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डिप्लोमेटिक इम्युनिटी क्या होती है, जिसकी वजह से पाक जासूसों पर भारत कोई कार्रवाई नहीं कर पाया

दिल्ली स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन से पिछले हफ्ते दो अधिकारियों को पकड़ा गया. दोनों भारत में रहकर जासूसी कर रहे थे. नाम- आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन. दोनों को 24 घंटे के भीतर वापस पाकिस्तान भेज दिया गया. डिपोर्ट कर दिया गया. लेकिन दोनों पर भारत में कोई कार्रवाई नहीं की गई. क्यों? जबकि इसी तरह के जासूसी के ही आरोप में जब कुलभूषण जाधव पाकिस्तान में पकड़े गए थे, तो उन्हें फांसी तक की सज़ा सुना दी गई थी.

वजह- हाई कमीशन के अधिकारी होने के नाते आबिद और ताहिर को डिप्लोमेटिक इम्युनिटी हासिल थी. इसलिए इन पर भारत में कोई केस नहीं चल सकता था. इस डिप्लोमेटिक इम्युनिटी को समझते हैं कि ये होती क्या है?

# पहले बेसिक बात

पहले हम जल्दी-जल्दी से तीन टर्म के बारे में समझ लेते हैं, फिर समझेंगे कि दूसरे देश के डिप्लोमेट पर एक्शन लेना मुश्किल क्यों होता है.

कॉमनवेल्थ देश

दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जो इतिहास में कभी न कभी इंग्लैंड के उपनिवेश रहे हैं. या आसान शब्दों में कहें, तो जहां इंग्लैंड ने कभी न कभी राज किया है. भारत भी उनमें से एक है. इन देशों को ‘कॉमनवेल्थ देश’ कहते हैं.

तभी आपने वो कॉमनवेल्थ गेम्स का नाम सुना होगा न! कभी न कभी इंग्लैंड के अधीन रहे इन्हीं कॉमनवेल्थ देशों के बीच जो स्पोर्ट्स इवेंट होता है, उसे ‘कॉमनवेल्थ गेम्स’ कहते हैं.

हाई कमीशन

हर कॉमनवेल्थ देश का दूसरे कॉमनवेल्थ देश में एक सरकारी दफ्तर बना है, जिसे ‘हाई कमीशन’ कहते हैं. जैसे- भारत और पाकिस्तान, दोनों कॉमनवेल्थ देश हैं. इसी नाते भारत का पाकिस्तान में हाई कमीशन है और पाकिस्तान का भारत में. हाई-कमीशन में रहते हैं उस देश के डिप्लोमेट्स या हिन्दी में बोलें तो राजनयिक. जैसे पाक का भारत में हाई-कमीशन है और यहां पाक के कुछ डिप्लोमेट्स रहते हैं.

अच्छा एक बात और बताते चलें. अगर एक देश कॉमनवेल्थ और और दूसरा नॉन-कॉमनवेल्थ, तो फिर इसे हाई-कमीशन नहीं कहेंगे. इसे ‘एंबेसी’ (Embassy) कहेंगे. जैसे- भारत कॉमनवेल्थ है, अमेरिका नहीं है. इसलिए चाहे भारत के अमेरिका में दफ्तर की बात हो, या अमेरिका के भारत में दफ्तर की..दोनों को एंबेसी कहेंगे, हाई-कमीशन नहीं.

विएना संधि

हाई-कमीशन और एंबेसी की पूरी फंक्शनिंग को रेग्युलेट करने के लिए यानी नियमशुदा करने के लिए 1961 में दुनिया के तमाम आज़ाद देशों के बीच विएना संधि हुई थी. इसके तहत इन सब बातों के लिए नियम बनाए गए कि हाई-कमीशन कैसे काम करेगा. एक देश के डिप्लोमेट को दूसरा देश किस तरह से डील करेगा? वगैरह.

विएना संधि में ही पहली बार ज़िक्र हुआ डिप्लोमेटिक इम्युनिटी (Diplomatic Immunity) का.

# डिप्लोमेटिक इम्युनिटी

..यानी फॉरेन डिप्लोमेट्स को मिली छूट

वियना संधि के तहत फॉरेन डिप्लोमेट्स (एक देश में रह रहे दूसरे देश के राजनयिक) को कुछ ख़ास अधिकार मिले हैं. उन्हें कुछ कानूनों से और टैक्स से छूट मिली है. उस वक्त इसका मकसद था कि डिप्लोमेट्स दूसरे देश में बिना किसी डर के, खुलकर काम कर सकें. डिप्लोमेटिक इम्युनिटी को कुल 187 देशों ने स्वीकार किया है.

डिप्लोमेटिक इम्युनिटी मिली होने के कारण –

अगर किसी देश को लगता है कि फॉरेन डिप्लोमेट ने उनके देश में रहकर कोई ग़ैर-कानूनी काम किया है, तो वे उस पर अपने देश के कानून के तहत केस नहीं चला सकते.

फॉरेन डिप्लोमेट को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, हिरासत में नहीं लिया जा सकता.

फॉरेन डिप्लोमेट्स के घर में घुसकर कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता. जैसे – छापेमारी वगैरह.

तो ऐसी स्थिति में फॉरेन डिप्लोमेट पर क्या एक्शन लिया जा सकता है?

जवाब- उसे पर्सोना नॉन ग्रेटा (अवांछित व्यक्ति) घोषित कर उसके अपने देश डिपोर्ट किया जा सकता है.

किसी फॉरेन डिप्लोमेट्स को उसके देश डिपोर्ट कर देना ही दो देशों के बीच डिप्लोमेटिक संबंधों में सबसे बड़ा और कड़ा एक्शन माना जाता है. और यही एक्शन अब पाकिस्तानी डिप्लोमेट्स पर लिया गया है.

हमने बात शुरू की थी, तो कुलभूषण जाधव का रेफरेंस लिया था. बात ख़त्म भी वहीं पर करते हैं. कुलभूषण पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में पकड़े गए थे. वे नौसेना के पूर्व अधिकारी थे, न कि कोई डिप्लोमेट. और इसी नाते उन्हें डिप्लोमेटिक इम्युनिटी भी हासिल नहीं थी. यानी, उन पर पाकिस्तानी में केस चल सकता था. चला भी. फांसी की सज़ा हुई. केस अभी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) के सामने है.

ये है फर्क. कि क्यों किसी एक ही आरोप में, मसलन जासूसी के आरोप में, किसी भी अन्य व्यक्ति पर तो दूसरे देश में केस चल सकता है, लेकिन डिप्लोमेट्स पर नहीं. मसला-ए-इम्युनिटी है.


पाकिस्तान से आया ये टिड्डी-दल आपकी फसल बर्बाद कर रहा है!

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