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सरकार को चपत लगाने और सुरक्षा एजेंसियों की घंटी बजाने वाले फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज काम कैसे करते हैं?

7 फरवरी 2021- पुरानी दिल्ली का चावड़ी बाजार इलाका. पुलिस ने हौजकाजी थाने के चावड़ी बाजार इलाके में चल रहे एक फर्जी अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन एक्सचेंज का पर्दाफाश किया. विदेश से आने-जाने वाली दो लाख से ज्यादा कॉल्स यहां रोज मैनेज होती थीं. इससे सरकार को लगती थी करोड़ों की चपत. एक्सचेंज का मालिक जुल्फिकार गिरफ्तार.

27 मई 2021- दिल्ली-एनसीआर का शहर नोएडा. अवैध टेलीकॉम एक्सचेंज चलाने वाला ओवैस आलम पुलिस की गिरफ्त में आया. मास्टरमाइंड ओवेस ने सेक्टर-62 के आइथम टावर, सेक्टर-63 और मुरादाबाद में अपने घर से फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज के नेटवर्क को चला रहा था. हर दिन में सरकार को 25 से 30 लाख रुपये की लगती थी चपत.

7 जुलाई 2021- नई दिल्ली में संसद भवन और लाल किले के आसपास का इलाका. सुरक्षा एजेंसिएयों ने किया अवैध ‘टेलीफोन एक्सचेंज’ का भंडाफोड़. राजधानी दिल्ली में चलाए जा रहे इस अवैध ‘टेलीफोन एक्सचेंज’ से सरकार के रेवेन्यू को होता था भारी नुकसान. इस अवैध टेलीफोन एक्सचेंज की मदद से खुफिया एजेंसियों को चकमा भी दिया जाता था.


ये तीन खबरें तो सिर्फ इस साल की हैं. अगर आप गूगल करेंगे तो आपको ‘फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज’ से जुड़ी कई खबरें मिल जाएंगी. आज हम आपको बताएंगे कि आखिर क्या हैं ये फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज और क्यों ये देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं.

पहले ‘टेलीफोन एक्सचेंज’ का सिस्टम समझिए?

साल 2019 में एक मूवी आई थी ‘द वास्ट ऑफ नाइट’ (The Vast of Night). ये साइंस फिक्शन थ्रिलर एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है. कहानी सन 1950 की है, जिसमें एक्ट्रेस सिएरा मैकॉर्मिक ने एक डैशबोर्ड टेलीफोन ऑपरेटर का किरदार निभाया है. लोगों के फोन कनेक्ट करते वक्त उन्हें फोन लाइन पर अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगती है. इसके बाद की पूरी कहानी ही मजेदार है. इस फिल्म को अमेजन प्राइम पर देखा जा सकता है.

अपनी स्टोरी के लिए इस मूवी से एक ही काम की चीज मिलती है. टेलिफोन डैशबोर्ड के काम करने का तरीका. 50 औऱ 60 के दशक में जब किसी को भी फोन करना होता था तो ये काम सीधे मुमकिन नहीं था. पहले ऑपरेटर को फोन करना होता था. वो अपने हाथ से बताए हुए नंबर पर तार का प्लग लगा कर फोन कनेक्ट करता था. इस दौरान वो बातें सुन भी सकता है. भारत की बात की जाए तो 80 के दशक तक कुछ ऐसा ही चला. 90 का दशक तक आते-आते ऑपरेटर का सिस्टम लोकल कॉल के लिए खत्म हुआ. लेकिन लंबी दूरी के लिए ऐसा ही सिस्टम चलता रहा. इसे ट्रंक कॉल कहते थे और इसके लिए ऑपरेटर से बात करके बुकिंग करानी होती थी. जब लाइन खाली होती तो ऑपरेटर बात कराता था. ये कहानी हम इसलिए बता रहे हैं कि आपको पता रहे कि टेलीफोन एक्सचेंज का सिस्टम कैसे आगे बढ़ा.

Changlings Telephone Operator
साल 2008 में एंजलीन जॉली ने मूवी चेंजलिंग एक हेड टेलिफोन ऑपरेटर की भूमिका निभाई थी.

फिर आया कंप्यूटर

कंप्यूटर ने आते ही सब बदल दिया. टेलीफोन एक्सचेंज सिस्टम में इंसानी दखल पूरी तरह से खत्म हो गया. सब काम ऑटोमेटिक तरीके से होने लगा. मतलब आपके इलाके में एक एक्सचेंज था, जहां अपनेआप वो काम होने लगा जो पहले ऑपरेटर करते थे. इंसान का काम कम हुआ और कॉल करना ज्यादा आसान हो गया.

अभी ये सिस्टम पूरी तरह शबाब पर पहुंचा ही था कि इंटरनेट का धमाका हुआ. अभी जहां देशभर को कनेक्ट करना ही मुश्किल हो रहा था वहीं दुनिया एक गांव बन गई. ग्लोबल विलेज का कॉन्सेप्ट आ गया. इंटरनेट के जरिये कहीं से कहीं कॉल करना मुमकिन हो गया. ये सुविधा तो अच्छी थी, लेकिन इससे सरकारी कंपनियों का एकाधिकार खत्म हो रहा था. लोकल और एसटीडी यानी देश भर में फोन का मामला तो पूरी तरह से ही सरकार के हाथ से चला गया.

लेकिन विदेशों में कॉल करना और रिसीव करना अब भी सरकारी के जिम्मे ही था. ऐसा होना जरूरी भी था, क्योंकि इससे नेशनल सिक्यॉरिटी का मामला भी जुड़ा था. ये साल 2000 के आसपास का दौर था. विदेशों से आने वाले कॉल को लेकर टेलीकॉम ऑपरेटर निश्चित कर दिए गए. एक इंटरनेशनल लॉन्ड डिस्टेंस (ILD) पॉलिसी बनाई गई. इस पॉलिसी के तहत कोई भी प्राइवेट कंपनी ILD लाइसेंस लेकर विदेशों से कॉल की सेवा शुरू कर सकती है. इसके लिए एक निश्चित लाइसेंस फीस और हर कॉल पर सरकार को एक निश्चित फीस भरनी पड़ती है.

मतलब ये कि आईएसडी (ISD) कॉल रूट के जरिये जो भी कॉल होगी, उसकी कमाई का एक हिस्सा सरकार को मिलना तय हुआ. इसके अलावा इस रूट से आने वाले कॉल आराम से ट्रेस भी किए जा सकते हैं. इसलिए देश की सुरक्षा के लिहाज से भी ये काफी सेफ था.

अब सोच कर देखिए कि अगर कोई इस पूरे ISD सिस्टम को ही इंटरनेट से जोड़ दे तो क्या होगा? मतलब कॉल सरकार के ISD वाले रूट से न जाकर इंटरनेट वाले रूट से जाए. इससे न तो सरकार को पैसा मिलेगा और न ही इसका अता-पता चलेगा कि किसकी कॉल आई और किसकी गई. बस यहीं से खुलता है फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज का दरवाजा.

फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज से सरकार को कैसे चपत लगती है, इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए आपको कार के जरिये दिल्ली से आगरा जाना है. इसके लिए आप यमुना एक्सप्रेस-वे पकड़ते हैं. तरीका ये है कि आप ग्रेटर नोएडा के आगे पड़ने वाले टोल से एंट्री लें और आगरा के पास पड़ने वाले टोल से बाहर निकल जाएं. इस दौरान आप ग्रेटर नोएडा पर कार के लिए तकरीबन 400 रुपए टोल टैक्स भरते हैं और आगरा में जब बाहर निकलते हैं तो वहां ये सुनिश्चित कर लिया जाता है कि आपने टोल भरा है. अब अगर कोई इन दो टोल नाकों से बचने का रास्ता निकाल ले. वो सिर्फ 200 रुपए लेकर एक्सप्रेस-वे के टोल नाकों से बचाते हुए आगरा पहुंचा दे तो. बस यही काम फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज करते हैं. सरकार की आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय लाइन से न जाकर इंटरनेट के जरिये फोन से बात करवाते हैं.

Std Isd Pco
कंप्यूटराइजड टेलिफोन एक्सचेंज आने के बाद कॉल करना बहुत आसान हो गया. छोटे शहरों और गावों तक टेलिफोन पहुंच गया.

कैसे बनता है फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज?

इसके लिए मुख्य रूप से तीन तरीके के इंस्ट्रमेंट की जरूरत पड़ती है. सिम कार्ड राउटर, एमडीएन पोर्ट और इथरनेट. इनके जरिये ISD कॉल को लोकल कॉल में बदला जा सकता है. मतलब न BSNL को पता चलेगा और VSNL  को कि कॉल कहां से और किसने की है. इन तीनों में एमडीएन पोर्ट और इथरनेट तार वाले इंटरनेट नेटवर्क को सिम कार्ड राउटर से जोड़ने के काम आते हैं. हालांकि सबसे नायाब इंस्ट्रमेंट्स है सिम कार्ड राउटर या ‘सिम बॉक्स’. तीन-चार सिम कार्ड लगाने वाला सिम बॉक्स तो आराम से ऑनलाइन मिल जाएगा. लेकिन सैकड़ों सिम कार्ड लगाने वाले सिम बॉक्स तस्करी के जरिये ही देश में पहुंचते हैं. इन सिम बॉक्स में 100-200 सिम लगाए जाते हैं. ये सभी सिम फर्जी डॉक्युमेंट पर लिए लोकल सिम होते हैं. सिम बॉक्स को इंटरनेट से कनेक्ट कर दिया जाता है.

अब सिम बॉक्स का काम समझिए. ये इंटरनेट के जरिये आने वाली किसी भी कॉल को लोकल कॉल में बदल कर आगे ट्रांसफर कर देता है. अगर किसी को ओमान से बनारस के किसी गांव में मौजूद किसी नंबर पर बात करनी है तो इसका एक तरीका तो ये है कि वो सीधे मोबाइल से नंबर मिलाए और 15 से 20 रुपए प्रति मिनट कॉल रेट के हिसाब से पैसा भरे. ये सरकारी रूट से कानूनी तरीका है. इससे कमाई का एक हिस्सा सरकार के पास जाएगा और दूसरा सर्विस प्रोवाइडर के पास. दूसरा तरीका ये है कि किसी फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज के जरिये फोन किया जाए. इसमें 5 फीसदी से कम रेट पर बात हो जाएगी. मतलब सरकार को लगी पूरी चपत और पूरा पैसा गया फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज वाले की जेब में.

Simbox Router
सिम बॉक्स इंटरनेट से की गई कॉल को किसी सिम पर डायवर्ट करता है. इसमें एक साथ 500 सिम तक लगाए जा सकते हैं.

ये मुमकिन कैसे होता है?

हमने इस बारे में टेलीकॉम डिपार्टमेंट के एक सीनियर आधिकारी से बात की. उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया,

“इसके पीछे वो इंस्ट्रमेंट्स हैं जो फर्जी टेलिफोन एक्सचेंज चलाने वाले इस्तेमाल करते हैं. ये इस्ट्रमेंट खुले मार्केट में उपलब्ध नहीं हैं. ज्यादातर चीन से भारत आते हैं. सब स्मगलिंग और ब्लैक मार्केट के जरिये भारत पहुंचता है. ठगों तक ये आराम से पहुंच रहे हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है? इसे आम क्राइम की तरह नहीं देखना चाहिए. सिम बॉक्स के जरिये कॉल करने वाले की लोकेशन और बातचीत को ट्रेस करना लगभग नामुमकिन है. ऐसे में देश के दुश्मनों के लिए ये वरदान साबित होता है. सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती से ही इस पर लगाम लगेगी.”

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल से जुड़े एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि ये डिपार्टमेंट के लिए सिरदर्द बना हुआ है. उन्होंने हमें बताया,

“हम भारत मे मौजूद उस शख्स तक तो आसानी से पहुंच जाते हैं जिसके पास इंटरनेशनल कॉल आई, लेकिन जिसने इंटरनेशनल कॉल किया उसका पता नहीं लगाया जा सकता. क्योंकि इस कॉल को सुरक्षा एजेंसियां ट्रैक नहीं कर सकतीं. इसे सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा है माना गया है. प्रोफेशनल सिम बॉक्स का इन लोगों के हाथ लगना भी चिंता की बात हैं.”

कैसे काम करता है फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज?

# फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज से कॉल करने के लिए पहले एक मोबाइल ऐप डाउनलोड करना होता है. ये ऐप पहले से प्ले स्टोर पर मौजूद हैं. ऐसा इसलिए कि भारत में भले ही इस तरह के ऐप का इस्तेमाल बैन है लेकिन दुनिया के कई देशों में इन्हें मान्यता मिली हुई है. वैसे तो ऐसे कई ऐप हैं, लेकिन उनमें से एक पॉपुलर ऐप है- टीपी स्मार्ट.

# मोबाइल ऐप टीपी स्मार्ट को विदेश में बैठा कॉलर अपने मोबाइल पर लोड करता था. उसे एक कोड मिलता था. जिसकी जानकारी सभी एक्सचेंज चलाने वालों को होती है.

# विदेश में बैठा यूजर जब भी अपने फोन से इंडिया के किसी नंबर पर कॉल करता था. तो वो कॉल सिम बॉक्स पर आती थी. इंटरनेट से आई कॉल इस मशीन में लगे दर्जनों सिमों के जरिये लोकल कॉल में कंवर्ट हो जाती है. जो फोन रिसीव कर रहा है उसे फोन नंबर लोकल ही दिखाई देगा.

# विदेश में बैठे कॉल करने वाले को प्रति मिनट मात्र 60-70 पैसे ही खर्च करने पड़ते हैं. जबकि उस इंटरनेशनल कॉल के लिए 15-20 रुपए प्रति मिनट के रेट तय हैं.

# फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज चलाने वालों को उनके एक्सचेंज में आई इंटरनेशनल कॉल्स के मुताबिक पेमेंट कर दिया जाता था. इसे अक्सर बड़े शहरों में बैठ कर कुछ लोग ऑपरेट करते हैं और हर फर्जी एक्सचेंज से की गई कॉल के हिसाब से उसे पेमेंट कर देते हैं. कई बार ये पेमेंट हवाला के जरिये भी किए जाते हैं. मतलब विदेश में कोई और डॉलर में पैसे रिसीव करता है और इंडिया में रुपए में पेमेंट कर देता है.


वीडियो – ये कौन सी इंस्टाग्राम स्टोरी है, जिससे इंस्टाग्राम ही बैठ जाता है?

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