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इलॉन मस्क: वो आदमी जो मंगल पर नई दुनिया बसाने निकल पड़ा है

इलॉन मस्क. दुनिया के सबसे अमीर इंसानों में से एक. लेकिन ये आदमी कहीं और दुनिया बसाना चाहता है. इलॉन मस्क इस मकसद के साथ जीते हैं कि उन्हें मंगल ग्रह पर एक इंसानी बस्ती बसानी है. इसी काम के लिए मस्क ने 2002 में स्पेसऐक्स नाम की कंपनी शुरू की. स्पेसऐक्स का उद्देश्य है स्पेस ट्रैवल को सस्ता बनाना. और मनुष्यों को मल्टीप्लानेटरी बनाना. मल्टीप्लानेटरी मतलब एक से ज़्यादा ग्रहों पर रहने वाली प्रजाति.

आज इलॉन मस्क के बड्डे पर आइए जानते हैं कि ये मंगल पर एक ‘सेल्फ सस्टेनिंग कॉलोनी’ क्यों बसाना चाहते हैं. ‘सेल्फ सस्टेनिंग कॉलोनी’ यानी एक आत्मनिर्भर इंसानी बस्ती. जो लंबे वक्त तक पृथ्वी पर निर्भर न हो. बिना किसी बाहरी मदद के अपने आप चल सके.

मंगल पर दुनिया क्यों बसाना चाहते हैं मस्क?

जब इलॉन मस्क से ये पूछा जाता है कि आप पृथ्वी को छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर क्यों बसेरा चाहते हैं? तो वो जवाब देते हैं,

हमारे पास दो रास्ते हैं. पहला रास्ता है कि हम हमेशा पृथ्वी पर रहें. और भविष्य में होने वाली किसी विनाशकारी घटना का इंतज़ार करें. हो सकता है न्यूक्लियर वेपन्स के साथ कोई थर्ड वर्ल्ड वॉर हो जाए. या जैसे एक ऐस्टेरॉइड के टकराने के डायनासौर समाप्त हो गए, वैसे ही हम भी खत्म हो जाएं. इस तरह की किसी भी घटना से हमारी प्रजाति का अस्तित्व खतरे में ही रहेगा. दूसरा रास्ता ये है कि हम इस ग्रह से बाहर निकलकर दूसरे ग्रहों पर भी बस्ती बसाएं. इस तरह मनुष्य अपने विनाश को टाल सकेगा.

पृथ्वी से टकराते ऐस्टेरॉइड से न्यूक्लियर धमाके से भी ज़्यादा ऊर्जा निकल सकती है.
पृथ्वी से टकराते ऐस्टेरॉइड से न्यूक्लियर धमाके से भी ज़्यादा ऊर्जा निकल सकती है.

दूसरा सवाल है कि मंगल ग्रह पर ही क्यों जाना है? कोई और ग्रह क्यों नहीं? इस पर मस्क कहते हैं,

हमारे सौरमंडल में हमारे पास क्या ऑप्शन्स हैं? शुक्र ग्रह यानी वीनस. यहां बहुत ज़्यादा प्रेशर है और ऐसिड की बारिश होती है. मर्करी यानी बुध ग्रह. ये भी सूरज के बहुत पास है. वहां बहुत ही ज़्यादा गर्मी है. वृहस्पति (ज्यूपिटर) और शनि (सैटर्न) के चांदों पर जा सकते हैं. लेकिन वो बहुत दूर हैं. हम अपने पृथ्वी के चांद को भी टार्गेट बना सकते थे. लेकिन ये एक बड़ी बस्ती के हिसाब से बहुत छोटा पड़ जाएगा. और यहां कोई वायुमंडल नहीं है. चांद पर मंगल के मुकाबले संसाधन भी बहुत कम हैं. इसलिए फिलहाल मंगल सबसे अच्छा ऑप्शन है.

मंगल पर क्या माहौल है?

मंगल पृथ्वी के मुकाबले सूरज से दूर है. इसलिए ये बहुत ठंडा है. मंगल पर औसत तापमान -60 डिग्री सेल्सियस होता है. इलॉन मस्क कहते हैं कि ये थोड़ा ठंडा है लेकिन इसे गर्म किया जा सकता है.

मंगल की हवा कैसी है? बहुत ही खराब. मंगल के वातावरण में ज़्यादातर कार्बनडाइऑक्साइड (96 प्रतिशत) है. करीब 2.5 प्रतिशत नाइट्रोजन है. और लगभग 2 प्रतिशत आर्गन. हमारे काम की गैस ऑक्सीजन सिर्फ 0.174 प्रतिशत है.

मंगल को रेड प्लानेट भी कहा जाता है.
मंगल को रेड प्लानेट भी कहा जाता है.

मंगल का डायमीटर (व्यास) पृथ्वी से लगभग आधा है. लेकिन ये पृथ्वी के सबसे करीब वाला साइज़ है. बाकी ग्रह या तो पृथ्वी से बहुत छोटे हैं या बहुत बड़े हैं. मंगल पर ग्रैविटी (गुरुत्वाकर्षण) पृथ्वी के मुकाबले लगभग एक तिहाई है. मतलब आप मंगल पर आसानी से लंबी छलांग मार पाएंगे. मंगल और पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग एक ही स्पीड से घूमते हैं. इसलिए मंगल पर एक दिन पृथ्वी के एक दिन से सिर्फ 40 मिनट बड़ा होता है.

मंगल पर बस्ती बसाने के लिए इलॉन मस्क के पास क्या प्लान है?

सितंबर 2016 में इलॉन मस्क ने अपने प्लान और उसके कई तकनीकी पहलुओं के बारे में विस्तार से बताया था.

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के साथ मस्क.
अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के साथ मस्क.

मंगल पर लाखों लोगों का एक शहर बसाना है. क्या दिक्कत है? दिक्कत है पैसे की. इलॉन मस्क ने एक वेन डायग्राम दिखाया. दो गोले हैं. एक गोले में वो लोग हैं, जो मंगल जाना चाहते हैं. दूसरे गोले में वो हैं, जो इसका खर्च उठा सकते हैं. ये दो गोले बहुत दूर हैं, वो इन्हें पास लाना चाहते हैं. मस्क के मुताबिक, एक आदमी का मंगल जाने का उतना ही पइसा लगना चाहिए, जितना अमेरिका में एक घर खरीदने का औसत खर्च है. 2 लाख डॉलर. लगभग 1.5 करोड़ रुपए. ये खर्च इतना कम कैसे होगा? इलॉन मस्क ने इसके लिए चार सूत्र बताए.

1. फुल रीयूज़ेबिलिटी.

रॉकेट और स्पेसशिप जैसी बड़ी चीज़ें जो इस मिशन में काम आएंगी, उन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सके. आमतौर पर एक स्पेस मिशन में इस्तेमाल होने वाला रॉकेट सिर्फ एक ही बार के लिए होता है. बीते दशक स्पेसऐक्स ने रीयूज़ेबल रॉकेट्स में बहुत तरक्की हासिल की. 2015 में स्पेसऐक्स ने फैल्कन 9 रॉकेट को ऑर्बिटल लॉन्च के बाद दोबारा सही सलामत ज़मीन पर लैंड कराया. इसके कुछ महीने बाद उन्होंने समुद्र में तैनात एक ड्रोनशिप में अपना रॉकेट लैंड कराया. इससे मिशन का खर्च काफी कम हो जाता है. मस्क चाहते हैं कि मिशन की सारी बड़ी चीज़ें रीयूज़ेबल हों.

स्पेसऐक्स के रॉकेट बूस्टर लैंड करते हुए.
स्पेसऐक्स के रॉकेट बूस्टर लैंड करते हुए.

2. रीफिल इन ऑर्बिट.

पृथ्वी की कक्षा में फ्यूल भरना. पहले रॉकेट स्पेसशिप को ले जाकर पृथ्वी की कक्षा में तैनात कर देगा. उसके बाद स्पेसशिप पृथ्वी की परिक्रमा करेगी और रॉकेट नीचे लैंड करने आ जाएगा. फिर इसी रॉकेट के ऊपर एक फ्यूल टैंक लगाया जाएगा. रॉकेट तुरंत इस फ्यूल टैंक को पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रही स्पेसशिप तक ले जाएगा. रॉकेट दोबारा नीचे आ जाएगा. ये टैंकर भी स्पेसशिप में फ्यूल भरने के बाद पृथ्वी पर लौट आएगा.

ऐसा करने से छोटा रॉकेट बनाकर उसमें ज़्यादा सामान और लोग भरे जा सकते हैं. मस्क के मुताबिक, ऐसा करने से मिशन का खर्च करीब पांच गुना कम हो जाएगा.

3. मंगल पर प्रोपेलेंट बनाना.

प्रोपेलेंट यानी वही फ्यूल जिससे रॉकेट उड़ान भरता है. मंगल पर ढंग का शहर बनाने के लिए स्पेसशिप को वापस पृथ्वी पर भेजना होगा. ऐसा नहीं किया तो मंगल स्पेसशिप्स का कबरिस्तान बन जाएगा. और वहां गए लोगों के पास वापस लौटने का ऑप्शन तो होना ही चाहिए. इसके लिए ये ज़रूरी है कि मंगल पर ही प्रोपेलेंट बनाया जाए. मस्क के मुताबिक, ये करने से मिशन का खर्च 5 गुना और कम होगा.

मंगल पर प्रोपेलेंट बनाने के लिए सही माहौल है. मंगल के वायुमंडल में खूब सारी कार्बनडाइऑक्साइड है. और ज़मीन के नीचे से पानी निकाला जा सकता है. यानी CO2 और H2O का जुगाड़ हो गया. इन दोनों की मदद से O2 (ऑक्सीजन) और CH4 (मिथेन) बनाई जा सकती है.

जहां गए हैं, वहीं के संसाधन इस्तेमाल काम में लाने को INSITU रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन कहा जाता है.
जहां गए हैं, वहीं के संसाधन इस्तेमाल काम में लाने को INSITU रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन कहा जाता है.

4. सही प्रोपेलेंट का चुनाव.

रॉकेट फ्यूल के लिए तीन मेन चॉइस हैं. पहला है कैरोसीन. कई रॉकेट्स में बहुत ही रिफाइन्ड कैरोसीन प्रोडक्ट का इस्तेमाल होता है. दूसरा ऑप्शन है हाइड्रोजन फ्यूल. और तीसरा है मीथेन. मस्क के मुताबिक, इन तीनों में से मीथेन आधारित प्रोपेलेंट सबसे सही साबित होगा. और उसे मंगल पर आसानी से बनाया भी जा सकता है.

तो इलॉन मस्क के मुताबिक ये चार बातें ध्यान में रखकर मंगल पर पहुंचने और लौटने का खर्च काफी कम किया जा सकता है.

कब तक हो पाएगा ये सब काम?

अब आप क्रोनोलॉजी समझिए. पहले तो रॉकेट स्पेसशिप को पृथ्वी के ऑर्बिट (कक्षा) में छोड़ेगा. फिर वो रॉकेट दोबारा पृथ्वी पर लैंड करेगा. उसी रॉकेट के ऊपर फ्यूल टैंक रखा जाएगा. रॉकेट इस फ्यूल टैंक को स्पेसशिप के पास लेकर जाएगा. रॉकेट ज़मीन पर वापस लैंड कर जाएगा. फ्यूल टैंक से स्पेसशिप में फ्यूल ट्रांसफर होगा. और फिर वो फ्यूल टैंक भी पृथ्वी पर वापस आ जाएगा. पृथ्वी की कक्षा में ऐसा तीन से पांच बार किया जा सकता है. फिर ये स्पेसशिप मंगल तक जाएगी. मंगल पर प्रोपेलेंट बनाया जाएगा. इस प्रोपेलेंट को स्पेसशिप में दोबारा भरा जाएगा. और ये स्पेसशिप वापस पृथ्वी लौट आएगी.

मस्क के मुताबिक भविष्य में पृथ्वी की कक्षा में एक साथ हज़ारों स्पेसशिप होंगी. ये सभी स्पेसशिप मार्स की तरफ एक साथ जाएंगी. जब मंगल ग्रह अपनी सही पॉज़िशन पर होगा. ये सही पॉज़िशन क्या है?

आत्मनिर्भर मंगल के लिए 2050 तक एक शहर बनाने की बात मस्क ने कही थी.
आत्मनिर्भर मंगल के लिए 2050 तक एक शहर बनाने की बात मस्क ने कही थी.

पृथ्वी और मंगल दोनों अलग-अलग स्पीड से सूर्य की परिक्रमा करते हैं. हर 26 महीने में एक बार ऐसा वक्त आता है जब पृथ्वी से मंगल पर स्पेस मिशन भेजा जा सकता है. इस समय अवधि को लॉन्च विंडो कहते हैं. जब ये लॉन्च विंडो का वक्त नज़दीक आएगा, तभी स्पेसऐक्स का जहाज़ी बेड़ा एक साथ मंगल की ओर निकलेगा.

इलॉन मस्क मंगल पर करीब 10 लाख लोगों का शहर बसाना चाहते हैं. शुरुआत में एक स्पेसशिप 100 लोग और खूब सारा सामान लेकर जाएगी. इस हिसाब से करीब 10,000 बार उड़ान भरनी होगी. इतने सारे लोग पहुंचाने में कितना वक्त लगेगा? मस्क का अनुमान है कि पहले लॉन्च के बाद करीब 40 से 100 साल लग सकते हैं. स्पेसऐक्स भविष्य में और बड़े स्पेसशिप तैयार करेगी. इनसे एक बार में 100 से भी ज़्यादा लोग और सामान मंगल तक भेजा जा सकेगा.

अभी क्या तैयारी है?

इलॉन मस्क का मार्स रॉकेट एक बार में करीब 550 टन का पेलोड उठा पाएगा. लगभग इसी साइज़ का नासा का सैटर्न V रॉकेट है. ये अबतक बनाया गया सबसे बड़ा रॉकेट सिस्टम है. इसी का इस्तेमाल करके नासा ने चांद पर लोगों को उतारा था. सैटर्न V एक बार में 135 टन का पेलोड उठा पाता है. मस्क अपने इतने ही बड़े रॉकेट से 550 टन उठाने का दावा कर रहे हैं.

स्पेसऐक्स ने अपने रॉकेट के लिए खास तरह का इंजन डिज़ाइन किया है. इसका नाम है राप्टर इंजन. जो रॉकेट स्पेसशिप को पृथ्वी की कक्षा में ले जाएगा उसमें 42 राप्टर इंजन लगे होंगे. और जो स्पेसशिप मंगल तक जाएगी, उसमें नौ राप्टर इंजन होंगे.

मंगल पर ऐसे स्टारशिप लैंड करेगा.
मंगल पर ऐसे स्टारशिप लैंड करेगा.

ये बड़े रॉकेट और स्पेसशिप का बहुत आगे का प्लान है. फिलहाल स्पेसऐक्स जिस स्पेसक्राफ्ट को चांद और मंगल पर मिशन के लिए भेज सकता है, उसका नाम है स्टारशिप. साल 2020 में स्टारशिप की कई टेस्ट फ्लाइट हुईं. इनके बाद स्टारशिप की डिज़ाइन में बदलाव किए गए. इसकी कई टेस्ट फ्लाइट होनी और बाकी हैं. यही स्टारशिप आगे चलकर स्पेसऐक्स के पहले मार्स मिशन में काम आएगी.

मंगल पहुंचकर क्या करेंगे?

मंगल पर बस्ती का हुलिया क्या होगा? वहां रहेंगे कैसे? इलॉन मस्क ने इसे लेकर बहुत ज़्यादा डीटेल में बात नहीं की है. शुरुआत से वो मंगल को ‘टेराफॉर्म’ करने की बात कह रहे हैं. टेराफॉर्म करने का मतलब है किसी ग्रह का वातावरण बदलकर उसे मनुष्यों के रहने लायक बनाना. इलॉन मस्क की ट्विटर कवर फोटो में आप मंगल को धीरे-धीरे पृथ्वी जैसे ग्रह में तब्दील होता देख सकते हैं. लेकिन ये कैसे होगा?

मस्क कहते हैं मंगल को बस ज़रा सा गर्म करने की ज़रूरत है. ऐसा करने के लिए इलॉन मस्क मंगल के ध्रुवों पर न्यूक्लियर वेपन चलाने जैसी बात कर चुके हैं. आइडिया ये है कि मंगल के ध्रुवों पर न्यूक्लियर हमले से वहां बर्फ में फंसी कार्बनडाइऑक्साइड वातावरण में छूटेगी. ग्रीनहाउस इफैक्ट देखने को मिलेगा. और मंगल ग्रह गर्म हो जाएगा. अपने इस स्टैंड के लिए मस्क को आलोचना का सामना भी करना पड़ा है.

मंगल पर शहर का स्पेसऐक्स का विज़न.
मंगल पर शहर का स्पेसऐक्स का विज़न.

जब मस्क से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कुछ और बात कही. उन्होंने अपने ट्विटर पर लिखा कि पहले मंगल पर जीवन ग्लास डोम्स के अंदर ही होगा. उसके बाद मंगल को टेराफॉर्म किया जाएगा, जिससे वो पृथ्वी जैसे लाइफ सपोर्ट कर सके.

टाइमलाइन को लेकर इलॉन मस्क हमेशा से बहुत महत्वाकांक्षी रहे हैं. उन्होंने कहा था कि 2022 में पहला स्पेसऐक्स रॉकेट मंगल ग्रह पर जा सकता है. इस रॉकेट में कोई इंसान नहीं होगा, सिर्फ सामान होगा. ये सामान आगे जाने वाले ह्यूमन मिशन्स के लिए मददगार साबित होगा. मस्क ने कहा था कि साल 2050 तक हम मंगल पर एक सेल्फ सस्टेनिंग सिटी देख पाएंगे. ये कब और कैसे होगा, ये हमें भविष्य में ही पता चलेगा.


विडियो – साइंसकारी: जेफ बेज़ोस स्पेस में जा रहे हैं तो स्पेस-एक्स वाले इलॉन मस्क को क्या दिक्कत है?

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