनाओं की पहेली सुलझाने के लिए ज़रूरी है कि अमेरिका घटना से जुड़े और ब्योरे मुहैया कराए.

अमेरिकी साइड को भी ये लग रहा था कि इन रहस्यमय हमलों के पीछे राउल का हाथ नहीं हो सकता. क्योंकि राउल की ही पहल पर अमेरिका और क्यूबा के बीच रिश्ते बहाल हुए थे. अमेरिकी स्टाफ़ पर हमले करवाने का मतलब था इस रिश्ते को गंवाना. राउल ये कतई नहीं चाहते थे. ऐसे में ये मानना कि वो अमेरिकी दूतावास कर्मियों पर अटैक करवाएं, तार्किक नहीं था. लेकिन सवाल था कि अगर इसके पीछे क्यूबन गवर्नमेंट का हाथ नहीं था, तो किसका था?

कौन ज़िम्मेदार?

इस सवाल के दो तात्कालिक जवाब थे. पहला ये कि इन रहस्यमय हमलों के पीछे क्यूबन हार्डलाइनर्स का हाथ था. ऐसे कट्टरपंथी, जो अमेरिका से रिश्ते जोड़ने के विरोधी थे. आशंका थी कि इन हार्डलाइनर्स ने अपनी ही सरकार को अंधेरे में रखकर ऐम्बैसी में पोस्टेड CIA एजेंट्स को टारगेट किया. आशंका ये भी थी कि मुमकिन है, इन हार्डलाइनर्स ने किसी विदेशी ताकत की मदद ली हो. उसी विदेशी ताकत ने उन्हें कोई ख़ास तरह की टेक्नॉलज़ी मुहैया कराई हो. जिसके सहारे वो ये मिस्टीरियस हमले करते हों. दूसरी आशंका ये थी कि इन हमलों के पीछे क्यूबन इंटेलिज़ेंस का हाथ हो. वो किसी नए किस्म के खुफ़िया उपकरण के सहारे अमेरिकी ख़ुफिया एजेंट्स और डिप्लोमैट्स को हरैस कर रहे हों.

CIA को ये भी आशंका थी कि इन सबके पीछे रूस का भी हाथ हो सकता है. शुबहा था कि रूस शायद कोई सीक्रेट वेपन प्रोग्राम चला रहा है. कोई ऐसा हैरतअंगेज़ हथियार, जिसकी टेक्नॉलज़ी अभी अमेरिका को भी नहीं मालूम. ना ही जिसकी पहेली एक्सपर्ट्स भेद पा रहे हैं. मगर रूस के पास ऐसा करने का कोई मोटिव था क्या? जवाब है, हां. रूस नहीं चाहता था कि क्यूबा और अमेरिका के रिश्ते सुधरें. ऐसे में अगर वो अमेरिका के ऐम्बैसी स्टाफ़ और CIA एजेंट्स को टारगेट करता, तो सारा दोष क्यूबन सरकार पर जाता. क्यूबा और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ जाता. मगर दिक्कत ये थी कि CIA को बहुत मेहनत करने के बाद भी इस घटना में रूसी हाथ होने का कोई साक्ष्य नहीं मिला.

मिला ‘हवाना सिंड्रोम’ का नाम

यानी, लाख जांच-पड़ताल के बाद भी सबूत के नाम पर अमेरिका के हाथ खाली थे. उसे ये तक पता नहीं था कि इस हमले को क्या कहकर पुकारा जाए. शुरुआत में तो अमेरिकन्स इसे ‘द थिंग’ कहकर पुकारते रहे. फिर कुछ ने इसे ‘इमैक्युलेट कनकशन’ नाम दिया. मगर इसके लिए जो टर्म पॉपुलर हुआ, वो था- हवाना सिंड्रोम.

क्यूबन राष्ट्रपति राउल कास्त्रो और उनका बेटा अलेज़ांड्रो इस प्रकरण से अपना नाम छुड़ाना चाहते थे. उन्होंने जांच में सहयोग की पेशकश की. CIA इसके लिए राज़ी नहीं था. उसका कहना था कि वो स्वतंत्र जांच करेगा. CIA को लगता था कि अगर क्यूबा के साथ मिलकर कोई जांच की, तो कई जानकारियां साझा करनी होंगी. बाद में क्यूबा इन जानकारियों का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ़ कर सकता है.

कोऑपरेट करने में CIA की अनिच्छा के चलते इस मामले की जांच का जिम्मा FBI को दिया गया. एजेंसी ने इस जांच को गोपनीय रखा. इसलिए कि अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी कि इस प्रकरण की ख़बर बाहर आए. क्योंकि ऐसा होने पर पब्लिक प्रेशर बन जाता. मगर जल्द ही किसी इनसाइडर ने ये बात लीक कर दी. उसने अमेरिकी सेनेटर मार्को रुबियो को इसके बारे में सूचित किया. रूबियो ने कहा, ये ग़लत हुआ है. हमारे नागरिक सरकारी ड्यूटी पर विदेश जाते हैं. उनकी हिफाज़त में चूक होना, उनपर ड्यूटी के दौरान हमला होना, बहुत गंभीर मुद्दा है.

जब बात आई सामने

जल्द ही ये बात अमेरिकी मीडिया में भी लीक हो गई. मगर तब भी स्टेट डिपार्टमेंट इसे डाउनप्ले करता रहा. इसपर संभल-संभलकर बयान दिए जाते रहे. मगर फिर ये सावधानी भी तज दी गई. तब अमेरिका में सेक्रेटरी ऑफ़ फॉरेन अफ़ेयर्स थे, रेक्स टिलरसन. अगस्त 2017 में उन्होंने टीवी पर कह दिया कि अमेरिकन्स पर ‘हेल्थ अटैक्स’ हुए हैं. इसी महीने स्टेट डिपार्टमेंट का भी स्पष्ट बयान आया. इस बयान में हवाना सिंड्रोम की जानकारी दी गई थी. बताया गया था कि हवाना में पोस्टेड 21 अमेरिकियों पर ख़ास तरह के अटैक्स हुए हैं. साथ ही, स्टेट डिपार्टमेंट ने सख़्त रवैया दिखाने के लिए वॉशिंगटन स्थित क्यूबन दूतावास के 15 अधिकारियों को भी वतन लौट जाने का निर्देश दिया.

कुछ दिनों बाद पता चला कि क्यूबा में पोस्टेड एक कैनेडियन डिप्लोमैट और उनके परिवार के साथ भी इसी तरह की घटना हुई है. ये डिप्लोमैट अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ घर में सो रहे थे. देर रात अचानक उनकी नींद खुली. इन सबको सिर पर बेहद तेज़ प्रेशर महसूस हुआ. दोनों बच्चों की नाक से खून निकलने लगा. पता चला कि कनाडा के 12 डिप्लोमैट्स के साथ ऐसी घटनाएं हुई थीं.

2017 ख़त्म होते-होते अमेरिका ने इस मामले में चीन का नाम लिया. अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि राउल कास्त्रो ने इन घटनाओं के पीछे चीन का हाथ होने की आशंका जताई है. मगर क्यूबन गवर्नमेंट ने इस बात से इनकार किया. चीन वाला ये ऐंगल इस वक़्त भले दब गया हो, मगर इसने कुछ महीनों बाद फिर सिर उठाया.

चीन में एक शहर है, ग्वैंगज़ो. यहां अमेरिका का एक वाणिज्यिक दूतावास था. यहां पोस्टेड अमेरिकी स्टाफ्स में से एक थीं, कैथरीन वर्नर. मार्च 2018 में एक रात कैथरीन के साथ भी यही हादसा हुआ. तकलीफ़ बनी रही, तो कैथरीन ने ऐम्बैसी को जानकारी दी. उन्होंने कैथरीन को यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेन्सिलवीनिया भेजा. यहां हुई विस्तृत जांच में पता चला कि हवाना के स्टाफ़ और कैथरीन के साथ हुई घटना एक जैसी हैं. इस जानकारी के बाद अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने चीन में पोस्टेड अपने करीब 300 कर्मियों की जांच करवाई. इनमें से 15 लोग ऐसे थे, जो उस रहस्यमय हमले के पीड़ित मिले.

साढ़े 4 साल का हासिल?

हवाना सिंड्रोम के शुरुआती केस को अब साढ़े चार साल बीत चुके हैं. इस बीच रशिया, पोलैंड, जॉर्जिया और ताइवान से भी डिप्लोमैट्स और ख़ुफिया कर्मियों पर ये रहस्यमय हमले होने की ख़बर आई है. अभी जुलाई 2021 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना से भी ऐसी ही ख़बर आई. पता चला कि जनवरी 2021 से जुलाई 2021 के बीच यहां पोस्टेड दो दर्जन से ज़्यादा अमेरिकी स्टाफ़ ने हवाना सिंड्रोम जैसी ही शिकायत की है. इन पीड़ितों में CIA के एजेंट्स, अधिकारी, डिप्लोमैट्स और बाकी दूतावास कर्मचारी शामिल हैं.

इस मामले पर 19 जुलाई को ऑस्ट्रिया का बयान भी आया. यहां फे़डरल मिनिस्ट्री ऑफ़ यूरोपियन ऐंड इंटरनैशनल अफ़ेयर्स ने स्टेटमेंट जारी किया. इसमें बताया गया कि ऑस्ट्रियन अथॉरिटीज़ इस मामले को गंभीरता से ले रही हैं और इसकी जांच कर रही हैं.

वियना में दो दर्ज़न से ज़्यादा US स्टाफ़ पर मिस्टीरियस हमला होना बड़ी ख़बर है. हवाना में हुई घटनाओं के बाद ये संख्या सबसे ज़्यादा है. अमेरिका के लिए सबसे बड़ी झेंप ये है कि साढ़े चार साल बाद भी उनके पास कोई ठोस जानकारी नहीं है. वो ये तक नहीं पता कर पाए हैं कि ये हमला होता किस चीज से है.

इसीलिए अब CIA ने इस पहेली को सुलझाने पर ध्यान केंद्रित किया है. बीते रोज़ इस मुद्दे पर CIA के डायरेक्टर विलियम बर्न्स का बयान आया. नैशनल पब्लिक रेडियो को दिए एक इंटरव्यू में बर्न्स ने पीड़ितों की संख्या बताई. उन्होंने कहा कि 2016 से अब तक 200 से ज़्यादा अमेरिकी ऑफ़िशियल्स और उनके परिवार के सदस्य हवाना सिंड्रोम के शिकार हो चुके हैं. इनमें से आधे लोग CIA से जुड़े हैं. इसीलिए अब CIA इस हवाना सिंड्रोम की पहेली को डीकोड करने का जतन बढ़ा रही है. इस मामले की जांच के लिए एक ख़ास टास्कफ़ोर्स का गठन किया है. इसमें शामिल मेडिकल एक्सपर्ट्स की संख्या भी पहले से तीन गुना बढ़ा दी गई है. इस टास्कफ़ोर्स की कमान CIA के उस अधिकारी को सौंपी गई है, जिसने इससे पहले लादेन को खोज निकालने वाली टीम का नेतृत्व किया था.

बर्न्स ने अपने इंटरव्यू में कुछ और चीजें भी कहीं. उन्होंने कहा कि अमेरिका की नैशनल अकैडमी ऑफ़ साइंसेज़ पैनल ने दिसंबर 2020 में अपनी रिपोर्ट दी थी. इसमें बताया गया कि हवाना सिंड्रोम के पीछे शायद किसी क़िस्म की डायरेक्ट एनर्जी का हाथ है. बर्न्स ने ये भी कहा कि इन हमलों के पीछे रशिया का हाथ होने की मज़बूत आशंका है.

रशिया पर उठाई गई उंगली सही है या नहीं, ये तो जांच पूरी होने पर पता चल सकेगा. हालांकि जांच से कुछ हासिल होगा भी कि नहीं, अभी कुछ पक्के से नहीं कहा जा सकता.


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