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हैप्पी हाइपोक्सियाः कोरोना के युवा मरीजों का साइलेंट किलर

कोरोना की पिछली लहर और इस बार की लहर में एक बहुत बड़ा अंतर देखा गया है. इस बार युवा भारी संख्या में इसके शिकार हो रहे हैं. इनमें भी हैप्पी हाइपोक्सिया के मामलों ने डॉक्टरों की परेशानी बढ़ाई है. कोरोना के बहुत कम लक्षण या बिना लक्षण वाले युवा मरीजों में ऑक्सीजन का लेवल अचानक तेजी से गिरता है. डॉक्टर जबतक कुछ समझ पाते हैं मरीज की मौत हो जाती है. कारण, मल्टीऑर्गन फेलियर. आखिर क्या है ये खतरनाक ‘साइलेंट हाइपोक्सिया’ या ‘हैप्पी हाइपोक्सिया (Happy Hypoxia)’. क्या इससे बचने का कोई तरीका है? आइए जानते हैं तफ्सील से.

सबसे पहले जानिए हाइपोक्सिया क्या है?

कोरोना इंफेक्शन के बाद दुनियाभर के कई मरीजों में एक खास तरह का लक्षण देखा गया. मरीज का ब्लड ऑक्सीजन का लेवल काफी नीचे (70-80) है, लेकिन मरीज को सांस लेने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है. मरीज एक दम सामान्य है. हालांकि शरीर में ऑक्सीजन की कमी लगातार मरीज को नुकसान पहुंचा रही है. दुनियाभर के डॉक्टर इस लक्षण को गंभीरता से लेने की सलाह दे रहे हैं.

आसान भाषा में कहें तो हाइपोक्सिया खून और शरीर की कोशिकाओं में ऑक्सीजन की कमी की स्थिति को कहते हैं. कई बार इससे पूरे शरीर पर असर पड़ सकता है या शरीर के किसी खास हिस्से पर. अमेरिकी नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन मायो क्लीनिक के अनुसार

शरीर की धमनियों में नॉर्मल ऑक्सीजन का स्तर 75 से 100 मिलीमीटर मरकरी (mm Hg) के बीच रहता है. नॉर्मल पल्स ऑक्सीमीटर पर अक्सर 95 से 100 के बीच की रीडिंग सामान्य मानी जाती है. ऑक्सीमीटर की रीडिंग 90 से नीचे होने पर इसे चिंताजनक माना जाता है. ऐसा होने के बाद इंसान को थकान, कंफ्यूजन, मानसिक दिक्कतें आना शुरू हो जाती हैं. इसकी वजह है ऑक्सीजन का भरपूर तरीके से ब्रेन में न पहुंच पाना. ऑक्सीजन लेवल के 80 से नीचे आने पर शरीर के दूसरे अंगों जैसे किडनी, हार्ट, लीवर आदि पर भी असर पड़ना शुरू हो जाता है.

इसे ऐसे समझिए. जब हम सांस लेते हैं तो खून के साथ ऑक्सीजन शरीर के कोने-कोने में पहुंच जाती है. ऑक्सीजन को खून में पहुंचाने का काम फेफड़ों से शुरू होता है. फेफड़े के ऊपर महीन ब्लड वेसल्स यानी रक्त वाहिनियों का जाल होता है. यह एक नेट की तरह होता है. जब हम सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन फेफड़ों में जाती है. इस ऑक्सीजन को ही उन रक्त वाहिनियों में एक खास प्रक्रिया द्वारा सोख लिया जाता है. उसके बाद ऑक्सीजन खून के साथ शरीर के हर अंग में पहुंच जाती है.

कोरोना का इंफेक्शन होने पर फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है और भरपूर ऑक्सीजन रक्त में घुल नहीं पाती. इससे शरीर के दूसरे अंग ऑक्सीजन के अभाव में काम करना बंद कर देते हैं. हाइपोक्सिया की स्थिति अक्सर पर्वतारोहियों में देखी जाती है. ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन की वजह से यह स्थिति पैदा होती है. हालांकि हैप्पी हाइपोक्सिया वाले कोरोना मरीजों की स्थिति पर्वतारोहियों से अलग होती है. उन्हें सांस लेने में भी कोई दिक्कत भी महसूस नहीं होती.

जब-जब अस्थमा का अटैक होता है, तब सांस की नली, जो ऑक्सीजन को फेफड़ों तक ले जाती है, वो सिकुड़ जाती है.
हाइपोक्सिया की दिक्कत होने पर मरीज में लक्षण देखे जाते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी हैप्पी हाइपोक्सिया के मरीज में नहीं दिखता. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हैप्पी या साइलेंट हाइपोक्सिया क्या है?

न्यू यॉर्क टाइम्स में अमेरिकी डॉक्टर रिचर्ड लेविटान ने हैप्पी हाइपोक्सिया के शुरुआती मरीजों के साथ अपने अनुभवों को एक संपादकीय में लिखा था. उनके अनुसार

गंभीर कोरोना मरीजों में साइलेंट हाइपोक्सिया की स्थिति देखी गई है. इसमें मरीजों का ऑक्सीजन लेवल तेजी से गिरता है लेकिन आम मरीजों की तरह इसे महसूस नहीं किया जा सकता. साइलेंट या हैप्पी हाइपोक्सिया की स्थिति में मरीज किसी भी तरह की परेशानी में नजर नहीं आता. कई मरीजों में देखने को मिला है कि उनका ऑक्सीजन लेवल 80 से भी नीचे है लेकिन वह सामान्य नजर आते हैं.

एम्स में मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का यह भी कहना है कि इमरजेंसी वॉर्ड में जिन मरीजों का ऑक्सीजन लेवल 70 से 80 के बीच है, वो भी काफी गंभीर नजर आते हैं. जबकि हैप्पी हाइपोक्सिया के मरीज का ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल 50 होने पर भी वह आराम से बैठा और मोबाइल फोन पर बातचीत करता नजर आता है. ऐसे मरीजों में सांस फूलने की स्थिति भी नहीं आती है. ऐसे में अंगों के फेल हो जाने की खतरनाक स्थिति बनती है. इसे एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (Acute Respiratory Distress Syndrome) या ARDS कहा जाता है.

युवाओं में ही ऐसा होता क्यों है?

इस पर पुख्ता रिसर्च चल रही है. लेकिन कुछ सामान्य बातें हैं जो देखने को मिली हैं. इन्हें ही युवाओं में हैप्पी हाइपोक्सिया का कारण बताया जा रहा है.

# युवाओं की इम्युनिटी मजबूत होती है. उनकी एनर्जी भी दूसरों के मुकाबले ज्यादा होती है. इस वजह से उनकी बर्दाश्त करने की क्षमता भी बुजुर्गों से ज्यादा होती है. अगर उम्र ज्यादा है तो ऑक्सीजन सेचुरेशन का 94% से 90% होना भी महसूस होता है. इसके उलट युवाओं को 80% ऑक्सीजन सेचुरेशन पर भी लक्षण महसूस नहीं होते. वे कुछ हद तक हाइपोक्सिया को बर्दाश्त कर जाते हैं.

# कोरोना 85% लोगों में माइल्ड, 15% में मॉडरेट और 2% में जानलेवा हो रहा है. युवाओ में ज्यादातर माइल्ड लक्षण ही देखा जाते हैं. इसलिए वह अस्पतालों में भर्ती करने में देरी करते हैं. चूंकि किसी भी तरह का शारीरिक लक्षण नहीं दिख रहा होता तो कई बार डॉक्टर के पास पहुंचने से पहले ही केस काफी बिगड़ जाता है.

किया क्या जाए?

सीनियर फिजीशियन डॉक्टर अनिल बंसल के मुताबिक

कोरोना मरीजों को पल्स ऑक्सीमीटर पर लगातार अपनी ऑक्सीजन जांचें. हैप्पी हाइपोक्सिया में होठों का रंग बदलने लगता है. वह हल्का नीला होने लगता है. त्वचा भी लाल/बैंगनी होने लगती है. गर्मी में न होने या कसरत न करने के बाद भी लगातार पसीना आता है. यह खून में ऑक्सीजन कम होने के लक्षण हैं. लक्षणों पर नजर रखते हुए, जरूरत पड़ने पर तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए.

कोरोना की पहली लहर से ही लगातार पेशेंट्स पर नजर रखने वाले डॉक्टर विपिन वशिष्ठ कहते हैं

कोरोना मरीज को दिन में कई बार अपना ऑक्सीजन लेवल चेक करना चाहिए. अक्सर युवा और कम लक्षण वाले ऐसा नहीं करते. ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल के 94 फीसदी से नीचे आने को खतरे की निशानी मानें. युवा और कम लक्षण वाले मरीज कई बार कम ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल में भी खुद को आराम में महसूस करता है. इससे हैप्पी हाइपोक्सिया की स्थिति बन सकती है. इसके अलावा खुद से ली गई दवाएं भी मुश्किल बढ़ा सकती हैं. मिसाल के तौर पर कुछ मरीज बीमार होने के कुछ दिन के भीतर ही बिना डॉक्टर की सलाह लिए ओरल स्टेरॉयड्स लेना शुरू कर देते हैं. ऐसे में शरीर का नेचुरल रेस्पॉन्स घट जाता है. आपका शरीर आपको अलर्ट करने के लिए जो लक्षण देता है, दवाइयों के असर की वजह से आप उन्हें जान ही नहीं पाते.

सभी एक्सपर्ट्स और डॉक्टर इस बात को लेकर एकमत हैं कि कम या मॉडरेट लक्षण वाले कोरोना मरीजों को भी उतना ही अलर्ट रहने की जरूरत है जितना गंभीर स्थिति वालों को. जितने दिन कोरोना पॉजिटिव रहें ऑक्सीमटर से लगातार ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल की जांच करते रहें. इसके अलावा बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी दवा को लेने से बचें.


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